स्कॉलर्स-कार्यकर्ताओं पर पीएमएलए की कार्रवाई के ख़िलाफ़ विभिन्न संगठनों ने पत्र लिखा

500 से अधिक नागरिकों, अधिकार कार्यकर्ताओं, महिला समूहों, छात्रों और शिक्षाविदों ने मनी लॉन्ड्रिंग क़ानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए लिखा है कि यूएपीए की तरह ही पीएमएलए के दुरुपयोग के भी मामले बढ़ रहे हैं, ख़ासकर उन लोगों के ख़िलाफ़ जो सरकार और इसकी नीतियों के मुखर आलोचक हैं.

(फोटो साभार: सोशल मीडिया)

500 से अधिक नागरिकों, अधिकार कार्यकर्ताओं, महिला समूहों, छात्रों और शिक्षाविदों ने मनी लॉन्ड्रिंग क़ानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए लिखा है कि यूएपीए की तरह ही पीएमएलए के दुरुपयोग के भी मामले बढ़ रहे हैं, ख़ासकर उन लोगों के ख़िलाफ़ जो सरकार और इसकी नीतियों के मुखर आलोचक हैं.

(फोटो साभार: सोशल मीडिया)

नई दिल्ली: 500 से अधिक नागरिकों, अधिकार कार्यकर्ताओं, महिला समूहों, छात्रों और शिक्षाविदों ने सरकार से संवैधानिक मुद्दों और जवाबदेही को उठाने वाले विद्वानों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के ‘दुरुपयोग’ की निंदा की है.

रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार (23 मई) को जारी खुले पत्र में कहा गया है कि पिछले कुछ महीनों में, ‘कई महिला विद्वानों और कार्यकर्ताओं को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में बार-बार समन दिया गया है, लंबे समय तक इंतजार कराया गया है, अक्सर महिला अधिकारी की गैर-मौजूदगी में पूछताछ की जाती है, बार-बार दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता है.’

उन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की ‘किसी भी मुखर आलोचक को चुप कराने की कार्यप्रणाली कठोर कानूनों को लागू करके उन्हें प्रताड़ित करना और चुप कराना है.’

गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) की तरह ही ‘पीएमएलए के दुरुपयोग के भी मामले बढ़ रहे हैं, खासकर उन लोगों के खिलाफ जो सरकार और इसकी नीतियों के मुखर आलोचक हैं, और उनके खिलाफ जो गरीबों और समाज के दबे-कुचले वर्गों के मुद्दे उठाते हैं.’

पत्र में कहा गया है कि अधिनियम सरकार को ‘प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष ट्रायल, उचित प्रक्रिया, महिलाओं के लिए प्रोटोकॉल और मानवाधिकारों के सिद्धातों का पालन करने की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करता है. जांच एजेंसियां प्रभावी रूप से पुलिस शक्तियों का प्रयोग करती हैं और उन्हें सीआरपीसी का पालन करने के लिए बाध्य होना चाहिए, लेकिन सीआरपीसी समेत किसी भी अन्य कानून के साथ किसी भी असंगतता के मामले में पीएमएलए का प्रभाव बहुत अधिक होता है.

उन्होंने कहा कि विद्वानों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ ‘उत्पीड़न और उन्हें निशाना बनाना’ तुरंत बंद होना चाहिए; महिलाओं को समन भेजने, उनसे पूछताछ करने और साक्ष्य एकत्र करने के लिए उचित प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए ताकि उन्हें परेशान और प्रताड़ित न किया जा सके; और ईडी को ‘उन व्यक्तियों और मामलों में बड़ी जिम्मेदारी और विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए जहां वे पीएमएलए का उपयोग करना चुनते हैं, और निश्चित तौर पर इसका इस्तेमाल विरोधियों, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को डराने-धमकाने के लिए न किया जाए.’

पत्र में कहा गया है, ‘हम हस्ताक्षरकर्ता महिला संगठन और चिंतित व्यक्ति दिल्ली में जांच की आड़ में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा कई महिला कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के लगातार और बार-बार उत्पीड़न की कड़ी निंदा करते हैं. ईडी को राजनीतिक प्रतिशोध के लिए डराने-धमकाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जहां प्रक्रिया ही एक सजा है.’

पत्र में कहा गया है कि जांच प्रक्रिया अंतहीन चलती रहती है. अप्रासंगिक दस्तावेज और व्यक्तिगत जानकारी मांगी जाती है, जैसे कि अन्य परिजनों के बारे में, जिसका जांच से कोई संबंध नहीं होता.

पीड़ित महिलाओं के नाम का जिक्र न करते हुए पत्र में कहा गया है कि उन्होंने राष्ट्रीय महत्व के उन महत्वपूर्ण मुद्दों पर अथक रूप से काम किया है. जो अधिकांश लोगों के लिए मायने रखते हैं, जिनमें खाद्य सुरक्षा, जवाबदेह और पारदर्शी शासन, शांति और सद्भाव , किसानों के अधिकार, महिलाओं के मुद्दे आदि शामिल हैं.

पत्र में आगे कहा गया है, ‘वे अलग-अलग सरकारों के तहत बड़ी प्रतिबद्धता और दृढ़ता के साथ इन वर्गों की जरूरतों के लिए राज्य को जवाबदेह बनाने में सबसे आगे रही हैं, फिर चाहे वह कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार रही हो, या आप सरकार, या भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार.’

पत्र में कहा गया है, ‘इस कानून को वियना कन्वेंशन सहित भारत की वैश्विक प्रतिबद्धताओं के मद्देनजर लागू किया गया था, जिसका मकसद विशेष तौर पर नशीले पदार्थों के व्यापार, हथियारों की तस्करी और संगठित अपराध जैसे बड़े स्तर के मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर अपराधों से निपटना था. यह घृणास्पद है कि कानून का दुरुपयोग विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के खिलाफ किया जा रहा है. यह कानून का स्पष्ट उपहास है और इसके मूल उद्देश्य को कमजोर कर रहा है.’

पत्र में कहा गया है कि ईडी को जांच शुरू करने से पहले एफआईआर दर्ज नहीं करनी होती हा या जिनके खिलाफ विशिष्ट आरोपों के तहत जांच चल रही है उन्हें समन देते समय या जांच के दौरान सूचित नहीं करना होता है. ईडी के पास समन, छापे और गिरफ्तारी की बेलगाम शक्ति है. कोई अभियुक्त हो या नहीं, उसे बयान दर्ज करने या दस्तावेज प्रस्तुत करने आदि के लिए बुलाया जा सकता है. आरोपी या गवाह के पास वकील, आरोप जानने या चुप रहने का अधिकार नहीं होता.

पूरा पत्र और हस्ताक्षरकर्ताओं की सूची नीचे पढ़ी जा सकती है:

List of signatories by The Wire

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