अदम गोंडवी: ‘दिल पे रखके हाथ कहिए, देश ये आज़ाद है?’

पुण्यतिथि विशेष: अदम तब भी नहीं हकलाए, जब वंचितों के सारे हक़ों को मारकर बैठे सत्ताधीशों व हाक़िमों ने अपनी भृकुटियां टेढ़ी कर लीं और सबक सिखाने पर आमादा हो गए. अफ़सोसजनक है कि आज सत्ता ने सवालों की राह ऐसी बना दी है कि अनेक सवालिया निगाहें उसकी ओर उठने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहीं.

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कवि अदम गोंडवी. [22 अक्टूबर 1947 -18 दिसंबर 2011] (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

पुण्यतिथि विशेष: अदम तब भी नहीं हकलाए, जब वंचितों के सारे हक़ों को मारकर बैठे सत्ताधीशों व हाक़िमों ने अपनी भृकुटियां टेढ़ी कर लीं और सबक सिखाने पर आमादा हो गए. अफ़सोसजनक है कि आज सत्ता ने सवालों की राह ऐसी बना दी है कि अनेक सवालिया निगाहें उसकी ओर उठने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहीं.

कवि अदम गोंडवी. [22 अक्टूबर 1947 -18 दिसंबर 2011] (फोटो साभार: सोशल मीडिया)
निस्संदेह, स्वतंत्र भारत में सत्ता से सवाल पूछना इतना कठिन पहले कभी नहीं रहा, जितना आज है. अलबत्ता, वह बहुत आसान कभी नहीं रहा. दलितों-वंचितों व शोषितों द्वारा या उनकी ओर से पूछे जाने पर तो- चूंकि बदनीयत सत्ताओं को उनके ईमानदार जवाब देने में पसीना-पसीना होना बहुत रास नहीं आता- वे प्रायः पूछने वालों को छठी का दूध याद दिलाने पर आमादा हो जाती रही हैं.

इसके बावजूद जनकवि अदम गोंडवी (22 अक्टूबर, 1947-18 दिसंबर, 2011), जिनकी आज पुण्यतिथि है, न सिर्फ जीवनभर ऐसे तबकों की आवाज बने रहे और बेबाकी से सत्ताओं से उनके सवाल पूछते रहे, बल्कि अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाते, मठ व गढ़ सब तोड़ते और ‘अपनों’ की नाना नाराजगियां भी झेलते रहे.

सच पूछिए तो ‘गीतों के राजकुमार’ कहलाने वाले स्मृतिशेष गोपालदास ‘नीरज’ ने उनके एक गीत में- जिनका दुख लिखने की खातिर मिली न इतिहासों को स्याही, कानूनों को नाखुश करके मैंने उनकी भरी गवाही… जले उमर भर फिर भी जिनकी अर्थी उठी अंधेरे में ही, खुशियों की नौकरी छोड़कर मैं उनका बन गया सिपाही…चमचम चूनर चोली पर तो लाखों ही थे मरने वाले, मेरी मगर ढिठाई मैंने फटी कमीजों के गुुन गाए– जैसी जो पंक्तियां खास अपने संदर्भ में लिखी हैं, वे उनसे ज्यादा अदम पर चस्पां होती हैं.

अलबत्ता, अदम के निर्दंभ कवि ने कभी इस तरह का कोई दावा नहीं किया, न ही ऐसी कोई शिकायत कि जिनका कोई नहीं था, उनकी पहरेदारी के कारण ‘कल जब मैं निकला दुनिया में, तिल भर ठौर मुझे देने को मरघट तक तैयार नहीं था.’ क्योंकि उनके निकट उनका सबसे बड़ा सम्मान यही था कि वे ‘किधर गए वो वायदे सुखों के ख्वाब क्या हुए, तुझे था जिसका इंतजार वो जवाब क्या हुए?’ पूछने वाले शलभ (युयुत्सावाद के प्रवर्तक कवि शलभ श्रीराम सिंह) की तर्ज पर अपनी जनता के भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर सत्ता को कठघरे में खड़ी करने का कर्तव्य बखूबी निभा रहे थे.

गौरतलब है कि यह कर्तव्य निभाते हुए अदम तब भी नहीं हकलाए, जब दलित-वंचित तबकों के सारे न्यायोचित हकों पर कुंडली मारकर बैठे सत्ताधीशों व हाकिमों ने अपनी भृकुटियां टेढ़ी कर लीं और सबक सिखाने पर आमादा हो गए. लेकिन अफसोस कि सवालों के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए जरूरी उनकी सांसें ऐसे वक्त में कम पड़ गईं, जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. आज हम देख ही रहे हैं कि सत्ता ने सवालों की राह इतनी कठिन बना दी है कि अनेक सवालिया निगाहें उसकी ओर उठने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहीं.

अदम ने अपने वक्त में सबसे बड़ा और सबसे तल्ख सवाल यह पूछा था कि सौ में सत्तर आदमी जब देश में नाशाद है, दिल पे रखकर हाथ कहिए देश ये आजाद है? इसका जवाब उनके इस संसार में रहते तो उन्हें नहीं ही मिला, उनके जाने के बाद से अब तक के बारह वर्षों में भी नहीं ही मिला है. कारण कि सवाल पूछने लायक हालात ही न रहने देने में सत्ताधीशों के ‘विश्वास’ ने जवाब देने की जिम्मेदारी से पिंड छुड़ाने या अनुकूलित जवाबों से काम चलाने की उनकी आदत से गुपचुप साठगांठ कर ली है, जो अब तक अंतहीन बनी हुई है.

तिस पर विडंबना यह कि अदम की सांसें इसलिए कम पड़ीं कि पीने की उनकी लत बढ़ती-बढ़ती उन्हें ही पीने लग गई. वर्ष 2011 में 67 साल की उम्र में मेडिकल जांच में उन्हें पता चला कि शराब ने उनका लीवर बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर डाला है तो आर्थिक तंगी के कारण वे अरसे तक उसका समुचित इलाज ही नहीं करा पाए और भगवान भरोसे गोडा जिले में स्थित अपने गांव आटा परसपुर के गजराजपुरवा में ही पड़े रहे. बाद में जैसे-तैसे उन्हें लखनऊ के संजय गांधी परास्नातक आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में भर्ती कराया गया तो डाॅक्टर सिर्फ सप्ताह भर उनकी प्राणरक्षा कर पाए.

उनके प्रशंसक बताते हैं कि ऐसी दारुण स्थिति में भी मजाल क्या कि उन्होंने कभी शराब के लिए अपनी शायरी के उसूलों से समझौता किया हो और सत्ता या सत्ताधीशों को आईना दिखाने के बजाय उनकी लप्पो-चप्पो की हों. लप्पो-चप्पो तो उन्होंने उन महानुभावों की भी नहीं की, जो उनकी बहुत इज्जत करते, अपनी सोहबत में रखते, उनकी दुर्दशा पर रहम करते, दया दिखाते और साथ खाते-पीते या उन्हें खिलाते-पिलाते थे.

इनमें उनके गृहजनपद गोंडा के मिस्टर सिन्हा नाम से प्रसिद्ध एक जिलाधिकारी भी थे. अदम उनके ड्राइंग रूम तक पहुंच रखते थे और वे यह सोचकर अदम से अपने स्याह-सफेद किसी काम की भी परदेदारी नहीं करते थे कि वे भले आदमी हैं, कवि तो हैं ही, और चौकी की बात चौके में नहीं करने वाले.

लेकिन एक दिन अदम ने उन्हें यह गजल सुनाकर हक्का-बक्का कर दिया: महज तनख्वाह से निपटेंगे क्या नखरे लुगाई के, हजारों रास्ते हैं सिन्हा साहब की कमाई के. ये सूखे की निशानी उनके ड्राइंगरूम में देखो, जो टीवी का नया सेट है रखा ऊपर तिपाई के. मिसेज सिन्हा के हाथों में जो बेमौसम खनकते हैं, पिछली बाढ़ के तोहफे हैं, वे कंगन कलाई के.

क्या पता कि इसके बाद मिस्टर सिन्हा से उनकी दोस्ती वैसी रह पाई या नहीं, जैसी पहले थी, लेकिन राम बहादुर नाम के एक अन्य जिलाधिकारी 2011 में उनकी बीमारी के वक्त उनके बहुत काम आए. उन्होंने न सिर्फ उनके इलाज की समुचित व्यवस्था करवाई, बल्कि व्यक्तिगत रुचि लेकर उनके गांव गजराज पुरवा को विकसित कराया और उनके नाम पर खेल का मैदान भी बनवाया. साथ ही कर्ज के बोझ से दबे उनके परिवार को कर्जमुक्त कराकर उसके आत्मसम्मानपूर्वक जीने का मार्ग प्रशस्त कराया.

बहरहाल, मिस्टर सिन्हा अदम के इकलौते शिकार नहीं थे. अदम के गांव के एक सरपंच ने, जिसने उन पर कई ‘उपकार’ कर रखे थे, अपनी पहुंच का बेजा इस्तेमाल करके रामसुधी नाम की गांव की लाचार वृद्धा की झोपड़ी अपनी चौपाल में मिला ली, तो उनके कवि को उस ओर से आंख मूंदे रखना गवारा नहीं हुआ. उन्होंने लिख दिया: बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई, रमसुधी की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में.

कैसे गवारा होता, अदम के लिए अपनी शायरी में ईमानदार व जनोन्मुख होना शब्दों के चमत्कार करने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था और वे अपने शुरुआती दौर में ही सामंतों व सवर्णों को दलितों के कठिन जीवन का ताप महसूस कराने के उद्देश्य से ‘चमारों की गली’ शीर्षक लंबी मर्मभेदी रचना लिखकर स्वजातीय बंधु-बांधवों को दुश्मन बना चुके थे.

बात अधूरी रह जाएगी, अगर 1986 के अदम के उस आगाज का जिक्र न किया जाए, जिसने उन्हें रातोंरात राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर दिया.

दरअसल, उस साल प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के पचास साल पूरे हुए थे और लखनऊ में हो रहे उसके सम्मेलन में रात को आयोजित कवि सम्मेलन में स्मृतिशेष मुल्कराज आनंद, तांबा, नागार्जुन, त्रिलोचन और कैफी आजमी वगैरह के साथ कई दूसरी भारतीय व विदेशी भाषाओं के कवि भी उपस्थित थे. कवि सम्मेलन शुरू हुआ और संचालक ने परंपरा के अनुसार वरिष्ठों को पेश करने से पहले, स्थानीय छुटभैये कवि यशःप्रार्थियों को उपकृत करना शुरू किया तो काव्य-संसार में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षरत अदम भी उन्हीं के बीच जा बैठे.

वे स्थानीय नहीं थे, लेकिन उन्होंने संचालक से वायदा करा लिया था कि वह वरिष्ठ कवियों से पहले उनका कवितापाठ करा देगा. लेकिन ऐन वक्त पर संचालक अपना वायदा भूल गया और याद दिलाने पर झिड़ककर कह दिया कि अब वक्त कहां बचा? फिर तरस खाते हुए से कहा- चलो, नाम पुकार देता हूं तुम्हारा, लेकिन एक ही कविता सुनाकर बैठ जाना, दूसरी-तीसरी मत पढ़ने लगना.

उसकी बात मानकर अदम माइक पर पहुंचे तो किसी उद्दंड श्रोता को कहते सुना, ‘लगता है कि अभी-अभी हल जोतकर आ रहा है!’ वे उसकी अनसुनी करके गजल पढ़ना शुरू करते कि दूसरे श्रोता भी ‘ही-ही-ही-ही’ करने लगे. दरअसल, नजाकत व नफासतपसंद लखनऊ के लोग किसान अदम की कुर्ता-धोती व गमछे वाली देहाती वेशभूषा का मजाक उड़ाने पर उतर आए थे.

लेकिन अदम ने अपने आत्मविश्वास को कमजोर नहीं पड़ने दिया और गजल सुनानी शुरू की: जितने हरामखोर थे कुर्ब-ओ-जवार में, परधान बनके आ गए अगली कतार में… जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुजार दें, समझो कोई गरीब फंसा है शिकार में

फिर तो चमत्कार हो गया! उनका मजाक उड़ा रहे श्रोताओं की संवेदनाएं इस कदर झंकृत हो उठीं कि अदम वही गजल सुनाकर जाने लगे तो हंगामा बरपाकर संचालक को उन्हें दोबारा बुलाने को मजबूर कर दिया और फिर भी तृप्त नहीं हुए. संचालक ने समय की कमी का हवाला देकर माफी मांगी और वरिष्ठ कवियों को पेश करना शुरू किया तो भी अनमने से बिना दाद और तालियों के बैठे रहकर नाराजगी जताते रहे.

उस कवि सम्मेलन में उपस्थित रहे वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव याद करते हुए बताते हैं कि फिर तो कोई और कवि जमा ही नहीं, जबकि उसके बाद अदम साहित्याकाश में छाए तो आखिरी सांस तक छाए ही रहे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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