उत्तराखंड: जांच समिति के सदस्य ने कहा- ढही सुरंग में कोई सुरक्षा निकास नहीं था

उत्तराखंड के सिल्कयारा में बीते 12 नवंबर को निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा ढह गया था, जिससे वहां काम कर रहे 41 मज़दूर फंस गए हैं. उन्हें बाहर निकालने के लिए बचाव अभियान जारी है. यह सुरंग 1.5 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षी चारधाम परियोजना के हिस्से के रूप में बनाई जा रही है.

बीते 12 नवंबर को उत्तराखंड के सिल्कयारा स्थित निर्माणाधीन सुरंग ढहने से 41 मजदूर फंस गए थे. (फोटो साभार: एएनआई)

उत्तराखंड के सिल्कयारा में बीते 12 नवंबर को निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा ढह गया था, जिससे वहां काम कर रहे 41 मज़दूर फंस गए हैं. उन्हें बाहर निकालने के लिए बचाव अभियान जारी है. यह सुरंग 1.5 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षी चारधाम परियोजना के हिस्से के रूप में बनाई जा रही है.

बीते 12 नवंबर को उत्तराखंड के सिल्कयारा स्थित निर्माणाधीन सुरंग ढहने से 41 मजदूर फंस गए हैं. (फोटो साभार: एएनआई)

नई दिल्ली: उत्तराखंड में सिल्कयारा सुरंग के ढहने की जांच कर रहे समिति के एक सदस्य ने खुलासा किया है कि इसमें आपातकालीन निकास का अभाव था और इसका निर्माण भूवैज्ञानिक दोष के कारण किया गया था.

बीते 12 नवंबर को निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा ढह गया था, जिससे वहां काम कर रहे 41 मजदूर अंदर फंस गए हैं. श्रमिकों को बाहर निकालने के लिए पिछले 13 दिन से विभिन्न एजेंसियां युद्धस्तर पर बचाव अभियान चला रही हैं. इसके अंदर फंसे भारत के कुछ सबसे गरीब राज्यों से आने वाले श्रमिकों को एक पाइप के माध्यम से भोजन, पानी और दवाएं मुहैया कराई जा रही हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि समिति के एक सदस्य नाम न छापने की शर्त पर बताया कि प्रारंभिक निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि यह हादसा एक भूवैज्ञानिक गलती के कारण हुआ हो सकता है, जिसे ‘शीयर जोन’ (Shear Zone) के रूप में जाना जाता है.

यह सदस्य सुरंग ढहने की घटना की जांच के लिए केंद्र द्वारा गठित टीम का हिस्सा हैं.

सदस्य ने कहा कि 1.5 किमी से अधिक लंबी सुरंगों के लिए आपातकालीन निकास की सिफारिश करने वाले सरकारी दिशानिर्देशों के बावजूद इसमें निकलने का कोई रास्ता नहीं था.

सदस्य ने कहा, ‘बचाव अभियान पूरा करने के बाद हमारा ध्यान निर्माण की कमियों की पहचान करने के लिए व्यापक जांच करने पर केंद्रित होगा.’

इसी बीच, सरकार ने बुधवार (22 नवंबर) को कहा कि उसने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को पूरे भारत में बन रही 29 सुरंगों का ऑडिट करने का आदेश दिया है.

एनएचएआई के सदस्य विशाल चौहान से जब शुक्रवार (24 नवंबर) को पूछा गया कि क्या सरकार ऐसी आपात स्थिति के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकती थी, तो उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘हिमालयी भूविज्ञान उतना अनुमानित नहीं है, जितना हम आम तौर पर सोचते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘कई बाधाएं हैं और हम समाधान खोजने के लिए सर्वोत्तम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं.’

यह सुरंग 1.5 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षी चारधाम परियोजना के हिस्से के रूप में बनाई जा रही है, जिसे उत्तर भारत में चार महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थलों को 890 किमी दो-लेन सड़क के माध्यम से जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है.

द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, सुरंग का निर्माण राज्य संचालित राष्ट्रीय राजमार्ग और बुनियादी ढांचा विकास निगम द्वारा किया जा रहा है, जो भारत के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अधीन है.

जुलाई 2020 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि निर्माण शुरू होने से पहले पूरी परियोजना के प्रभाव का ठीक से आकलन नहीं किया गया था.

पर्यावरणविद् हेमंत ध्यानी ने इस दुर्घटना की जांच के लिए गठित समिति का जिक्र करते हुए कहा, ‘समिति को न केवल आपदा प्रबंधन के लिए उठाए गए कदमों की जांच करनी होगी, बल्कि सुरंग के निर्माण और डिजाइन के अलावा विस्फोट के दौरान उचित सावधानी बरती गई थी या नहीं, इसकी भी जांच करनी होगी.’

ध्यानी, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति के सदस्य थे, ने रॉयटर्स को बताया कि उनकी समिति की 7-8 मीटर चौड़ी एक संकीर्ण सुरंग बनाने की सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया गया है, जिससे अधिक विस्फोट हुआ और ढहने का खतरा बढ़ गया.’

उन्होंने कहा, ‘खामियों की एक शृंखला है.’ उन्होंने कहा कि पूरे प्रोजेक्ट के दौरान पहाड़ी की खुदाई, मलबे को डंप करने और पानी के प्रवाह में रुकावट के कारण 200 से अधिक संभावित भूस्खलन स्थान बनाए गए हैं.

उन्होंने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि बेहतर समझ आएगी और सरकार सुधारात्मक कदम उठाएगी.’