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भाजपा से संबंध रखने वाली वकील की मद्रास हाईकोर्ट के जज के तौर पर नियुक्ति को मंज़ूरी

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में वकालत करने वालीं लक्ष्मण चंद्र विक्टोरिया गौरी से संबंधित सोशल मीडिया एकाउंट और यूट्यूब पर उपलब्ध भाषणों के अनुसार, वे भाजपा के महिला मोर्चा की महासचिव हैं.

भाजपा के एक कार्यक्रम में लक्ष्मण चंद्र विक्टोरिया गौरी (बीच में). (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

मुंबई: सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जजों का सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक दलों में शामिल होना कोई असामान्य बात नहीं है. न्यायाधीशों के परिवार के सदस्यों का सक्रिय राजनीति में होना भी असामान्य नहीं है. लेकिन स्पष्ट राजनीतिक संबंधों वाले वकील की न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए सिफारिश होना निश्चित तौर पर असामान्य है.

17 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पांच वकीलों को मद्रास हाईकोर्ट के जज के रूप में पदोन्नत करने की सिफारिश की. उन्हीं में से एक हैं, लक्ष्मण चंद्र विक्टोरिया गौरी.

कथित तौर पर उनसे संबंध रखने वाले सोशल मीडिया एकाउंट और यूट्यूब पर उपलब्ध भाषणों के अनुसार, गौरी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की महिला इकाई की महासचिव हैं.

यह स्पष्ट नहीं है कि क्या गौरी अभी भी राजनीतिक दल से जुड़ी हैं, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट के जज के तौर पर उनकी सिफारिश करने के कॉलेजियम के फैसले पर कई लोगों ने सवाल उठाए हैं.

दक्षिणी तमिलनाडु में कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल की 49 वर्षीय वकील गौरी भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित उन 17 वकीलों और तीन न्यायिक अधिकारियों में से एक थीं, जिनका नाम हाल ही में पारित प्रस्तावों में इलाहाबाद, मद्रास और कर्नाटक हाईकोर्ट के जजों के रूप में नियुक्ति के लिए आगे बढ़ाया गया था.

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में दो दशकों से अधिक समय तक वकालत कर चुकीं गौरी कुछ साल पहले ही भाजपा में शामिल हुई थीं.

गौरी के अलावा सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने न्यायाधीश के रूप में चार अन्य वकीलों – वेंकटचारी लक्ष्मीनारायणन, पिल्लईपक्कम बहुकुटुम्बी बालाजी, रामास्वामी नीलकंदन और कंधासामी कुलंदिवलु रामकृष्णन – के नामों को भी जज के रूप में मंजूरी दी है.

शीर्ष अदालत की कॉलेजियम ने एडवोकेट आर. जॉन सत्यन की नियुक्ति मद्रास हाईकोर्ट के जज के रूप में करने संबंधी अपनी 16 फरवरी 2022 की सिफारिश को भी दोहराया, इसके बावजूद भी कि इंटेलिजेंस ब्यूरो ने उनके सोशल मीडिया पोस्टों पर आपत्ति जताई थी, जिनमें एक पोस्ट में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना वाला एक लेख शेयर किया था.

सत्यन अकेले वकील नहीं हैं, जिनके खिलाफ इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) ने प्रतिकूल इनपुट दिए हैं. कथित तौर पर आईबी की रिपोर्ट के कारण एक अन्य वकील अब्दुल हमीद का नाम कॉलेजियम द्वारा मद्रास हाईकोर्ट के जज के रूप में दोहराया नहीं गया है. हमीद अतीत में पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम के साथ काम कर चुके हैं.

बहरहाल, कथित तौर पर गौरी से ताल्लुक रखने वाले ट्विटर हैंडल पर वह पार्टी की सदस्य होने का दावा करती हैं. 31 अगस्त 2019 को हैंडल से किए गए एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, ‘मैं अभी-अभी भाजपा में शामिल हुई हूं, आप भी भाजपा में शामिल हो सकते हैं और नए भारत के निर्माण सहायता के लिए हाथ मिला सकते हैं.’

लेकिन, 2017 के उनके कई वीडियो हैं जो ‘बीजेपी टीवी पर अपलोड किए गए हैं. जहां उन्हें भाजपा महासचिव के तौर पर पेश किया गया है और वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उनके कार्यों के लिए प्रशंसा करती हैं.’

एक पोस्टर जिसमें विक्टोरिया गौरी को भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय मुख्य सचिव दिखाया गया है.

वकीलों ने फैसले की आलोचना की

द वायर ने मदुरै पीठ में वकालत करने वाले कुछ वकीलों से बात की. उन्होंने भी गौरी की राजनीतिक संबद्धता की पुष्टि की. एक वकील ने गोपनीयता की शर्त पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के फैसले से आपत्ति हो सकती हैं, मद्रास हाईकोर्ट और तमिलनाडु राज्य सरकार द्वारा निभाई गई भूमिका को देखना महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट तक उनका नाम यूं ही हवा से नहीं पहुंच गया. जैसा कि प्रक्रिया चलती है, इसकी सिफारिश सबसे पहले मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ मिलकर करते हैं. राज्य सरकार को भी उनके नाम को मंजूरी देनी होती है. मेरे लिए, प्रासंगिक सवाल यह है कि उनके नाम को राज्य स्तर पर ही कैसे मंजूरी मिली.’

एक अन्य वकील ने द वायर को बताया कि मदुरै पीठ की बार एसोसिएशन में कई लोग कॉलेजियम के फैसले के विरोध में हैं. वकीन ने दावा किया, ‘लेकिन कोई भी इसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करेगा.’

गौरतलब है कि राजनीतिक संबद्धता वाले व्यक्ति की न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति होने या सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में शामिल होने से संबंधित कोई संवैधानिक या कानूनी रोक नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई अपनी सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए गए थे.

बॉम्बे और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज अभय थिप्से 2017 में सेवानिवृत्त होते ही कांग्रेस में शामिल हो गए थे. विजय बहुगुणा भाजपा में शामिल होने और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के जज थे.

इस बीच, जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर जज के रूप में नियुक्त होने से पहले केरल की वामपंथी सरकार में मंत्री थे. पहले वे केरल हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट के जज बने.

कई मौजूदा जजों के करीबी परिवार के सदस्य सक्रिय राजनीति में हैं. 2020 में एक कथित गैंगस्टर विकास दुबे की कथित मुठभेड़ में हत्या की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्या यह जज की ओर से ‘अवैध कार्य’ है कि उनके परिवार का कोई सदस्य राजनीति में है.

पिछले कुछ महीनों में केंद्र सरकार ने कॉलेजियम प्रणाली की लगातार आलोचना करके न्यायाधीशों की नियुक्ति में बड़ी भूमिका निभाई है.

द वायर ने गौरी से कई बार संपर्क किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. उनके जवाब देने पर वह रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.