भारत में लोकतंत्र की गिरावट का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा

जो लोग यक़ीन करते हैं कि भारत अब भी एक लोकतंत्र है, उनको बीते कुछ महीनों में मणिपुर से लेकर मुज़फ़्फ़रनगर तक हुई घटनाओं पर नज़र डालनी चाहिए. चेतावनियों का वक़्त ख़त्म हो चुका है और हम अपने अवाम के एक हिस्से से उतने ही ख़ौफ़ज़दा हैं जितना अपने नेताओं से.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Alisdare Hickson/Flickr CC BY SA 2.0)

जो लोग यक़ीन करते हैं कि भारत अब भी एक लोकतंत्र है, उनको बीते कुछ महीनों में मणिपुर से लेकर मुज़फ़्फ़रनगर तक हुई घटनाओं पर नज़र डालनी चाहिए. चेतावनियों का वक़्त ख़त्म हो चुका है और हम अपने अवाम के एक हिस्से से उतने ही ख़ौफ़ज़दा हैं जितना अपने नेताओं से.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Alisdare Hickson/Flickr CC BY SA 2.0)

(यह लेख अरुंधति रॉय द्वारा 12 सितंबर 2023 को लौज़ान, स्विट्ज़रलैंड में 2023 का यूरोपियन एस्से प्राइज़ फ़ॉर लाइफ़टाइम एचीवमेंट स्वीकार करते समय दिया गया वक्तव्य है.)

मुझे 2023 यूरोपियन एस्से अवॉर्ड से सम्मानित करने के लिए मैं चार्ल्स विल्यों फाउंडेशन का शुक्रिया अदा करती हूं. शायद यह बात फ़ौरन ज़ाहिर न हो कि मुझे यह सम्मान हासिल करके कितनी ख़ुशी हो रही है. लेकिन बहुत मुमकिन है कि मैं ख़ुशी और संतोष से सराबोर हूं. सबसे अधिक ख़ुशी मुझे इस बात से हो रही है कि यह पुरस्कार साहित्य के लिए है. शांति के लिए नहीं. संस्कृति या सांस्कृतिक आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि साहित्य के लिए. लिखने के लिए. और उस क़िस्म के निबंध लिखने के लिए जैसे निबंध मैं लिखती हूं और पिछले 25 वर्षों से लिखती आ रही हूं.

ये निबंध क़दम दर क़दम भारत के बहुसंख्यकवाद में और फिर पूरी तरह फासीवाद में पतन (हालांकि कुछ लोग इसे एक तरक्की के रूप में देखते हैं) का नक्शा पेश करते हैं. हां, हमारे यहां अभी भी चुनाव होते हैं, और इस वजह से एक भरोसेमंद जनाधार सुरक्षित करने के लिए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हिंदू श्रेष्ठतावाद के संदेश को बड़ी बेरहमी से 1.4 अरब लोगों की इस आबादी के बीच पहुंचाया गया है.

इसका नतीजा यह है कि हमारे देश में चुनाव एक मौसम हैं – हत्या का मौसम, सड़कों-गलियों में पीट-पीटकर मार दिए जाने का मौसम, संकेतों में ज़हरीले संदेश देने का मौसम. यह भारत में अल्पसंख्यकों, ख़ासकर मुसलमानों और ईसाइयों के लिए सबसे ख़तरनाक समय होता है. अब हमें सिर्फ़ अपने नेताओं से ही नहीं, बल्कि आबादी के एक पूरे हिस्से से ख़ौफ़ होता है. अब हमारी सड़कों पर, हमारी कक्षाओं में और कई सारी सार्वजनिक जगहों पर दिखता है कि बुराई को किस तरह एक मामूली, रोज़मर्रा की चीज़ बना दिया गया है.

मुख्यधारा के प्रेस, चौबीस घंटे चलने वाले सैकड़ों न्यूज़ चैनलों को फासीवादी बहुसंख्यकवाद के अभियान में जोड़ लिया गया है. भारत के संविधान को असल में दरकिनार कर दिया गया है. भारतीय दंड संहिता को फिर से लिखा जा रहा है. अगर मौजूदा हुकूमत को 2024 के चुनाव में बहुमत मिल जाता है, तो यह बहुत मुमकिन है कि हमें एक नया संविधान देखने को मिले.

यह भी बहुत मुमकिन है कि जिस कवायद को परिसीमन कहा जाता है, उस पर भी अमल किया जाए. यह चुनावी क्षेत्रों की नई सीमाएं खींचने की प्रक्रिया है, जिसे अमेरिका में जेरीमैंडरिंग के नाम से जाना जाता है. हो सकता है कि परिसीमन का इस्तेमाल करते हुए उत्तर भारत में हिंदी बोलने वाले राज्यों को अधिक संसदीय सीटें दे दी जाएं, जहां भाजपा का एक आधार है. दक्षिण के राज्यों में इससे भारी नाराज़गी पैदा होगी. यह एक ऐसा कदम है जो भारत को एक ऐसे देश में बदल सकता है जहां अलग-अलग इलाक़ों के बीच मनमुटाव और टकराव जगह बना ले.

चुनावों में इनके हारने की संभावना कम ही है. लेकिन वे हार भी जाएं, तब भी समाज में श्रेष्ठ होने के एहसास का ज़हर बहुत गहराई तक फैल चुका है. इसने अंकुश बनाए रखने की ज़िम्मेदारी वाले हरेक सार्वजनिक संस्थान को खोखला कर दिया है. अभी तो निगरानी और अंकुश बनाए रखने के लिए कोई भी संस्थान नहीं बचा है, सिवाय एक कमज़ोर और खोखले कर दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के.

इस बेहद प्रतिष्ठित पुरस्कार और मेरे लेखन को ऐसी स्वीकृति देने के लिए मैं आपका फिर से शुक्रिया अदा करती हूं – लेकिन मैं यह ज़रूर बताना चाहूंगी कि एक लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड किसी शख़्स को बूढ़ा महसूस कराता है. मुझे यह दिखाना बंद करना होगा कि मैं बूढ़ी नहीं हूं. यह एक बहुत बड़ी विडंबना है कि मैं यह पुरस्कार पच्चीस बरसों के एक ऐसे लेखन के लिए हासिल कर रही हूं, जिसमें कही गई बातों की सिर्फ़ अनसुनी की जाती रही है. इसके बजाय अक्सर ही उदारवादियों ने और खुद को ‘प्रगतिशील’ मानने वाले लोगों ने भी इस लेखन का अक्सर मज़ाक उड़ाया और आलोचना की.

यह एक ऐसा लेखन है जिसमें हम जिस तरफ़ जा रहे थे, उसकी दिशा को लेकर चेतावनियां दी गई हैं. लेकिन अब चेतावनी का समय ख़त्म हो चुका है. अब हम इतिहास के एक दूसरे दौर में हैं. एक लेखक के रूप में मैं सिर्फ़ यही उम्मीद कर सकती हूं कि मेरा लेखन इस बेहद खौफनाक और अंधेरे दौर का एक गवाह होगा, जो आज मेरे मुल्क की ज़िंदगी पर हावी हो रहा है. और उम्मीद करती हूं कि मेरे जैसे दूसरे लोगों का काम बना रहे, ताकि आने वाले वक़्त को यह बात पता चल सके कि जो कुछ भी हो रहा था उससे सारे लोग सहमत नहीं थे.

एक निबंध लेखक के रूप में मेरी ज़िंदगी किसी योजना का हिस्सा नहीं थी. यह बस हो गई.

1997 में मेरी पहली किताब द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स थी, जो एक उपन्यास था. इत्तेफाक़ से उसी साल ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भारत की आज़ादी की पचासवीं सालगिरह भी थी. शीत युद्ध को ख़त्म हुए और अफ़गान-सोवियत युद्ध के मलबे में सोवियत कम्युनिज्म को दफ़्न हुए आठ साल हो चुके थे. यह अमेरिका के प्रभुत्व वाली एकध्रुवीय दुनिया की शुरुआत थी, जिसमें पूंजीवाद के सामने उसकी कोई विरोधी ताक़त नहीं बची थी. भारत ने पाला बदला और वह संयुक्त राज्य के खेमे में शामिल हो गया. उसने कॉरपोरेट पूंजी के लिए अपना बाजार खोल दिया.

निजीकरण और ढांचागत समायोजन मुक्त बाज़ार के नारे थे. भारत की वाहवाही हो रही थी. लेकिन फिर 1998 में भाजपा के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्रवादी सरकार सत्ता में आई. इसने सबसे पहला काम जो किया वह था- सिलसिलेवार परमाणु परीक्षण. ज़्यादातर लोगों ने एक ज़हरीली, अंधभक्त राष्ट्रवादी भाषा में इसका स्वागत किया, इसमें लेखक, कलाकार और पत्रकार सब शामिल थे. यह बात अचानक ही बदल गई कि आप सार्वजनिक रूप से कैसी चर्चाएं कर सकते हैं.

तब मुझे अपने उपन्यास के लिए बुकर पुरस्कार मिला ही था और अनचाहे ही मुझे इस आक्रामक नए भारत का एक सांस्कृतिक राजदूत बना दिया गया था. मैं बड़ी पत्रिकाओं के कवर पर छप रही थी. मैं जानती थी कि अगर मैंने कुछ नहीं कहा, तो यह मान लिया जाएगा कि इन सबमें मेरी सहमति है. तब मेरी समझ में आया कि चुप रहना उतना ही राजनीतिक है जितना बोलना. मैं समझती थी कि बोलना साहित्य की दुनिया में मेरे करिअर का अंत कर देगा. उससे भी अधिक मैं समझती थी कि मैं जिन बातों में यकीन करती थी उन्हें अगर मैंने नतीजों की परवाह किए बिना नहीं लिखा तो मैं ख़ुद अपनी सबसे ख़राब दुश्मन बन जाऊंगी, और शायद मैं कभी फिर से लिख नहीं पाऊं.

इसलिए मैंने लिखा, अपने अंदर के लेखक को बचाने के लिए. मेरा पहला निबंध ‘द एंड ऑफ इमेजिनेशन’ (कल्पना का अंत यहां) एक ही साथ व्यापक प्रसार वाली दो बड़ी पत्रिकाओं- आउटलुक और फ्रंटलाइन में प्रकाशित हुआ. एकबारगी ही मुझे ग़द्दार और राष्ट्र-विरोधी करार दिया गया. मैंने इन अपमानों को तारीफ़ों के रूप में लिया, वे बुकर पुरस्कार से कम प्रतिष्ठित नहीं थे.

इसने मेरे लिए एक लंबे सफ़र की शुरुआत की, यह सफ़र बांधों, नदियों, विस्थापनों, जाति, खनन, गृह युद्ध के बारे में था. यह एक ऐसा सफ़र था जिसने मेरी समझ को गहराई दी और मेरे कथा लेखन और कथेतर यानी निबंधों को इस तरह आपस में जोड़ा कि अब उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता है.

मैं अपनी किताब आज़ादी के एक निबंध का एक छोटा-सा हिस्सा पढूंगी, जो इसके बारे में है कि ये निबंध किस तरह इस दुनिया में जी रहे हैं. यह हिस्सा ‘साहित्य की ज़बान’ नाम के निबंध से है.

‘ये निबंध जब पहली बार छपे थे (पहले व्यापक प्रसार वाली पत्रिकाओं में, फिर इंटरनेट पर और फिर आखिरकार किताबों के रूप में), तो उन्हें आशंका भरे संदेह के साथ देखा गया. कम से कम कुछ हलकों में तो ऐसा ही हुआ और ऐसा अक्सर उनकी तरफ से हुआ जो जरूरी नहीं कि सियासी तौर पर असहमत ही हों. रवायती तौर पर जिसे साहित्य समझा जाता है, यह लेखन उसके लिए एक आजमाइश थी. जो लोग खासकर चीजों को अलग-अलग नामों में बांटकर देखने में दिलचस्पी रखते हैं, उनका अंदेशा समझ में आता था. क्योंकि वे यह तय नहीं पा रहे थे कि यह कैसा लेखन था– कोई पर्चा या बहस, अकादमिक या अखबारी लेखन, सफरनामा, या फिर कोई साहित्यिक दुस्साहस?

कुछ के लिए तो यह लेखन ही नहीं था: ‘अरे आपने लिखना क्यों बंद कर दिया? हम आपकी अगली किताब का इंतजार कर रहे हैं.’ कुछ दूसरों को लगा कि मैं भाड़े पर लिखने वाली कलम हूं. हर किस्म की पेशकश मुझे की गई: ‘डार्लिंग, बांधों पर तुमने जो लिखा था वह मुझे बड़ा अच्छा लगा, क्या तुम मेरे लिए चाइल्ड अब्यूज़ पर एक लेख लिख सकती हो?’ (ऐसा सचमुच हुआ था.) मुझे कड़ी नसीहतें दी गईं (ज्यादातर सवर्ण मर्दों द्वारा) कि कैसे लिखा जाता है, मुझे किन विषयों के बारे में लिखना चाहिए और मेरा लहजा क्या होना चाहिए.

लेकिन इन बड़े रास्तों से दूर दूसरी जगहों पर जल्द ही इन लेखों का दूसरी भारतीय ज़बानों में अनुवाद हुआ, ये पर्चों के रूप में छपे, जंगलों और नदी घाटियों में ये बिना कीमत लिए बांटे गए, उन गांवों में जहां हमले हो रहे थे, विश्वविद्यालय परिसरों में जहां छात्र झूठ दर झूठ से आजिज आ गए थे. क्योंकि मोर्चे पर मौजूद ये पढ़ने वाले फैलती हुई आग से झुलसने लगे थे और इस पर उनकी राय एकदम अलग थी कि साहित्य क्या है या इसे कैसा होना चाहिए.

मैं इसका जिक्र कर रही हूं, क्योंकि इसने मुझे सिखाया कि साहित्य की जगह को लेखक और पढ़नेवाले दोनों मिलकर बनाते हैं. कई मायनों में यह एक नाजुक-सी जगह है, लेकिन इसे मिटाया नहीं जा सकता. अगर इसे जमींदोज कर दिया जाए, हम इसे फिर से बना लेते हैं. क्योंकि हमें एक पनाहगाह चाहिए. साहित्य को एक जरूरत के रूप में देखने वाला नज़रिया मुझे बहुत पसंद है. वह साहित्य जो पनाह दे. हर किस्म की पनाह.’

आज यह सोचा भी नहीं जा सकता कि भारत में मुख्यधारा का कोई मीडिया संस्थान इस तरह के निबंधों को प्रकाशित करेगा. वे सभी कॉरपोरेट विज्ञापनों पर जीते हैं. पिछले बीस बरसों में मुक्त बाज़ार और फासीवाद और तथाकथित स्वतंत्र प्रेस ने मिलकर भारत को एक ऐसी जगह पहुंचा दिया है, जहां इसे किसी भी लिहाज से एक लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है.

इस जनवरी में दो ऐसी चीज़ें हुईं दो इन हालात की इतनी बख़ूबी मिसाल पेश करती हैं कि कोई और चीज़ शायद ही ऐसा कर पाए. बीबीसी ने ‘इंडिया: द मोदी क्वेश्चन’ नाम से दो हिस्सों में एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई. और उसके कुछ दिनों के बाद अमेरिका की हिंडनबर्ग रिसर्च ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसे अब हिंडनबर्ग रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है.

हिंडनबर्ग रिसर्च की विशेषज्ञता एक ऐसी चीज़ में है जिसे एक्टिविस्ट शॉर्ट-शेलिंग कहा जाता है. उन्होंने भारत की सबसे बड़े कॉरपोरेट कंपनी अडानी समूह की हैरतअंगेज़ धांधलियों को विस्तार से उजागर किया. बीबीसी-हिंडनबर्ग मामले को भारतीय मीडिया ने इस तरह पेश किया कि यह भारत के ट्विन टावरों पर किसी हमले से कम नहीं था. ये ट्विन टावर हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के सबसे बड़े उद्योगपति गौतम अडानी जो अभी हाल तक दुनिया के तीसरे सबसे अमीर आदमी थे. इन दोनों के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप हल्के नहीं हैं.

बीबीसी इशारा करती है कि मोदी ने सामूहिक क़त्लेआम को उकसाया. हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने अडानी पर ‘कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी जालसाज़ी’ करने का आरोप लगाया है. 30 अगस्त को गार्डियन और फाइनेंशियल टाइम्स ने अपराध के सबूत देने वाले दस्तावेज़ों के आधार पर लेख प्रकाशित किए, जिन्हें ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट द्वारा जमा किया गया था. इनमें भी हिंडनबर्ग रिपोर्ट की और पुष्टि की गई. भारतीय जांच एजेंसियां और ज्यादातर भारतीय मीडिया ऐसी हालत में नहीं है कि वे इनकी जांच कर सकें या इन लेखों को प्रकाशित कर सकें. जब विदेशी मीडिया उन्हें प्रकाशित करता है, तब यह आसान हो जाता है कि एक खोखले आक्रामक राष्ट्रवाद के मौजूदा माहौल में इसे भारतीय संप्रभुता पर एक हमला बताया जाए.

बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘द मोदी क्वेश्चन’ का पहला भाग 2002 में गुजरात राज्य में मुसलमानों के जनसंहार के बारे में है. यह तब शुरू हुआ जब मुसलमानों को रेल के एक डिब्बे को जलाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया, जिसमें 59 हिंदू तीर्थयात्री जिंदा जल गए थे. मोदी इस जनसंहार से महज कुछ ही महीनों पहले राज्य के मुख्यमंत्री मनोनीत हुए थे, तब वे चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री नहीं बने थे. डॉक्यूमेंट्री फिल्म सिर्फ़ हत्याओं के ही बारे में नहीं है, बल्कि कुछ पीड़ितों के 20 साल लंबे उस सफ़र के बारे में भी है, जो उन्होंने भारत की क़ानूनी व्यवस्था की भूलभुलैया में अपने यक़ीन को सीने से लगाए हुए इंसाफ़ और राजनीतिक जवाबदेही की उम्मीद में तय किया है.

फिल्म में आंखोंदेखी गवाहियां शामिल हैं, जिनमें सबसे दहला देने वाली गवाही इम्तियाज़ पठान की है, जिन्होंने ‘गुलबर्ग सोसाइटी जनसंहार’ में अपने परिवार के दस लोगों को खो दिया था. इस कत्लेआम में एक भीड़ ने साठ लोगों को मार डाला था, जिसमें एक पूर्व सांसद एहसान जाफ़री शामिल थे, जिनके टुकड़े करके उन्हें ज़िंदा जला दिया गया. वे मोदी के सियासी प्रतिद्वंद्वी थे और उन्होंने तबके एक चुनाव में मोदी के खिलाफ प्रचार किया था. गुलबर्ग सोसाइटी में हुआ क़त्लेआम उन कुछ दिनों में गुजरात में हुए इसी तरह के कई ख़ौफ़नाक क़त्लेआमों में से एक था.

दूसरे कत्लेआमों में से एक- जिसकी चर्चा फिल्म में नहीं है- 19 साल की बिलक़ीस बानो का सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के 14 सदस्यों की हत्या कर दी गई. इसमें उनकी 3 साल की बेटी भी शामिल हैं. पिछले अगस्त में स्वतंत्रता दिवस के दिन जब मोदी महिलाओं के अधिकारों के बारे में राष्ट्र को संबोधित कर रहे थे, उनकी सरकार ने ठीक उसी दिन बिलक़ीस के उन बलात्कारियों और और उनके परिजनों के हत्यारों को सज़ामाफ़ी दी, जिन्हें आजीवन क़ैद की सजा मिली थी. इन लोगों ने वैसे भी कैद के ज्यादातर दिन पैरोल पर बाहर ही बिताए थे. अब वे आजाद लोग थे. जेल के बाहर फूल-मालाओं के साथ उनका स्वागत किया गया, अब वे समाज के सम्मानित सदस्य हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाजपा के राजनेता उनके साथ मंच पर आते हैं.

बीबीसी की फिल्म ने ब्रिटिश फॉरेन ऑफिस द्वारा अप्रैल 2002 में तैयार की गई एक अंदरूनी रिपोर्ट को उजागर किया, जिससे जनता अब तक वाकिफ़ नहीं थी. फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट ने अनुमान लगाया था कि ‘कम से कम 2,000’ लोगों का क़त्ल किया गया था. इस रिपोर्ट में कहा गया कि सामूहिक क़त्लेआम की योजना पहले से ही बनाई गई थी जिसमें ‘नस्ली सफ़ाए की सभी ख़ास निशानियां’ दिखाई देती हैं. रिपोर्ट कहती है कि विश्वसनीय संपर्कों ने उन्हें बताया था कि पुलिस को चुपचाप खड़े रहने के आदेश दिए गए थे. रिपोर्ट बहुत सीधे-सीधे मोदी की तरफ़ उंगली उठाती है. गुजरात जनसंहार के बाद अमेरिका ने उन्हें वीज़ा देने से मना कर दिया था. मोदी उसके बाद एक के बाद एक तीन चुनाव जीते और 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे. उन पर लगा प्रतिबंध तब हटा लिया गया जब वे प्रधानमंत्री बने.

मोदी सरकार ने फिल्म पर पाबंदी लगा दी है. हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने इस पाबंदी पर अमल किया और इसके सभी लिंक और संदर्भ हटा दिए. फिल्म के रिलीज होने के हफ्तों के भीतर बीबीसी के दफ्तरों को पुलिस ने घेर लिया और टैक्स अधिकारियों ने उन पर छापे मारे.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

दूसरी तरफ, हिंडनबर्ग रिपोर्ट आरोप लगाती है कि अडानी ग्रुप ‘शेयरों की भारी धांधली और हिसाब को लेकर भारी हेराफेरी’ में लिप्त रहा है, जिसने ऑफशोर शेल कंपनियों का इस्तेमाल करके, (शेयर बाज़ार में) सूचीबद्ध अपनी मुख्य कंपनियों के मूल्य को फ़र्ज़ी तरीक़े से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया. इससे इसके प्रमुख की कुल संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई.

रिपोर्ट के मुताबिक़, अडानी की सूचीबद्ध कंपनियों में से सात को उनके वास्तविक मूल्य से 85% अधिक मूल्य पर दिखाया गया. मोदी और अडानी की जान-पहचान दशकों पुरानी है. 2002 के मुसलमानों के सामूहिक क़त्लेआम के बाद उनकी दोस्ती मजबूत हुई. उस वक़्त ज़्यादातर भारत, जिसमें कॉरपोरेट भारत भी शामिल है, गुजरात के क़स्बों और गांवों में आक्रामक हिंदू भीड़ द्वारा ‘बदले में’ मुसलमानों के ख़ुलेआम क़त्ल और बलात्कारों पर ख़ौफ़ से सहम गया था. गौतम अडानी मोदी के साथ खड़े रहे. गुजराती उद्योगपतियों के एक छोटे-से समूह के साथ उन्होंने कारोबारियों का एक नया मंच बनाया. उन्होंने आलोचना करने वालों को ख़ारिज करते हुए मोदी का समर्थन किया, जिन्होंने ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के रूप में अपना नया राजनीतिक करिअर शुरू किया था. इस तरह उस चीज़ का जन्म हुआ जिसे ‘विकास’ के गुजरात मॉडल के नाम से जाना जाता है: कॉरपोरेट दुनिया की भारी दौलत के बूते मजबूत होता हिंसक हिंदू राष्ट्रवाद.

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में तीन कार्यकालों के बाद 2014 में मोदी भारत के प्रधानमंत्री चुने गए. दिल्ली में शपथ ग्रहण समारोह के लिए वे एक निजी जेट में सवार होकर आए, जिसके ऊपर बड़े अक्षरों में अडानी का नाम जगमगा रहा था. मोदी के नौ बरसों के कार्यकाल में अडानी दुनिया के सबसे धनी आदमी बन गए. उनकी दौलत 8 अरब डॉलर से बढ़ कर 137 अरब डॉलर हो गई. अकेले 2022 में उन्होंने 72 अरब डॉलर बनाए, जो दुनिया में उनके ठीक नीचे के नौ अरबपतियों की मिली-जुली दौलत से भी अधिक है.

अब अडानी ग्रुप का एक दर्जन व्यापारिक बंदरगाहों पर नियंत्रण है, जहां से भारत में माल की कुल आवाजाही का 30 फ़ीसदी संचालित होता है. उनके हाथ में सात हवाई अड्डे हैं, जहां से भारत के कुल 23 फ़ीसदी हवाई मुसाफ़िर आते-जाते हैं. भारत के कुल अनाज का 30 फ़ीसदी हिस्सा अडानी के नियंत्रण वाले गोदामों (वेयरहाउस) में जमा है. वे भारत में निजी क्षेत्र में बिजली पैदा करने वाले सबसे बड़े बिजलीघरों के मालिक हैं या उन्हें चलाते हैं.

जी हां, गौतम अडानी दुनिया के सबसे धनी आदमियों में से एक हैं, लेकिन अगर आप चुनावों के दौरान भाजपा की तड़क-भड़क को देखें तो वह न सिर्फ भारत की, बल्कि शायद दुनिया की भी सबसे अमीर राजनीतिक पार्टी निकलेगी. भाजपा ने 2016 में चुनावी बॉन्ड की योजना लागू की, जिसमें कॉरपोरेट कंपनियों को अपनी पहचान सार्वजनिक किए बिना राजनीतिक दलों को धन मुहैया कराने की इजाजत दे दी गई थी. भाजपा अब तक सबसे अधिक कॉरपोरेट फंडिंग हासिल करने वाली पार्टी बन गई है. ऐसा दिखता है कि मानो ट्विन टावरों का तहख़ाना एक ही है.

जिस तरह मोदी की जरूरत के वक्त अडानी उनके साथ खड़े रहे, मोदी सरकार भी अडानी के साथ खड़ी है और इसने संसद में विपक्ष के सांसदों द्वारा पूछे गए एक भी सवाल का जवाब देने से इनकार किया है. वह इस हद तक चली गई कि उसने उनके भाषणों को संसद के रिकॉर्ड तक से हटा दिया है.

जहां भाजपा और अडानी ने अपनी-अपनी दौलत बटोरी है, अपनी एक आलोचनात्मक रिपोर्ट में ऑक्सफैम ने बताया है कि भारतीय आबादी के सबसे ऊपर के 10% लोगों के पास देश की कुल दौलत का 77% है. 2017 में पैदा हुई कुल दौलत का 73% हिस्सा सबसे अमीर 1% लोगों के पास चला गया, जबकि 67 करोड़ भारतीय लोगों, जो देश का सबसे गरीब आधा हिस्सा हैं, ने पाया कि उनकी दौलत में सिर्फ 1% का इजाफा हुआ है.

जहां भारत को एक विशाल बाज़ार वाली एक आर्थिक ताकत के रूप में पहचाना जाता है, इसकी ज्यादातर आबादी तबाह कर देने वाली गरीबी में जीती है. लाखों लोग गुजारे के लिए मिली राशन की थैलियों पर जीते हैं, जो मोदी का चेहरा छपे हुए पैकेट में बांटी जाती हैं. भारत एक बहुत गरीब अवाम का एक बहुत अमीर देश है. दुनिया के सबसे गैरबराबर समाजों में से एक. ऑक्सफैम इंडिया को अपनी मेहनत का फल भी मिला, उसके दफ्तरों पर भी छापे मारे गए. समस्याएं खड़ी करने वाले एमनेस्टी इंटरनेशनल और कुछ दूसरे ग़ैर सरकारी संगठनों को इतना परेशान किया गया कि उन्होंने काम करना बंद कर दिया.

इनमें से किसी भी बात का पश्चिमी लोकतंत्रों के नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ा है. हिंडनबर्ग-बीबीसी मामलों के कुछ ही दिनों के भीतर ‘गर्मजोशी से भरी’ बैठकों के बाद प्रधानमंत्री मोदी, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रों ने घोषणा की कि भारत 470 बोइंग और एयरबस हवाई जहाज़ ख़रीदेगा. बाइडेन ने कहा कि इस सौदे से दस लाख से अधिक अमेरिकी नौकरियां पैदा होंगी. एयरबस में इंजन रोल्स रॉयस का होगा. ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने कहा कि ‘ब्रिटेन के उभरते हुए विमान निर्माण सेक्टर के लिए आसमान ही सीमा है.’

जुलाई में मोदी ने अमेरिका का राजकीय दौरा किया और बास्तील दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में फ्रांस गए. क्या यकीन करेंगे आप इस पर? मैक्रों और बाइडेन बेहद शर्मनाक तरीकों से उनकी ख़ुशामद करते रहे, जबकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि यह सब 2024 के चुनाव, जहां मोदी तीसरा कार्यकाल पाने के लिए उतरेंगे, के प्रचार में मुंहमांगी मुराद की तरह काम करेगा. जिस आदमी को वे गले लगा रहे हैं, उसके बारे में ऐसा कुछ भी नहीं है जो वो जानते.

वे गुजरात जनसंहार में मोदी की भूमिका के बारे में जानते होंगे. जिस घिनौने तरीकों और नियमित रूप से मुसलमानों को पीट-पीटकर सरेआम मारा जा रहा है, जिस तरह मोदी के मंत्रिमंडल के एक सदस्य फूल-मालाएं लेकर मुसलमानों के हत्यारों से मिले, जिस तरह हर क़िस्म से मुसलमानों को अलग-थलग और अकेला कर देने की एक तेज़ रफ्तार प्रक्रिया चल रही है, उन्हें इन सबकी जानकारी भी रही होगी. उन्हें हिंसक हिंदू गिरोहों द्वारा सैकड़ों चर्चों को चलाए जाने की जानकारी भी रही होगी.

उन्हें विपक्षी नेताओं, छात्रों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, और पत्रकारों को उत्पीड़ित किए जाने की ख़बर भी रही होगी, जिनमें से कुछ को जेल की लंबी सज़ाएं तक मिल चुकी हैं; पुलिस और हिंदू राष्ट्रवादी होने के अंदेशे वाले लोगों द्वारा विश्वविद्यालयों पर हमलों की; इतिहास की किताबों को फिर से लिखे जाने की; फिल्मों पर पाबंदियां लगाए जाने की; एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बंद होने की; बीबीसी के भारतीय दफ़्तरों पर छापों की; कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सरकार के आलोचकों को विदेश यात्राओं से रोकने के लिए रहस्यमय नो-फ्लाई लिस्ट में डाले जाने की; भारतीय और विदेशी अकादमिक लेखकों-चिंतकों पर दबावों की जानकारी भी रही होगी.

उन्हें पता होगा कि भारत अब वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक) में 180 देशों में 161वें रैंक पर है, कि भारत के कई सारे बेहतरीन पत्रकारों को मुख्यधारा के मीडिया से निकाल बाहर कर दिया गया है, और पत्रकारों को शायद जल्दी ही सेंसर की एक ऐसी व्यवस्था का सामना करना पडे़गा, जिसमें सरकार द्वारा क़ायम की गई एक संस्था के पास यह फ़ैसला करने की ताक़त होगी कि सरकार के बारे में मीडिया की ख़बरें और टिप्पणियां फ़र्ज़ी हैं या नहीं. और उस नए आईटी कानून के बारे में भी उन्हें पता होगा, जिसे सोशल मीडिया पर असहमति को चुप कराने के लिए बनाया गया है.

उन्हें तलवारें लहराने वाली हिंसक हिंदू भीड़ के बारे में भी पता रहा होगा, जो लगातार और खुलेआम मुसलमानों के सफ़ाए और मुसलमान औरतों के बलात्कार का आह्वान करते हैं.

वे कश्मीर के हालात के बारे में जानते रहे होंगे, 2019 में जिसका संपर्क महीनों तक दुनिया से काटकर रखा गया- एक लोकतंत्र में इंटरनेट को बंद करने की यह सबसे लंबी घटना थी. उस कश्मीर के पत्रकारों को उत्पीड़ित और गिरफ्तार किया जाता है, उनसे पूछताछ होती है. 21वीं सदी में किसी की ज़िंदगी भी वैसी नहीं होनी चाहिए, जैसी उनकी है- गर्दनों पर बूटों के साए में.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

वे 2019 में पास किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम के बारे में जानते रहे होंगे, जो बड़े खुलेआम तरीक़े से मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है; उन्हें उन बड़े आंदोलनों की जानकारी भी होगी जो इसके जवाब में उठ खड़े हुए थे; और यह भी कि वे आंदोलन तभी ख़त्म हुए जब उसके अगले साल दिल्ली में हिंदू भीड़ ने दर्जनों मुसलमानों का क़त्ल किया (जो इत्तेफाक से उस समय हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक आधिकारिक यात्रा पर शहर में थे और जिसके बारे में उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा). उन्हें इस बात की जानकारी भी रही होगी कि कैसे दिल्ली पुलिस ने सड़क पर पड़े हुए गंभीर रूप से जख्मी नौजवान मुसलमानों को भारत का राष्ट्रगान गाने पर मजबूर किया और इस दौरान उन्हें कोंचते और लात मारते रहे. इसके बाद उनमें से एक नौजवान की मौत हो गई.

उन्हें इस बात की जानकारी भी रही होगी कि जिस वक़्त वे मोदी के गले मिल रहे थे, उसी वक़्त उत्तर भारत में एक छोटे-से क़स्बे से मुसलमान अपना घर-बार छोड़ कर भाग रहे थे, जब ख़बरों के मुताबिक़ सत्ताधारी दल से जुड़े हिंदू चरमपंथियों ने मुसलमानों के दरवाज़ों पर क्रॉस के निशान लगाए और उन्हें चले जाने को कहा. ‘मुसलमान-मुक्त’ उत्तराखंड की खुलेआम बातें हो रही हैं.

उन्हें पता रहा होगा कि मोदी की हुक्मरानी में भारत के उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर एक बर्बर गृह युद्ध की आग में झुलस रहा है. एक किस्म का नस्ली सफाया अंजाम दिया जा चुका है. इसमें केंद्र सरकार की मिलीभगत है, राज्य सरकार इसकी भागीदार है, सुरक्षा बल दो हिस्सों में बंट गए हैं, जिनमें एक तरफ पुलिस और दूसरी तरफ़ कोई व्यवस्था नहीं है. इंटरनेट बंद है. ख़बरों को रिस-रिसकर आने में हफ्तों लग जाते हैं.

इन सबके बावजूद दुनिया की ताक़तें मोदी को वह सब कुछ मुहैया करा रही हैं, जो उन्हें भारत के सामाजिक ताने-बाने को तबाह करने और जलाने के लिए चाहिए. मुझसे पूछिए तो यह एक क़िस्म का नस्लवाद है. ये ताक़तें लोकतांत्रिक होने का दावा करती हैं, लेकिन ने नस्लवादी हैं. वे इसमें यकीन नहीं करते कि वे जिन ‘मूल्यों’ पर अमल करने का दावा करते हैं, उन्हें अश्वेत देशों पर लागू होना चाहिए. बेशक, यह एक पुरानी कहानी है.

इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता. हम अपनी लड़ाई लड़ेंगे- और आखिरकार अपने मुल्क को वापस हासिल भी करेंगे. लेकिन अगर वे यह सोचते हैं कि भारत में लोकतंत्र को पुर्जे-पुर्जे करने का कोई असर पूरी दुनिया पर नहीं पड़ने वाला है, तो यक़ीनन वे ख़ामख़याली में जी रहे हैं.

जो लोग इसमें यक़ीन करते हैं कि भारत अभी भी एक लोकतंत्र है, उनके लिए ये वे कुछ घटनाएं हैं जो महज पिछले कुछ महीनों में घटी हैं. जब मैंने कहा कि हम एक अलग ही दौर में पहुंच गए हैं, तो मैं इसी की बात कर रही थी. चेतावनियों का वक्त खत्म हो चुका है और हम अपने अवाम के एक हिस्से से उतने ही खौफज़दा हैं जितना अपने नेताओं से.

मणिपुर में जहां गृहयुद्ध चल रहा है, इसमें एक पक्ष बन चुकी पुलिस ने दो औरतों को एक भीड़ के हवाले कर दिया जिसने उन औरतों को गांव में निर्वस्त्र घुमाया और फिर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया. उनमें से एक औरत ने अपने छोटे भाई को अपनी आंखों के सामने कत्ल होते हुए देखा. बलात्कारी जिस समुदाय के थे, उस समुदाय की औरतें बलात्कारियों के साथ खड़ी रहीं और उन्होंने अपने आदमियों को बलात्कार करने के लिए उकसाया भी.

महाराष्ट्र में सशस्त्र रेलवे सुरक्षा बल के एक अधिकारी ने ट्रेन के एक डिब्बे में सरेआम मुसलमान सवारियों पर गोलियां चलाईं और लोगों से मोदी को वोट देने का आह्वान किया.

एक बेहद लोकप्रिय आक्रामक हिंदू शख़्स, जो आला राजनेताओं और पुलिसकर्मियों के साथ करीबी से फोटो खिंचाता रहा है, हिंदुओं से एक घनी मुसलमान बस्ती से होकर एक धार्मिक जुलूस में शामिल होने का आह्वान करता है. यह आदमी फरवरी में दो मुसलमान नौजवानों को एक गाड़ी से बांधकर जिंदा जलाने का मुख्य आरोपी है. लेकिन वह अभी तक आजाद था. नूंह कस्बा गुड़गांव से लगा हुआ है, जहां मुख्य अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट कंपनियों के दफ्तर हैं. जुलूस में शामिल हिंदुओं ने मशीनगन और तलवारें ले रखी थीं. मुसलमानों ने अपना बचाव किया. जैसा कि अंदाजा लगाया जा सकता है, जुलूस का अंत हिंसा में हुआ. छह लोग मारे गए. 19 साल के एक इमाम की उनके बिस्तर में ही बेरहमी से जान ले ली गई, उनकी मस्जिद को तहस-नहस करके जला दिया गया. राज्य ने इस पर कार्रवाई यह की कि सभी गरीब मुसलमान आबादियों को बुलडोजर से गिरा दिया और सैकड़ों मुसलमान परिवारों को जान लेकर भागना पड़ा.

इन सबके बारे में प्रधानमंत्री के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है. यह चुनावों का मौसम है. अगले मई तक आम चुनावों को होना है. यह सब चुनावी अभियान का हिस्सा है. हम और भी अधिक खून-खराबे, सामूहिक हत्याओं, साजिश करके होने वाले झूठे हमलों, नकली जंगों और ऐसी हरेक चीज़ की आशंका के लिए तैयार हैं, जो पहले से ही बंटी हुई आबादी को और अधिक बांट देंगी.

हाल ही में मैंने दहशत से भर देने वाला एक वीडियो देखा जिसे एक छोटे-से स्कूल की कक्षा में शूट किया गया है. टीचर ने एक मुसलमान बच्चे को अपनी डेस्क के पास खड़ा करके बाकी लड़कों से एक-एक कर आकर उसे मारने को कहा. जो छात्र जोर से नहीं मारते, वह उन्हें डांटती है. इस पर कुल मिलाकर यह कार्रवाई की गई है कि गांव के हिंदुओं और पुलिस ने मुसलमान परिवार पर दबाव डाला है कि कोई आरोप दाखिल न किया जाए. मुसलमान बच्चे की स्कूल की फीस लौटा दी गई है और उसे स्कूल से निकाल लिया गया.

भारत में जो कुछ हो रहा है, वह कोई ढीली-ढाली क़िस्म का इंटरनेट फासिज़्म नहीं है. यह सचमुच की चीज़ है. हम नाज़ी बन चुके हैं. सिर्फ हमारे नेता ही नहीं, सिर्फ हमारे टीवी चैनल और अखबार ही नहीं, बल्कि हमारी आबादी का व्यापक हिस्सा भी. अमेरिका और यूरोप और दक्षिण अफ्रीका में रहने वाली भारतीय हिंदू आबादी की बड़ी संख्या राजनीतिक और भौतिक रूप से फासीवादियों की मदद करती है. अपने ज़मीर, और अपने बच्चों के ज़मीर और अपने बच्चों के बच्चों के ज़मीर के लिए, हमें उठ खड़ा होना होगा. इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम नाकाम रहते हैं या कामयाब. वह जिम्मेदारी सिर्फ़ हम भारत के लोगों की ही नहीं है. जल्दी ही, 2024 में अगर मोदी जीत जाते हैं, तो असहमति के सारे रास्ते बंद कर दिए जाएंगे. इस हॉल में मौजूद आपमें से किसी को भी यह दिखावा नहीं करना चाहिए कि जो कुछ भी हो रहा था आप उसके बारे में नहीं जानते थे.

अगर आप इजाजत दें, तो मैं अपना भाषण अपने पहले निबंध ‘द एंड ऑफ इमेजिनेशन’ का एक अंश पढ़ते हुए करना चाहूंगी. यह एक दोस्त के साथ नाकामी के बारे में होने वाली एक बातचीत है- और लेखक के बतौर मेरा निजी घोषणापत्र:

‘मैंने कहा कि जो भी हो, चीज़ों को लेकर उसका नज़रिया बाहरी था, यह अंदाजा लगाना कि किसी इंसान की खुशी या कहिए कि संतुष्टि का सफर अपने चरम पर पहुंच गया है (और अब उसे नीचे ही गिरना होगा) क्योंकि एक इत्तेफाक से उसे ‘सफलता’ मिल गई है. यह इस फीके यकीन पर आधारित था कि दौलत और शोहरत हरेक इंसान के सपनों की सबसे जरूरी चीज़ें हैं.

तुमने न्यूयॉर्क में बहुत ज़्यादा रह लिया है, मैंने उससे कहा. और भी दुनियाएं हैं. दूसरी किस्म के सपने हैं. ऐसे सपने जिनमें नाकामी मुमकिन है. और इज्जत के काबिल भी. कभी-कभी उसके लिए कोशिश करना भी अहम है. ऐसी दुनियाएं हैं जिनमें क़ाबिलियत और इंसानी क़द्र को मापने का अकेला पैमाना शोहरत नहीं है. मैं ऐसे तमाम लड़ने वालों को जानती हूं और उन्हें प्यार करती हूं जो मुझसे कहीं ज़्यादा बेशक़ीमती हैं, जो रोज ब रोज़ लड़ाई जारी रखते हैं, यह जानते हुए भी कि वे नाकाम रहेंगे. यह सच है कि ऐसे लोग इस शब्द के लोकप्रिय अर्थ में कम ‘सफल’ हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे कम संतुष्ट हैं.

मैंने उससे कहा, एक ही सपना है जो ख्वाहिश के लायक़ है, कि यह सपना देखना कि जब तक तुम ज़िंदा हो तब तक जियो, और मरो तभी जब मौत आ जाए. (भविष्य का अंदेशा? शायद.)

‘मतलब क्या है इसका?’ (तनी हुई भौंहें, जरा-सी खीझ).

मैंने समझाने की कोशिश की, लेकिन बहुत अच्छे से कह नहीं पाई. कभी-कभी सोचने के लिए मुझे लिखने की ज़रूरत पड़ती है. इसलिए उसको मैंने अपनी बात कागज के एक नैपकिन पर लिख दी. यह लिखा था मैंने: प्यार करना. प्यार पाना. अपनी महत्वहीनता को कभी न भूलना. अपने आसपास की जिंदगी की बयान से बाहर हिंसा और व्यापक गैरबराबरी का कभी भी आदी न हो जाना. सबसे उदास जगहों में भी खुशी खोजना. खूबसूरती को उसकी छुपी हुई जगहों तक से खोज निकालना. जो बात जटिल है, उसको कभी भी सरल नहीं बनाना और जो बात सीधी-सरल है उसे कभी उलझाना नहीं. मजबूती की इज्जत करना, सत्ता की कभी नहीं. और सबसे बढ़कर, देखना. समझने की कोशिश करते रहना. कभी भी नजरें न फेरना. और भूलना कभी नहीं, कभी भी नहीं.

यह पुरस्कार देकर मुझे सम्मानित करने के लिए आपका एक बार फिर शुक्रिया. पुरस्कार देते वक़्त मेरे बारे में जो कुछ कहा गया है, उसका वह हिस्सा मुझे बहुत प्यारा लगा, जिसमें कहा गया है, ‘अरुंधति रॉय निबंध का इस्तेमाल लड़ाई की तरह करती हैं.’

एक लेखक के लिए इस पर  यकीन करना एक गुस्ताखी, उद्दंडता, और यहां तक कि थोड़ी-सी बेवकूफी भी होगी कि वह अपने लेखन से दुनिया को बदल सकती है. लेकिन अगर उसने इसकी कोशिश तक नहीं की तो यह सचमुच में एक अफ़सोसनाक बात होगी.’

जाने से पहले…मैं बस यह कहना चाहती हूं: बहुत सारी रकम इस पुरस्कार का हिस्सा है. यह रकम मेरे पास नहीं रहेगी. इसे उन कई सारे एक्टिविस्टों, पत्रकारों, वकीलों, फिल्मकारों के साथ साझा किया जाएगा, जो बिना किसी संसाधन के एक नामुमकिन साहस के साथ इस हुकूमत के ख़िलाफ़ अभी भी खड़े हैं. हालात चाहे कितने ही खौफनाक क्यों न हों, आप जानिए कि उनके ख़िलाफ़ भारी लड़ाई जारी है.

आप सबका शुक्रिया.

(मूल अंग्रेज़ी लेख से रेयाज़ुल हक़ द्वारा अनूदित)