सुप्रीम कोर्ट का सवाल- आपको नहीं लगता कि सांप्रदायिक सद्भाव के लिए घृणा भाषण का त्याग ज़रूरी है

जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने नफ़रती भाषण के ख़िलाफ़ एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सॉलिसिटर जनरल से यह सवाल किया. अक्टूबर 2022 में शीर्ष अदालत ने औपचारिक शिकायतों का इंतज़ार किए बिना आपराधिक मामले दर्ज करके नफ़रत भरे भाषणों के ख़िलाफ़ ‘तत्काल’ स्वत: कार्रवाई करने का निर्देश दिया था.

(फोटो: पीटीआई)

जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने नफ़रती भाषण के ख़िलाफ़ एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सॉलिसिटर जनरल से यह सवाल किया. अक्टूबर 2022 में शीर्ष अदालत ने औपचारिक शिकायतों का इंतज़ार किए बिना आपराधिक मामले दर्ज करके नफ़रत भरे भाषणों के ख़िलाफ़ ‘तत्काल’ स्वत: कार्रवाई करने का निर्देश दिया था.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारत के सॉलिसिटर जनरल से सवाल किया कि क्या आपको नहीं लगता कि देश में ‘सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए नफरत फैलाने वाले भाषणों (Hate Speech) का त्याग एक बुनियादी आवश्यकता है’.

जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने नफरती भाषण के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, अधिवक्ता निजाम पाशा ने पीठ को बताया कि अपने पहले के आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि सरकारों को किसी भी शिकायत का इंतजार किए बिना किसी भी नफरती भाषण के खिलाफ स्वत: कार्रवाई करनी चाहिए.

पाशा ने अदालत में प्रस्तुत किया कि उक्त आदेश के मद्देनजर इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक समाचार लेख के आधार पर एक अवमानना ​​याचिका दायर की गई है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि पिछले 4 महीनों में महाराष्ट्र में नफरत फैलाने वाली 50 रैलियां हुई हैं. उन्होंने कहा, ‘हर दो दिन में एक अभद्र भाषा का कार्यक्रम सिर्फ महाराष्ट्र में हो रहा है.’

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले सकल हिंदू समाज द्वारा आयोजित रैलियों के संबंध में महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिए थे.

समाचार रिपोर्टों के आधार पर दायर याचिका पर भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताई.

यह देखते हुए कि पाशा द्वारा दिए गए आंकड़े केवल महाराष्ट्र से संबंधित हैं, सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘केरल का यह व्यक्ति (याचिकाकर्ता) महाराष्ट्र के बारे में पूरी तरह से जानता है. देश के बाकी हिस्सों में पूरी तरह से शांति है? उनका जनहित महाराष्ट्र तक ही सीमित है.’

उन्होंने कहा कि घृणा अपराधों की रिपोर्ट करने के लिए याचिकाकर्ता सीआरपीसी के तहत मजिस्ट्रेट की अदालत से संपर्क कर सकता है. इसके बजाय याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत के समक्ष अवमानना ​​याचिका दायर की है, वह भी समाचार रिपोर्ट के आधार पर.

जस्टिस केएम जोसेफ ने टिप्पणी की कि जब न्यायालय ने आदेश पारित किया था, तो उसे देश में मौजूदा परिस्थितियों के बारे में पता था.

उन्होंने कहा, ‘अगर इस अदालत का कोई आदेश है, तो हमने देश में क्या हो रहा है, इसकी एक निश्चित समझ पर इसे पारित किया है. हम समझते हैं कि क्या हो रहा है, इस तथ्य को गलत नहीं समझा जाना चाहिए कि हम चुप हैं.’

न्यायाधीश ने कहा कि पहले सॉलिसिटर जनरल ने शालीनता से स्वीकार किया था कि वर्तमान मामला ऐसा है जो भारत के लोकतंत्र के दिल तक जाता है.

उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से पूछा, ‘क्या आप इस देश के सॉलिसिटर जनरल के रूप में नहीं सोचते हैं कि सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए अभद्र भाषा का त्याग करना मूलभूत आवश्यकता है?’

लाइव लॉ के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल ने इसका सकारात्मक जवाब दिया. इसके बाद न्यायाधीश ने कहा, ‘वास्तव में आपको कहना चाहिए कि आप कार्रवाई करेंगे.’ मेहता ने उन्हें बताया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा कार्रवाई की जा चुकी है.

जस्टिस जोसेफ ने पूछा, ‘कितनी एफआईआर दर्ज की गईं.’ इस पर मेहता ने बताया कि अब तक 18 एफआईआर दर्ज की गई हैं.

फिर न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि एफआईआर दर्ज करने के बाद अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की है? सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि अगर न्यायालय जांच की निगरानी करने के लिए तैयार है, तो वह न्यायालय की बेहतर सहायता के लिए एक रिपोर्ट दायर करेंगे.

मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज की आपत्तियों के बावजूद पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख बुधवार (29 मार्च) को तय कर दी.

मालूम हो कि अक्टूबर 2022 में शीर्ष अदालत ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पुलिस प्रमुखों को औपचारिक शिकायतों का इंतजार किए बिना आपराधिक मामले दर्ज करके नफरत भरे भाषणों के अपराधियों के खिलाफ ‘तत्काल’ स्वत: कार्रवाई करने का निर्देश दिया था.

इसके अलावा शीर्ष अदालत ने तीनों राज्यों की सरकारों को उनके अधिकार क्षेत्र में हुए नफरत भरे भाषणों से संबंधित अपराधों पर की गई कार्रवाई के संबंध में अदालत के समक्ष एक रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया था.

पीठ ने कहा था कि राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बनाए रखने के लिए नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए, भले ही वे किसी भी धर्म के हों.

पीठ ने आदेश में कहा था, ‘भारत का संविधान इसे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और बंधुत्व के रूप में देखता है, व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करता है और देश की एकता और अखंडता प्रस्तावना में निहित मार्गदर्शक सिद्धांत हैं. जब तक विभिन्न धर्मों या जातियों के समुदाय के सदस्य सद्भाव से रहने में सक्षम नहीं होंगे, तब तक बंधुत्व नहीं हो सकता है.’

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में नफरती भाषणों से निपटने के लिए औपचारिक कानूनी ढांचा नहीं है, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के प्रावधानों का एक समूह (धारा 153ए और 295ए), नफरत फैलाने वाले भाषणों को शिथिल रूप से परिभाषित करता है.

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