रामदेव ने शेल कंपनियों के जाल के ज़रिये कैसे खड़ा किया रियल एस्टेट का साम्राज्य?

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की पड़ताल बताती है कि योग गुरु और कारोबारी रामदेव रियल एस्टेट के क्षेत्र के अगुवा हैं, जहां उनके परिवार के लोगों और क़रीबियों ने शेल कंपनियों के ज़रिये हरियाणा में कई एकड़ ज़मीन ख़रीदी-बेची है.

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रामदेव. (फोटो साभारः फेसबुक/@swami.ramdev)

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की पड़ताल बताती है कि योग गुरु और कारोबारी रामदेव रियल एस्टेट के क्षेत्र के अगुवा हैं, जहां उनके परिवार के लोगों और क़रीबियों ने शेल कंपनियों के ज़रिये हरियाणा में कई एकड़ ज़मीन ख़रीदी-बेची है.

रामदेव. (फोटो साभारः फेसबुक/@swami.ramdev)

नई दिल्ली: साल 2014 के चुनाव से पहले काला धन वापस लाने के दावे करने वाले योग गुरु और कारोबारी बाबा रामदेव जिस पतंजलि ग्रुप का चेहरा हैं, उसकी काली कमाई को लेकर द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने बड़े खुलासे किए हैं.

कलेक्टिव के सदस्य श्रीगिरीश जलिहाल और तपस्या की रिपोर्ट बताती है कि रामदेव के परिवार के लोगों और करीबियों ने शेल कंपनियों के जरिये हरियाणा में कई एकड़ जमीन की खरीदफरोख्त की और रामदेव को रियल एस्टेट की दुनिया का बादशाह बना दिया.

रिपोर्ट कहती है, ‘रामदेव को भारत में योग गुरु के तौर पर जाना जाता है. मगर दिल्ली से सटे मांगर नाम के गांव में उन्हें रियल एस्टेट की दुनिया का बादशाह कहा जाता है. वहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि बाबा के लिए काम करने वालों ने यहां पर रियल स्टेट के धंधे का पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है.’

रामदेव रियल एस्टेट के बादशाह कैसे बने?

रिपोर्ट बताती है कि उन्हें रियल एस्टेट का बादशाह बनाने में शेल कंपनियों की बहुत बड़ी भूमिका है.

शेल कंपनियां कंपनियां केवल पन्नों पर होती हैं, इनके माध्यम से लेनदेन होता है मगर यह नहीं पता चला कि इन कंपनियों का असली मालिक कौन है, या इन कंपनियों के जरिये किसे फायदा पहुंच रहा है. इन कंपनियों का बनाने का मकसद भी यही होता है कि सब कुछ बैंकिंग चैनल के जरिये हो मगर यह न पता चले कि पैसे का असली मालिक कौन है. बड़े-बड़े कारोबारी टैक्स से बचने के लिए ऐसी कंपनियों का निर्माण करते हैं, जिससे सरकार और लोगों को यह बताने से बचे रहे कि उन्होंने पैसा कहां से कमाया और कहां पर लगा रहे हैं.

एक तरह से समझिए कि वही काला धन, जिसकी चर्चा बाबा रामदेव साल 2014 से पहले खूब किया करते थे, उस काले धन को बनाने और बचाए रखने का सबसे बड़ा उपाय यह शेल कंपनियां हैं.

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी पड़ताल में पाया कि पतंजलि ग्रुप से जुड़ी हुई कई सारी शेल कंपनियां है. कागज पर यह कंपनियां जिस बिजनेस को करने का दावा करती हैं, असल दुनिया में वह वैसा कोई काम नहीं करती है. इन शेल कंपनियों में पैसे किसके लग रहे हैं, यह छुपाने के लिए पैसा डाला जाता है. इसी पैसे से इन शेल कंपनियों ने दशकों से दिल्ली के लिए फेफड़ों के तौर पर काम करने अरावली के मांगर के इलाके में कई एकड़ जमीन खरीदी है. इन जमीनों को खरीदकर बेचा गया है. बेचकर जो पैसा मिला है, उस पैसे को फिर से दूसरी शेल कंपनी में लगाया है. उससे फिर से अरावली के इलाके में जमीन खरीदने बेचने का काम किया है.

संक्षेप में मोदी सरकार में काले धन से मुक्ति दिलवाने के दावे करने वाले रामदेव ऐसी कंपनी के संस्थापक सदस्यों में से एक और ब्रांड प्रमोटर है, जो काला धन बनाने और बढ़ाने के काम में लगी हुई है.

क्या वन भूमि है मांगर? 

मांगर की जमीनों के के बारे में भी जान लेते हैं. मांगर दिल्ली से सटा हुआ इलाका है, जो हरियाणा के फरीदाबाद जिले में पड़ता है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होने के कारण यहां जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं. इलाका जंगलों से भरा हुआ है और अरावली की पहाड़ियों में आता है. अगर आदर्श तौर पर नियम कानून बनते और लागू होते, तो मांगर गांव को फॉरेस्ट लैंड यानी वन भूमि का दर्जा मिल चुका होता. वन संरक्षण अधिनियम के तहत इस इलाके को सुरक्षा मिलती. मगर यह इलाका दिल्ली के नजदीक है  रियल स्टेट के कारोबारियों के लिए यह इलाका पैसा छापने वाली मशीन की तरह साबित हो रहा है.

अगस्त 2023 में मोदी सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम में इस तरीके का बदलाव किया जिसकी वजह से अनधिकृत ही सही, मगर संभावित वन भूमि की श्रेणी में आने वाले इस इलाके को इस कानून के तहत जो थोड़ी-बहुत सुरक्षा मिलती थी, वह भी जाती रही. अर्थ यह कि अब यह इलाका व्यावसायिक फायदे के लिए पूरी तरह से खुला हुआ है. रही-सही कसर हरियाणा के भाजपा सरकार ने पूरा कर दी.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 1996 में आदेश दिया था कि जमीन के किसी भी टुकड़े पर अगर जंगल है तो संरक्षित करना होगा. मांगर की जंगल वाली जमीन की खरीदफरोख्त के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश अड़चन की तरह काम कर रहा था. हरियाणा सरकार ने चुपचाप इस अड़चन को हटाने का काम किया, जिसका अंतिम फायदा पतंजलि ग्रुप पर दूसरे रियल एस्टेट के कारोबारियों को मिला.

कलेक्टिव की रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में बताया गया है कि कैसे सरकारी हीलाहवाली ने पतंजलि को फायदा पहुंचाया.

रिपोर्ट कहती है, ‘न्यायिक रिकॉर्ड, सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है कि हरियाणा सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक ठोस प्रयास किए है कि इन संवेदनशील अरावली पहाड़ियों को कोई सुरक्षा न मिले. राज्य ने 1996 और 2022 के सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण आदेशों, जो इन जंगलों को सुरक्षा प्रदान करते थे, राज्य वनों की कटाई के कानून और एक केंद्र सरकार का कानून जो दिल्ली और उसके आसपास पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण भूमि की रक्षा करता है, को खारिज कर दिया.’

रिपोर्टर्स कलेक्टिव द्वारा कंपनियों, दस्तावेजों के अध्ययन का हवाला देते हुए आगे कहा गया, ‘राज्य की टालमटोल ने अरावली की वन भूमि में एक अनाम रियाल एस्टेट कारोबार को फलने-फूलने में मदद की. रामदेव का पतंजलि समूह, जो आयुर्वेद, सौंदर्य प्रसाधन, भोजन और एफएमसीजी उत्पादों को बेचता है, इसके मुख्य लाभार्थियों में से एक था- आज तक यह संदिग्ध संस्थाओं और शेल कंपनियों के माध्यम से अरावली में जमीन के बड़े हिस्से को खरीद और बेच रहा है.’

12 साल पुरानी कंपनी और एक रुपये का बिजनेस नहीं!

कलेक्टिव की टीम ने कॉरपोरेट रिकॉर्ड की छानबीन कर यह पता लगाया है कि पतंजलि के साम्राज्य से जुड़ी तकरीबन दर्जनभर से ज्यादा ऐसी शेल कंपनियां है जिन्होंने मांगर गांव के इलाके में जमीन खरीदने और बेचने का काम किया है. राज्य के डिजिटल रिकॉर्ड से पता चलता है कि कम से कम 14 शेल कंपनियों के कब्ज़े में मांगर गांव के इलाके की 142 एकड़ जमीन है.

चूंकि डिजिटल रिकॉर्ड बहुत देरी से अपडेट होते हैं, तो यह भी संभावना है कि पतंजलि ग्रुप से जुड़ी शेल कंपनियों का इससे ज्यादा जमीन पर कब्जा हो.

कलेक्टिव की टीम ने पतंजलि समूह से जुड़ी एक शेल कंपनी- पतंजलि कोर्रुपैक प्राइवेट लिमिटेड (Patanjali Corrupack Private Limited) के पैसे की आवाजाही की पड़ताल भी की है. यह कंपनी साल 2009 में  रामदेव के भाई राम भरत और रामदेव के सबसे खास सहयोगी और पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के सीईओ आचार्य बालकृष्ण ने की थी.

रामदेव और भरत राम का कहना है कि यह कंपनी पैकेजिंग मटेरियल मैन्युफैक्चरिंग करने का काम करती है. मगर पिछले 12 साल का रिकॉर्ड बताता है कि इस कंपनी ने पैकेजिंग मैटेरियल मैन्युफैक्चरिंग की दुनिया में एक रुपये का बिजनेस नहीं किया है, सिर्फ जमीन खरीदने और बेचने का काम किया है.

कानूनी तौर पर देखा जाए, तो पैकेजिंग मैटेरियल मैन्युफैक्चरिंग का काम करने वाली कंपनी अपने काम के लिए पट्टे पर जमीन ले सकती है या जमीन खरीद सकती है. मगर जमीन खरीदने बेचने का काम नहीं कर सकती है. मगर उक्त कंपनी पैकेजिंग का काम न करते हुए जमीन खरीदने और बेचने के काम में लगी रही.

साल 2011 तक पतंजलि नेटवर्क के जरिये मिले पैसे से पतंजलि की  कोर्रुपैक प्राइवेट लिमिटेड के पास मांगर गांव के तकरीबन 70 एकड़ जमीन का मालिकाना हक था.

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पतंजलि से  जुड़ी एक और शेल कंपनी का ज़िक्र किया है. यह कंपनी है कनखल आयुर्वेद प्राइवेट लिमिटेड (Kankhal Ayurved Private Limited), जो साल 2006 में आचार्य बालकृष्ण और स्वामी मुक्तानंद द्वारा बनाई गई थी. कागज़ पर तो कंपनी को आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथिक और एलोपैथिक दवाओं के निर्माण और बिक्री के लिए बनाया गया था लेकिन बिना यह काम किए ही कंपनी पैसा कमाती गई. बालकृष्ण ने अन्य फर्मों की तरह इसमें धन निवेश किया लेकिन कंपनी अपना ‘असली’ काम करने की बजाय मांगर इलाके में जमीन की खरीदफरोख्त में लगकर मुनाफा कमाती रही.

2009 और 2011 के बीच कनखल आयुर्वेद ने मांगर में 43 एकड़ से अधिक जमीन खरीदी. फिर, अगस्त 2011 में उसने 40 एकड़ जमीन दिल्ली की कंस्ट्रक्शन कंपनी टोपाज़ प्रोपबिल्ड प्राइवेट लिमिटेड को बेच दी, जिसमें इसने करीब 365% का मुनाफा कमाया.

रिपोर्ट में रामदेव के करीबियों और उनके परिवार वालों के नाम पर खुली इसी तरह की कई शेल कंपनियों के बारे में बताया गया है, जिनके जरिये रामदेव ने अपना रियल एस्टेट साम्राज्य खड़ा किया है.

(द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की पड़ताल का पहला और दूसरा भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)