सेना ने कश्मीरी पत्रकारों को निशाना बनाने, नैरेटिव बनाने के लिए फ़र्ज़ी एकाउंट इस्तेमाल किए: रिपोर्ट

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट बताती है कि श्रीनगर में भारतीय सेना की चिनार कॉर्प्स से जुड़े फ़र्ज़ी सोशल मीडिया एकाउंट्स के ज़रिये उनका नैरेटिव फैलाया गया और कश्मीरी पत्रकारों को निशाना बनाया गया. भारत में फेसबुक के अधिकारियों को मेटा नियमों के इस उल्लंघन की जानकारी होने के बावजूद सरकारी कार्रवाई के डर से उन्होंने कोई क़दम नहीं उठाया.

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(साभार: Dima Solomin/Unsplash)

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट बताती है कि श्रीनगर में भारतीय सेना की चिनार कॉर्प्स से जुड़े फ़र्ज़ी सोशल मीडिया एकाउंट्स के ज़रिये उनका नैरेटिव फैलाया गया और कश्मीरी पत्रकारों को निशाना बनाया गया. भारत में फेसबुक के अधिकारियों को मेटा नियमों के इस उल्लंघन की जानकारी होने के बावजूद सरकारी कार्रवाई के डर से उन्होंने कोई क़दम नहीं उठाया.

(साभार: Dima Solomin/Unsplash)

श्रीनगर: वाशिंगटन पोस्ट की बुधवार (27 सितंबर) को प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि फेसबुक की कोऑर्डिनेटेड इनऑथेंटिक बिहेवियर (सीआईबी) टीम की भारत इकाई ने एक इन्फ्लुएंस ऑपरेशन (प्रभावित करने के उद्देश्य से की जाने वाली कवायद) से जुड़े एकाउंट्स, जिन्होंने मेटा की अप्रमाणिक व्यवहार से जुड़ी नीतियों का उल्लंघन किया था, को हटाने का विरोध किया था.

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में उनके सुपरवाइज़र्स द्वारा इस बात की ओर ध्यान दिलाए जाने के बावजूद भारत में सीआईबी की टीम आशंकित थी.

वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, ट्विटर (अब एक्स) के कार्यालयों पर नरेंद्र मोदी सरकार की छापेमारी के बीच भारतीय अधिकारी अपनी कानूनी सुरक्षा को लेकर सशंकित थे, उन्हें डर था कि अगर वे नेटवर्क अवरुद्ध करने की कार्रवाई पर आगे बढ़े तो उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा है, ‘मोदी प्रशासन एक ऐसी मिसाल पेश कर रहा है कि कैसे तानाशाह सरकारें अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यह निर्देश दे सकती हैं कि कंपनियों के नियमों की परवाह किए बिना उन्हें कौन-सी सामग्री रखनी चाहिए और क्या हटाना चाहिए.’

उक्त इन्फ्लुएंस ऑपरेशन के बारे में सितंबर 2022 में द वायर ने भी रिपोर्ट किया था, जहां बताया गया था कि कैसे कश्मीर के यूजर्स के तौर पर हजारों बॉट एकाउंट शामिल थे, जो भारतीय सेना की सराहना करते हुए उन देशों, जिनके साथ भारत की प्रतिद्वंद्विता है, जैसे चीन और पाकिस्तान की आलोचना कर रहे थे.

द वायर ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिका स्थित स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्जर्वेटरी, जो दुनिया भर में इंटरनेट टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग का अध्ययन करती है, की एक पड़ताल की सामग्री के बारे में बताया था. ऑब्जर्वेटरी ने जम्मू-कश्मीर में इन्फ्लुएंस ऑपरेशन चलाने वाले एक अज्ञात ऑनलाइन नेटवर्क की खोज की थी.

जहां स्टैनफोर्ड रिपोर्ट ने विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में किसी भी संगठन/व्यक्ति विशेष को इस गतिविधि का जिम्मेदार ठहराने से परहेज किया था, वहीं वाशिंगटन पोस्ट की जांच से पता चलता है कि फेसबुक के अधिकारियों ने तकनीकी जानकारी प्राप्त की- जिसमें कुछ एकाउंट्स से जुड़े जियोलोकेशन (भौगोलिक स्थिति से जुड़े) डेटा भी शामिल थे- जो उन्हें सीधे संबंधित इमारत तक ले गए, जो श्रीनगर में भारतीय सेना के चिनार कॉर्प्स डिवीजन की है.

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में कश्मीर प्रोजेक्ट में शामिल एक फेसबुक कर्मचारी के हवाले से कहा गया है, ‘यह एकदम साफ़ था’ कि चिनार कॉर्प्स ने अपना नैरेटिव फ़ैलाने के इरादे से इस प्लेटफॉर्म पर कश्मीरी होने का दिखावा करने वाले ढेरों फर्जी यूजर आईडी लाकर फेसबुक के नियमों का उल्लंघन किया था.’

कर्मचारी ने आगे कहा, ‘यह वही समय था, जिसने सीआईबी को लगभग तोड़कर रख दिया था और हममें से कई लोगों को नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.’  रिपोर्ट में कहा गया है कि जब फेसबुक के अमेरिकी जांचकर्ताओं ने ‘पहली बार उन एकाउंट्स से किए गए पोस्ट देखे जो कश्मीर के निवासी होने का दावा करते थे, तो किसी एक केंद्रीय संगठन के इसके पीछे होने का सबूत ढूंढना मुश्किल नहीं था. अलग-अलग एकाउंट से एक जैसे शब्दों वाले बहुत सारे पोस्ट किए गए थे.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन्फ्लुएंस ऑपरेशन लगभग एक साल तक बेरोक-टोक चलता रहा क्योंकि अमेरिका में फेसबुक के शीर्ष अधिकारी भारतीय टीम को अपनी बात नहीं समझा सके कि इस मैनीपुलेटिव (हेर-फेर करने वाले) नेटवर्क को खत्म करने की जरूरत है.

यह गतिरोध तब तक जारी रहा जब तक मेटा के वैश्विक मामलों के तत्कालीन उपाध्यक्ष निक क्लेग, जिन्हें भारत की सार्वजनिक नीति (पब्लिक पॉलिसी) का प्रभारी बनाया गया था, से हस्तक्षेप की मांग नहीं की गई. क्लेग ने फेसबुक के शीर्ष वकीलों से परामर्श करने के बाद फैसला सुनाया कि अप्रामाणिक गतिविधि में लिप्त खातों को हटाया जाना चाहिए. अखबार की जांच में पाया गया कि उक्त पेजों को अंततः हटा दिया गया लेकिन फेसबुक ने इसे सार्वजनिक रूप इसके बारे में जानकारी न देने का फैसला किया.

अप्रामाणिक व्यवहार पर मेटा की नीति कहती है कि कंपनी ‘लोगों को फेसबुक पर खुद को गलत तरीके से पेश करने, फर्जी खातों का इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देती.’ इसमें यह भी कहा गया है कि नीति का मकसद “यूजर एकाउंट और हमारी सेवाओं की सुरक्षा करना और एक ऐसी जगह बनाना है जहां लोग उन लोगों और समुदायों पर भरोसा कर सकें जिनसे वे बातचीत करते हैं.’

स्टैनफोर्ड रिपोर्ट इन्फॉर्मेशन ऑपरेशन्स के उन 15 डेटासेट में से एक के विश्लेषण पर आधारित थी, जिन्हें ट्विटर ने अपने प्लेटफॉर्म से हेरफेर और स्पैम नीति का उल्लंघन करने के लिए हटा दिया था. हालांकि, डेटासेट को ट्विटर मॉडरेशन रिसर्च कंसोर्टियम के शोधकर्ताओं के साथ साझा किया गया, जहां से स्टैनफोर्ड के जांचकर्ताओं ने इसे एक्सेस किया.

वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ‘यह भी पाया गया कि फर्जी एकाउंट अक्सर कश्मीर में भारत के मुख्य सैन्य बल- चिनार कॉर्प्स के आधिकारिक खाते को टैग किया जाता था, जिससे पता चलता है कि वे खुद को छिपाने के लिए बहुत कोशिश भी नहीं कर रहे थे.”

इससे पहले स्टैनफोर्ड रिपोर्ट ने हेरफेर करने वाले ट्विटर नेटवर्क की सामग्री का विश्लेषण करके गतिविधि को सेना से जोड़ा था और निष्कर्ष निकाला था कि यह चिनार कोर के उद्देश्यों के अनुरूप था. रिपोर्ट के अनुसार, ‘आधिकारिक चिनार कॉर्प्स एकाउंट (@ChinarcorpsIA) नेटवर्क में सातवां सबसे अधिक मेंशन या रीट्वीट किया गया एकाउंट है.’

रिपोर्ट में पाया गया कि नेटवर्क से जुड़े एकाउंट ने इंटरनेट पर कहीं और से अपनी प्रोफाइल तस्वीरें उठाई थीं. एक विशेष मामले में हुई पड़ताल में पाया गया कि एक एकाउंट ने एक ऐसी तस्वीर इस्तेमाल की, जो फ्रीलांसिंग वेबसाइट फाइवर पर एक अलग यूजर ने पहले से इस्तेमाल की हुई थी.

इसी तरह, वाशिंगटन पोस्ट ने पाया कि भारतीय सेना के इन्फ्लुएंस ऑपरेशन से जुड़े ट्विटर खाते प्रमाणित यूजर्स की चोरी की गई फोटो का इस्तेमाल पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़े पैमाने पर कर रहे थे. इसने एक कश्मीरी पत्रकार जिब्रान नज़ीर के मामले का हवाला दिया है. नज़ीर #नयाकश्मीर के साथ ट्वीट करने वाले एक एकाउंट पर अपनी तस्वीर देखकर हैरान थे, जहां अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद से सूबे के समृद्ध होने का दावा किया गया था.

स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्ज़र्वेटरी के एक शोधकर्ता शेल्बी ग्रॉसमैन, जो इस पड़ताल में शामिल थे, ने पिछले साल द वायर से कहा था, ‘ये नेटवर्क समस्या हैं क्योंकि वे वो इंसान होने का दिखावा कर रहे हैं जो वे नहीं हैं और ऐसा दिखा सकते हैं कि कश्मीरियों की एक राजनीतिक राय है, जबकि असल में वे फर्जी लोग हैं. नेटवर्क केवल फर्जी लोगों के बारे में ही नहीं था. वहां बहुत-सी अन्य खतरनाक चीज़ें भी थीं.’

स्टैनफोर्ड के विश्लेषण में यह भी पाया गया कि नेटवर्क से जुड़े खाते कश्मीरी पत्रकारों के खिलाफ बदनामी अभियान में लगे हुए थे और आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को राजद्रोह के समान बताते थे. स्टैनफोर्ड जांच में पाया गया, ‘पत्रकारों को टैग करने वाले ट्वीट का उद्देश्य या तो घटनाओं को पत्रकारों के ध्यान में लाना है या रिपोर्टर को फॉलोवर्स के ध्यान में लाना- जो अक्सर भारत विरोधी सामग्री के लिए रिपोर्टर को निशाना बनाने का एक स्पष्ट प्रयास होता था.” .

वाशिंगटन पोस्ट की जांच भी समान निष्कर्षों पर पहुंची और इसने दुर्भावनापूर्ण नेटवर्क पर स्वतंत्र कश्मीरी पत्रकारों के नाम, उनकी निजी जानकारी का खुलासा करने और गुमनाम ट्विटर एकाउंट का इस्तेमाल करके उन्हें निशाना बनाने का आरोप लगाया. रिपोर्ट में न्यूज़ आउटलेट द कश्मीरियत के 30 वर्षीय संपादक काजी शिबली के मामले का हवाला दिया गया है.

वाशिंगटन पोस्ट द्वारा देखे गए एक अज्ञात यूजर ने ट्वीट्स की एक श्रृंखला में लिखा, ‘@द कश्मीरियत #भारतीय सेना द्वारा किए गए विभिन्न अभियानों पर #फर्जी खबरें पोस्ट करता है, जिससे लोगों में #सेना के प्रति नफरत पैदा होती है. यहां तक कि #कश्मीर में हो रहे राशन वितरण जैसी सकारात्मक चीजों को भी @TheKashmiriyat के पोस्ट में नकारात्मक तरह से दिखाया गया है.’

इसी तरह, स्टैनफोर्ड रिपोर्ट ने भी नेटवर्क में उन्हीं दो एकाउंट्स की तरफ इशारा किया था, जो मुख्य रूप से पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और नेताओं को निशाना बना रहे थे. स्टैनफोर्ड रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि ये एकाउंट #ह्वाइटकॉलरटेररिस्ट्स जैसे लेबल के साथ पत्रकारों का अपमान कर रहे थे. कुछ मीडिया रिपोर्ट इस शब्द के इस्तेमाल का श्रेय लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे को देती हैं, जो उसी श्रीनगर स्थित उसी चिनार कोर के पूर्व कमांडर हैं जिस पर इस मामले में सवाल उठे हैं.

रिपोर्ट में पाया गया कि इन हैंडलों से आने वाले अधिकांश ट्वीट्स ने कश्मीरी पत्रकार फहद शाह को निशाना बनाया, जो फरवरी 2022 से जेल में बंद हैं.

वाशिंगटन पोस्ट की जांच में पाया गया कि फेसबुक की सीआइबी टीम ने अपने निष्कर्ष कंपनी के सुरक्षा नीति प्रमुख नथानिएल ग्लीचर को भेज दिए थे, ऐसा बताया गया कि जिन्होंने इसे भारत में अपने समकक्षों के साथ साझा किया.

वॉशिंगटन पोस्ट ने एक आधिकारिक बयान के हवाले से कहा, फेसबुक की भारतीय टीम पीछे हट गई और कार्रवाई करने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्होंने कहा कि ‘उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है और उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया जा सकता है.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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