रज़ा का दूसरा जीवन…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कुछ लोग, जो एक जन्म को ही मानते हैं और पुनर्जन्म में यक़ीन नहीं कर पाते, उनमें से अधिकांश के लिए एक ही जीवन हो पाता है, अच्छा-बुरा, जैसा भी. पर कुछ बिरले होते हैं जो अपने विचार या सृजन से लंबा मरणोत्तर जीवन पाते हैं जो कई बार उनके भौतिक जीवन से कहीं अधिक लंबा होता है.

(फोटो साभार: रज़ा फाउंडेशन/फेसबुक पेज)

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कुछ लोग, जो एक जन्म को ही मानते हैं और पुनर्जन्म में यक़ीन नहीं कर पाते, उनमें से अधिकांश के लिए एक ही जीवन हो पाता है, अच्छा-बुरा, जैसा भी. पर कुछ बिरले होते हैं जो अपने विचार या सृजन से लंबा मरणोत्तर जीवन पाते हैं जो कई बार उनके भौतिक जीवन से कहीं अधिक लंबा होता है.

(फोटो साभार: रज़ा फाउंडेशन/फेसबुक पेज)

हम जैसे लोग, जो एक जन्म को ही मानते और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं कर पाते, उनमें से अधिकांश के लिए एक ही जीवन हो पाता है, अच्छा-बुरा, जितना लंबा या छोटा पर एक ही. उनमें से कुछ बिरले होते हैं जो अपने विचार, चिंतन या सृजन द्वारा लंबा मरणोत्तर जीवन पाते हैं जो कई बार उनके भौतिक जीवन से कहीं अधिक लंबा होता है. ऐसों को हम कालजयी मानते-कहते हैं. इसे सौभाग्य ही मानना चाहिए कि हमने अपने समय में ऐसी कालजयिता होते देखी है.

साहित्य और कलाओं में, काल की प्रतिकूलता के बावजूद, उदाहरण के लिए, हमने प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, महादेवी, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद को दूसरा जीवन पाते देखा है. कलाओं में इस कालजयी सूची में अनेक नाम हैं, उदाहरण के लिए, मल्लिकार्जुन मंसूर, बिस्मिल्लाह खां, अली अकबर खां, विलायत खां, रविशंकर, कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी और मक़बूल फ़िदा हुसैन, रज़ा, राम कुमार, अकबर पद्मसी, हबीब तनवीर, इब्राहीम अलकाज़ी, शंभू मित्र, बाल सरस्वती, बिरजू महाराज.

सैयद हैदर रज़ा ने लंबा पहला जीवन जिया. उनका देहावसान 94 से कुछ अधिक आयु में हुआ. उनको अपने जीवन में सभी तरह की उच्चस्तरीय मान्यता मिली. एक वनग्राम में दस झोंपड़ियों में से एक में जन्मे रज़ा वहां से उठकर कहां पहुंचे अब यह सामान्य जानकारी में शामिल है.

छह वर्षों की अथक कोशिश के बाद महीने उनके अब तक के जीवन की, उनके लंबे कला-जीवन की सबसे बड़ी प्रदर्शनी पेरिस के विश्वविख्यात कला संग्रहालय पाम्पिदू केंद्र में 14 फरवरी से होने जा रही है. लगभग 90 कलाकृतियां और उतने ही दस्तावेज़ तीन महीने तक इस प्रदर्शनी में दिखाए जा रहे हैं.

यह शायद किसी आधुनिक कलाकार की फ्रांस में ही नहीं शायद समूचे पश्चिम में अब तक की सबसे बड़ी प्रदर्शनी होगी. उस दौरान उनकी कला पर विभिन्न विशेषज्ञ संवाद करेंगे और कई अन्य बौद्धिक-सर्जनात्मक आयोजन भी होंगे.

रज़ा की कलानिष्ठा, रंगों पर अधिकार, अन्य कलाओं में उनकी गहरी रुचि, अध्यात्म और ऐन्द्रियता की सहवर्तिता, युवा कलाकारों के प्रोत्साहन-समर्थन के लिए उनका उदार उद्यम अब जानी-मानी बातें हैं. उनका दूसरा जीवन और उसमें अंतनिर्हित कालजयिता का लंबा चरण शुरू हो चुका है और दूर तथा देर तक चलेगा इसमें संदेह नहीं. जिस फ्रांस में उन्होंने साठ बरस बिताए वहां के एक बड़े कला संग्रहालय में उनकी इतनी बड़ी और अभूतपूर्व प्रदर्शनी उनके दूसरे जीवन का एक बेहद उजला मुक़ाम होने जा रही है.

‘दुख की राजधानी’

फ्रांस में अतियथार्थवाद की शुरुआत जिन तीन कवियों ने की उनमें से एक थे पॉल एलुआर. 1926 में प्रकाशित उनका कविता संग्रह ‘दुख की राजधानी’ आरंभिक अतियथार्थवाद का सबसे अच्छा उदाहरण है. उसमें ताज़गी तो है ही, पहले विश्वयुद्ध के दारुण अनुभव से उपजी हताशा भी. उसकी दो कविताएं हिंदी अनुवाद में यों हैं:

नंगा सच

निराशा के पंख नहीं
न प्रेम के पास
चेहरा नहीं
वे बोलते नहीं.
मैं चलता नहीं
मैं उन्हें देखता नहीं
मैं उनसे बोलता नहीं
पर मैं सिर्फ़ इतना जीवित हूं
जितना मेरा प्रेम, मेरी निराशा

 

प्रेम में एक स्त्री

वह खड़ी है मेरी पलकों पर
और उसके बाल मेरे बालों से मिलते-जुलते हैं
उसका आकार मेरे हाथों का है
उसके पास मेरी आंखों की आवाज़ है
उसका रंग मेरी आंखों का है
वह घुल जाती है मेरी परछाई में
आकाश के विरुद्ध एक पत्थर की तरह.

उसकी आंखें हमेशा खुली रहती हैं
और वह मुझे सोने नहीं देती
वह दिन में सपने देखती है
सूर्यों को दूर प्रवाहित कर देती है
मुझे हंसाती, रुलाती और हंसाती है
बोलने देती है जबकि मेरे पास कुछ कहने को नहीं होता.

नेरूदा की दो गुमशुदा कविताएं

‘मैंने औरों से अधिक कुछ नहीं किया/शायद किसी से भी कम ही’ कहने वाले पाब्लो नेरूदा की दो गुमशुदा कविताएं, हिंदी अनुवाद में, प्रस्तुत हैं:

1

कहां चले गए तुम, तुमने क्या किया है
ऐ मेरे प्यार
जब तुम नहीं लेकिन सिर्फ़ तुम्हारी छाया
उस दरवाज़े से बाहर आई,
दिन सब कुछ उतार रहा था
जो तुम नहीं हो,
मैं तुम्हें खोजने चला
हर कोने में,
कल्पना करते हुए कि शायद तुम
बंद हो घड़ी में, कि शायद
तुम फिसल गए हो आइने में
कि तुमने अपनी हंसी लपेटी
और छोड़ दिया उसे
एक एशट्रे के पीछे से उछलने को-
तुम वहां नहीं थे, न ही तुम्हारी हंसी
न तुम्हारे केश
न ही तुम्हारी तेज़ पदचाप
दौड़ी आती हुई

2

आकाश पार करते हुए
नियराता हूं तुम्हारे केश की रक्त किरण से.
धरती और गेहूं का हूं मैं और जैसे मैं पास जाता हूं
तुम्हारी आग अपने को उकसाती है
मेरे अंदर और चट्टानें
और पिसान सुलगते हैं.
इसी कारण मेरा हृदय
फूलता है और उठता है रोटी में
तुम्हारे मुंह के खाने के लिए
और मेरा खून तुम्हारे लिए ढाली गई मदिरा.
तुम और मैं देश हैं फलों से भरपूर
रोटी, आग, खून और मदिरा
वह पार्थिव प्रेम रचते हैं
जो हमें झुलसाता है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)