सारे मुग़ल मुस्लिम थे, लेकिन हर मुसलमान मुग़ल नहीं है

मुग़ल भारत के अंतिम और सबसे लंबे वक्त तक शासन करने वाले मुस्लिम राजवंश का नाम है, जबकि मुसलमान इस्लाम धर्म के अनुयायियों का. हर मुद्दे को ‘हिंदू-मुस्लिम’ के चश्मे से देखने वालों द्वारा इस तथ्य की उपेक्षा इसलिए की जाती है, क्योंकि इसके बगैर वे मुसलमानों पर निशाने साधने के लिए मुग़लों को उनका असंदिग्ध प्रतिनिधि या विश्वासपात्र शासक साबित नहीं कर सकते.

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अपने दरबार में एक मुग़ल शासक. (पेंटिंग साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

मुग़ल भारत के अंतिम और सबसे लंबे वक्त तक शासन करने वाले मुस्लिम राजवंश का नाम है, जबकि मुसलमान इस्लाम धर्म के अनुयायियों का. हर मुद्दे को ‘हिंदू-मुस्लिम’ के चश्मे से देखने वालों द्वारा इस तथ्य की उपेक्षा इसलिए की जाती है, क्योंकि इसके बगैर वे मुसलमानों पर निशाने साधने के लिए मुग़लों को उनका असंदिग्ध प्रतिनिधि या विश्वासपात्र शासक साबित नहीं कर सकते.

अपने दरबार में एक मुग़ल शासक. (पेंटिंग साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

देश में मुगलों को लेकर जब भी कोई चर्चा चलती है, उनका इतिहास पढ़ाने या न पढ़ाने की ‘बहस’ से इतर भी (जो चलती ही है, क्योंकि वे हमारे मुहावरों व कहावतों तक में शामिल हैं. मेरा खुद का मुगलों से पहला परिचय अपनी दादी द्वारा प्रायः कही जाने वाली इस कहावत से हुआ था: काबुल गए मुगल ह्वै आए, बोलैं मुगली बानी, आब-आब कहि मरिगै सैयां, रहा बगलिययं पानी), क्या पता जानबूझकर या अनजाने में, उसमें एक तथ्य की पूरी तरह उपेक्षा कर दी जाती है.

यह कि मुगल भारत के अंतिम और सबसे लंबे वक्त तक शासन करने वाले मुस्लिम राजवंश का नाम है, जबकि मुसलमान इस्लाम धर्म के अनुयायियों का. इस तथ्य को इस तरह भी देखा जा सकता है कि सारे मुगल मुस्लिम हैं, क्योंकि कुख्यात मंगोल शासक चंगेज खान (1162-1227) के प्रपौत्र द्वारा इस्लाम कुबूल करने के साथ ही मंगोल, तुर्की, कजाख और उज्बेक खून के सम्मिश्रण वाले इस वंश का जन्म हुआ, लेकिन हर मुसलमान मुगल नहीं है.

इसी से जुड़ा हुआ एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि भारत का इस्लाम और गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद व लोदी आदि मुस्लिम राजवंशों से मुगलों से कई शताब्दियों पहले वास्ता पड़ चुका था. स्वाभाविक ही था कि जहीरुद्दीन मुहम्मद उर्फ बाबर ने 1526 ई. में मुगल साम्राज्य की स्थापना की, तो उसे और उसके वारिसों को उसके विस्तार के लिए दूसरे राजवंशों की तरह इन राजवंशों से भी निपटना पड़ा.

हर मुद्दे को ‘हिंदू-मुस्लिम’ के नजरिये से देखने वालों द्वारा इस तथ्य की उपेक्षा इसलिए की जाती है, क्योंकि इसके बगैर वे मुसलमानों पर निशाने साधने के लिए मुगलों को उनका असंदिग्ध प्रतिनिधि या विश्वासपात्र शासक साबित नहीं कर सकते, जबकि दूसरे पक्ष द्वारा इसकी उपेक्षा इस अर्थ में ‘हिंदू मुस्लिम’ करने वालों की मदद करती है कि इससे यह बात दबी रह जाती है कि जहां तक साम्राज्य विस्तार की बात है, उसमें कतई हिंदू-मुसलमान नहीं होता था.

अंतिम शक्तिशाली मुगल बादशाह औरंगजेब के वक्त तक देश के गैर-मुगल मुस्लिम राजवंश मुगल साम्राज्य के विस्तार की राह में वैसे ही रोड़े अटकाया करते थे, जैसे मराठे और राजपूत. मुगल भी अपने वर्चस्व के लिए प्रतिद्वंद्वी गैर-मुगल मुस्लिम राजवंशों से वैसा ही सलूक करते थे, जैसा मराठा व राजपूत हिंदू राजवंशों से.

मिसाल के तौर पर, अवध के नवाब भी जरूरत पड़ने पर मुगल साम्राज्य को चुनौती देकर उससे दो-दो हाथ करने से बाज नहीं आते थे- भले ही दोनों का धर्म एक ही था.

1739 में नादिरशाह ने दिल्ली में जो कत्लोगारत मचाई, उसके पीछे भी अवध के पहले नवाब बुरहानउलमुल्क सआदतअली खां प्रथम और मुगल बादशाह मुहम्मदशाह के बीच की बदगुमानियां ही थीं. इन दोनों पक्षों की दुश्मनी अवध में नवाबी के आगाज के साथ ही आरंभ हो गई और दूसरे नवाब सफदरजंग (1739-1754) के वक्त भीषण जंग तक जा पहुंची थी.

इतिहासकारों के अनुसार, नादिर के हमले के वक्त नवाब बुरहानउलमुल्क और बादशाह मुहम्मदशाह के रिश्तों में अविश्वास जड़ें न जमाए होता, तो न दिल्ली को उसके इतिहास का भीषणतम कत्लेआम झेलना पड़ता, न ही वह बादशाह के तख्तेताऊस में जड़ा बेशकीमती कोहिनूर गंवाती.

दरअसल, नादिर के हमले के वक्त तक बुरहानउलमुल्क अवध को मुगल सल्तनत से ‘स्वतंत्र’ घोषित कर चुके थे, क्योंकि मराठों के हमलों से निपटने को लेकर उनमें और बादशाह में मतभेद पैदा हो गए थे. इसके बावजूद नादिर ने 27 दिसंबर, 1738 को लाहौर के सूबेदार को हराकर दिल्ली की ओर मुंह किया, तो महज बादशाही सेना के बूते उसको रोकना नामुमकिन मान मुहम्मदशाह ने बुरहानउलमुल्क समेत अपने सारे सूबेदारों को सदलबल फौरन दिल्ली पहुंचकर उसे रोकने में मदद करने का फरमान जारी किया.

लेकिन बुरहानउलमुल्क 24 फरवरी, 1739 को अपने तीस हजार सैनिकों के साथ नादिर के करनाल स्थित पड़ाव पहुंचे तो मंसूबा पाल बैठे कि बादशाही सेना के बगैर ही उसको हराकर अपना इकबाल और बुलंद कर लेंगे. लेकिन नादिर की सेना पहले तो जानबूझकर पीछे भागी, फिर पलटकर ऐसा प्रत्याक्रमण किया कि बुरहानउलमुल्क के सैनिकों की एक नहीं चली. तब उन्होंने बादशाही सेना की मदद मांगी, लेकिन जब तक वह मदद मिलती, नादिर ने उन्हें बुरी तरह घायल कर कैद कर लिया.

हालांकि, कैद में भी उन्होंने अपना मनोबल ऊंचा रखा और नादिर को चेताते रहे कि वह मुहम्मदशाह को हलके में न ले और वे जो कुछ भी उसकी नजर कर दें, उसे लेकर दिल्ली पर हमले का इरादा छोड़ दे. लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि मुहम्मदशाह ने उनको विश्वास में लिए बिना नादिर को ‘पटाने’ के लिए उसे दो करोड़ रुपये नजर कर दिए है, अपना रंग बदल लिया और नादिर से कहा, ‘मुहम्मदशाह बादशाह हैं. उनके लिए दो करोड़ रुपये भला क्या चीज हैं? अपनी जांबख्शी के लिए आपको इतने रुपये तो उनका यह नाचीज नवाब अपने सूबे अवध से ही दे देगा… अब तो आप दिल्ली पर जरूर धावा बोलिए.’

नादिर ने उनकी बात मान ली. लेकिन 19 मार्च, 1739 को जब वह दिल्ली से महज छह मील दूर था, उसने उनसे उनके वायदे के मुताबिक अवध के खजाने से दो करोड़ रुपये मांगे और न दे पाने यातनाएं देने का हुक्म दे दिया. यह अपमान युद्धभूमि के घावों से भी तकलीफदेह हो गया तो बुरहानउलमुल्क ने कैद में ही जहर खाकर जान दे दी.

तदुपरांत नादिर दिल्ली पहंचा तो 22 मार्च को कत्ल-ए-आम के बाद भी वहीं रुककर मुहम्मदशाह की हुकूमत के सारे फैसले खुद करता रहा. बुरहानउलमुल्क की विरासत के दावेदारों का झगड़ा निपटाने में तो उसने सारी हदें पार कर दीं. उनके भांजे, दामाद व नायब सूबेदार मुकीम के पक्ष में फैसले से पहले पक्का कर लिया कि वे बुरहानउलमुल्क के वायदे के अनुसार अवध से दो करोड़ रुपये की नजर के साथ बेशकीमती हीरे-जवाहरात, माल-असबाब और हाथियों की सौगात भी देंगे. उन दिनों दो करोड़ रुपये अवध की दो वर्षों की आमदनी से थोड़े ही कम होते थे.

नादिर के आदेश पर मुहम्मद शाह को खून के घूंट पीकर मुकीम को नवाब मिर्जा अबुल मंसूर अली नाम से अवध का नवाब बनाने का फरमान जारी करना पड़ा. यही मुकीम बाद में सफदरजंग के नाम से प्रसिद्ध हुए. हालांकि मुहम्मद शाह ने उन्हें नादिरशाह के दबाव में नवाब बनाया था, लेकिन 1748 में तब उनसे बहुत खुश हुए, जब अहमदशाह अब्दाली पंजाब व मुल्तान सूबे लूटकर दिल्ली की ओर बढ़ा और सफदरजंग ने उसे रोकने का हुक्म मिलने पर उसको लौट जाने पर मजबूर कर दिया.

लेकिन जब तक वे अब्दाली को हराकर दिल्ली लौटे, मुहम्मदशाह दुनिया छोड़ गए. उनके शहजादे अहमदशाह अब्दाली से लड़ाई में सफदरजंग के साथ ही थे, लेकिन वे गद्दी पर बैठे तो दोनों की बनी नहीं. फिर तो अहमदशाह ने उनकी हत्या की साजिश तक रचवा डाली. वे बच निकले और बदला लेने पर उतर आए तो घुटने टेककर न सिर्फ उनसे माफी मांग ली बल्कि उन्हें इलाहाबाद की सूबेदारी भी दी. लेकिन बाद में जैसे ही उन्हें कमजोर पाया, फरमान जारी कर दिया कि उन्हें दिल्ली में न घुसने दिया जाए और घुसें तो हाथी से बांधकर बाहर निकाल दिया जाए.

मगर 1752 में अब्दाली फिर आ पहुंचा और उन्हें मराठों से रक्षा करार के लिए फिर सफदरजंग से मदद मांगनी पड़ी. फिर जानें क्या सूझी कि उन्होंने पंजाब व मुल्तान अब्दाली को देकर हाथ जोड़ लिए और सफदरजंग द्वारा कराया गया क़रार तोड़कर मराठों को पचास लाख रुपये नहीं दिए. सफदरजंग के अधिकारों में कटौती करके उन्हें अवध वापस चले जाने को कह दिया, सो अलग.

इस पर सफदरजंग ने बगावत कर उनका तख्ता पलट दिया. पहले शाही खानदान से बाहर के एक अवयस्क को अकबरशाह नाम से बादशाह बनाया, फिर शाही खानदान के आलमगीर को आदिलशाह नाम से. खुद बारी-बारी से दोनों के वजीर बने और अहमदशाह के विरुद्ध जंग भी छेड़ दी. चार मई, 1753 को शुरू हुई यह जंग 16 नवंबर, 1753 को मराठों के दखल से इस शर्त पर रुकी कि अहमदशाह सफदरजंग के सारे अधिकार बहाल कर देंगे.

सफदरजंग के बाद शुजाउद्दौला (1754-1775) अवध के नवाब बने तो 22-23 अक्टूबर, 1764 की बक्सर की ऐतिहासिक लड़ाई में करारी शिकस्त के बाद अंग्रेजों के डर से लखनऊ व फैजाबाद छोड़कर रूहेलखंड में शरण लेने को मजबूर हुए. तब तक मुगलों और नवाबों के बीच अविश्वास इतना बढ़ गया था कि फर्रुखाबाद के नवाब अहमद खां बंगश ने शुजाउद्दौला को सलाह दी कि फिर से हुकूमत हासिल हो जाए तो वे किसी भी मामले में मुगलों का कतई एतबार न करें.

बंगश खुद भी मुगलों का एतबार नहीं करते थे. शुजाउद्दौला ने सूबे की रुपये में पांच आना आमदनी देने की शर्त पर अंग्रेजों से सुलह की और फैजाबाद को राजधानी बनाया तो बंगश की सलाह के मुताबिक मुगलों के किले के अंदर बने सारे मकान ढहवा दिए.

अंग्रेजों के दौर में गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने 1819 में मुगलों व नवाबों के बीच के अविश्वास को और भड़काने के लिए नवाब गाजीउद्दीन हैदर को बादशाह बना डाला. उन्हें बहकाकर कि वे किस बात में कम हैं, जो मुगलों के दबदबे में रहें. इसके बाद से अवध के नवाब अपने नाम के शुरू में ‘नवाब’ और आखिर में ‘शाह’ लगाने लगे, ताकि जैसी जरूरत हो, वैसी करवट बदल लें.

यह सिलसिला अंग्रेजों द्वारा 11 फरवरी, 1856 को नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करने तक जारी रहा. इसीलिए 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध दिल्ली व लखनऊ के एक होकर लड़ने के लिए बिरजिस कदर को सिर्फ ‘नवाब’ बनाया गया था, ‘शाह’ नहीं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)