क्या प्रधानमंत्री का मज़ाक़ उड़ाना ईशनिंदा है?

क्या किसी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और सरकार की आलोचना समाज की आलोचना है? क्या भाजपा को यह अहंकार हो गया है कि वही समाज है और जिसे उसने अपना भगवान मान लिया है, वह पूरे समाज का ईश्वर है? उसकी आलोचना, उस पर मज़ाक़ ईशनिंदा है?

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

क्या किसी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और सरकार की आलोचना समाज की आलोचना है? क्या भाजपा को यह अहंकार हो गया है कि वही समाज है और जिसे उसने अपना भगवान मान लिया है, वह पूरे समाज का ईश्वर है? उसकी आलोचना, उस पर मज़ाक़ ईशनिंदा है?

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर भारतीय जनतंत्र की लाज बचा ली है. उसने कांग्रेस पार्टी के नेता पवन खेड़ा को अंतरिम जमानत देने का आदेश दिया. उसने उन पर अलग अलग राज्यों में  दायर एफआईआर को इकट्ठा करने का हुक्म भी दिया. यह भी कहा कि कि वह खेड़ा के वकील की इस बात से सहमत है कि उनपर जो आरोप है उसके लिहाज़ से एफआईआर में जो धाराएं लगाई गई हैं, वे असंगत मालूम होती हैं.

खेड़ा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मज़ाक़ उड़ाने का आरोप है. क्या प्रधानमंत्री का मज़ाक़ उड़ाने से सामुदायिक भावना आहत हो सकती है? क्या समाज में इस मज़ाक़ के कारण वैमनस्य फैल सकता है? सबसे बढ़कर यह बात कि क्या प्रधानमंत्री का मज़ाक़ उड़ाने पर किसी को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए?

इन सवालों पर हम बात करेंगे लेकिन उसके पहले यह समझना ज़रूरी है कि गिरफ़्तारी से कहीं ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है गिरफ़्तारी का तरीक़ा. खेड़ा रायपुर के कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने के लिए अन्य पार्टी सदस्यों के साथ हवाई जहाज़ पर सवार हो चुके थे. उन्हें झूठ बोलकर जहाज़ से नीचे उतरने को बाध्य किया गया. हवाई पट्टी पर उन्हें कहा गया कि दिल्ली के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उनसे मिलेंगे. काफ़ी इंतज़ार कराने के बाद उन्हें बतलाया गया कि असम पुलिस ने दिल्ली पुलिस को खबर की है कि वहां उन पर दायर एक एफआईआर के लिए उन्हें पकड़ा जाना है. असम पुलिस की टीम रवाना हो चुकी है. दिल्ली पुलिस असम की बिरादर पुलिस की मदद कर रही थी.

भारत में पुलिस के कामकाज का सारे लोग जानते हैं. एफआईआर होते ही, जो न क़त्ल की है, न किसी सामूहिक हिंसा की, इतनी तत्परता, इतनी फुर्ती कि 1,000 किलोमीटर से भी अधिक का सफ़र तय करके पुलिस की एक पूरी टुकड़ी असम से दिल्ली पहुंच जाए, यह हम सबके लिए हैरतनाक है. लेकिन ऐसा ही नाटक हम कुछ वक्त पहले देख चुके हैं. गुजरात के कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी को प्रधानमंत्री पर व्यंग्य करने के कारण असम पुलिस ने रातोंरात गुजरात पहुंचकर न सिर्फ़ गिरफ़्तार किया बल्कि वह तुरत-फुरत उन्हें जहाज़ में बिठाकर असम ले भी गई. उन पर भी समाज में विद्वेष फैलाने का इल्ज़ाम था.

जिग्नेश मेवाणी को कुछ दिन असम की जेलों में बिताने पड़े. जब एक अदालत ने उन्हें इस मामले में ज़मानत दे दी, तो असम पुलिस ने उन पर एक दूसरा मामला जड़ दिया कि पुलिस की गाड़ी में उन्होंने महिला पुलिसकर्मी पर हमला किया था. दूसरी अदालत ने फिर जमानत दी. यही नहीं, उसने असम पुलिस को झूठा मामला दर्ज करने के लिए फटकारा और सलाह दी कि कि उसे ख़ुद में सुधार लाना चाहिए.

इस फटकार के 10 महीने बाद ठीक वही हरकत दोहराकर असम पुलिस ने साबित किया कि ख़ुद को सुधारने का उसका कोई इरादा नहीं. जब इसी तरह के मामले में जिग्नेश मेवाणी को असम की अदालत ने तुरत जमानत दे दी थी तो असम पुलिस को पवन खेड़ा को गिरफ़्तार करने में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने की ज़रूरत न थी.

इसका फ़ैसला कोई स्थानीय थाना नहीं कर रहा होगा. यह पुलिस में सर्वोच्च स्तर पर तय किया गया होगा. इसका अर्थ यह भी है कि भाजपा शासित प्रदेशों में पुलिस अपनी पेशेवर बुद्धि का उपयोग नहीं करती.

असम पुलिस के साथ दिल्ली पुलिस ने भी साबित किया कि एक पेशेवर पुलिस दल से ज़्यादा वह शासक दल भारतीय जनता पार्टी की शाखा के तौर पर काम करने को अपना दायित्व मानती है. उसकी यह चुस्ती, दूसरे राज्य के साथ सहयोग करने की प्रस्तुति उन मामलों में ग़ायब हो जाती है जिनमें भाजपा से जुड़े लोग अभियुक्त होते हैं.

भाजपा शासित दूसरे प्रदेशों में भी देखा गया है कि पुलिस न सिर्फ़ भाजपा समर्थकों की गिरफ़्तारी में सहयोग नहीं करती बल्कि उसमें अड़ंगा लगाती है. यह दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने कई मामलों  में साबित किया है.

पवन खेड़ा को जिस तरह घेरा गया,जैसे उनकी बांह पकड़कर लगभग खींचकर ले जाते पुलिसकर्मी उल्लसित थे, वह चिंता की बात है. क्या पवन खेड़ा भागने वाले थे? क्या उन्होंने पुलिस के कहने पर चलने से इनकार किया था? फिर यह ज़बरदस्ती क्यों? पुलिस अपना काम कर रही है या उसे सरकार के आलोचकों के उत्पीड़न में मज़ा आने लगा है?

गिरफ़्तारी के इस अंदाज़, उसकी नाटकीयता का मक़सद सामान्य लोगों और राजनीतिक वर्ग में भी आतंक बिठाने का है. आप सरकार की आलोचना नहीं कर सकते, उस पर या उसके मुखिया पर व्यंग्य भी नहीं कर सकते. जबकि ख़ुद प्रधानमंत्री और उनके दल के बाक़ी सारे लोग फूहड़, हिंसक और नफ़रत भरे बयान देने के लिए आज़ाद हैं. न सिर्फ़ अपने राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ बल्कि मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ भी. और उसे जायज़ सियासी ज़बान माना जाता है.

सरकारी वकील ने पवन खेड़ा के मज़ाक़ के समय उनकी भाव-भंगिमा और उसके चलते आसपास उठी हंसी पर नाराज़गी जतलाई. आख़िर एक चुने हुए प्रधानमंत्री पर मज़ाक़ कैसे किया जा सकता है? यह मज़ाक़ लोगों में उनके प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है. यह एक तरह की ग़द्दारी है.

प्रधानमंत्री पर मज़ाक़ अगर जनतंत्र में नहीं किया जाएगा तो और कहां उसके लिए जगह होगी? विपक्ष का काम ही है सरकार की निगरानी करना और उसके जिस काम या निर्णय को वह ग़लत मानता है, उसके ख़िलाफ़ जनमत तैयार करना. वरना जनतंत्र और क्या है? यह आलोचना रोज़ाना का काम है. इस आलोचना में व्यंग्य भी होगा और सरकार और उसके मुखिया का मज़ाक़ भी उड़ाया जाएगा.

यह मज़ाक़ कई बार अरुचिकर होगा, भदेस और फूहड़ भी हो सकता है. हो सकता है कि उससे मज़ाक़ के निशाने को मानहानि भी लगे. लेकिन यह कहना कि वह समाज में विद्वेष फैला रहा है कुतर्क से अधिक कुछ नहीं. यह ख़याल भी कि एक बार चुनकर सत्ता में आई सरकार के प्रति वफ़ादार रहना सबका कर्तव्य है, जनतंत्र को सिर के बल खड़ा कर देना है.

पवन खेड़ा की गिरफ़्तारी के लिए दिल्ली के हवाई अड्डे पर घेराबंदी के पहले गायिका नेहा सिंह राठौड़ के घर उत्तर प्रदेश की पुलिस पहुंची और उन्हें एक प्रश्न पत्र थमाया. उन्हें कई सवालों के जवाब देने हैं. उनमें सबसे अहम है कि उनके गाने से उत्तर प्रदेश में वैमनस्य फैल रहा है, क्या उन्हें इसका पता है?

नेहा का गीत व्यंग्य और क्रोधपूर्ण व्यंग्य है. सरकार और उसके तंत्र पर व्यंग्य है. सरकार ज़रूर उससे व्यथित ही सकती है लेकिन समाज को क्यों इस गीत से चोट पहुंचेगी? क्या मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और सरकार की आलोचना समाज की आलोचना है? क्या भाजपा को यह अहंकार हो गया है कि वही समाज है और जिसे उसने अपना भगवान मान लिया है, वह पूरे समाज का ईश्वर है? उसकी आलोचना, उस पर मज़ाक़ ईशनिंदा है?

भारतीय जनता पार्टी को इस ख़ामख़याली से बाहर निकल आना चाहिए. उसने ज़रूर जनतंत्र को तिलांजलि दे दी है लेकिन भारत के एक बड़े तबके ने जनतंत्र का अपना अधिकार उसके सुपुर्द नहीं किया है. इसकी क़ीमत है लेकिन जनतंत्र के लिए यह क़ीमत चुकाने को वह तैयार है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)