महाराष्ट्र पुलिस सुनिश्चित करे कि हिंदू संगठन के कार्यक्रम में कोई हेट स्पीच न हो: कोर्ट

रविवार को मुंबई में होने वाले हिंदू जन आक्रोश मोर्चा के कार्यक्रम पर उसके पिछले आयोजन में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हेट स्पीच का हवाला देते हुए रोक लगाने की मांग की गई थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार सुनिश्चित करे कि कार्यक्रम में कोई नफ़रती भाषण न दिया जाए. कोर्ट ने पुलिस को कार्यक्रम की वीडियोग्राफी कर एक रिपोर्ट सौंपने को भी कहा है.

New Delhi: A view of Supreme Court of India in New Delhi, Thursday, Nov. 1, 2018. (PTI Photo/Ravi Choudhary) (PTI11_1_2018_000197B)
(फोटो: पीटीआई)

रविवार को मुंबई में होने वाले हिंदू जन आक्रोश मोर्चा के कार्यक्रम पर उसके पिछले आयोजन में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हेट स्पीच का हवाला देते हुए रोक लगाने की मांग की गई थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार सुनिश्चित करे कि कार्यक्रम में कोई नफ़रती भाषण न दिया जाए. कोर्ट ने पुलिस को कार्यक्रम की वीडियोग्राफी कर एक रिपोर्ट सौंपने को भी कहा है.

New Delhi: A view of Supreme Court of India in New Delhi, Thursday, Nov. 1, 2018. (PTI Photo/Ravi Choudhary) (PTI11_1_2018_000197B)
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र सरकार से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि हिंदू जन आक्रोश मोर्चा को मुंबई में पांच फरवरी को एक कार्यक्रम आयोजित करने की अधिकारियों से अनुमति मिलने की स्थिति में उस दौरान कोई नफरती भाषण (हेट स्पीच) नहीं दिया जाए.

महाराष्ट्र सरकार की ओर से शीर्ष न्यायालय में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ को बताया कि राज्य ने यह निर्णय किया है कि यदि कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति दी जाती है, तो यह इस शर्त पर दी जाएगी कि कोई भी व्यक्ति नफरती भाषण नहीं देगा और कानून की अवज्ञा नहीं करेगा, या लोक व्यवस्था में खलल नहीं डालेगा.

पीठ ने मेहता के बयान दर्ज किए और राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने को कहा कि कार्यक्रम में कोई नफरती भाषण न दिया जाए.

न्यायालय ने कहा, ‘हम यह भी निर्देश देते हैं कि अनुमति दिए जाने की स्थिति में और सीआरपीसी की धारा 151 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करने की स्थिति पैदा होने पर, यह प्रावधान लगाना संबद्ध पुलिस अधिकारियों का कर्तव्य होगा.’

शीर्ष न्यायालय शाहीन अब्दुल्ला नामक याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई कर रहा था. उनकी अर्जी में कहा गया था कि पूरे महाराष्ट्र में कई कार्यक्रम और रैलियां हुई हैं, जिसमें मुस्लिम समुदाय के आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार का आह्वान किया गया है, और पूरे समुदाय को अपराधी बताते हुए ‘लैंड जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ के आरोप लगाए गए हैं.

आवेदक ने आरोप लगाया कि ऐसी सामूहिक रैलियां, जिनमें बच्चे भी शामिल होते हैं, वे सरकार की सहमति और जानकारी के साथ आयोजित की जाती हैं. बीते 29 जनवरी को मुंबई में हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों की के संगठा ‘सकल हिंदू समाज’ के तत्वाधान में हिंदू जनाक्रोश मोर्चा के बैनर तले हुई रैली में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक टी. राजा सिंह द्वारा मुसलमानों को मारने का खुला आह्वान किया गया था.

याचिका में यह सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय के हस्तक्षेप का अनुरोध किया गया है कि 29 जनवरी को हिंदू जन आक्रोश मोर्चा की सभा में हुई घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हो. याचिकाकर्ता की ओर से न्यायालय में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 151 लगानी चाहिए, जो उन्हें एक संज्ञेय अपराध रोकने के लिए गिरफ्तारियां करने की शक्ति प्रदान करती है.

सिब्बल ने पूरे कार्यक्रम की ‘वीडियोग्राफी’ कराए जाने और एक रिपोर्ट न्यायालय में सौंपे जाने की मांग की थी, जिस पर पीठ ने अपने आदेश में पुलिस को कार्यक्रम की ‘वीडियोग्राफी’ करने और एक रिपोर्ट सौंपने को कहा.

न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल मेहता से कहा कि वे हिंदू जन आक्रोश मोर्चा के 29 जनवरी के कार्यक्रम के बारे में निर्देश प्राप्त करें.

सुनवाई के दौरान, मेहता ने याचिका का विरोध किया और याचिकाकर्ता पर चुनिंदा तरीके से मुद्दा उठाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता केरल निवासी है, लेकिन उन्होंने महाराष्ट्र में एक प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर चिंता जताई है.

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘अब लोग चुनिंदा तरीके से विषय चुन रहे हैं और इस न्यायालय में आकर इस कार्यक्रम को उत्तराखंड या मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र में प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे हैं. क्या इस न्यायालय को एक ऐसे प्राधिकार में तब्दील किया जा सकता है, जो कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति प्रदान करता हो?’’ उन्होंने कहा कि कार्यक्रम रोकने का अनुरोध स्वीकार करना भाषणों की पहले ही कर दी गई ‘सेंसरशिप’ होगी.

लाइव लॉ के अनुसार, इसका जवाब देते हुए सिब्बल ने कहा कि 29 जनवरी के कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं द्वारा दिए गए ‘गंभीर बयानों’ पर विचार किया जाना चाहिए, इसमें सत्तारूढ़ दल के एक सांसद सहित भागीदारों ने आपत्तिजनक भाषण दिए और अगले चरण की अनुमति देने से पहले इन सभी पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है.

सरकार के वकील ने सिब्बल की दलील का विरोध किया. धारा 151 को लागू करने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए मेहता ने कहा, ‘याचिकाकर्ता न केवल प्री-स्पीच सेंसरशिप (बोलने से पहले रोकना) बल्कि प्री-स्पीच अरेस्ट की भी मांग कर रहे हैं.

यह कहते हुए कि ‘पहले से ही सोचना कि भाषण सही नहीं होगा, मेहता ने आयोजन की वीडियोग्राफी करवाने के अदालत के फैसले को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही जोड़ा कि ‘आदर्श रूप से उत्साही लोगों को रिकॉर्ड करना चाहिए, जो चुनिंदा रूप से आते हैं और इस अदालत के अधिकारक्षेत्र का दुरुपयोग करते हैं.’

इस पर जस्टिस जोसेफ ने मेहता से पूछा, ‘क्या आपको लगता है कि याचिकाकर्ताओं को वीडियोग्राफी करने की अनुमति दी जाएगी?’

ज्ञात हो कि गुरुवार को इस याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग के बाद जस्टिस केएम जोसेफ, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने कड़ी टिप्पणियां करते हुए कहा था कि उसके आदेशों के बावजूद नफरत फैलाने वाले भाषणों (हेट स्पीच) पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा.

पीठ ने कहा था कि अगर शीर्ष अदालत को नफ़रत फैलाने वाले भाषणों पर रोक लगाने के लिए आगे निर्देश देने के लिए कहा गया तो उसे बार-बार शर्मिंदा होना पड़ेगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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