उत्तराखंड: पतंजलि को हिमालय के रिज़र्व वन क्षेत्र में एक क्विंटल की प्रतिमा लगाने से रोका गया

उत्तरकाशी ज़िले में 'हॉर्न ऑफ हर्षिल' शिखर पर आयुर्वेदिक औषधि खोजने की मुहिम पर गया पतंजलि आयुर्वेद और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान का एक दल बिना अनुमति के धनवंतरि की सौ किलोग्राम की प्रतिमा लेकर पहुंचा था. जानकारी मिलने पर वन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें मूर्ति लगाने से रोक दिया.

(फोटो साभार: ट्विटर/Ach_Balkrishna)

उत्तरकाशी ज़िले में ‘हॉर्न ऑफ हर्षिल’ शिखर पर आयुर्वेदिक औषधि खोजने की मुहिम पर गया पतंजलि आयुर्वेद और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान का एक दल बिना अनुमति के धनवंतरि की सौ किलोग्राम की प्रतिमा लेकर पहुंचा था. जानकारी मिलने पर वन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें मूर्ति लगाने से रोक दिया.

(फोटो साभार: ट्विटर/Ach_Balkrishna)

नई दिल्ली: उत्तराखंड के वन्यकर्मियों ने पतंजलि आयुर्वेद और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (एनआईएम) की संयुक्त टीम को उत्तरकाशी जिले के आरक्षित वन क्षेत्र में लगभग 100 किलोग्राम वजन की प्रतिमा स्थापित करने से रोक दिया है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उत्तरकाशी के जिला वन अधिकारी (डीएफओ) डीपी बलूनी के अनुसार, पर्वतारोहण दल धनवंतरि की ग्रेनाइट प्रतिमा को अपने साथ वापस लाने पर सहमत हो गया है. इससे पहले एक मीडिया कॉन्फ्रेंस में पतंजलि के चेयरमैन आचार्य बालकृष्ण ने कहा था कि वे ऐसी दो मूर्तियों में से एक को हिमालय में स्थापित करना चाहते हैं.

अख़बार से बातचीत में डीएफओ बलूनी ने कहा कि उनकी टीम को आयुर्वेदिक औषधि खोजने की मुहिम के लिए गोविंद नेशनल पार्क और वन विभाग से अनुमति दी गई थी, लेकिन किसी प्रतिमा को लगाने के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई थी.

उन्होंने कहा, ‘… उनके आवेदन के बाद कुछ निर्देशों के साथ वन क्षेत्र से गुजरने की अनुमति जारी की गई… जब वे चले गए, तो मुझे उनकी प्रतिमा स्थापित करने की योजना के बारे में पता चला. चूंकि यह वन संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन होता, तो मैंने कहा कि हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते.’

बलूनी ने आगे कहा, ‘मैंने संबंधित रेंज अधिकारी को उन्हें ऐसा करने से रोकने का निर्देश दिया था. हमने उन्हें समझाने की कोशिश की कि इस तरह के कदम से हमें परेशानी होगी. वे प्रतिमाको पहाड़ियों पर ले गए थे, लेकिन वहां के कर्मचारियों ने मुझे जो बताया, उसके अनुसार वे इसे स्थापित न करने पर राजी हो गए हैं. अगर वे इसे स्थापित करने की कोशिश करेंगे तो हम हटा देंगे.’

गौरतलब है कि एनआईएम के प्रिंसिपल कर्नल अंशुमन भदौरिया और आचार्य बालकृष्ण के नेतृत्व में एक टीम ने बीते शनिवार को हिमालय की दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियों की खोज के लिए चढ़ाई और सर्वेक्षण मुहिम शुरू की है.

ईटीवी भारत के अनुसार, पतंजलि योगपीठ ने उत्तरकाशी वन प्रशासन से ‘हॉर्न ऑफ हर्षिल’ शिखर पर जाने की अनुमति मांगते हुए कहा था कि पतंजलि योगपीठ के 30 लोग और एनआईएम के विशेषज्ञों का दल करीब 23 हजार फीट की ऊंचाई स्थित हॉर्न ऑफ हर्षिल पर जड़ी-बूटियों आदि के बारे में शोध करेगा.

बलूनी ने चैनल से बात करते हुए कहा, ‘हमने आचार्य बालकृष्ण से कहा है कि वो इस प्रोग्राम को तत्काल खत्म करें. उनके दल के साथ हमारे 5 लोगों को भी तैनात किया गया है. गंगोत्री नेशनल पार्क पूरी तरह से प्रतिबंधित क्षेत्र है. यहां किसी तरह का निर्माण या स्थापना नहीं हो सकती है. अगर फिर भी वो ऐसा करेंगे तो उसे हटाने का काम किया जाएगा.’

उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे इस तरह की इजाजत नहीं दे सकते हैं. ‘ये सब भारत सरकार की अनुमति और जमीन स्थानांतरण के बाद ही हो सकता है. फिलहाल हमारा संपर्क किसी से नहीं हो पा रहा है. जैसे ही संपर्क होगा, इसकी जानकारी सभी को दी जाएगी.’

बता दें कि लोक पुराणों के अनुसार, धनवंतरि को विष्णु का अवतार और आयुर्वेद का जनक माना जाता है.

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