कल्पना और कौशल के बिना स्वतंत्रता कहीं भी संभव नहीं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: परम स्वतंत्रता न तो जीवन में संभव है और न ही सृजन में. फिर भी सृजन में ऐसी स्वतंत्रता पा सकना संभव है जो व्यापक जीवन में नहीं मिलती या मिल सकती.

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(पेंटिंग साभार: Bruce Rolff/pixels.com)

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: परम स्वतंत्रता न तो जीवन में संभव है और न ही सृजन में. फिर भी सृजन में ऐसी स्वतंत्रता पा सकना संभव है जो व्यापक जीवन में नहीं मिलती या मिल सकती.

(पेंटिंग साभार: Bruce Rolff/pixels.com)

साहित्य और कलाओं में स्वतंत्रता का मुद्दा सिर्फ़ राजनीतिक सत्ता से जुड़ा नहीं होता: उसका संबंध और साबका उन तत्वों से भी होता है जो स्वयं सृजनात्मक अनुशासनों के अंदर सत्ता बनाते और पोसते हैं. साहित्य हो, या संगीत और ललित कलाएं, रंगमंच या नृत्य, हरेक विधा में कुछ सीमाएं और मर्यादाएं हमेशा सक्रिय रहती हैं. एक तरह से वे ही उनके आंतरिक अस्तित्‍व में सत्ता की भूमिका निभाती हैं. ये बंदिशें कई तरह की हो सकती हैं: यथार्थ-समाज-समय को चित्रित करने से लेकर नैतिकता और सामाजिक वर्जनाओं तक. रागों में वर्जित स्वरों से लेकर रंगमंच पर कुछ मानवीय कर्म न दिखाने तक. साहित्य और कलाओं को समाज में, अकादमिक जगत में, आलोचना में कैसे समझा-समझाया जा रहा है इसका भी स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ता है.

ऐसा तो बहुत हुआ, और हो रहा है वहां साहित्य को अपने आप अपनी शक्ति और संभावना के बल पर खड़े होने और मान्य किए जाने की अनुमति या अवकाश नहीं होते. हम पहले भी यह कह चुके हैं कि साहित्य भी, उदाहरण के लिए, विचार की एक वैध विधा है, कि वह भी मानवीय स्थिति-नियति-संभावना-विकल्प पर अपने ढंग से विचार करता है. यह और बात है कि अक्सर साहित्य स्वयं आत्मविश्वास के साथ अपने विचार की विधा होने पर इसरार नहीं करता और अन्य वैचारिक अनुशासन उसे विचार की एक स्वतंत्र विधा मानने से इनकार करते या कतराते रहते हैं.

इस संदर्भ में साहित्य की स्वतंत्रता का क्या अर्थ या प्रतिफलन हो सकता है. स्वतंत्रता कल्पना और कौशल के बिना कहीं भी संभव नहीं. कल्पना किसी कृति या लेखक को उन सीमाओं का अतिक्रमण करने में मदद कर सकती है जो उसकी स्वतंत्रता के, किसी न किसी तरह से, आड़े आती हैं. कल्पना एक नया मार्ग, जोखिम भरा सही, सुझा सकती है. कल्पना यह भी कर सकती है कि वह सीमाओं का पुनराविष्कार कर उन्हें इतनी लचीली बना दे कि उनमें कुछ नया और अप्रत्याशित करना संभव हो. सीमा को संभावना में बदलने का यह उपक्रम जब-जब होते हम देख सकते हैं.

हर व्यक्ति की दृष्टि अद्वितीय हो सकती है और उसे किसी और व्यापक दृष्टि में विलय करने का प्रलोभन भी प्रबल हो सकता है. ऐसा विलय स्वतंत्रता के विषेध जैसा है. लेकिन बिरले होते हैं, मगर होते हैं, जो अपनी दृष्टि से अद्वितीयता को, वह मान्य-स्वीकार्य-लोकप्रिय हो, न हो, बचाए रखते हैं. वे ही सृजन में स्वतंत्र कहे जा सकते हैं.

परम स्वतंत्रता न तो जीवन में संभव है और न ही सृजन में. फिर भी सृजन में ऐसी स्वतंत्रता पा सकना संभव है जो व्यापक जीवन में नहीं मिलती या मिल सकती. इसमें दो राय नहीं कि हमारा समय ऐसा है जिसमें साहित्य और कलाओं की ज़्यादातर उपेक्षा या अवहेलना हो रही है. राजनीतिक सत्ता, मीडिया और स्वयं अकादमिक जगत ने ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें साहित्य और कलाएं मैटर नहीं करतीं.

ऐसे में इन माध्यमों की स्वतंत्रता या कि उनमें स्वतंत्रता को बचाने-बढ़ाने की कोशिश अप्रासंगिक लग सकती है. पर इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि जब व्यापक जीवन में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष शिथिल पड़ रहा है, साहित्य और कलाओं में ऐसा संघर्ष अथक और अविराम चल रहा है. यह भी एक तरह की दूसरी गवाही होगी.

कोविड के बाद शोध

कोलकता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में कलाओं के शोधार्थियों के एक आयोजन में ‘कोविड के बाद शोध में निदर्शनात्मक बदलाव’ विषय पर कुछ कहने का सुयोग जुड़ा. कोविड में जो विषमताएं-क्रूरताएं और जनहानि हुई, उसके साथ-साथ टेक्नोलॉजी में भी कई परिवर्तन हुए हैं. किसी हद तक हम उसके बाद टेक्नोलॉजी के अधिक गुलाम या बंदी होते जा रहे हैं.

यह भी स्पष्ट है कि गूगल आदि जानकारी और ज्ञान तक के ऐसे स्रोत बन गए हैं कि युवाओं में एक तरह का बौद्धिक आलस्य फैल रहा है. बहुत से युवा विद्वान अब पुस्तकें आदि पढ़कर संदर्भ नहीं खोजते. वह उन्हें आसानी से ऑनलाइन मिल जाते हैं. ऐसा बहुत-सा ज्ञान जो गूगल आदि पर है प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता. गूगल अपने आप तो ज्ञान पैदा नहीं करता: उस पर ज्ञान डाला जाता है. उसकी प्रामाणिकता जांचने के उद्यम से भी युवा अक्सर बचना चाहते हैं. बहुत-सी जानकारी आसानी से मिल रही है पर उसे ज्ञान समझना बहुत हद तक दयनीय है.

हमारे यहां कलाओं की स्थिति में समानताओं के साथ-साथ कई बहुत महत्वपूर्ण अंतर भी हैं. विशेषतः प्रदर्शनकारी कलाएं जैसे संगीत, नृत्य और रंगमंच भंगुर हैं: वे जैसे-जैसे होते हैं वैसे-वैसे ओझल भी होते जाते हैं. संगीत और नृत्य का इतिहास कुछ अवधारणाओं और किंवदंतियों, क़िस्सों आदि पर आधारित हैं. उन पर विचार करते समय हमारे विशेषज्ञ तक उसको हिसाब में नहीं लेते जो कि स्वयं कलाकारों ने अपने प्रयत्न, माध्यम, दृष्टि, संघर्ष आदि के बारे में कहा होता है.

ये उक्तियां प्रायः हर बार संबंधित कला या कलाकार के बारे में ऐसा कुछ आलोकित और प्रगट करती हैं जो आम तौर से सामान्यीकरणों आदि में नहीं होता और जो चकित करता है. अगर प्रयोग के बाद शास्त्र बनने और प्रयोग से ही शास्त्र निकलने की बात सच और सही है तो ऐसा क्यों है कि किसी ने आज तक ऐसी एक भी पुस्तक किसी कला या कलाओं के बारे में क्यों नहीं लिखी जिसमें इन कलाकार-उक्तियों के आधार पर विस्तार से लिखा गया हो?

याद आता है कि ऐसा संभवतः एकमात्र उदाहरण दार्शनिक डॉ. एसके सक्सेना का है जिन्होंने बिरजू महाराज की स्वतःस्फूर्त उक्तियों के आधार पर दशकों पहले भोपाल के भारत भवन में एक सुचिंतित वक्तव्य दिया था जो शायद बाद में लिखा भी गया.

ललित कलाओं में स्थिति बेहतर है. मैं अभी कलाकृतियों की नीलामी करने वाली एक संस्था का कैटलॉग देख रहा था. उसमें न सिर्फ़ हुसैन, रज़ा, गायतोंडे, स्वामीनाथन, मीरा मुखर्जी, तैयब महेता, सूज़ा आदि की कलाकृतियां हैं पर उनकी बेहद मूल्यवान उक्तियां भी हैं. कुछ उदाहरण देखिए. गायतोंडे कहते हैं कि ‘चित्र तो हमेशा आपके अंदर मौजूद हैं, इससे भी पहले जब आप वास्तव में चित्र बनाना शुरू करते हैं. आपको सिर्फ़ अपने को ऐसा उपकरण बनाना है जो प्रामाणिकता के साथ उसे व्यक्त कर सके जो पहले से ही है. चित्र और गायतोंडे एक-दूसरे का पर्याय है.’

सूज़ा ने कहा है: ‘रूपकों में बात करना कि आपकी जड़ें आपके देश में होती हैं ठीक है. पर जड़ों को जल की ज़रूरत होती है जो बादलों से आता है जो दूर देश में आकार लेते हैं और नदियों से जिनके उद्गम किसी और देश में होते हैं.’

ज़रीना हाशमी कहती हैं: ‘मेरा काम माध्यम के बारे में नहीं होता- वह किसी अवधारणा के बारे में होता है. मैं शब्द से शुरू करती हूं, बिंब से नहीं.’

अकबर पदमसी का विचार है कि ‘कलाकार का काम है कि रंग और आकार की शक्ति का उपयोग का वह किसी आंतरिक अवर्णनीय भावना को व्यंजित करे. वह संकेतित होना चाहिए, चित्रित नहीं.’

इसी तरह की उक्तियां संगीतकारों, नर्तकों आदि से भी मिलती रही हैं. उनका आलोचनात्मक उपयोग और विश्लेषण न किया जाना थोड़े अचरज की बात है. अचरज की बात तो यह भी है कि संगीत और नृत्य की इतनी समृद्ध और विपुल संपदा हमारे पास है पर उसके समकक्ष उसकी आलोचनात्मक और वैचारिक समझ और विवेचन बहुत कम. विश्वविद्यालयों के सीमित होते जा रहे परिसरों में यह संशोधन हो पाएगा इसकी संभावना कम ही लगती है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)