बहुसंख्यकवाद असलियत था, है और उसका ख़तरा भी असली है

बहुसंख्यकवाद का जो मतलब मुस्लिमों के लिए है, वह हिंदुओं के लिए नहीं. वे कभी उसकी भयावहता महसूस नहीं कर सकते. मसलन, डीयू के शताब्दी समारोह में जय श्री राम सुनकर हिंदुओं को वह भय नहीं लग सकता जो मुसलमानों को लगेगा क्योंकि उन्हें याद है कि उन पर हमला करते वक़्त यही नारा लगाया जाता है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

बहुसंख्यकवाद का जो मतलब मुस्लिमों के लिए है, वह हिंदुओं के लिए नहीं. वे कभी उसकी भयावहता महसूस नहीं कर सकते. मसलन, डीयू के शताब्दी समारोह में जय श्री राम सुनकर हिंदुओं को वह भय नहीं लग सकता जो मुसलमानों को लगेगा क्योंकि उन्हें याद है कि उन पर हमला करते वक़्त यही नारा लगाया जाता है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘आप जो कहते हैं उस पर मैं भरोसा नहीं कर सकता क्योंकि आप जो कर रहे हैं, वह मैं देख रहा हूं.’
(जेम्स बाल्डविन)

मुसलमानों को मशविरा दिया जा रहा है कि उन्हें बहुसंख्यकवादी ख़तरे के हव्वे से बाहर निकलकर अपने समुदाय की भलाई के लिए प्रस्तावित सुधारों पर विचार करना चाहिए.आख़िर कितने दिन वे इस ख़तरे के डर से अपने सामाजिक रीति-रिवाजों में सुधार को टालते रहेंगे?

इसके साथ ही यह भी कहा जाता है कि मुसलमानों को ‘सीज़ मेंटेलिटी’ से बाहर निकलकर दुनिया को देखना चाहिए. या यह कि कब तक वे दड़बे वाली जेहनीयत के शिकार रहेंगे?

यह सब सुनते हुए मुझे आज से कोई दस साल पहले के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की याद आई. रामलीला मैदान में मजमा लगा रहता था और भारत में क्रांति की उम्मीद में हज़ारों लोग अन्ना हज़ारे के दर्शन के लिए जाया करते थे. उस वक्त उन लोगों पर लानत भेजी जा रही थी जो उस भीड़ का हिस्सा होने से इनकार कर रहे थे.

एक मित्र ने कहा कि वहां लगने वाले नारे,उस जगह का पूरा माहौल अस्वस्तिकर है. ख़ासकर मुसलमानों के लिए. इस पर एक दूसरे मित्र ने कहा कि क्या सिर्फ़ इस वजह से वे इस महान आंदोलन में भाग नहीं लेंगे कि उसमें थोड़ी बहुसंख्यकवादी बू है? क्या यह उनका दिमाग़ी संकरापन नहीं? वे क्या वे अपने दड़बे वाली सोच से बाहर निकलकर वृहत्तर राष्ट्रीय हित में शामिल नहीं हो सकते?

यह सुनकर मुझे जयप्रकाश आंदोलन की याद आई. उस आंदोलन में जो कुछ नारे लोकप्रिय थे, उनमें एक था, ‘गाय हमारी माता है,अब्दुल गफ़ूर उसको खाता है.’ उस आंदोलन में मुसलमान भी बड़ी संख्या में शामिल थे. जयप्रकाश जी के सहयोगियों में से किसी ने उनका ध्यान इस तरफ़ दिलाया लेकिन उन्होंने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. यह नारा लगता ही रहा. आख़िर एक बड़ा मक़सद था, उसके लिए क्या मुसलमान इस नारे को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे?

उस वक्त बहुसंख्यकवाद शब्द प्रचलित नहीं था. सबको पता था कि उस आंदोलन का आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का था. ज़रूर उस समय कहा गया होगा कि क्या संप्रदायवाद के डर से मुसलमान इस राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए नहीं लड़ेंगे? सामने, अगल-बगल आरएसएस को देखते हुए, उसका दबाव महसूस करते हुए भी मुसलमान इसमें शरीक हुए.

राम मनोहर लोहिया हों या जयप्रकाश या विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुसलमानों ने सबका साथ दिया. जानते हुए कि वे सब बहुसंख्यकवादी जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी का सहयोग ले रहे हैं. लेकिन बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मुसलमानों ने इनसे परहेज़ नहीं किया. यहां तक कि अरविंद केजरीवाल का उन्होंने उत्साहपूर्वक साथ दिया. उसका नतीजा सामने है.

बहुसंख्यकवाद न तब हव्वा था, न अब है. वह असलियत था, है और उसका ख़तरा भी असली है. पहले वह सहयोगी भूमिका में था, अब वह प्रभुत्वकारी है.

प्रश्न यह है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति को बहुसंख्यकवादियों का साथ लेने में कभी हिचक क्यों नहीं हुई? क्यों वे बार-बार मुसलमानों को कहते रहे कि उन्हें संकोच छोड़कर व्यापक राष्ट्रीय हित में उनका साथ देना चाहिए? पिछली सदी के साठ के दशक में संविद सरकारों का मामला हो या 1977 में जनता पार्टी, यही तर्क दिया गया. यही बात 2013 में कही गई.

कहा गया कि व्यापक राष्ट्रीय विकास के लिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए. उन लोगों पर लानत भेजी गई जो बहुसंख्यकवाद का ‘हव्वा’ दिखलाकर नरेंद्र मोदी से लोगों को डराने की कोशिश कर रहे थे. कहा गया कि हम सबको इस काल्पनिक डर से बाहर निकलकर साहसपूर्वक जनतांत्रिक निर्णय करना चाहिए.

बहुसंख्यकवाद के हव्वे को धता बतलाते हुए जनतांत्रिक साहस के साथ नरेंद्र मोदी नीत भाजपा को चुन लिया गया. नौ साल गुजर चुके हैं और बहुसंख्यकवाद अपने सबसे बदशक्ल अवतार में भारत के सीने पर मूंग दल रहा है. यह कहना शायद ग़लत है. बहुसंख्यकवाद से हिंदुओं को वह तकलीफ़ कभी न होगी जो मुसलमानों और ईसाइयों को होती है.

किसी हिंदू के साथ वंदेमातरम गाने के लिए या जय श्रीराम का नारा लगाने के लिए ज़बरदस्ती नहीं की जाती. किसी हिंदू को मांस खाने और घर में पकाने पर मार नहीं डाला जाता. किसी हिंदू मर्द को मुसलमान लड़की से शादी करने पर गिरफ़्तार नहीं किया जाता. किसी हिंदू का घर बुलडोज़र से गिराया नहीं जाता.

इसलिए बहुसंख्यकवाद के होते हुए उसका जो मतलब मुसलमानों के लिए है, वह हिंदुओं के लिए नहीं और वे कभी उसकी भयावहता महसूस नहीं कर सकते. मसलन दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में जय श्री राम का नारा लगने पर हिंदुओं को अस्वस्ति भले हो, वह भय नहीं लग सकता जो मुसलमानों को लगेगा क्योंकि उन्हें याद है कि उन पर हमला करते वक्त यही नारा लगाया जाता है.

अभी मैंने लेखक जेसिंटा केरकेट्टा की टिप्पणी पढ़ी, ‘ईद-उल- अदहा के मौके पर रात एक मित्र के घर आना हुआ. उसने खाना बनाया. हमने साथ खाना खाया. सबके सो जाने पर देर रात मैं उसके हाथ में मेंहदी लगाती रही. वह कुछ रंग चाहती थी. मैंने पूछा ‘तुम्हें कैसा लगता है?’ उसने कहा ‘अपनी धार्मिक पहचान को लेकर एंग्जायटी होती है. हमें डर लगता है.’

क्या यह एंग्जायटी, यह डर कभी हिंदुओं को लगता होगा? और क्या जेसिंटा की मित्र की प्रतिक्रिया अतिशयोक्तिपूर्ण थी? क्या उस मित्र को, जो निश्चय ही मुसलमान है, यह कहा जा सकता है कि अपने भय से बाहर आकर उसे इस सरकार के सामाजिक सुधार के प्रस्ताव पर खुले मन से विचार करना चाहिए?

बहुसंख्यकवादी राजनीति अगर मुसलमानों को यह कहे कि वह उनके भले के लिए कुछ कर रही है तो क्या मुसलमानों को उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए और अपने डर में फंसा रहना चाहिए?

उसी तरह यह कहने वाले भले लोग भी मिलते हैं कि मुसलमानों को दड़बे की मानसिकता या ‘सीज़ मेंटेलिटी’ से आज़ाद होना चाहिए. यह एक विचित्र मांग है. मुसलमानों को मिली-जुली, खुली जगह कभी मकान नहीं मिलेगा, खुली जगह, आज़ादी से वे नमाज़ भी नहीं पढ़ सकते, उन्हें हर जगह शहर के कोने में धकेलकर एक दड़बे में बंद कर दिया जाएगा लेकिन उनसे मांग की जाएगी कि वे दड़बे वाली जेहनियत के शिकार न हों.

‘सीज़ मेंटेलिटी’ से पीड़ित मुसलमान नहीं, हिंदू हैं. उन्हें बतलाया जा रहा है कि वे घेर लिए गए हैं और उन्हें अपने चारों तरफ़ के ख़तरे से, जो मुसलमानों और ईसाइयों की शक्ल में उनके बीच है, सावधान रहना है. बांग्लादेशी, रोहिंग्या उनकी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की साज़िश कर रहे हैं. मुसलमान उनकी लड़कियों को फुसला रहे हैं, पढ़-लिखकर उनकी नौकरियां हथिया रहे हैं. उन्हें सदा जागते रहने को कहा जा रहा है, अपने चारों तरफ़ नज़र रखने को कहा जा रहा है. तो ‘सीज़ मेंटेलिटी’ किसकी है और किसे उससे आज़ाद होने की ज़रूरत है?

मुसलमान देख रहे हैं कि उनके साथ क्या किया जा रहा है इसलिए उस पर भरोसा नहीं कर सकते जो उनसे कहा जा रहा है. मसलन ज़किया जाफ़री इसपर भरोसा नहीं कर सकतीं कि यह सरकार उन जैसी मुसलमान औरतों का भला करने की नीयत से क़ानूनी सुधार कर रही है और उन्हें उसका साथ देना चाहिए. और ज़किया सिर्फ़ एक नाम नहीं है.’

क्या हम यह कहना चाहते हैं कि जो राजनीति मुसलमान विरोध और उनके ख़िलाफ़ नफ़रत की खाद पर ही फलती-फूलती है, वह मुसलमान औरतों के भले के लिए फ़िक्रमंद है? और क्या हम यह सोचते हैं कि वे इस बात पर विश्वास कर लेंगी?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)