जीएम सरसों के मूल्यांकन की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ: ग़ैर-सरकारी संगठन

ग़ैर-सरकारी संगठनों के एक समूह ने आरोप लगाया कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए जीएम सरसों का परीक्षण देश की नियामक व्यवस्था में निर्धारित सीमित दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है. सरकार ने परीक्षण के दौरान नियमों के उल्लंघन के दावे का खंडन किया है.

/
(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

ग़ैर-सरकारी संगठनों के एक समूह ने आरोप लगाया कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए जीएम सरसों का परीक्षण देश की नियामक व्यवस्था में निर्धारित सीमित दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता है. सरकार ने परीक्षण के दौरान नियमों के उल्लंघन के दावे का खंडन किया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों का विरोध करने वाले गैर-सरकारी संगठनों के एक समूह ने शुक्रवार को एक रिपोर्ट जारी कर जीएम सरसों के मूल्यांकन और उसे मंजूरी दिए जाने की प्रक्रिया में नियमों के ‘उल्लंघन’ का आरोप लगाया गया है.

‘द कोअलिशन ऑफ जीएम-फ्री इंडिया’ की तरफ से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि जीएम-सरसों के मंजूरी-पूर्व मूल्यांकन के दौरान स्वास्थ्य विशेषज्ञों को भी शामिल नहीं किया गया था.

इस रिपोर्ट पर पर्यावरण मंत्रालय की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

अक्टूबर 2022 में पर्यावरण मंत्रालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किस्म ‘धारा मस्टर्ड हाइब्रिड’ (डीएमएच-11) को बीज उत्पादन और व्यावसायिक स्तर पर जारी करने से पहले इसके पर्यावणीय परीक्षण की अनुमति दे दी थी. अभी तक सिर्फ कपास ही ऐसी जीएम फसल है, जिसकी भारत में खेती की अनुमति है.

पर्यावरणीय परीक्षण शुरू होने से पहले गैर-सरकारी संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर परीक्षणों को रोकने के निर्देश देने की मांग की है.

जीएम-विरोधी कार्यकर्ताओं और किसानों के अनुसार, जीएम सरसों खरपतवार-नाशक के प्रति सहनशील फसल है लिहाजा इस पर जहरीले रसायनों का छिड़काव करने से इसका सेवन करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा. उनका यह भी तर्क है कि यह पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है और भारतीय कृषि की स्थितियों के अनुकूल नहीं है.

गैर-सरकारी संगठनों की यह रिपोर्ट 10 जनवरी को मामले पर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली एक महत्वपूर्ण सुनवाई से पहले आई है. उसने रिपोर्ट में आरटीआई, मीडिया रिपोर्टों और सरकारी दिशानिर्देशों से मिली जानकारी का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि ‘यह अनुमोदन भारत के सीमित जैव सुरक्षा नियमों की कुल विफलता को प्रदर्शित करता है और विनियामक व्यवस्था में गंभीर कमियों को भी दर्शाता है.’

इसमें आरटीआई से मिले जवाब का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी भी (स्वतंत्र) स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने जीएम सरसों के मूल्यांकन में कभी भी भाग नहीं लिया.

गैर-सरकारी संगठनों ने कहा कि जीएम सरसों का खरपतवार-नाशी के अनुकूल फसल के रूप में परीक्षण नहीं हुआ क्योंकि इन फसलों के लिए कोई नियामक दिशानिर्देश और प्रोटोकॉल नहीं हैं.

द हिंदू के मुताबिक, कोअलिशन ऑफ जीएम-फ्री इंडिया ही सुप्रीम कोर्ट में आनुवंशिक रूप से संशोधित सरसों के परीक्षणों के खिलाफ मुकदमा लड़ रहा है. इसने अपनी रिपोर्ट में जीएम सरसों के मूल्यांकन और अनुमोदन में कथित नियामक चूक के कम से कम 15 उदाहरण दिए हैं.

गैर-सरकारी संगठनों ने आरोप लगाया कि केंद्र यह कहकर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है कि जीएम सरसों के विकास में कोई नियामक चूक नहीं है.

मंच के पदाधिकारियों ने कहा कि औपचारिक स्वीकृति पत्र जारी किए बिना, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) तीसरे पक्ष के आवेदक की ओर से मामले में कूद पड़ा.

उन्होंने तर्क दिया कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए जीएम सरसों का परीक्षण देश की नियामक व्यवस्था में निर्धारित सीमित दिशानिर्देशों/प्रोटोकॉल का उल्लंघन करता है.

उनकी रिपोर्ट में कहा गया है कि खरपतवारनाशक बेअसर (एचटी) जीएम सरसों की मंजूरी देश के सीमित जैव सुरक्षा नियमों की ‘पूरी तरह विफलता’ और नियामक व्यवस्था में गंभीर कमियों को भी प्रदर्शित करती है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘जीएम सरसों की मंजूरी में स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा के साथ गंभीर समझौता किया गया है. कृषि पर राज्य सरकारों के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन किया गया है और इसे किनारे कर दिया गया है और राज्यों से परामर्श भी नहीं किया गया है, जैसा कि बीटी बैंगन के मामले में किया गया था.’

इसके अनुसार, भारत सरकार और नियामकों ने भारत में खरपतवारनाशक बेअसर फसलों पर प्रतिबंध लगाने की सर्वोच्च न्यायालय की तकनीकी विशेषज्ञ समिति की विज्ञान आधारित सिफारिश की स्पष्ट रूप से अनदेखी और उपेक्षा की है.

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण मंत्रालय के तहत गठित जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) ने 25 अक्टूबर 2022 को ट्रांसजेनिक सरसों हाइब्रिड किस्म डीएमएच-11 को पर्यावरणीय मंजूरी दी थी.

सरकार का यह फैसला हरित समूहों के विरोध के बीच आया था, जिनका कहना है कि जीएम सरसों की व्यावसायिक खेती मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) और संगठन की कृषक इकाई- भारतीय किसान संघ (बीकेएस) ने भी जीएम सरसों को पर्यावरण मंजूरी देने की अनुशंसा किए जाने का विरोध किया है.

वहीं, दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या जीएम सरसों को पर्यावरण मंजूरी देने के पीछे कोई बाध्यकारी कारण रहा है कि ऐसा न करने से देश असफल हो जाएगा.

सरकार ने जीएम सरसो मूल्यांकन के दौरान नियमों के उल्लंघन के दावे का किया खंडन

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं के इस दावे का शनिवार को खंडन किया कि भारत में जीएम सरसों के मूल्यांकन एवं अनुमोदन के दौरान वैधानिक नियमों का उल्लंघन किया गया. उसने कहा कि संबंधित पक्ष के साथ परामर्श के बाद ही इस उत्पाद को सशर्त मंजूरी दी गई.

शनिवार को मंत्रालय ने कहा, ‘जीएम सरसों की जैव-सुरक्षा डोजियर के संबंध में 2016 में उप-समिति द्वारा तैयार खाद्य एवं पर्यावरण सुरक्षा मूल्यांकन रिपोर्ट को मंत्रालय की वेबसाइट पर 30 दिनों (पांच सितंबर से पांच अक्टूबर, 2016) के अंदर लोगों की टिप्पणियों के लिए अपलोड किया गया था.’

उसने कहा, ‘उसी दौरान उस पूरे डोजियर को लोगों द्वारा समीक्षा के वास्ते मंत्रालय के कार्यालय में भी उपलब्ध कराया गया.’

उसने कहा, ‘जीएम सरसों को सशर्त पर्यावरण मंजूरी दी गई, उससे पहले संबंधित पक्षों के साथ परामर्श किया गया जिसकी रूपरेखा 2016 के आनुवांशिक अभियांत्रिकृत पादप विश्लेषण प्रारूप, पक्ष के पर्यावरण जोखिम आकलन मार्गदर्शन में बताई गई है. सशर्त पर्यावरण अनुमोदन की शर्त भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की मंजूरी थी.’

द कोलिशन ऑफ जीएम-फ्री इंडिया ने आरोप लगाया है कि पिछले साल 25 अक्टूबर को औपचारिक मंजूरी देने से बस पहले 22 अक्टूबर को ही सरसों अनुसंधान निदेशालय को बीज मिले थे. इस पर मंत्रालय ने कहा कि पिछले साल 18 अक्टूबर को जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति की 147वीं बैठक में जीएम सरसों को पर्यावरण मंजूरी देने की सिफारिश की गई.

उसने कहा, ‘जीएम सरसों का पर्यावरण संबंधी अनुमोदन पत्र केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी मिलने के बाद 25 अक्टूबर 2022 को जारी किया गया तथा बीज आईसीएआर के सरसों अनुसंधान निदेशालय को 29 अक्टूबर 2022 को भेजे गए.’

एनजीओ ने यह भी दावा किया कि जीएम सरसों का इस बात को लेकर भी परीक्षण नहीं किया कि क्या वह खरपतवारनाशक बेअसर (एचटी) फसल है, क्योंकि एचटी फसलों के लिए कोई ऐसा विनियामक दिशानिर्देश एवं विनियम नहीं हैं.

मंत्रालय ने कहा कि जीएम सरसो के लिए ‘खरपतवारनाशक बेअसर’ शब्द का इस्तेमाल ही गलत है.

इस दावे का कि जब जीएम सरसों को मंजूरी दी गई तब इस तथ्य की अनदेखी की गई कि कृषि राज्य का विषय है, मंत्रालय ने कहा कि जीएम सरसों के प्रथम स्तर के जैव-सुरक्षा अनुसंधान परीक्षण एवं द्वितीय स्तर के जैव सुरक्षा अनुसंधान परीक्षण राज्य सरकारों से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेने के बाद किए गए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)