मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में अमरमणि ​त्रिपाठी की समय-पूर्व रिहाई से क्या भाजपा को फायदा होगा?

कहा जा रहा है कि अमरमणि त्रिपाठी को भाजपा विशेषकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ‘अपने ब्राह्मण चेहरे’ के बतौर आगे करेंगे. हालांकि भाजपा का उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा, क्योंकि विपक्ष इस मुद्दे पर उसे खूब घेरेगा. बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोप के बाद अब कवयित्री मधु​मिता शुक्ला की हत्या के सज़ायाफ़्ता रहे अमरमणि को आगे लाने का दांव उल्टा भी पड़ सकता है.

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अमरमणि त्रिपाठी. (फोटो साभार: फेसबुक)

कहा जा रहा है कि अमरमणि त्रिपाठी को भाजपा विशेषकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ‘अपने ब्राह्मण चेहरे’ के बतौर आगे करेंगे. हालांकि भाजपा का उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा, क्योंकि विपक्ष इस मुद्दे पर उसे खूब घेरेगा. बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोप के बाद अब कवयित्री मधु​मिता शुक्ला की हत्या के सज़ायाफ़्ता रहे अमरमणि को आगे लाने का दांव उल्टा भी पड़ सकता है.

अमरमणि त्रिपाठी. (फोटो साभार: फेसबुक)

गोरखपुर: बाहुबली नेता पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी की कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या मामले में समय-पूर्व रिहाई ने पूर्वांचल खासकर गोरखपुर-बस्ती मंडल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है और उनकी भावी भूमिका को लेकर खूब चर्चा हो रही है.

कवयित्री मधुमिता शुक्ला की लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी स्थित उनके आवास पर 9 मई 2003 को हत्या कर दी गई थी.

मधुमिता की हत्या में अमरमणि को पत्नी मधुमणि सहित आजीवन कारावास की सजा हुई थी. सजा के बाद महराजगंज जिले के लक्ष्मीपुर (अब नौतनवा ) विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक रहे अमरमणि का सियासी सफर रुक गया, लेकिन उन्होंने बेटे-बेटियों और भाई के जरिये अपने विधानसभा क्षेत्र नौतनवा और संसदीय क्षेत्र महराजगंज में सियासी पकड़ कमजोर नहीं होने दिया. यही कारण है कि भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनमें अपनी सियासी उपयोगिता की संभावनाएं देख रहे हैं.

अमरमणि 80 के दशक में गोरखपुर में शुरू हुए ठाकुर-ब्राह्मण जातीय संघर्ष की उपज हैं. उनके चाचा पूर्व मंत्री श्याम नारायण तिवारी जरूर राजनीति में पहले से सक्रिय थे और 1974 में ही महराजगंज जनपद के फरेंदा क्षेत्र से विधायक बन गए थे, लेकिन अमरमणि की राजनीति में एंट्री तब के बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी के सिपहसालार के रूप में हुई थी.

हरिशंकर तिवारी के खिलाफ ठाकुरों का नेतृत्व कर रहे वीरेंद्र प्रताप शाही 1974 का विधानसभा चुनाव बस्ती सीट से हारने के बाद 1980 में महराजगंज जिले के लक्ष्मीपुर विधानसभा से चुनाव लड़ने पहुंच गए. इस सीट पर कांग्रेस और लोकदल के नेता जीत रहे थे. सिर्फ एक बार 1967 में जनसंघ से इस सीट पर रघुराज सिंह चुनाव जीते थे.

शाही को विधानसभा में जाने से रोकने के हरिशंकर तिवारी खेमे ने अमरमणि को लक्ष्मीपुर चुनाव लड़ने भेज दिया. शाही और अमरमणि निर्दल चुनाव लड़े. इस चुनाव में जनता पार्टी से फतेह बहादुर सिंह चुनाव लड़ रहे थे. वे खांटी समाजवादी विचार के थे और गोरखपुर के डीएवी डिग्री कालेज के छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके थे.

अपने पहले ही चुनाव में अमरमणि के खिलाफ अपहरण का केस दर्ज हुआ. उनके धमकी देने के बावजूद जब फतेह बहादुर सिंह चुनाव से नहीं हटे तो अमरमणि ने उनका अपहरण करने की कोशिश की.

फतेह बहादुर सिंह उस घटना का याद करते हुए बताते हैं कि वह नौतनवा कस्बे में एक दुकान पर बैठे थे, तभी कई गाड़ियों से अमरमणि समर्थकों के साथ आए और उन्हें जबरन ले जाने की कोशिश की. अमरमणि समर्थकों ने कहा कि उन्हें नेपाल ले जाकर मार देंगे. इस घटना की एफआईआर सिंह ने दर्ज कराई थी.

इस चुनाव में अमरमणि चुनाव हार गए, लेकिन उन्हें 19,289 मत मिले. इसके बाद 1985 में भी वे वीरेंद्र प्रताप शाही से हारे. ये दोनों चुनाव वे निर्दल लड़े थे.

इसके बाद 1989 में हुए चुनाव में अमरमणि बहुत कम मतों के अंतर से जीतकर पहली बार विधायक बने. यह चुनाव भी वे निर्दल लड़े थे. यह चुनाव में परिस्थितियां एकदम बदल गई थीं. वीरेंद्र प्रताप शाही जनता पार्टी से जुड़े थे, लेकिन बाद में वे मेनका गांधी द्वारा बनाए गए संजय विचार मंच से जुड़ गए.

फिर वे वीपी सिंह की जनमोर्चा से जुड़ गए. वीपी सिंह की गोरखपुर के तमकुही कोठी मैदान में बड़ी सभा हुई. इसमें वीरेंद्र प्रताप शाही भी शामिल थे. सभा का संचालन पिपराइच के विधायक केदारनाथ सिंह कर रहे थे. शाही को भाषण के लिए नहीं बुलाने पर उनके समर्थकों ने शोर शराबा किया और उनके समर्थक ब्लाक प्रमुख रामप्रवेश सिंह ने केदारनाथ सिंह से बदसलूकी भी कर दी. यह देख वीपी सिंह बेहद नाराज हुए.

इस घटना ने शाही के सियासी जिंदगी पर जबर्दस्त चोट की. वे 1989 लोकसभा चुनाव में महराजगंज से जनता दल का टिकट मांग रहे थे. वीपी सिंह को तमकुही मैदान में हुई सभा की घटना याद थी और उन्होंने शाही को टिकट नहीं दिया. उनकी जगह फरेंदा से जनता पार्टी के विधायक चुने गए हर्षवर्धन को टिकट दे दिया गया.

शाही को लक्ष्मीपुर विधानसभा से जनता दल के टिकट पर लड़ने को कहा गया, लेकिन उन्होंने टिकट लेने से मना कर दिया और महराजंगज से लोकसभा व लक्ष्मीपुर से विधानसभा का चुनाव एक साथ लड़ गए.

लक्ष्मीपुर से उनके करीबी अखिलेश सिंह चुनाव लड़ने की इच्छा रखे हुए थे. उन्होंने बगावत कर दी और वे भी चुनाव में कूद पड़े. इस तरह चुनाव में लड़ाई त्रिकोणीय हो गई, जिसका फायदा अमरमणि त्रिपाठी को मिला और आखिरी राउंड में वे अखिलेश सिंह से जीत गए.

शाही विधानसभा और लोकसभा चुनाव दोनों हारे. महराजगंज संसदीय सीट से हर्षवर्धन चुनाव जीते. इसके बाद से उन्होंने लक्ष्मीपुर और महराजगंज की राजनीति छोड़ दी और गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में सक्रिय हो गए.

अमरमणि की इन्हीं दिनों हरिशंकर तिवारी से खटक गई और वे उनसे अलग हो गए. तिवारी से अलग होने के बाद वे वीरेंद्र प्रताप शाही से जुड़ गए. उधर हिंदू महासभा से मानीराम से विधायक बने बाहुबली नेता ओम प्रकाश पासवान की अपने गुरु महंत अवेद्यनाथ से अनबन हो गई. वे भी शाही से जुड़ गए.

गोरखपुर की राजनीति में ये तीनों नेता कुछ वर्षों तक एक साथ रहे. ओमप्रकाश पासवान की 25 मार्च 1996 को लोकसभा चुनाव के ठीक पहले बांसगांव में सभा के दौरान बम मारकर हत्या कर दी गई. घटना को आतंकवादी घटना की तरह अंजाम दिया गया था. इसमें सात लोगों की मौत हुई थी और 30 लोग घायल हुए थे.

इस घटना के चार वर्ष बाद 1997 में शाही की लखनऊ में गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला ने हत्या कर दी. शाही उस वक्त बसपा में थे और प्रदेश में मायावती मुख्यमंत्री थीं.

अमरमणि त्रिपाठी दो बार चुनाव हारने के बाद 1989 में जीते, लेकिन उसके बाद 1991 और 1993 का चुनाव अखिलेश सिंह से हार गए. एक बार लगा कि वे राजनीति में ज्यादा आगे नहीं जा पाएंगे, लेकिन अखिलेश सिंह के महराजगंज लोकसभा क्षेत्र में सक्रिय होने का फायदा उठाते हुए उन्होंने अपनी स्थिति मजबूत की और 1996 का चुनाव जीतकर वापसी की.

यह दौर अस्थिर सरकारों का था. उन्हें कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह सरकार में मंत्री बनने का मौका लगा, हालांकि उन्हें महत्वपूर्ण विभाग नहीं दिए गए. सत्ता का फायदा उठाते हुए उन्होंने अपना दबदबा खूब बढ़ाया.

वर्ष 2002 के चुनाव में उन्हें करारा झटका तब लगा, जब उन्हें कांग्रेस और सपा ने टिकट नहीं दिया. उस वक्त बसपा ने उन्हें टिकट दिया. बसपा को ब्राह्मण चेहरे की तलाश थी. बसपा को अमरमणि में खूब संभावनाएं दिखीं. अमरमणि चुनाव जीत गए और बसपा की सरकार भी बन गई. उन्हें मंत्री बनाया गया.

उस वक्त बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें विवादों से बचने को कहा था लेकिन अमरमणि कहां मानने वाले थे. वे हर रोज व किसी न किसी कारणों से चर्चा में रहते. सत्ता का उपयोग उन्हें विरोधियों के दमन में भी किया. उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी अखिलेश सिंह के भाई कौशल सिंह उर्फ मुन्ना सिंह पर रासुका लगा.

उन्होंने नौतनवा में एक बड़े व्यापारी के दुर्गा आयल मिल पर कब्जा कर उसे अपना कार्यालय बना लिया. बाद में उसे अपने नाम आवंटित भी करा लिया. उन्होंने निचलौल क्षेत्र में खेती की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की जिसका किसानों ने विरोध किया. इसको लेकर काफी बवाल हुआ.

गोरखपुर में उनके वर्तमान आवास को लेकर भी विवाद रहा. एक व्यापारी का आरोप था कि उनके आवास को अमरमणि ने कब्जा कर लिया. नौतनवा में पूर्व सैन्य अधिकारी की जमीन पर कब्जा का मामला तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक पहुंचा था और वे नाराज भी हुए थे.

लक्ष्मीपुर क्षेत्र में अमरमणि ने इस दौरान आधा दर्जन स्कूल-कॉलेज भी स्थापित किए. आज भी उनके परिजन इन शिक्षण संस्थानों की प्रबंधन समितियों में हैं.

अमरमणि अपने स्कूल-कॉलेज में कवि सम्मेलनों का आयोजन कराते. ऐसे ही कवि सम्मेलन में कवयित्री मधुमिता शुक्ला उनके करीब आईं.

मधुमिता शुक्ला और अमरमणि त्रिपाठी. (फोटो साभार: फेसबुक)

मधुमिता की जब लखनऊ में हत्या हुई तो वह सात माह की गर्भवती थीं. अमरमणि पर हत्या के आरोप लगे, लेकिन उन्हें बचाने का प्रयास किया गया. घटना की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई. सीबीसीआईडी को उनके खिलाफ सबूत मिले तो मुख्यमंत्री मायावती ने अमरमणि को मंत्री पद से हटा दिया, लेकिन जांच करने वाले सीबीसीआईडी के दो बड़े अफसरों को भी हटा दिया गया.

अमरमणि को मंत्री पद से हटाए जाते वक्त बसपा सुप्रीमो ने बयान दिया था कि यदि वे दोषमुक्त पाए गए तो उन्हें फिर से वापस लिया जाएगा. यह घटना लंबे समय तक मीडिया में छाई रही. इसको लेकर केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर भी उंगली उठने लगी, क्योंकि मायावती सरकार को भाजपा समर्थन दे रही थी.

आखिरकार इस घटना की जांच सीबीआई को सौंपी गई, जिसने मधुमिता की हत्या के आरोप में अमरमणि त्रिपाठी, उनकी पत्नी मधुमणि सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया और सभी को सीबीआई की विशेष अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

जेल में रहते हुए भी अमरमणि का रुतबा कम न हुआ. वे 2007 का चुनाव जेल में रहते हुए ही लड़े और जीते. इस बार उन्हें सपा ने टिकट दिया था. इस चुनाव के पहले एक ऐसी घटना हुई, जिसने अमरमणि को योगी आदित्यनाथ के करीब ला दिया.

2007 में जनवरी के अंतिम सप्ताह में एक झड़प में एक युवक की मौत ने सांप्रदायिक रंग ले लिया. योगी आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी इस मामले में कूद पड़ी. मुलायम सरकार ने योगी को गिरफ्तार कर लिया. उनकी गिरफ्तारी के बाद गोरखपुर ही नहीं एक दर्जन से अधिक जिलों में हिंसा-आगजनी की घटनाएं हुईं.

योगी आदित्यनाथ नौ दिन गोरखपुर मंडलीय कारागार में रहे. अमरमणि उस समय समाजवादी पार्टी में थे. वह जेल में रहते हुए लक्ष्मीपुर विधानसभा से चुनाव लड़ रहे थे.

जेल में अमरमणि की योगी से नजदीकी की खबरें जब सार्वजनिक हुई तो अमरमणि ने एक बयान जारी कर कहा था कि वह जिंदगी भर सांप्रदायिक ताकतों से लड़ते रहे हैं और आगे भी लड़ेंगे. दरअसल उनकी चिंता थी कि इन खबरों से कहीं लक्ष्मीपुर के मुसलमान उनसे खफा न हो जाए. यह चुनाव अमरमणि जेल में रहते हुए जीत गए.

सजायाफ्ता होने के बाद उन्होंने 2012 के चुनाव में बेटे अमनमणि त्रिपाठी को चुनाव लड़ाया, लेकिन वह हार गए. इस दौरान अमनमणि की पत्नी सारा सिंह की कथित मार्ग दुर्घटना में मौत हो गई.

सारा की मां ने अमनमणि पर हत्या का आरोप लगाया. अमनमणि पर केस दर्ज हुआ और वे गिरफ्तार हुए. एक ठेकेदार ने भी अमनमणि पर अपहरण और मारपीट का केस दर्ज कराया. अमनमणि भी पिता की तरह आए दिन विवादों में रहने लगे.

2012 का चुनाव हारने के बाद अमरमणि के लिए कुछ वर्ष मुश्किलों के रहे. इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर नौतनवा के दुर्गा आयल मिल से उनका कब्जा हटाया गया. गोरखपुर स्थित आवास भी खाली करने की नौबत आ गई थी, लेकिन किसी तरह से मामला सुलझ गया.

2017 का विधानसभा चुनाव अमनमणि ने जेल में रहते हुए लड़ा. उनकी दोनों बहनें तनुश्री और अलंकृता चुनाव प्रचार में उतरीं. अमनमणि चुनाव जीतकर विधायक बन गए. इसके बाद वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ कई मंचों पर दिखाई दिए. कोरोना काल में रोक के बावजूद फर्जी पत्र के आधार पर पास बनाकर बद्रीनाथ धाम जाने की कोशिश में उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया.

पिछले वर्ष हुए 18वीं विधानसभा के चुनाव में वे बसपा से टिकट पाने में कामयाब रहे, लेकिन चुनाव जीत न सके. इस बार निषाद पार्टी के सिम्बल पर भाजपा ने अपनी ओर से ऋषि त्रिपाठी को चुनाव लड़ाया और वे जीत गए.

इस तरह से देखें तो 1980 के बाद से हुए 11 विधानसभा चुनावों में अमरमणि चार बार और एक बार उनके बेटे विधायक बने. वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव में अमरमणि के भाई अजीतमणि चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके. हालांकि उनके लड़ने के कारण भाजपा को हार का सामना जरूर करना पड़ा. जेल में रहने के बावजूद अमरमणि त्रिपाठी ने अपने परिवार को अपने क्षेत्र से जोड़े रखा.

नौतनवा विधानसभा में चार दशक से अधिक समय से राजनीतिक मुकाबला अमरमणि और अखिलेश सिंह में ही होता रहा है. पिछला चुनाव ही ऐसा रहा कि दोनों परिवारों से अलग किसी व्यक्ति को जीत मिली.

अमरमणि और अखिलेश के बीच चुनावी मुकाबला बहुत रोचक व तीखे अंदाज में होता है. दोनों आमने-सामने मंच लगाते और जवाब कव्वाली की तरह घंटों भाषण होता. समर्थक आपस में भिड़ते रहते और दोनों तरफ से एफआईआर दर्ज होती.

नौतनवा का जनता चैक अक्सर दोनों के चुनावी मुकाबले का रणक्षेत्र बनता. पत्रकार इस क्षेत्र की कवर करने के लिए विशेष उत्कंठित रहते. पूरे विधानसभा क्षेत्र का ऐसा कोई गांव नहीं, जहां दोनों के बीच गोलबंदी न हो. इस स्थिति से यह क्षेत्र अभी भी उबर नहीं पाया है.

देहरादून की विशेष अदालत ने अमरमणि और उनकी पत्नी को 24 अक्टूबर 2007 को आजीवन कारावास की सजा दी थी. आजीवन कारावास की सजा होने के बाद वह करीब पांच वर्ष हरिद्वार जेल में रहे.

अमरमणि ने गोरखपुर के मंडलीय कारागार में करीब 10 वर्ष की कैद की सजा का अधिकतर समय अस्पतालों में गुजारा. उन्हें मई 2012 में हरिद्वार से गोरखपुर जेल ट्रांसफर किया गया था. 10 वर्ष में वे सिर्फ 16 महीने ही जेल में रहे. बाकी समय बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट वार्ड में भर्ती रहे. पत्नी मधुमणि भी प्राइवेट वार्ड में भर्ती रहीं.

प्रदेश में सरकार किसी की भी रही अमरमणि के रुतबे में कोई कमी नहीं आई. बसपा, सपा और भाजपा सरकार में वे जेल के बजाय बीमारी के नाम पर अस्पताल में रहे और यही से अपने क्षेत्र की राजनीति पर पकड़ बनाए रखी.

दो बार स्टिंग ऑपरेशन और एक बार हाईकोर्ट के निर्देश के चलते वह कुछ समय जेल में जरूर रहे, लेकिन वहां भी उनसे हर कोई बेरोकटोक मिल सकता था. मिलने वाले बताते हैं कि वे वहीं से मोबाइल से अपने समर्थकों के काम के लिए अफसरों-नेताओं को फोन करते थे.

अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी. (फाइल फोटो साभार: फेसबुक)

अमरमणि ने हरिद्वार जेल से गोरखपुर अपना ट्रांसफर गोरखपुर, महराजगंज आदि जनपदों में दर्ज मुकदमे की पेशी में उपस्थित होने के आधार पर कराया था. उनके ऊपर एक समय 40 से अधिक केस दर्ज थे, जिनमें से अधिकतर महराजगंज जनपद के थे.

महराजगंज जिले के केस की सुनवाई में वे जरूर पेश होते. पेशी के दौरान पूरे ठाठ से जाना होता. बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आते. वर्ष 2007 के चुनाव में दाखिल एफिडेविट में उन्होंने हत्या, हत्या के प्रयास सहित छह केस का विवरण दिया था.

वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक कार्यक्रम में बीआरडी मेडिकल कॉलेज आए. कार्यक्रम समाप्त होने के बाद अचानक उनकी गाड़ी प्राइवेट वार्ड की तरफ मुड़ गई. उन्होंने अमरमणि से मुलाकात की. इस खबर को छिपाने का बहुत प्रयास किया गया था, लेकिन खबर सामने आ गई.

अफवाह यह भी उड़ती रही कि वे बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट वार्ड से अपने क्षेत्र व घर में भी जाते रहे, लेकिन इसकी कभी पुष्टि नहीं हो सकी.

कारागार प्रशासन द्वारा उनकी उनके क्षमा आवेदन पर इसी  24 अगस्त को रिहाई के आदेश के कुछ घंटों बाद ही जिला मजिस्ट्रेट ने जरूरी औपचारिकताओं के कागजातों पर दस्तखत कर दिए और 24 घंटे के अंदर जेल प्रशासन ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज जाकर उनकी रिहाई की औपचारिकता पूरी कर दी. यह सब उनकी योगी सरकार में पैठ का सबूत देते हैं.

चर्चा हो रही है कि उनकी रिहाई से भाजपा को क्या राजनीतिक फायदा होगा? अमरमणि, उनके बेटे या परिवार का कोई सदस्य भाजपा में नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से डेढ़ दशक से उनकी नजदीकी जगजाहिर है. अमनमणि मुख्यमंत्री को अपना संरक्षक बताते हैं.

चर्चा है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में अमरमणि त्रिपाठी के राजनीतिक रसूख का भाजपा इस्तेमाल करेगी. गोरखपुर-बस्ती मंडल की सभी नौ लोकसभा सीट पर भाजपा ही जीती है. नौ सांसदों में चार ब्राह्मण, एक राजपूत, एक दलित और तीन पिछडी जाति के हैं.

पिछले चुनाव में कांग्रेस सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे आरपीएन सिंह भी भाजपा में आ गए हैं. वे कुशीनगर सीट से लोकसभा के सांसद रह चुके हैं. उन्हें भाजपा चुनाव जरूर लड़वाएगी.

कम से कम तीन सांसदों के टिकट कटने की भी स्थिति है. जिन सांसदों के टिकट कटेंगे, उनकी जगह पर उपयुक्त प्रत्याशी की तलाश चल रही है. ऐसे में अमरमणि के परिवार के लिए कोई जगह बनाई जा सकती है. यदि उनके लिए जगह नहीं बनी तो भी भाजपा के लिए उनका उपयोग किया जाएगा.

पूर्वांचल में बड़े ब्राह्मण नेता के रूप में हरिशंकर तिवारी रहे हैं. उनका चार महीने पहले 16 मई को निधन हो गया. उनके दोनों बेटे भीष्म शंकर तिवारी और विनय शंकर तिवारी तथा भांजे गणेश शंकर राजनीति में हैं.

भीष्म शंकर दो बार संत कबीर नगर से सांसद रहे हैं तो विनय शंकर तिवारी अपने पिता की सीट से 2017 में विधायक बने थे, लेकिन 2022 का विधानसभा चुनाव हार गए. भीष्म शंकर भी दो बार से लोकसभा का चुनाव हार रहे हैं. गणेश शंकर विधान परिषद के सभापति रह चुके हैं.

पूरा परिवार बसपा में था, लेकिन पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव के बाद सभी सपा में आ गए. तिवारी परिवार से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुरानी राजनीतिक अदावत है.

हरिशंकर तिवारी को ‘ब्राह्मण शिरोमणि’ कहा जाता था. इस रिक्तिता को उनके परिवार सहित कई ब्राह्मण नेता पूरा करने में लगे हैं. तिवारी के निधन पर शोक व्यक्त करने वालों सभी दलों के दिग्गज नेता रहे, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने शोक संवेदना प्रकट नहीं की. इसको लेकर कई दिनों तक चर्चा रही.

कहा जा रहा है कि अमरमणि त्रिपाठी को भाजपा विशेषकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ‘अपने ब्राह्मण शिरोमणि’ के बतौर आगे करेंगे. हालांकि भाजपा का सीधे तौर पर अमरमणि या उनके परिजनों को राजनीति में आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा, क्योंकि विपक्ष इस पर खूब घेरेगा. बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोप के बाद अब कवयित्री मधु​मिता शुक्ला की हत्या के सजायाफ्ता अमरमणि त्रिपाठी को आगे लाने का दांव उल्टा भी पड़ सकता है.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)