बिहार जाति सर्वेक्षण: नालबंदों का पेशा ख़त्म हो रहा है, जातिगत दर्जा नहीं

जाति परिचय: बिहार में हुए जाति आधारित सर्वे में उल्लिखित जातियों से परिचित होने के मक़सद से द वायर ने एक श्रृंखला शुरू की है. यह भाग नालबंद जाति के बारे में है.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Flickr/murych_kun/CC BY-NC 2.0 DEED)

जाति परिचय: बिहार में हुए जाति आधारित सर्वे में उल्लिखित जातियों से परिचित होने के मक़सद से द वायर ने एक श्रृंखला शुरू की है. यह भाग नालबंद जाति के बारे में है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Flickr/murych_kun/CC BY-NC 2.0 DEED)

मजहब के रूप में इस्लाम हिंदू धर्म से बिल्कुल अलग है. एक तो इसमें निराकार ईश्वर का सिद्धांत है और दूसरा यह कि इसमें जाति और अमीरी-गरीबी का भेद नहीं है. लेकिन यह केवल मजहबी बात है. व्यवहार के स्तर पर भारत में इस्लाम धर्मावलंबी भी जातियों में बंटे हैं और ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो अपनी जातियों के परे जाकर शादियां करते हैं. समाज के स्तर पर इस धर्म के लोग अशराफ, अजलाफ और अरजाल में बंटे हैं.

यदि हिंदू धर्मावलंबियों की सामाजिक व्यवस्था के सापेक्ष यदि इन जातियों को देखें, तो कह सकते हैं कि अशराफ सवर्ण, अजलाफ शूद्र और अरजाल ‘अछूत’ होते हैं. लेकिन बिहार सरकार के स्तर पर यह विभाजन दूसरा ही रूप अख्तियार करता है. यहां इस्लाम धर्मावलंबियों को ऊंची जातियों, पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग में बांटा गया है.

सनद रहे कि बिहार सरकार द्वारा जारी जाति आधारित गणना रिपोर्ट के मुताबिक सूबे की कुल आबादी 13,07, 25, 310 है. इसमें मुसलमानों की आबादी 2,31, 49,925 है जो कुल आबादी का 17.7 प्रतिशत है. इनमें अशराफ (शेख, पठान और सैयद) की आबादी 62, 80,537 है. हालांकि, पारंपरिक रूप से मुगल भी अशराफ में शामिल हैं, लेकिन बिहार सरकार की रपट में उन्हें अन्य के रूप में प्रतिवेदित बताया गया है. एक अनुमान के मुताबिक दरभंगा, मधुबनी सहित मिथिला के क्षेत्र में इनकी आबादी करीब 10-15 हजार है.

नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में बिहार एक नए तरह के आंदोलन का गवाह बना. यह आंदोलन था- पसमांदा आंदोलन. पसमांदा फारसी का शब्द है, जिसका अर्थ होता है पीछे छूट जाना, और यही अब पीछे छूटे या नीचे धकेल दिए गए लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है. पसमांदा समाज के अंदर बहुत पहले से अपनी पहचान और अधिकार को लेकर एक आंदोलन था. लेकिन जैसा कि अभी कहा गया नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में इसने एक नया रूप लिया, तो यहां यह चर्चा भी की जानी चाहिए कि और अली अनवर ने इस शब्द को इसके सियासी अर्थों के साथ खुले तौर पर पहली बार प्रयोग किया.

अली अनवर बिहार में सत्तासीन जनता दल यूनाइटेड के द्वारा राज्यसभा के दो बार सदस्य बनाए गए. पेशे से पत्रकार अली अनवर ने पसमांदा के जरिए अजलाफ और अरजाल के बीच एका स्थापित करने की कोशिश की. उनका यह आंदोलन मुसलमानों में वैसे तो भेद पैदा करने वाला था और इसका राजनीतिक नतीजा यह हुआ कि जदयू ने लालू प्रसाद के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा दी.

बहरहाल, पसमांदा आंदोलन आज भी एक मुखर आंदोलन है. इसने पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग में शामिल मुसलमानों को एक-दूसरे के करीब कर दिया है. अब यदि इस आधार पर देखें, तो पसमांदा मुसलमान (जो पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं) की कुल आबादी 1, 68,69,388 है.

काबिल-ए-गौर यह भी कि पसमांदा मुसलमानों में सबसे अधिक जातियां अति पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं. पिछड़ा वर्ग में शामिल पसमांदा मुसलमानों की बिहार की कुल आबादी में हिस्सेदारी केवल 2.1124 प्रतिशत है और इनमें शामिल जातियां हैं- सुरजापुरी मुसलमान, मलिक, नालबंद, कागजी, गद्दी, सुकियार और रौतिया.

आज नालबंद जाति की बात करते हैं. यह वह जाति है, जिसका संबंध इस देश के कृषक समुदायों से रहा. इस जाति के लोग बैलों और घोड़ों के पैरों में नाल ठोंकते थे. चूंकि वह समय बैल और घोड़ों का ही था, जो परिवहन के लिए इस्तेमाल किए जाते थे, तो नालबंद जाति के लोग अपने साथ लोहे की नाल, हथौड़ी और कीलें आदि एक झोले में डालकर गांव-गांव घूमते थे.

नाल ठोंकने की विधि पशुओं के लिए पीड़ादायक थी. पहले बैल या फिर घोड़े को रस्सियों के सहारे जमीन पर पटककर काबू में किया जाता था और तब नालबंद उनके खुरों में पड़े पुराने नाल को उखाड़ते थे. इसके बाद खुरों को साफ किया जाता था. कई बार खुरों को साफ करने व समतल बनाने के लिए रेती (लोहे का एक औजार) का इस्तेमाल किया जाता था ताकि नाल आसानी से फिट हो सके. इसके बाद नई नाल ठोंकी जाती थी. आमतौर पर नाल उन बैलों को ही ठोंकी जाती थी, जो बैलगाड़ियों में जोते जाते थे.

नाल ठोंकने के अलावा नालबंद जाति के लोग बाछों को बैल बनाने के लिए उनकी छोटी अवस्था में ही उनका बंध्याकरण कर देते थे. हिंदुओं में नट जाति के लोग भी यह काम करते थे, लेकिन नालबंद जाति के लोग इस काम में उस्ताद माने जाते थे.

खैर, अब यह जाति बिहार में पिछड़ा वर्ग में शामिल है और इसकी कुल आबादी केवल 11,900 रह गई है. सरकार की रपट ही यह बताती है कि इनके कुल 2,461 परिवारों में 803 गरीब हैं. यहां गरीब का मतलब वे, जिनकी रोजाना की आय दो सौ रुपये तक सीमित है.

दरअसल, समय के साथ घोड़ों और बैलों का चलन कम होता गया और नालबंद जातियों का पारंपरिक काम खत्म होता गया. नालबंद जाति के लोगों ने दूसरा पेशा अख्तियार किया. हालांकि अब भी ग्रामीण इलाकों में जहां बैलगाड़ी और तांगे आदि इस्तेमाल में हैं, वहां नालबंद नाल ठोंकते नजर आते हैं. लेकिन अब इनकी संख्या बहुत कम है.

बहरहाल, यही मानव सभ्यता का विकास क्रम है. पहले पेशा बना और फिर पेशों से जाति. अब पारंपरिक पेशे खत्म हो रहे हैं, लेकिन जाति जस की तस बनी है.

(लेखक फॉरवर्ड प्रेस, नई दिल्ली के हिंदी संपादक हैं.)

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