बिहार जाति सर्वेक्षण: समाज के हाशिये पर रहा मुसहर समुदाय

जाति परिचय: बिहार में हुए जाति आधारित सर्वे में उल्लिखित जातियों से परिचित होने के मक़सद से द वायर ने एक श्रृंखला शुरू की है. यह भाग मुसहर जाति के बारे में है.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Flickr/Sumedha Minocha/IFPRI)

जाति परिचय: बिहार में हुए जाति आधारित सर्वे में उल्लिखित जातियों से परिचित होने के मक़सद से द वायर ने एक श्रृंखला शुरू की है. यह भाग मुसहर जाति के बारे में है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Flickr/Sumedha Minocha/IFPRI)

यह फलसफा वाजिब नहीं है कि लोकतांत्रिक राजनीति में संख्या का महत्व होता है. यह इसके बावजूद कि एक आदमी-एक वोट का सिद्धांत हमारे देश में है. प्रमाण यह कि बिहार में 40,35,787 लोग रहते हैं, जो खुद को मुसहर बताते हैं. यह आंकड़ा बिहार सरकार द्वारा हाल में जारी जाति आधारित गणना रिपोर्ट-2022 का है.

यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी रिपोर्ट में उन जातियों का भी आंकड़ा है, जिनकी संख्या मुसहर जाति से बहुत कम है, लेकिन शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी उनकी आबादी के अनुपात में कई गुना अधिक है. मुसहर जाति के लोगों की आबादी के अनुपात में भागीदारी न्यूनतम रही है. एक जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बनाए भी गए तो इस तरह कि नीतीश कुमार की कृपा के पात्र माने गए.

मुसहर समुदाय के लोग भूमिहीनों में अग्रणी हैं. रोजी-रोजगार के संकट की कोई सीमा नहीं. ऐसी स्थिति में यदि कोई इन्हें मुसहर कहता है तो वह क्यों कहता है, यह सवाल बेमानी है. ये पूर्व में देश के खानाबदोशों में शामिल रहे, बिल्कुल ‘रमता जोगी, बहता पानी’ के जैसे. लेकिन इनके पास न तो चरवारों की तरह भेड़ें थीं और न ही मवेशीपालक जातियों के जैसे गाय और भैंस. इन्होंने सुअरों को अपने पास रखा. आज भी बिहार के ग्रामीण इलाकों में ऐसे घर मिलेंगे, जिनमें सुअरों के साथ ये अपना जीवन गुजर-बसर करते हैं.

सरकारी आंकड़ों से इतर 90 फीसदी लोगों के पास अपने नाम पर एक धुर भी जमीन नहीं है. ये गैरमजरूआ जमीन पर, नहर किनारे, गांव के दक्खिन टोले में रहते हैं. गैर-मजरूआ जमीन पर झोपड़ी डालकर रहना और अपनी रैयत अथवा पट्टेवाली जमीन पर घर बनाकर रहने में बहुत फर्क होता है. एक फर्क तो पते का ही है. अधिकांश मुसहरों के आवासीय पते में मुसहर टोली के अलावा मुसहरी का उल्लेख अवश्य रहता है.

कुछ मुसहर लोग खुद को भुईयां भी मानते हैं. हालांकि बिहार सरकार की नजर में अब यह एक अलग जाति है, जिसकी आबादी 11,74, 460 है. भुईयां यानी जमीन. मगही में जमीन को भुईयां ही कहते हैं. ये खुद को जमीन पर रहने वाले ही मानते हैं.

इन्हें मुसहर कहने के पीछे कारण यह कि ये लोग भूख मिटाने के लिए मूस यानी चूहा तक खाने से परहेज नहीं करते. रही बात पारंपरिक पेशे की तो ये मूलत: कृषि पर आश्रित होते हैं. लेकिन खेतिहर के रूप में नहीं, बल्कि खेतिहर मजदूर के रूप में. बिहार के मगध इलाके में खेतिहर मतलब वह जिसके पास खेत हो और. ये ‘अछूत’ की श्रेणी में शामिल हैं. खेतिहर मजदूरी में इन्हें इस कारण भी अक्सर रोजगार नहीं मिलता.

छुआछूत और भेदभाव के अलावा एक बड़ा कारण यह है कि खेतिहर मजदूर जातियों की एक लंबी सूची है. इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि खेती में रोजगार के लिए भी प्रतिस्पर्धा रहती है. इसमें जीत उसी को मिलती है जो सामाजिक रूप से एक हद तक सम्मानित माना जाता है. इसलिए भी मुसहर जाति के लोग आज भी अक्सर धान के खेतों में धान चुनते देखे जा सकते हैं.

बिहार और उत्तर प्रदेश के इलाकों में तो यहां तक कहा जाता है कि यदि तसला में धान हो तो मुसहर कोई काम नहीं करते. लेकिन सच यह है कि इन्हें कोई काम के योग्य मानता ही नहीं.

वैसे यह एक अलहदा जाति है. अपनी संस्कृति के लिहाज से एकदम जनजाति. ये प्रकृति का दोहन करनेवाले नहीं रहे हैं. ये प्रकृति को प्यार करते हैं और पूरे समाज की उपेक्षा सहते हैं. इनकी अपनी संस्कृति रही है और इस लिहाज से ये हिंदू नहीं हैं. इनके अपने देवता हैं.

यदि आप उत्तर बिहार में जाएंगे तो वहां आपको इनके देवता दीना-भद्री मिलेंगे. ऐसे ही दक्षिण बिहार के इलाके में भुईंया देवता नजर आएंगे.

(लेखक फॉरवर्ड प्रेस, नई दिल्ली के हिंदी संपादक हैं.)

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