पिकासो और रोथको के कला संसार में विचरण

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पिकासो की ऊर्जा और कल्पनाशीलता अथक और अपरंपार थी. फिर पिकासो से रोथको तक जाना बिल्कुल भिन्न कलासंसार में जाना है. उनके यहां कला गहन विचार, सतत चिंतन और बहुत ठहराव से उपजती है. वह कुछ गहरा और अप्रत्याशित देखती-दिखाती है पर ख़ुद को कुछ कहने से रोकती है.

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पिकासो की ‘गुएर्निका’ और रोथको की एक पेंटिंग. (साभार: Artsper Magazine/The Museum of Contemporary Art)

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पिकासो की ऊर्जा और कल्पनाशीलता अथक और अपरंपार थी. फिर पिकासो से रोथको तक जाना बिल्कुल भिन्न कलासंसार में जाना. उनके यहां कला गहन विचार, सतत चिंतन और बहुत ठहराव से उपजती है. वह कुछ गहरा और अप्रत्याशित देखती-दिखाती है पर ख़ुद को कुछ कहने से रोकती है.

पिकासो की ‘गुएर्निका’ और रोथको की एक पेंटिंग. (साभार: Artsper Magazine/The Museum of Contemporary Art)

सार्थकता अक्सर धीरज से मिलती है: उसको पाने या देखने में जल्दबाज़ी अक्सर मदद नहीं करती, बल्कि ज़्यादातर बाधा साबित होती है. पर अगर आपके पास समय कम हो आप कई बार ऐसा सार्थक कर जाते हैं जो अन्यथा शायद ही संभव होता. पेरिस में हमारे पास कुल दो दिन थे. उसमें हमने पेरिस के लगभग तीन छोरों पर चल रही कला-प्रदर्शनियां देखीं. पहली चित्रकार- मित्र मनीष पुष्कले की, दूसरी पिकासो के रेखांकनों की और तीसरी मार्क रोथको की.

मनीष पुष्कले की प्रदर्शनी ‘कार्ते ब्‍लांश’ नाम से एशियन कला के प्रसिद्ध म्यूज़ी गिमे के गोलाकार शिखर पर लगी है और कुल एक विशाल कलाकृति की है. वह अंडमान-निकोबार अंचल में एक भाषा के लोप से प्रेरित है, पर बहुत बारीकी से और अपार लगते व्यारों में में बुनी गई कृति है जिसमें अक्षर, भाषा, उनकी अथक यात्राएं, भूले-बिसरे चिह्न, अनेक पथ और भटकाव, लोप और उपस्थिति, स्मृति और दिग्भ्रम, विलाप और मौन आदि सभी गुंथे हुए हैं. अंदर और बाहर, निजी और सामाजिक, उजाला और अंधेरा, हो रहे ओर बीत रहे आदि के अनेक युग्म प्रगट होते और परस्पर घुलमिल जाते हैं. शुभारंभ पर प्रसिद्ध हिंदी वेत्ती अनी मान्तो ने कैटलॉग में शामिल और इसी प्रदर्शनी के लिए लिखी गई मेरी हिंदी कविता का फ्रेंच अनुवाद पढ़ा और मैंने मूल कविता सुनाई. कुछ पंक्तियां हैं:

अक्षर हैं पर उनमें शब्द में समाहित होने की इच्छा नहीं है;
चिह्न हैं पर वे किसी आकार में घट जाने की प्रतीक्षा में नहीं हैं;
कुछ छूटा हुआ है पर वह फिर से किसी का हिस्सा नहीं बनना चाहता,
कुछ ज़ाहिर तो हो रहा है पर वह कुछ कहना नहीं चाहता है.

बाहर उजाले की दरारें हैं,
अंदर अंधेरे की सुरगें हैं,
हमारे वितान में उजाले-अंधेरे बुने हुए हैं,
हम दिगंबर नहीं हैं, हम छायाओं में लिपटे हुए हैं.

प्रदर्शनी पेरिस में तीन माह चलेगी और फिर नीस के एशियातिक म्यूज़ियम में जाएगी. इस अवसर पर प्रसिद्ध भाषाविद् और लेखक गणेश देवी ने एक निबंध लिखा है जो कैटलॉग में है.

अगला दिन बारिश और उसके कारण यातायात की उड़चनों का था. टैक्सी मिलना पेरिस में हमेशा ही कठिन होता है पर उस दिन तो संकट गहरा गया. पर हमने हार नहीं मानी. उसी में भागकर दो संग्रहालय गए.

सेंटर पाम्पिदू में पिकासो की 50वीं पुण्यतिथि पर उनके रेखांकनों की अब तक की सबसे बड़ी प्रदर्शनी लगी है, जिसमें अनेक कृतियां पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित हुई हैं. कई रेखांकन हैं जो बाद में कई चित्रों के प्रारूप बने जैसे कि ‘गुएर्निका’ के पहले किए गए कई रेखांकन. एक हज़ार के लगभग रेखांकनों को एकबारगी देखना कठिन तो था, पर कोई और चारा न था.

यह प्रभाव बहुत गहरा पड़ा कि पिकासो की ऊर्जा और कल्पनाशीलता अथक और अपरंपार थी- इतनी विपुल, इतनी प्रयोगधर्मी, इतनी ऊर्जस्वित, इतनी अदम्य कि आश्चर्य होता है कि एक अकेले कलाकार ने कैसे यह संभव किया. इस एहसास से बचा नहीं जा सकता कि पिकासो में मानवीय-दैवीय-दैत्य सभी शक्तियों की त्रिवेणी थी. उनका कहना था कि ‘रेखांकन कोई मज़ाक नहीं है. यह एक बहुत गंभीर और रहस्यमय तथ्य है कि एक सीधी-सादी रेखा एक जीवित प्राणी का प्रतिनिधित्व कर सकती है. न सिर्फ़ उसका बिंब बल्कि, उससे कहीं अधिक, वह जो सचमुच में है.’

रेखांकन की सामग्री और विषय असंख्य हैं. उन्होंने अपनी पहली ड्राइंग क्लास 11 वर्ष की उमर में शुरू की थी और उनकी पहली रेखांकन प्रदर्शनी बार्सेलोना के एक कैफ़े में हुई जब वे 19 वर्ष के थे. प्रेमिकाओं, मॉडल्स, दिगंबराओं, मिथकीय पशुओं, घोड़ों, सांड़ों, मिनोटोर से लेकर नटों, अपोलोनेयर जैसे कविमित्र के लिए, बाल्ज़ाक और ओविड की साहित्यिक कृतियों के लिए अलंकरण, कई कविताओं और रेखांकन की नोटबुक्स, एदुआर माने की कलाकृति ‘घास पर दोपहर का भोजन’ कलाकृति पर कई रेखांकन आदि की विपुलता चकित करती है. रेखा पिकासो के यहां चलती-भटकती-बिलमती-दौड़ी-हांफती-रोती-गाती- हंसती-थकती- सुस्ताती-ऊपर-नीचे जाती-ठहरती-अटकती-लटकती-मुक्त होती है: वह लगभग सब कुछ है, सब कुछ हो सकती है.

पिकासो से रोथको एक बिल्कुल भिन्न कलासंसार में जाना है. उनके यहां कला गहन विचार, सतत चिंतन और बहुत ठहराव से उपजती है. वह कुछ गहरा और अप्रत्याशित देखती-दिखाती है पर कुछ कहने से अपने को रोकती है. यहां कला ही जीवन है. उन्होंने कहा था कि ‘वे चित्रकार इसलिए बने कि वे चित्रकला का संगीत और कविता जैसी मार्मिकता के स्तर पर उन्नयन करना चाहते थे’.

दिलचस्प यह है कि रोथको ने बुनियादी मानवीय भावों को, जिन्हें हम भारतीय कला-चिंतन में स्थायी भाव कहते हैं, अमूर्तन के माध्यम से व्यक्त करने की चेष्टा की. लुई वितां फाउंडेशन की विशाल इमारत की 11 कला-वीथिकाओं में आयोजित यह प्रदर्शनी रोथको की विराट कला को सिलसिलेवार प्रगट करती है: सीधे कुछ कहे बग़ैर रोथको इतना कुछ कह पाते हैं. उनमें मानवीय चेष्टा और संभावना, मानवीय आकांक्षा और विडंबना बहुत सघन रूप से विन्यस्त है. ये सिर्फ़ कलाकृतियां नहीं है- वे जीवनकृतियां हैं. वे सचाई में कुछ नया, अकनीय, अपूर्वानुमेय, अप्रत्याशित जोड़ती हैं. यहां कला जीवन का विस्तार है, उसका इज़ाफ़ा है. लगता है कि जैसे इस कला-वृद्धि से जीवन कुछ अधिक जीवन हो गया जैसे कला कुछ अधिक कला हो गई.

रोथको के चित्रों ने रज़ा को प्रभावित किया था. कुछ कलामर्मज्ञ उनके रंगबोध में कुछ समानताएं भी पाते हैं. रंगों के बड़े-बड़े आयत, वर्ग और चकत्ते इतने ठोस लगते हैं कि उनसे दर्शक आक्रांत हुए बिना नहीं रह सकते. कई सीमित स्पेसों में भी रोथको ने चित्र बनाए और उनको उनसे भर सा दिया है. उनके यहां सिर्फ़ रंग बोलते हैं मानो कि आकारों को भी कुछ कहने की अनुमति नहीं है: उनका काम है रंगों को पर्याप्त जगह देना ताकि वे बोल सकें. यहां संसार रंगसंसार है.

दशकों पहले मैंने रज़ा में रंगक्षोभ नोटिस किया था: उसका पूरा वितान रोथको के यहां है. रोथको के यहां हिंसा या क्षोभ दिखते नहीं है पर वे अंतःसलिल हैं यह वे आग्रह करते हैं. इतने निरंतर सक्रिय और गहरे रंगबोध के बावजूद उनका कहना था कि उनकी रंगों में कोई रुचि नहीं हैं- वे रोशनी तलाश करते हैं.

पुस्तकें, प्रदर्शनी और प्रदर्शन

पुस्तकें तो कुछ पेरिस की शेक्सपीयर एंड कंपनी और गालिआनी के यहां से ले ली थीं, पर लंदन में काफ़ी समय उन्हें फ़ायल्स, वाटरस्टोन और लंदन रिव्यू ऑफ बुकशॉप में नबेरने-लेने में बिताया. इन दुकानों में जो भीड़ होती है उनसे यह साफ़ होता है कि ईबुक्स आदि पुस्तकों को रुचि और आकर्षण से अपदस्थ नहीं कर पाए हैं. कविता के ही बहुत छोटे-छोटे संग्रह निकल रहे हैं- सुकल्पित और सुमुद्रित, कलापुस्तकों की तरह. महंगे भी. फ़ेबर एंड फ़ेबर के यहां से इतने नए कवि प्रकाशित हो रहे हैं, जिनके मैंने कभी नाम ही नहीं सुने. कविता में अनुवाद-पुस्तकों की भी भरमार सी है.

सथबी कला के क्षेत्र में क्रिस्ती की तरह एक प्रतिष्ठित नीलामघर है. वे आधुनिक भारतीय कला के अनेक संचयन जब-तब नीलाम करते रहते हैं. नया संचयन अगले सप्‍ताह नीलाम होने वाला था. लंदन में उनके सदर मुकाम में वे चित्र प्रदर्शित हैं जो हम देखने गए. पाम्पिदू शो के बाद रज़ा के चित्रों के दाम बहुत बढ़ गए हैं. बाक़ायदा चित्रों में से तो कोई भी एक करोड़ से कम का नहीं है. कुछ सिरेग्राफ तक 3 से 5 हज़ार पाउंड की रेंज में हैं. एक साठ के दशक का अनोखा चित्र हमारे वहां घूमते ही आया और उसे हम देख पाए. मकानों का भूदृश्य है, जिसे रज़ा के इकोल द बोजार पेरिस में अपनी एक सहछात्रा को उपहार में दिया था. मैंने उसे पहली बार देखा. उसका शायद ही कभी सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ हो.

कला-नीलामी का एक उजला पक्ष है कि कई कलाकारों की भुला दी गई कलाकृतियां उसमें आती रहती हैं. इस संचयन में मनजीत बावा, अकबर पद्मसी, कृष्ण खन्ना आदि के चित्र शामिल हैं.

इस बार जिस होटल में हम ठहरे, वह ट्राफ़लगर चौक के नज़दीक है: यह तरह-तरह के प्रदर्शनों की जगह है. सो एक दिन शाम को लौटने पर जगह ठसाठस भरी थी: बसें, कारें आदि सब रोक दी गई थीं. हज़ारों लोग, जिनमें काले-गोरे, स्त्रियां और बच्चे, मुस्लिम-ईसाई-यहूदी आदि शामिल थे, फिलिस्तीन के पक्ष और इज़रायल के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे. अगले दिन इज़रायल के समर्थन में भी एक प्रदर्शन उसी जगह हुआ पर वह न तो उतना बड़ा था, न उतना प्रभावशाली.

पश्चिम जिस तरह से इज़रायल का समर्थन कर रहा है उसमें कई दरारें पड़ रही हैं और इन देशों में ऐसे मुखर-सक्रिय तबके हैं जो इस समर्थन का सख़्त विरोध कर रहे हैं. वहां के मीडिया में इसकी ख़बरें और विश्लेषण प्रमुखता से छप रही हैं: टेलीविजन के सभी लोकप्रिय प्रमुख चैनल भी उन्हें पूरी और समुचित जगह दे रहे हैं.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)