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सवाल नरेंद्र मोदी की पढ़ाई लिखाई का नहीं, बल्कि फ़र्ज़ी डिग्री के आरोप का है

भारत में सांसद और विधायक बनने के लिए किसी भी तरह की डिग्री की ज़रूरत नहीं है. मगर इसका मतलब यह नहीं है कि सांसद और विधायक अपने चुनावी हलफ़नामे में अगर फ़र्ज़ी डिग्री पेश करें तो यह कोई ग़लती नहीं है. नरेंद्र मोदी की डिग्री को लेकर गुजरात हाईकोर्ट का फैसला इस तरह के संशय को बढ़ाता ही है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेताओं द्वारा 2016 में एक प्रेस वार्ता में साझा की गई उनकी डिग्रियां. (फोटो: पीटीआई)

भारत में सांसद और विधायक बनने के लिए किसी भी तरह की डिग्री की ज़रूरत नहीं है. मगर इसका मतलब यह नहीं है कि सांसद और विधायक अपने चुनावी हलफ़नामे में अगर फ़र्ज़ी डिग्री पेश करें तो यह कोई ग़लती नहीं है. नरेंद्र मोदी की डिग्री को लेकर गुजरात हाईकोर्ट का फैसला इस तरह के संशय को बढ़ाता ही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेताओं द्वारा 2016 में एक प्रेस वार्ता में साझा की गई उनकी डिग्रियां. (फोटो: पीटीआई)

भारतीय संविधान का कोई भी अनुच्छेद या प्रावधान और न ही जनप्रतिनिधित्व कानून की कोई धारा सांसदों और विधायकों के चुनाव के लिए किसी तरह की शैक्षणिक योग्यता की शर्त की बात करती है. मतलब भारत में सांसद और विधायक बनने के लिए किसी भी तरह की डिग्री की जरूरत नहीं है. मगर इसका मतलब यह नहीं है कि सांसद और विधायक अपने चुनावी हलफनामे में अगर फर्जी डिग्री पेश करेंगे तो यह कोई गलती नहीं है.

फर्जी डिग्री पेश करने का मतलब है कि वोटरों को उम्मीदवार ने गलत जानकारी देकर बहकाने का काम किया है. इंडियन पैनल कोड की धारा 191 के मुताबिक यह एक दंडनीय अपराध है. सदस्यता खारिज होने की संभावना भी बन सकती है.

गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के जरिये दिए गए उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें सीआईसी ने गुजरात यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री साझा करने का आदेश दिया था. इसके साथ ही अरविंद केजरीवाल पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगा दिया गया है.

यह फैसला आने के बाद गांव देहात में प्रधानमंत्री के समर्थक भी हंस रहे हैं और और दबी जुबान में पूछ रहे हैं कि आखिरकार यह कैसा फैसला है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री असली है या फर्जी, इसे लेकर लोगों के मन में संशय क्यों बढ़ता जा रहा है?

अरविंद केजरीवाल अपना पक्ष रखते हुए लोगों को यह बात भी समझा रहे हैं कि क्यों एक प्रधानमंत्री को पढ़ा-लिखा होना जरूरी है? सांसद और विधायकों की शैक्षणिक योग्यता को लेकर भारत के संविधान से निकली समझ क्या कहती है? पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा वह कौन से पैमाने हैं जिनके आधार पर आधार पर हमें नेताओं को परखना चाहिए?

कहां से शुरू हुआ था डिग्री विवाद

आम आदमी पार्टी के पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर पर हलफनामे में फर्जी डिग्री दाखिल करने का आरोप लगा था. इसी समय भाजपा सरकार में मंत्री के तौर पर कार्यरत स्मृति ईरानी पर भी फर्जी डिग्री का आरोप लगा था. मगर दिल्ली पुलिस ने जितेंद्र सिंह तोमर के मामले में जितनी तत्परता दिखाई उसके मुकाबले स्मृति ईरानी के मामले पर रत्ती भर भी नहीं दिखाई.

जितेंद्र सिंह तोमर को गिरफ्तार किया गया. साल 2015 में फर्जी डिग्री के चलते इन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी साल दिल्ली विधानसभा में इनकी सदस्यता भी रद्द कर दी. जब यह मामला उठा और अरविंद केजरीवाल की सरकार को घेरा जाने लगा तो यहीं से हवाओं में तैर रहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की से जुड़ा विवाद भी तूल पकड़ने लगा.

आम आदमी पार्टी के नेता अपने डिग्री दिखा रहे थे और चुनौती दे रहे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी डिग्री दिखाएं. यहीं मामला बढ़ते-बढ़ते यहां तक चला आया है कि देश यह जानना चाहता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री फर्जी तो नहीं हैं?

साल 2014 में चुनाव आयोग को सौंपे गए अपने हलफनामे में नरेंद्र मोदी ने पहली बार में स्वीकार किया कि वह शादीशुदा हैं. 2014 से पहले लड़े गए गुजरात के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने अपने हलफनामे में शादीशुदा होना कभी स्वीकार नहीं किया था. यही बात लोगों को खटकी. लोगों को लगा कि जो व्यक्ति अपनी शादीशुदा होने की जानकारी झूठी दे सकता है वह कई सारी जानकारियां भी झूठी दे सकता है. यहीं से यह संदेह भी पनपने लगा दी क्या नरेंद्र मोदी की सौंपी गई दूसरी जानकारियां सही है या नहीं?

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग को सौंपे गए हलफनामे के मुताबिक, नरेंद्र मोदी ने साल 1978 में डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम के तहत दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए और साल 1983 में गुजरात यूनिवर्सिटी से एमए की डिग्री हासिल की है. नरेंद्र मोदी के इस दावे को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय, चुनाव आयोग, दिल्ली यूनिवर्सिटी और गुजरात यूनिवर्सिटी में कई सारे आरटीआई दाखिल किए गए. प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब आया कि चुनाव आयोग से पूछिए. चुनाव आयोग से जवाब आया कि चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जाकर देख लीजिए. गुजरात यूनिवर्सिटी ने जवाब दिया कि साल 2005 के सूचना के अधिकार के कानून के तहत यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती है.

दिल्ली के एक निवासी हंसराज जैन ने भी दिल्ली यूनिवर्सिटी में आरटीआई दाखिल कर नरेंद्र मोदी की डिग्री के बारे में पूछताछ की थी. उन्हें भी किसी तरह का मुकम्मल जवाब नहीं मिला. इसी समय आम आदमी पार्टी के नेता जितेंद्र सिंह तोमर पर भी फर्जी डिग्री विवाद का मामला चल रहा था. आम आदमी पार्टी पर जमकर हमला हो रहा था.

इसी समय केंद्रीय सूचना आयोग ने केजरीवाल से उनके चुनावी फोटो पहचान पत्र के बारे में जानकारी भी मांगी थी. अप्रैल 2016 में अरविंद केजरीवाल ने चीफ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर यानी सीआईसी श्रीधर आचार्यलु को बड़े ही कठोर शब्दों में चिट्ठी लिखी और नरेंद्र मोदी से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक करने की बात कही.

केंद्रीय सूचना आयोग ने इस चिट्ठी को एक आरटीआई आवेदन माना और गुजरात यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी को आदेश दिया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिग्री से जुड़ी जानकारियां साझा करें.

इसी के बाद भाजपा के नेता अमित शाह और अरुण जेटली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीए और एमए की डिग्री सार्वजनिक करते हुए कहा था कि अरविंद केजरीवाल ने देश का नाम बदनाम किया है. उन्हें माफी मांगनी चाहिए.

नरेंद्र मोदी की डिग्री दिखाते अमित शाह और अरुण जेटली. (फाइल फोटो: पीटीआई)

इसके जवाब में आम आदमी पार्टी के उस समय के नेता आशुतोष ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि अमित शाह और अरुण जेटली भगवान नहीं है कि उनकी बात मान ली जाए. सार्वजनिक की गई डिग्री में कई खामियां हैं. यह डिग्री फर्जी है.

गुजरात यूनिवर्सिटी सीआईसी के नरेंद्र मोदी के डिग्री देने के आदेश को चुनौती देते हुए गुजरात हाईकोर्ट चली गई थी. यूनिवर्सिटी ने कहा था कि आयोग का आदेश त्रुटिपूर्ण है, इसे रद्द करने की जरूरत है. सात साल बाद अब इसी मामले पर फैसला आया है.

गुजरात हाईकोर्ट का फैसला

गुजरात हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के जज बीरेन वैष्णव ने सीआईसी के 2016 में दिए गए आदेश को रद्द कर दिया है. इसके साथ अरविंद केजरीवाल पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसे चार हफ्तों के भीतर गुजरात राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के पास जमा करना होगा.

जानकारों का कहना है कि मोदी सरकार के दौर में मौजूद संस्थाओं की आजादी को लेकर अनगिनत सवाल खड़े हो चुके हैं. यह फैसला भी उसी फेहरिस्त में शामिल होता है.

इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि अमित शाह के जरिये प्रधानमंत्री की जो डिग्री सार्वजनिक की गई है. वह फर्जी है. अपने आप में कई सवाल खड़ा करती है. प्रधानमंत्री के मास्टर ऑफ आर्ट यानी एमए की डिग्री में यूनिवर्सिटी की स्पेलिंग गलत है. यूनिवर्सिटी में ‘विक्ट्री वी’ आता है जबकि इसमें इस्तेमाल ‘बैट वाला बी’ किया गया है. इस तरह से यह यूनिवर्सिटी के बजाय यूनिबर्सिटी हो गया.

मगर फैक्ट चेक वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ के पत्रकार अभिषेक ने ट्वीट कर या जानकारी दी कि वहां ‘यूनिबर्सिटी’ नहीं लिखा है. यह वर्तनी की गलती नहीं है. हो सकता है कि उस तरह के फॉन्ट का उपयोग किया गया हो, जहां लोअरकेस ‘वी’ लोअरकेस ‘बी’ जैसा दिखता है.

उधर, संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा कि जिस फॉन्ट में मास्टर ऑफ आर्ट्स लिखा गया है उसकी शुरुआत साल 1992 में की गई है. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि उन्होंने 1983 में एमए की डिग्री हासिल कर ली थी. इसका मतलब क्या बनता है?

फैसले से आगे

गुजरात हाईकोर्ट का फैसला हास्यास्पद है. भारत के चुनाव आयोग का नियम कहता है कि अगर चुनाव आयोग को सौंपी गई डिग्री फर्जी निकलती है तो सदस्यता खारिज हो सकती है. यह बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा है. न वह सांसद बचेंगे और न ही वह चुनाव लड़ सकेंगे.

अरविंद केजरीवाल ने भी गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस का लब्बोलुबाब यह रहा कि देश इसलिए नहीं तरक्की कर पा रहा है कि देश के पास पढ़ा-लिखा प्रधानमंत्री नहीं है. 21वीं सदी में पढ़ा-लिखा प्रधानमंत्री होना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि नाले के गैस से चाय बनाई जा सकती है. बादलों के पीछे से अगर हवाई जहाज जाए तो उसे रडार नहीं पकड़ पाएगा. क्लाइमेट चेंज कोई समस्या नहीं है. क्या कोई पढ़ा-लिखा प्रधानमंत्री इस तरह की बातें करेगा? ऐसी बातें सुनकर पूरी दुनिया भारत पर मुंह दबाकर हंसती है. अगर देश का प्रधानमंत्री पढ़ा-लिखा नहीं होगा तो आप उससे किसी भी कागज पर दस्तखत करवा लेंगे.

उन्होंने यह भी जोड़ा कि गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री पर और अधिक संशय बढ़ गया है. देश की जनता जानना चाहती है कि उनका प्रधानमंत्री कितना पढ़ा लिखा है? जनता पूछ रही है कि अगर डिग्री है तो गुजरात विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय डिग्री दिखा क्यों नहीं देते? जनता के मन में संशय उठ रहा है या तो डिग्री है नहीं और अगर है तो फर्जी है क्या?

अरविंद केजरीवाल की आधी बात तो ठीक है कि गुजरात हाईकोर्ट का फैसला इस बात को लेकर संशय ज्यादा पैदा करता है कि प्रधानमंत्री की डिग्री असली है भी या नहीं? लोग जानना भी चाहते हैं कि वह कैसे माने कि प्रधानमंत्री की डिग्री फर्जी नहीं है? मगर प्रधानमंत्री की पढ़ाई लिखाई और हास्यास्पद बयानों के जरिये वह देश की तरक्की के लिए और प्रधानमंत्री के पद के लिए पढ़े-लिखे होने की शर्त की जो वकालत कर रहे हैं उसमें शातिरपन ज्यादा है.

क्या बनना चाहिए कोई कानून?

हकीकत यह है कि संविधान सभा में इस पर खूब बहस हुई थी कि जनप्रतिनिधि के चुनाव यानी सांसद और विधायक के चुनाव में शैक्षणिक योग्यता की शर्त रखनी चाहिए या नहीं? लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है कि ऐसी कोई शर्त नहीं बननी चाहिए जिसके पैमाने पर बहुत सारे लोगों को वंचित रहना पड़े.

सब जानते हैं कि भारत एक गरीब मुल्क हैं. आजादी के 75 साल बीतने के बाद भी भारत की बहुत बड़ी आबादी उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती है. मतलब डिग्रियों का प्रावधान बनाएंगे तो अब भी बहुत बड़ी आबादी लोकतंत्र से बाहर चली जाएगी. सबको पता है कि शिक्षा बहुत जरूरी है. मगर चुनाव लड़ने के लिए शिक्षा को अनिवार्य कर देने का मतलब होगा एक ऐसा सिस्टम बनाना जो बहुत बड़ी आबादी को लोकतंत्र से बाहर करना. यह नाइंसाफी भरा होगा.

अगर आप अब भी लोकतंत्र में सबकी भागीदारी का मतलब नहीं समझ पा रहे हैं तो इसे ऐसे समझिए कि अगर शैक्षणिक योग्यता जैसी कोई भी शर्त लगाई जाएगी तो इसमें गरीब, हाशिये के तबके से आने वाले लोग, महिलाएं जैसी बड़ी आबादी भागीदारी नहीं कर पाएगा. भारतीय लोकतंत्र पन्नों पर ही अभिजात्य लोकतंत्र बनकर रह जाएगा.

इसके साथ यह भी समझने वाली बात है कि एक व्यक्ति घर की चारदीवारी में रहकर सांसद या विधायक नहीं बनता है. बल्कि जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ता है. जनता के बीच जाकर अपनी बात रखता है. अपने विचार व्यक्त करता है. जनता के पास पूरा मौका का होता है कि उसे परखे. परखने का इमानदार पैमाने बनाएं.

मौजूदा वक्त की चुनाव प्रणाली की असली दिक्कत यह नहीं है कि चुनाव लड़ने के कानून के किसी प्रावधान में शैक्षणिक योग्यता का प्रावधान नहीं है बल्कि असली दिक्कत यह है कि मीडिया सीबीआई, ईडी जैसे संस्थानों के जरिये सिस्टम इतना तोड़-मरोड़ दिया गया है कि जनता का परखने का पैमाना ही बेईमान बनते चले जा रहे है. अब अगर मीडिया के जरिये 24 घंटे मुस्लिमों के खिलाफ जहर फैलाने वाले लोगों की वकालत की जाएगी तो कैसे जनता के परखने का पैमाना बढ़िया बन सकता है?

और ध्यान दीजिएगा कि इन सभी संस्थानों पर कोई अनपढ़ नहीं पहुंचता बल्कि अच्छे खासे पढ़े-लिखे लोग ही पहुंचते हैं. अरविंद केजरीवाल से पूछना चाहिए कि वह इन पढ़े-लिखे लोगों के बारे में क्या कहते हैं?

जहां तक बात रही नरेंद्र मोदी की मूर्खतापूर्ण बयानों की, तो वह पढ़ाई लिखाई कम होने या अनपढ़ होने का मसला नहीं है. पढ़े-लिखे लोग भी बहुत ज्यादा मूर्खतापूर्ण, कुतार्किक बातें करते रहते हैं. खोजने निकलेंगे, तो आईएएस और जजों के पद पर नियुक्त हो चुके कई लोगों के ऐसे बयान देखने को मिल जाएंगे.

नरेंद्र मोदी मूर्खतापूर्ण बयान इसलिए दे पाते हैं कि उन्हें यकीन है कि सवाल पूछने वाली संस्थाएं उनसे खुलकर सवाल नहीं पूछेंगी. जो सवाल पूछना चाहते हैं उन्हें सवाल पूछने नहीं देंगे. उन्होंने अपने आसपास ऐसा माहौल बनाया है जो एक तानाशाही व्यक्ति का रवैया होता है. अगर उन्हें इस बात का डर होता कि उनके बोले गए और किए गए कामों की जायज छानबीन जनता के सामने पेश की जाएगी तो वह कुछ भी मूर्खतापूर्ण और अशोभनीय बोलने से पहले अपने वक्तव्य पर 4 बार सोचते हैं. अगर सिस्टम ढंग से काम करें तो संवैधानिक पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति की इतनी हिम्मत नहीं हो सकते हो कि वह संवैधानिक मर्यादाओं को लांघकर कोई बात करें या कोई काम करें.

अरविंद केजरीवाल का कहना है कि भारत के प्रधानमंत्री को सैकड़ों फाइल साइन करनी होती है, अगर वह पढ़ा-लिखा नहीं होगा तो उससे गलत फाइल पर साइन करवा ली जाएगी. चूंकि अरविंद केजरीवाल भी अपने तानाशाही चश्मे से भारतीय राजनीति को देखते हैं इसलिए उन्होंने इस यह मान लिया है कि देश को एक व्यक्ति चलाता हैं.

इसमें मीडिया संस्थानों की भी गलती है जो इस तरह से चर्चा करते हैं, जिससे आम लोग सिस्टम के कामकाज को ढंग से नहीं समझ पाते हैं. चुने हुए प्रतिनिधि का काम यह होता है कि वह लोगों के दुख दर्द को समझे. संसद और विधानसभा में उनकी आवाज उठाएं. बाकी सब काम करने के लिए आईएएस अधिकारी, सचिवालय के कर्मी आदि होते हैं.

मान लीजिए कि औद्योगिक क्षेत्र या पर्यावरण क्षेत्र से जुड़े किसी महत्वपूर्ण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने हैं, प्रधानमंत्री या किसी भी नेता की जिम्मेदारी बनती कि वह इस क्षेत्र के जानकार, इस क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों के समूह से बातचीत कर कर ही फैसला लें. यही नियम है. अगर वह ऐसा नहीं करता है तो इसका मतलब है कि वह तानाशाही रवैया अपना रहा है. जैसा कि प्रधानमंत्री पर नोटबंदी के फैसले को लेकर आरोप लगता है कि उन्होंने आरबीआई की बात भी नहीं मानी.

कहने का मतलब यह है कि प्रधानमंत्री होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी को तानाशाह बनने का अधिकार मिल गया है. बल्कि प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति बड़ी जिम्मेदारी के साथ जाने-माने जानकारों से सलाह लेकर कोई फैसला लेने के लिए अधिकृत होता है.

अब यह सिस्टम भी गड़बड़ा चुका हैं. अगर आईएएस अधिकारी संविधान के मूल्यों से ज्यादा अपने पद, प्रतिष्ठा, नौकरी में पैरवी की ज्यादा चिंता करेंगे तो ऐसे तमाम काम करेंगे जो संविधान के मुताबिक उन्हें नहीं करने चाहिए. अडानी घोटाले में अगर प्रधानमंत्री की तरफ तमाम उंगलियां मुड़ी दिख रही है तो इसमें उन अधिकारियों को भी शामिल मानना चाहिए, जो प्रधानमंत्री को सलाह देने का काम करते हैं. उन्हें कैसे अलग किया जा सकता है?

बाकी आप सब प्रधानमंत्री की डिग्री असली है या फर्जी? इस विषय पर सोच ही रहे हैं तो इस पर भी सोचिएगा कि आखिरकार आप ऐसे नेताओं को चुनकर क्यों भेजते हैं जिनके होते हुए भारत के हर इलाके में शिक्षा व्यवस्था लचर है और फर्जी डिग्री लेने और देने का कारोबार जमकर चल रहा है?