ईडी की ताक़त बढ़ी, मोदी सरकार ने मनी लॉन्ड्रिंग क़ानून का दायरा बढ़ाया

नए नियमों के अनुसार, ईडी अब जिन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकता है, उनमें 'पॉलिटिकली एक्सपोज़्ड पर्सन्स' (पीईपी) को शामिल किया गया है. साथ ही बैंकों को अब वरिष्ठ नौकरशाहों, वरिष्ठ न्यायिक या सैन्य अधिकारियों और महत्वपूर्ण नेताओं के विस्तृत रिकॉर्ड रखने होंगे.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

नए नियमों के अनुसार, ईडी अब जिन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकता है, उनमें ‘पॉलिटिकली एक्सपोज़्ड पर्सन्स’ (पीईपी) को शामिल किया गया है. साथ ही बैंकों को अब वरिष्ठ नौकरशाहों, वरिष्ठ न्यायिक या सैन्य अधिकारियों और महत्वपूर्ण नेताओं के विस्तृत रिकॉर्ड रखने होंगे.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने मनी लॉन्ड्रिंग के नियमों में बदलाव किए हैं, जिससे इसका दायरा काफी बढ़ गया है जिसके तहत अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) व्यक्तियों और संगठनों के वित्तीय इतिहास तक पहुंच सकता है. इसका असर उन सभी पर होगा, जिनके खिलाफ यह ताकतवर केंद्रीय एजेंसी कार्रवाई कर सकती है.

क्या बदलाव हुए हैं?

रिपोर्ट के अनुसार, ईडी के दायरे को बढ़ाने वाले बदलावों की घोषणा 7 मार्च को वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले राजस्व विभाग द्वारा जारी दो गजट अधिसूचनाओं के माध्यम से हुई.

पहले नोटिफिकेशन में कहा गया है कि 2023 प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग रूल्स में अब एक क्लॉज होगा, जो सरकार के अनुसार ‘राजनीतिक रूप से एक्सपोज़्ड व्यक्ति (पीईपी- Politically Exposed Persons या) से संबंधित होगा.

पीईपी को ‘ऐसे व्यक्तियों के रूप में परिभाषित किया है, जिन्हें किसी बाहरी देश द्वारा प्रमुख सार्वजनिक कार्य सौंपे गए हैं और जिनमें राज्यों या सरकारों के प्रमुख, वरिष्ठ राजनेता, वरिष्ठ सरकारी या न्यायिक या सैन्य अधिकारी, राज्य के स्वामित्व वाले निगम और महत्वपूर्ण राजनीतिक दल के अधिकारी भी इसमें शामिल हैं.

नए नियमों में यह भी कहा गया है कि प्रत्येक बैंकिंग कंपनी या वित्तीय संस्थान या मध्यस्थ को गैर-सरकारी संगठनों के साथ-साथ पीईपी के लेन-देन (transaction) की प्रकृति और कीमत का विस्तृत रिकॉर्ड बनाए रखने की जरूरत होगी.

मिंट के अनुसार, वित्तीय संस्थानों को भारतीय रिज़र्व बैंक के दिशानिर्देशों के तहत पीईपी के लिए ‘नो योर कस्टमर’ (केवाईसी) जांच करने की जरूरत होगी.

इसके अलावा, किसी ट्रस्ट, सोसाइटी या धारा 8 कंपनी के रूप में पंजीकृत सभी धर्मार्थ (चैरिटेबल) संस्थाओं को कवर करने के लिए गैर-लाभकारी संगठन की परिभाषा का विस्तार किया गया है. वित्तीय संस्थानों को अपने संस्थापकों, सेटलर्स, ट्रस्टियों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं का विवरण देना होगा.

अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि प्रत्येक वित्तीय संस्थान को नीति आयोग के दर्पण पोर्टल पर एक गैर-लाभकारी संगठन का विवरण दर्ज करना होगा. ग्राहकों और रिपोर्टिंग इकाई के बीच व्यापार संबंध ख़त्म होने या खाता बंद होने के बाद, जो भी बाद में हो, बैंकों को इन पंजीकरण रिकॉर्ड को पांच साल की अवधि के लिए रखना होगा.

पीएमएलए के अमल की जिम्मेदार ईडी के एक अनाम अधिकारी ने इस अख़बार को बताया, ‘असल में पीएमएलए के तहत वित्तीय रिपोर्टिंग के मकसद के लिए प्रावधानों में राजनीति में जो लोग महत्वपूर्ण हैं, वे सभी, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और यहां तक कि राज्यों के प्रमुख भी शामिल हैं.’

आम चुनावों से महज सालभर पहले बढ़ी ईडी की ताकत

सरकार के इस कदम से ईडी की ताकतें कई गुना बढ़ गई हैं.

जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने ईडी की गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्क करने और पीएमएलए के तहत तलाशी और जब्ती से संबंधित इसकी व्यापक शक्तियों को बरकरार रखा था. भाजपा ने इसे ‘ऐतिहासिक निर्णय‘ बताया था.

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि हर केस में संबंधित व्यक्ति को प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) देना अनिवार्य नहीं है. ईसीआईआर ईडी की पुलिस एफआईआर के समान होती है.

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने इस फैसले के ‘दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर गहरी चिंता‘ व्यक्त की थी.’

इसके एक महीने बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि असाधारण मामलों में मुकदमे से पहले संपत्ति पर कब्जा करने की ईडी की शक्तियों पर इसी अदालत का फैसला मनमाने तरीके से अमल में लाए जाने की गुंजाइश छोड़ता है और इसे अधिक स्पष्टीकरण की जरूरत है.

सुप्रीम कोर्ट 2021 में ईडी निदेशक संजय कुमार मिश्रा को दिए गए कार्यकाल विस्तार के खिलाफ मामले की भी सुनवाई कर रहा है. केंद्र सरकार ने विस्तार के खिलाफ याचिकाओं को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया है.

मिश्रा को पहली बार 19 नवंबर, 2018 को एक आदेश के जरिये दो साल की अवधि के लिए ईडी निदेशक नियुक्त किया गया था. उन्हें नवंबर, 2020 में कार्यालय छोड़ना था और उसी साल मई में वह 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति की आयु के हो चुके थे. लेकिन, 13 नवंबर, 2020 को एक कार्यालय आदेश के माध्यम से, नियुक्ति पत्र को केंद्र सरकार द्वारा पूर्वव्यापी रूप से संशोधित किया गया और मिश्रा के दो साल के कार्यकाल को तीन साल से बदल दिया गया.

इस मामले में अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता केवी विश्वनाथन ने हाल ही में कहा था कि इस तरह का विस्तार गैरक़ानूनी था.

ईडी और विपक्ष

ये बदलाव ऐसे समय में किए गए हैं जब केंद्र सरकार पर भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ अन्य केंद्रीय एजेंसियों के साथ ईडी का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया जा रहा है. आम चुनावों के पास आने के मद्देनजर देश में राजनीतिक गतिविधि तेज होने के साथ ही विपक्षी दलों द्वारा केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप बार-बार लगाए गए हैं.

सितंबर 2021 में फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने बताया कि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से ईडी द्वारा 121 नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए और इसमें से 115, यानी  95% विपक्षी दल के सदस्य हैं.

बहुत समय पहले की बात जाने दें, शुक्रवार (10 मार्च) को ही ईडी अधिकारियों ने नौकरी के बदले जमीन मामले में बिहार के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव के दिल्ली स्थित आवास पर छापेमारी की है.

इस बीच, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता को ईडी के समन को लेकर भी चर्चा हो रही है. पूछताछ से एक दिन पहले दिल्ली में कविता ने एनडीटीवी से कहा कि ‘किसी भी केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा पूछताछ करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पूछताछ किए जाने के बराबर है.’

शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कविता के एक दिन के धरने में कम से कम 12 विपक्षी दलों के नेता भी शामिल रहे. कविता ने कहा है कि उनका मानना है कि उन्हें इसलिए समन मिला क्योंकि उनकी पार्टी ने महिला आरक्षण विधेयक के लिए आंदोलन को बढ़ावा देने वाले पोस्टर लगाए थे.

कविता को दिल्ली आबकारी नीति मामले में तलब किया गया है. इसी गुरुवार को ईडी ने इस मामले में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार किया था. सिसोदिया पहले से ही जेल में है क्योंकि सीबीआई उसी मामले की जांच कर रही है.

सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद केंद्रीय जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के खिलाफ आठ विपक्षी दलों ने पीएम मोदी को पत्र लिखा था.

दूसरी तरफ, जहां तक एनजीओ और गैर-लाभकारी संगठनों की बात है- जिनमें से कई ने महामारी के दौरान गरीबों को खाना खिलाने और आश्रय देने महत्वपूर्ण योगदान दिया था- वे पहले ही विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के नियमों को कड़ा किए जाने के बाद जांच के दायरे में आ गए थे. सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च सहित कई थिंक टैंक और मदर टेरेसा द्वारा स्थापित धर्मार्थ संगठनों सहित कई उनके पंजीकरण को लेकर मुश्किल में पड़ चुके हैं.

क्रिप्टो

वित्त मंत्रालय की दूसरी गजट अधिसूचना में क्रिप्टोकरेंसी या ‘वर्चुअल डिजिटल एसेट्स’ शामिल हैं और इसे 2002 के मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के दायरे में लाया गया है.

अधिनियम में अब ऐसी गतिविधियां शामिल होंगी जो वर्चुअल संपत्ति से संबंधित हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं:

  1. वर्चुअल डिजिटल एसेट और फिएट मुद्राओं के बीच विनिमय
  2. वर्चुअल डिजिटल एसेट के एक या एक से अधिक प्रारूपों के बीच विनिमय
  3. वर्चुअल डिजिटल एसेट को ट्रांसफर करना
  4. वर्चुअल डिजिटल एसेट याइसे नियंत्रित करने वाले उपकरणों का रखरखाव या उन्हें चलाना
  5.  किसी जारीकर्ता के प्रस्ताव और वर्चुअल डिजिटल एसेट को बेचने से संबंधित वित्तीय सेवाओं में हिस्सा लेना और उसके प्रावधान

उल्लेखनीय है कि क्रिप्टो ट्रांज़ैक्शन करने वाले थर्ड पार्टी पोर्टल्स भी अब पीएमएलए के दायरे में आएंगे.

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