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एमपी के सरकारी स्कूलों में हिंदू ग्रंथ पढ़ाए जाएंगे, इनका अपमान सहन नहीं किया जाएगा: सीएम

कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा रामायण पर आधारित हिंदू धार्मिक पुस्तक रामचरितमानस पर दिए गए विवादास्पद बयानों की पृष्ठभूमि में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की यह चेतावनी आई है. उन्होंने कहा कि रामायण ग्रंथ देने वाले तुलसीदास जी को मैं प्रणाम करता हूं. ऐसे लोग जो हमारे इन महापुरुषों का अपमान करते हैं, वह सहन नहीं किए जाएंगे.

शिवराज सिंह चौहान. (फोटो: पीटीआई)

भोपाल: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को कहा कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में छात्रों को हिंदू धार्मिक ग्रंथ पढ़ाए जाएंगे. उन्होंने इन पूजनीय ग्रंथों का अपमान करने की कोशिश करने वालों को चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों को सहन नहीं किया जाएगा.

गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों में कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा रामायण पर आधारित हिंदू धार्मिक पुस्तक रामचरितमानस पर दिए गए विवादास्पद बयानों की पृष्ठभूमि में भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के मुख्यमंत्री की यह चेतावनी आई है.

चौहान ने राजधानी भोपाल में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि प्राचीन हिंदू महाकाव्य अमूल्य पवित्र ग्रंथ हैं और वे मनुष्य के नैतिक चरित्र के निर्माण में मदद करते हैं.

उन्होंने कहा, ‘हमारे रामायण, महाभारत, वेद, उपनिषद, श्रीभगवद गीता हो, सभी हमारे अमूल्य ग्रंथ हैं. इन ग्रंथों में मनुष्य को नैतिक और पूर्ण बनाने की पूरी क्षमता है. इसलिए हमारे धर्म ग्रंथों की शिक्षा भी हम शासकीय विद्यालयों में देंगे. गीता का सार, रामायण, रामचरितमानस तथा महाभारत के प्रसंग भी पढ़ाएंगे. क्यों नहीं पढ़ाना चाहिए भगवान राम को.’

मुख्यमंत्री ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्य लिखने के लिए 16वीं शताब्दी के भक्ति कवि तुलसीदास की सराहना की.

उन्होंने कहा, ‘रामायण ग्रंथ देने वाले तुलसीदास जी को मैं प्रणाम करता हूं. ऐसे लोग जो हमारे इन महापुरुषों का अपमान करते हैं, वह सहन नहीं किए जाएंगे. मध्य प्रदेश में हमारे इन पवित्र ग्रंथों की शिक्षा देकर हम अपने बच्चों को नैतिक भी बनाएंगे, पूर्ण भी बनाएंगे.’

मालूम हो कि उत्तर प्रदेश के सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीते रविवार (22 जनवरी) को रामचरितमानस के कुछ हिस्सों पर जाति के आधार पर समाज के एक बड़े वर्ग का ‘अपमान’ करने का आरोप लगाया था और कहा था कि इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.

मौर्य ने रामचरितमानस के कुछ हिस्सों पर यह कहते हुए पाबंदी लगाने की मांग की थी कि उनसे समाज के एक बड़े तबके का जाति, वर्ण और वर्ग के आधार पर अपमान होता है.

मौर्य ने कहा था, ‘धर्म का वास्तविक अर्थ मानवता के कल्याण और उसकी मजबूती से है. अगर रामचरितमानस की किन्हीं पंक्तियों के कारण समाज के एक वर्ग का ‘जाति’, ‘वर्ण’ और ‘वर्ग’ के आधार पर अपमान होता हो तो यह निश्चित रूप से ‘धर्म’ नहीं, बल्कि ‘अधर्म’ है. रामचरितमानस में कुछ पंक्तियों में कुछ जातियों जैसे कि तेली और कुम्हार का नाम लिया गया है.’

उन्होंने कहा था, ‘इन जातियों के लाखों लोगों की भावनाएं आहत हो रही हैं. इसी तरह से रामचरितमानस की एक चौपाई यह कहती है कि महिलाओं को दंड दिया जाना चाहिए. यह उन महिलाओं की भावनाओं को आहत करने वाली बात है जो हमारे समाज का आधा हिस्सा हैं.’

इससे पहले बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने बीते 11 जनवरी को नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में ‘रामचरितमानस को समाज में नफरत फैलाने वाला ग्रंथ बताया था.’ उनके इस बयान पर काफी विवाद हुआ था.

उन्होंने कहा था कि मनुस्मृति और रामचरितमानस जैसे हिंदू ग्रंथ दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों और शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं के खिलाफ हैं.

चंद्रशेखर ने कहा था कि मनुस्मृति, रामचरितमानस और भगवा विचारक गुरु गोलवलकर की बंच ऑफ थॉट्स नफरत फैलाते हैं. नफरत नहीं प्यार देश को महान बनाता है. उनके इस बयान के कथित वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए गए हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)