अदालत के तीसरे आदेश के बाद पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया कश्मीरी युवक रिहा

जम्मू कश्मीर के बारामूला के रहने वाले 25 वर्षीय मुज़म्मिल मंज़ूर वार को 17 अगस्त 2020 को ‘देश की सुरक्षा और संप्रभुता’ के लिए ख़तरा पैदा करने के आरोप में ‘कठोर’ पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया था. इसे उनके पिता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन रिहाई के दो आदेश के बाद भी उन्हें रिहा नहीं किया गया था.

मुज़म्मिल के पिता मंजूर अहमद वार, अदालत के आदेश के बावजूद अपने बेटे की रिहाई के लिए 15 महीने तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे. (फोटो: जहांगीर अली)

जम्मू कश्मीर के बारामूला के रहने वाले 25 वर्षीय मुज़म्मिल मंज़ूर वार को 17 अगस्त 2020 को ‘देश की सुरक्षा और संप्रभुता’ के लिए ख़तरा पैदा करने के आरोप में ‘कठोर’ पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया था. इसे उनके पिता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन रिहाई के दो आदेश के बाद भी उन्हें रिहा नहीं किया गया था.

मुज़म्मिल के पिता मंजूर अहमद वार, अदालत के आदेश के बावजूद अपने बेटे की रिहाई के लिए 15 महीने तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे. (फोटो: जहांगीर अली)

श्रीनगर: दो बार रिहाई का आदेश देने के बावजूद उत्तर प्रदेश की एक जेल में कैद उत्तरी कश्मीर के एक युवक को रिहा नहीं किया था. इस मामले को जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने ‘मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन’ करार दिया है. अदालत के तीसरे आदेश के बाद युवक को आखिरकार रिहा कर दिया गया है.

अदालत के तीसरे हस्तक्षेप के बाद बारामूला के डांगरपोरा गांव के निवासी 25 वर्षीय मुज़म्मिल मंजूर वार को कश्मीर लाकर बीते सोमवार (5 जून) को हाईकोर्ट में पेश किया गया.

जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत उनकी हिरासत को जम्मू कश्मीर ​हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के 15 महीने से अधिक समय के बाद आगरा सेंट्रल जेल से उन्हें कश्मीर लाया गया है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा ‘कानूनविहीन कानून’ (Lawless Law) बताए गए पीएएस के तहत एक बंदी को बिना आरोप या सुनवाई के अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखा जा सकता है.

अदालत ने मामले में बारामूला के डिप्टी कमिश्नर (डीसी) को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा था, यह देखते हुए कि मुज़म्मिल की निरंतर हिरासत एक ‘परेशान करने वाला परिदृश्य’ था, जो ‘कानून के शासन को कमजोर करने’ का प्रयास दिखाता है.

अदालत ने मामले में बारामूला डिप्टी कमिश्नर की व्यक्तिगत उपस्थिति का आदेश देते हुए कहा था, ‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार के गंभीर उल्लंघन का यह प्रथमदृष्टया मामला बनता है.’

मुज़म्मिल के पिता मंज़ूर अहमद वार ने कहा कि वह अपने बेटे को कश्मीर वापस लाने के लिए पिछले 15 महीनों से अधिकारियों से ‘भीख’ मांग रहे थे, लेकिन उनकी मांग को अनसुना कर दिया गया.

उन्होंने कहा, ‘मैं संविधान और न्यायपालिका में पूर्ण विश्वास रखने वाला कानून का पालन करने वाला नागरिक हूं, लेकिन जब अधिकारियों ने अदालत के आदेशों को लागू करने से इनकार कर दिया, तो मेरे पास कोई सहारा नहीं बचा था.’

2 अगस्त 2022 को लिखे गए पत्र में अहमद ने जम्मू कश्मीर प्रशासन से अपने बेटे को ‘मानवीय आधार पर’ कश्मीर में स्थानांतरित करने का आग्रह किया था. उन्होंने यह भी कहा था कि उसके पास आगरा जाकर उससे मिलने के लिए आय का कोई स्रोत नहीं है.

पत्र में उल्लेख किया गया था कि ‘एक गरीब परिवार’ से होने के नाते उनका बेटा ‘आगरा में भी कई कठिनाइयों का सामना कर रहा है, क्योंकि वह ‘कश्मीर घाटी से बाहर कभी नहीं गया था.’

हालांकि, उन्हें प्रशासन से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, जो 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद सीधे केंद्र सरकार द्वारा चलाया जाता है.

छात्र रहे मुज़म्मिल को 17 अगस्त 2020 को ‘देश की सुरक्षा और संप्रभुता’ के लिए खतरा पैदा करने के आरोप में ‘कठोर’ पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया था.

द वायर द्वारा प्राप्त किए गए अदालती दस्तावेजों के अनुसार, उन्हें उत्तरी कश्मीर के सोपोर पुलिस स्टेशन द्वारा गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 20 (आतंकवादी संगठन का सदस्य होने के लिए सजा) और 23 (आतंकवादी संगठन की सहायता करने का इरादा) तथा आर्म्स एक्ट की धारा 7/25 के तहत में गिरफ्तार किया गया था.

जम्मू कश्मीर पुलिस ने दावा किया था कि मुज़म्मिल को 22 फरवरी 2020 को तब गिरफ्तार किया गया था, जब सुरक्षा बलों की एक टीम बारामूला जिले के सोपोर इलाके में आतंकवादियों की आवाजाही के बारे में जानकारी मिलने के बाद वाहनों की औचक जांच कर रही थी. पुलिस ने उनके कब्जे से एक ग्रेनेड बरामद करने का भी दावा किया था.

हालांकि, उनके पिता ने कहा कि सुरक्षाकर्मियों की एक टीम ने 20 जनवरी 2022 की रात को उनके घर पर छापा मारा, इससे एक महीने पहले उनके बेटे को आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार दिखाया गया था.

उन्होंने कहा कि उनके बेटे को जम्मू कश्मीर पुलिस की आतंकवाद-रोधी इकाई ‘स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप’, ने इस वादे के साथ हिरासत में लिया था कि उन्हें ‘कुछ सवालों के बाद’ परिवार को लौटा दिया जाएगा.

एक निजी स्कूल के शिक्षक मंज़ूर अहमद ने द वायर को बताया, तीन दिनों तक हमें नहीं पता था कि उसे कहां रखा गया था. इसके बाद पुलिस ने स्वीकार किया कि वह उनकी हिरासत में था और आखिरकार सात दिनों के बाद हम उससे मिल पाए. उन्होंने हमें बताया कि वह कुछ प्रतिबंधित साइटों तक पहुंचने के लिए वीपीएन का उपयोग कर रहा था, जिसके कारण उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

गिरफ्तारी के लगभग छह महीने बाद देश की सुरक्षा के खिलाफ काम करने का आरोप में बारामूला के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर जीएन इटू 17 अगस्त 2020 को जम्मू कश्मीर जन सुरक्षा कानून की धारा 8 (ए) के तहत मुजम्मिल के खिलाफ मुकदमा दायर करने का आदेश पारित कर देते हैं.

हालांकि उनके पिता ने उसी वर्ष हाईकोर्ट में पीएसए के आदेश को चुनौती दी थी.

उनके वकील अधिवक्ता शफकत नजीर ने तर्क दिया था कि पीएसए लगाने का आदेश में अधिकारियों की ओर से ‘दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया था’ क्योंकि पीएसए के आदेश को मंजूरी दिए जाने के समय उनका बेटा पहले से ही बारामूला जेल में था.

मुज़म्मिल पर देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाने के अलावा पीएसए निरोध आदेश में यह भी कहा गया कि इसके तहत उन्हें हिरासत में लेना ‘आवश्यक’ था, क्योंकि ‘इस बात की पूरी संभावना थी’ कि उन्हें एफआईआर संख्या 35 में जमानत मिल सकती है.

हालांकि, बचाव पक्ष के वकील ने अदालत को बताया कि मुज़म्मिल ने किसी भी अदालत में जमानत के लिए आवेदन नहीं किया था.

अदालत ने 11 फरवरी 2022 को उनकी रिहाई का आदेश देते हुए फैसला सुनाया, ‘प्रतिवादियों ने कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की है, जो याचिकाकर्ता की हिरासत को सही ठहराने के लिए कारण बताए, यहां तक कि जब वह (पीएसए) आदेश पारित होने की तारीख को पहले से ही हिरासत में था.’

हालांकि, आगरा में जेल अधिकारियों ने मुज़म्मिल को रिहा करने से इनकार कर दिया, जिससे उसके पिता को फिर से जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा.

इसके बाद 30 अगस्त, 2022 को अदालत ने फैसला सुनाया कि पीएसए के तहत मुज़म्मिल की नजरबंदी को रद्द करने के आदेश से आगरा में जेल अधिकारियों को अवगत कराया जाना चाहिए.

सामान्य परिस्थितियों में ऐसे आदेश जारी किए जाने के बाद तुरंत बाद ही अदालत के निर्देशों के बिना सरकार द्वारा जेल अधिकारियों को आधिकारिक तौर पर इसकी सूचना दी जानी होती है.

हालांकि, अदालत दूसरे आदेश के बावजूद जेल अधिकारियों ने फिर से मुज़म्मिल को रिहा करने से इनकार कर दिया, जिससे हाईकोर्ट को तीसरी बार फिर से मामले में हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

अदालत ने अपने पिछले आदेश के उल्लंघन का संज्ञान लेते हुए फैसला सुनाया, ‘बारामुला जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ता से संबंधित व्यक्ति (मुज़म्मिल) को सुनवाई की अगली तारीख पर इस अदालत के समक्ष पेश करे, उसी दिन वह खुद भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहेंगे.’

अदालत के आदेश पर मंज़ूर अहमद ने कहा, ‘मेरे बेटे ने घर से दूर अपना कीमती समय खो दिया है. मुझे खुशी है कि अदालत का आदेश आखिरकार लागू हो गया है, लेकिन अब इन 15 महीनों को कौन लौटाएगा?’

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