कॉलेजियम बहस में उतरे उपराष्ट्रपति, कहा- एनजेएसी क़ानून को रद्द किया जाना गंभीर मसला

कॉलेजियम प्रणाली को लेकर चल रही खींचतान के बीच उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 में एनजेएसी अधिनियम रद्द करने को लेकर कहा कि संसद द्वारा पारित एक क़ानून, जो लोगों की इच्छा को दर्शाता है, उसे शीर्ष अदालत ने ‘रद्द’ कर दिया और ‘दुनिया को ऐसे किसी भी क़दम के बारे में कोई जानकारी नहीं है.’

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़. (फोटो साभार: फेसबुक/@Vice President of India )

कॉलेजियम प्रणाली को लेकर चल रही खींचतान के बीच उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 में एनजेएसी अधिनियम रद्द करने को लेकर कहा कि संसद द्वारा पारित एक क़ानून, जो लोगों की इच्छा को दर्शाता है, उसे शीर्ष अदालत ने ‘रद्द’ कर दिया और ‘दुनिया को ऐसे किसी भी क़दम के बारे में कोई जानकारी नहीं है.’

एलएम सिंघवी स्मृति व्याख्यान में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़. (फोटो साभार: फेसबुक/@Vice President of India )

नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के 2015 के फैसले, जिसमें  उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली को खत्म करने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम, 2014, की मांग की गई थी, को रद्द करने का संदर्भ देते हुए एक कार्यक्रम के कहा कि जब कानून से संबंधित कोई बड़ा सवाल हो तो अदालतें फिर इस मुद्दे पर गौर फरमा सकती हैं.

प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की उपस्थिति में एलएम सिंघवी स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए धनखड़ ने रेखांकित किया कि संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ का उल्लेख है और संसद लोगों की इच्छा को दर्शाती है.

उन्होंने कहा कि एनजेएसी अधिनियम को रद्द किए जाने को लेकर संसद में ‘कोई चर्चा’ नहीं हुई और यह एक ‘बहुत गंभीर मसला’ है.

गौरतलब है कि अक्टूबर 2015 में जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की 22 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाले संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित एनजेएसी अधिनियम, जिसके तहत उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को एक प्रमुख भूमिका दी गई थी, को निरस्त कर दिया था. कोर्ट ने इसे ‘असंवैधानिक’ बताया था.

धनखड़ ने यह भी कहा कि संसद द्वारा पारित एक कानून, जो लोगों की इच्छा को दर्शाता है, उसे उच्चतम न्यायालय ने ‘रद्द’ कर दिया और ‘दुनिया को ऐसे किसी भी कदम के बारे में कोई जानकारी नहीं है.’

उपराष्ट्रपति ने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि जब कानून से संबंधित कोई बड़ा सवाल हो तो अदालतें भी इस मुद्दे पर गौर फरमा सकती हैं.

उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति का बयान सरकार और न्यायपालिका के बीच कॉलेजियम प्रणाली और न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर चल रही खींचतान के बीच आया है. बीते दिनों केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कॉलेजियम व्यवस्था को ‘अपारदर्शी और एलियन’ बताया था. उनकी टिप्पणी को लेकर शीर्ष अदालत ने नाराजगी भी जाहिर की थी.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सीजेआई चंद्रचूड़ द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के विषय पर बोलने के बाद उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘भारतीय संसद 2015-216 में एक संवैधानिक संशोधन अधिनियम देख रही थी और पूरी लोकसभा ने सर्वसम्मति से मतदान किया. न कोई परहेज था और न ही कोई मतभेद और संशोधन पारित किया गया. राज्यसभा में यह लगभग सर्वसम्मत ही था.’

उन्होंने कहा, हम भारत के लोग- उनकी इच्छा को संवैधानिक प्रावधान में बदल दिया गया. जनता की शक्ति, जो एक वैध मंच के माध्यम से व्यक्त की गई थी, उसे खत्म कर दिया गया. दुनिया ऐसे किसी कदम के बारे में नहीं जानती.

धनखड़ ने कहा, ‘इतने जीवंत लोकतंत्र में बड़े पैमाने पर लोगों की नियुक्ति करने वाले संवैधानिक प्रावधान को अगर खत्म कर दिया जाए तो क्या होगा? मैं सभी से अपील कर रहा हूं कि ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें दलगत आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए.

उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद दर्शकों, जिनमें पूर्व सीजेआई आरएम लोढ़ा, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत कई जज और वकील शामिल थे, से कहा, ‘मैं यहां के लोगों- जिसमें न्यायिक अभिजात्य वर्ग, विचारशील व्यक्ति, बुद्धिजीवी शामिल हैं- से अपील करता हूं कि कृपया दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण खोजें जिसमें किसी संवैधानिक प्रावधान को रद्द किया गया हो.’

संविधान के अनुच्छेद 145 (3), जो एक संवैधानिक मामले का फैसला करने के लिए न्यूनतम पांच-न्यायाधीशों की बेंच स्थापित करने का प्रावधान करता है, का उल्लेख करते हुए धनखड़, जो एक वरिष्ठ वकील भी हैं, ने कहा, ‘जब कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न की बात हो तो संविधान की व्याख्या न्यायालय द्वारा की जा सकती. यह कहीं नहीं कहा गया कि प्रावधान को ख़त्म किया जा सकता है.’

यह कहते हुए कि ‘विचार करने में अभी देर नहीं हुई है’ उन्होंने जोड़ा, ‘कानून के एक छात्र के रूप में क्या संसदीय संप्रभुता से कभी समझौता किया जा सकता है? क्या पिछली संसद द्वारा किए गए कार्यों से एक सफल संसद बाध्य हो सकती है?’

धनखड़ ने 26 नवंबर को यहां संविधान दिवस के एक कार्यक्रम में इसी तरह की भावना व्यक्त की थी. उन्होंने कहा कि वह “हैरान हैं कि इस फैसले (एनजेएसी) के बाद संसद में कोई चर्चा नहीं हुई. इसे इस तरह लिया गया. यह बहुत गंभीर मुद्दा है.’

मालूम हो कि केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू पिछले कुछ समय से न्यायपालिका, सुप्रीम कोर्ट और कॉलेजियम प्रणाली को लेकर आलोचनात्मक बयान दे रहे हैं.

अक्टूबर 2022 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का ‘मुखपत्र’ माने जाने वाले ‘पांचजन्य’ की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट और न्यायपालिका के लिए समान शब्दों का इस्तेमाल किया था और कहा था कि न्यायपालिका कार्यपालिका में हस्तक्षेप न करे.

साथ ही, उन्होंने जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली पर निशाना साधते हुए यह भी कहा था कि जजों की नियुक्ति सरकार का काम है. उन्होंने न्यायपालिका में निगरानी तंत्र विकसित करने की भी बात कही थी.

इसी तरह बीते चार नवंबर को रिजिजू ने कहा था कि वे इस साल के शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजद्रोह कानून पर रोक लगाने के फैसले से दुखी थे.

वहीं, बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि सरकार का कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नाम रोके रखना अस्वीकार्य है. साथ ही, कॉलेजियम प्रणाली के बचाव में बीते शुक्रवार को ही सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी संस्था परफेक्ट नहीं है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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