रिजिजू के बयान पर कांग्रेस सांसद ने पूछा- क्या सरकार न्यायपालिका से टकराने का प्रयास कर रही है

बीते हफ्तेभर में केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू संसद में सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत अर्ज़ियां और 'दुर्भावनापूर्ण' जनहित याचिकाएं न सुनने को कह चुके हैं, इसके बाद उन्होंने अदालत की छुट्टियों पर टिप्पणी की और कोर्ट में लंबित मामलों को जजों की नियुक्ति से जोड़ते हुए कॉलेजियम के स्थान पर नई प्रणाली लाने की बात दोहराई.

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संसद सत्र के दौरान केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू और कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी. (फोटो: पीटीआई/संसद टीवी)

बीते हफ्तेभर में केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू संसद में सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत अर्ज़ियां और ‘दुर्भावनापूर्ण’ जनहित याचिकाएं न सुनने को कह चुके हैं, इसके बाद उन्होंने अदालत की छुट्टियों पर टिप्पणी की और कोर्ट में लंबित मामलों को जजों की नियुक्ति से जोड़ते हुए कॉलेजियम के स्थान पर नई प्रणाली लाने की बात दोहराई.

संसद सत्र के दौरान केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू और कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी. (फोटो: पीटीआई/संसद टीवी)

नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कानून मंत्री किरेन रिजिजू के एक बयान का हवाला देते हुए शुक्रवार को लोकसभा में सवाल किया कि क्या सरकार न्यायपालिका के साथ टकराव की जमीन तैयार करने का प्रयास कर रही है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, तिवारी ने लोकसभा में शून्यकाल के दौरान कहा, ‘कानून मंत्री ने हाल ही में बयान दिया कि सुप्रीम कोर्ट को दुर्भावनापूर्ण जनहित यात्रिकाओं और जमानत आवेदनों पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए. उन्होंने यह भी कह दिया कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बहुत अधिक छुट्टियां लेते हैं. और फिर उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों की प्रक्रिया पर सवाल उठाया.’

उन्होंने कहा, ‘इन सबसे एक बहुत ही बुनियादी सवाल उठता है. क्या यह सरकार स्वतंत्रता में विश्वास करती है? क्या यह सरकार अनुच्छेद 21 को मानती है? क्या यह सरकार न्यायपालिका के साथ टकराव की योजना बना रही है?’

उल्लेखनीय है कि बीते बुधवार को राज्यसभा में एक विधेयक को लेकर हो रही चर्चा में कहा था कि ऐसे समय में जब ढेरों मामले लंबित हों, तो सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाओं को जमानत याचिकाओं और बेतुकी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए.

इसके बाद गुरुवार को उन्होंने अदालतों में लंबित मामलों को लेकर पूछे गए एक सवाल को न्यायाधीशों के रिक्त पदों से जोड़ते हुए कहा कि यह मुद्दा जजों की नियुक्तियों के लिए ‘कोई नई प्रणाली’ लाए जाने तक हल नहीं होगा.

उन्होंने इसी दिन यह भी कहा कि ‘भारत के लोगों के बीच यह भावना है कि अदालतों को मिलने वाली लंबी छुट्टी इंसाफ चाहने वालों के लिए बहुत सुविधाजनक नहीं है’ और यह उनका ‘दायित्व है कि वे इस सदन के संदेश या भावना को न्यायपालिका तक पहुंचाएं.’

गौरतलब है कि संसद के दोनों सदनों ने 2014 के अगस्त माह में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) के प्रावधान वाला 99वां संविधान संशोधन सर्वसम्मति से पारित किया था, जिसमें जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की 22 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को एक प्रमुख भूमिका दी गई थी.

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2015 में इस कानून को संविधान के बुनियादी ढांचे के अनुरूप न बताते हुए इसे खारिज कर दिया था.

इसका हवाला देते हुए रिजिजू ने गुरुवार को कहा कि संसद ने सर्वसम्मति से विधेयक पारित किया था, लेकिन 2015 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे रद्द कर दिया गया था. उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली जनता और सदन की भावनाओं को प्रतिबिंबित नहीं करती है.

हालांकि, बीते सप्ताह एनजेएसी के सवाल पर कानून मंत्री ने ही राज्यसभा में कहा था कि सरकार का इसे फिर से लाने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है.

कॉलेजियम प्रणाली बीते कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच गतिरोध का विषय है. कानून मंत्री रिजिजू लगातार मौके-बेमौके कॉलेजियम प्रणाली पर निशाना साधते रहे हैं.

रिजिजू के अलावा बीते 7 दिसंबर को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने अपने पहले संसदीय संबोधन में एनजेएसी कानून को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने को लेकर अदालत पर निशाना साधा था. उनका कहना था कि यह ‘संसदीय संप्रभुता से गंभीर समझौता’ और उस जनादेश का ‘अनादर’ है, जिसके संरक्षक उच्च सदन एवं लोकसभा हैं.

यह पहला अवसर नहीं था जब धनखड़ ने उपराष्ट्रपति बनने के बाद एनजेएसी को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की हो.

बीते 2 दिसंबर को उन्होंने कहा था कि वह ‘हैरान’ थे कि शीर्ष अदालत द्वारा एनजेएसी कानून को रद्द किए जाने के बाद संसद में कोई चर्चा नहीं हुई. उससे पहले उन्होंने संविधान दिवस (26 नवंबर) के अवसर पर हुए एक कार्यक्रम में भी ऐसी ही टिप्पणी की थी.

इससे पहले रिजिजू कुछ समय से न्यायपालिका, सुप्रीम कोर्ट और कॉलेजियम प्रणाली को लेकर आलोचनात्मक बयान देते रहे हैं.

नवंबर महीने में केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कॉलेजियम व्यवस्था को ‘अपारदर्शी और एलियन’ बताया था. उनकी टिप्पणी को लेकर शीर्ष अदालत ने नाराजगी भी जाहिर की थी.

सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम की विभिन्न सिफारिशों पर सरकार के ‘बैठे रहने’ संबंधी आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए रिजिजू ने कहा था कि ऐसा कभी नहीं कहा जाना चाहिए कि सरकार फाइलों पर बैठी हुई है.

नवंबर 2022 में ही सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि सरकार का कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नाम रोके रखना अस्वीकार्य है. कॉलेजियम प्रणाली के बचाव में इसके बाद सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी संस्था परफेक्ट नहीं है.

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