फादर स्टेन स्वामी: प्रतिरोध की राह कभी भी आसान नहीं रही है

एल्गार परिषद मामले में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी का मेडिकल आधार पर ज़मानत का इंतज़ार करते हुए 5 जुलाई 2021 को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया था. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर रहे हैं इसी मामले में आरोपी बनाए गए कार्यकर्ता महेश राउत.

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फादर स्टेन स्वामी. (पेंटिग: महेश राउत)

एल्गार परिषद मामले में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी का मेडिकल आधार पर ज़मानत का इंतज़ार करते हुए 5 जुलाई 2021 को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया था. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर रहे हैं इसी मामले में आरोपी बनाए गए कार्यकर्ता महेश राउत.

फादर स्टेन स्वामी. (पेंटिग: महेश राउत)

नई दिल्ली: एल्गार परिषद मामले में गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किए गए आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता 84 साल के स्टेन स्वामी का 5 जुलाई 2021 को मेडिकल आधार पर जमानत का इंतजार करते हुए मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया था.

एल्गार परिषद मामले में एनआईए द्वारा गिरफ्तार किए जाने वाले स्टेन स्वामी सबसे वरिष्ठ और मामले में गिरफ्तार 16 लोगों में से एक थे. स्टेन स्वामी अक्टूबर 2020 से जेल में बंद थे. वह पार्किंसंस बीमारी से जूझ रहे थे और उन्हें गिलास से पानी पीने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. इसके बावजूद स्टेन स्वामी को चिकित्सा आधार पर कई बार अनुरोध के बाद भी जमानत नहीं दी गई थी.

एल्गार परिषद मामला पुणे में 31 दिसंबर 2017 को आयोजित संगोष्ठी में कथित भड़काऊ भाषण से जुड़ा है. पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई और इस संगोष्ठी का आयोजन करने वालों का संबंध माओवादियों से था.

उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर इसी मामले में आरोपी बनाए गए और जेल में बंद आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता महेश राउत ने यह पत्र लिखा है. 36 साल के राउत टिस के छात्र रहे हैं और उन पर एनआईए ने माओवादी विचारधारा का प्रचार करने और छात्रों को नक्सली आंदोलन में शामिल करने के प्रयास का आरोप लगाया है.

एनआईए का आरोप है कि राउत ने मामले के सह-आरोपियों को एल्गार परिषद कार्यक्रम के लिए पांच लाख रुपये दिये थे. उन्हें 2018 में गिरफ्तार किया गया था और वह अब भी जेल में हैं.

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प्रतिरोध की राह कभी भी आसान नहीं रही है. सत्ता के जनविरोधी नीतियों-कृत्यों के प्रतिरोध में जनता के वैकल्पिक नजरिये-कार्यक्रमों को सामने रखना, विकास की विनाशकारी व्याख्या पर सवाल करते रहना और सत्ता के झूठ को बेनकाब करते रहना, सत्ता को कभी भी पसंद नहीं.

वो प्रतिरोध के हर एक आवाज को दबाने की कोशिश करती है, कथाएं रच जनता को भ्रमित करती है, फर्जी मुकदमों में बंद करती है, हिंसा करती है. सत्ता कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, वह प्रतिरोध से डरती है, उसे निहत्थों की जुबां और लफ़्जों से डर लगता है. एकजुटता के इंकलाबी नारों, आंदोलनों में औरतों की हवा में लहराती मुठ्ठियों से डर लगता है, दलित युवाओं की ढपलियों की थाप और आदिवासियों के मांदर- नगाड़ों से डर लगता है. और ऐसी ही प्रतिरोध की बुलंद आवाज थे फादर स्टेन स्वामी.

शोषण-अन्याय के खिलाफ, आदिवासी समुदाय के हक के संघर्षो में, मानवीय

मूल्यों की रक्षा में वे हमेशा साथ रहे. न्यायपरस्त-जनवादी फादर स्टेन स्वामी की प्रतिरोध की बुलंद आवाज को दबाने के लिए इस फर्जी केस में उन्हें गिरफ्तार किया गया. इस पूरे दौर में उन्हें शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना को झेलना पड़ी. जेल, न्यायालय की अनास्था और उनके इलाज में बरती गई जानबूझकर की गई लापरवाही-देरी से 5 जुलाई 2021 को फादर स्टेन स्वामी की जान गई. यह सत्ता द्वारा की गई हत्या है.

फादर स्टेन स्वामी की संस्थात्मक मौत के विरोध में और उनकी शहादत की याद में उन्हें सलाम करते हुए प्रतिरोध की आवाज को बुलंद करने के लिए हम- एल्गार परिषद केस में जेल में बंदी, उनके साथी 5 जुलाई को एक दिन के निषेध अनशन पर हैं.

हम सभी जनवादी ताकतों, संगठनों, आंदोलनों व्यक्तियों को आह्वान करते हैं कि कि 5 जुलाई को अनशन, धरना, मोर्चों,

सभाओं, चर्चाएं, आंदोलनों और अन्य माध्यमों द्वारा आप भी फादर स्टेन स्वामी की संस्थात्मक मौत के खिलाफ आवाज उठाएं और अपने संघर्षों में उन्हें याद करें.

वो तुम्हें याद करती है, जब तुम बैठे थे
धरने पर
उसके, उसके लोगों के साथ
संथाल – छोटा नागपुर जमीन
कानूनों में बदलावों के खिलाफ…

जब तुम चले थे
मोर्चों में
विस्थापन के खिलाफ
और लड़े थे साथ
‘जमीन- जंगल’ कि रक्षा में,
जिसे उसके पुरखों ने सौंपा था उसे…

वो तुम्हें याद करती है
जब देखती है वो
बंदूक की नोंक पर
खाली किए जा रहे
उसके गांव, जंगल, खलिहान

याला ढोते ट्रकों
की रफ्तारों में कुचलता 
उसके लोगों का अस्तित्व, इतिहास.
लोहे के खदानों से निकल
फसलों को तबाह करती पानी…

जो आंसुओं संग
भर रहा आंखों को
अंगारों से..

उन अंगारों संग
वो निकल पड़ी है
गांव-गांव, जंगल-जंगल
पहाड़-पहाड़…

पत्थलगड़ी की ज्वाला बनकर
मशाल, हसिया, तीर-कमान लिए
अपने गांव-जंगल की रक्षा में,
दूर खदड़ने
हथियार लिए घुसे भेड़ियों को…
कुछ हारी

कुछ जीती
लड़ाइयों के बीच
अंतिम जंग को 
जीतने के विश्वास में
फादर,

तुम्हें याद करती है…

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