ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार…

19 दिसंबर, 1927 को ब्रिटिश सरकार ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के तीन क्रांतिकारियों- रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक़ उल्ला खां और रोशन सिंह को क्रमशः गोरखपुर, फ़ैज़ाबाद और इलाहाबाद की जेलों में फांसी दी थी.

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शहीद अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह. (फोटो साभार: Wikipedia)

19 दिसंबर, 1927 को ब्रिटिश सरकार ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के तीन क्रांतिकारियों- रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक़ उल्ला खां और रोशन सिंह को क्रमशः गोरखपुर, फ़ैज़ाबाद और इलाहाबाद की जेलों में फांसी दी थी.

शहीद अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह. (फोटो साभार: Wikipedia)

96 साल पहले 19 दिसंबर, 1927 को यानी आज के ही दिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने गोरखपुर, फैजाबाद (अब अयोध्या) और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की जेलों में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के तीन क्रांतिकारियों- रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफाक उल्ला खां और रोशन सिंह को शहीद कर डाला था, जबकि गोंडा की जेल में बंद उनके साथी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी की सांसें दो दिन पहले ही छीन ली थीं. क्योंकि अंदेशा था कि लाहिड़ी की शहादत के लिए 19 दिसंबर की निर्धारित तिथि का इंतजार किया गया तो उनको जेल से निकालने के लिए एक्शन की योजना बना रहे क्रांतिकारी किसी न किसी तरह उन्हें छुड़ा ले जाएंगे.

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पैरोकारों के मुताबिक, इन क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा अपराध यह था कि उन्होंने अपने देश को उसके शिंकंजे से मुक्त कराने के लिए हथियार उठा लिए थे. एक ओर 1919 में 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में एकत्र हजारों निर्दोष देशवासियों के संहार से उनका खून खौल रहा था तो दूसरी ओर फरवरी, 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस ले लेने के चलते अहिंसक संघर्षों से उनका मोहभंग हो गया था.

कहने की जरूरत नहीं कि कोई संघर्ष हिंसक हो या अहिंसक, उसके लिए धन की जरूरत पड़ती ही पड़ती है. वह इन क्रांतिकारियों को भी पड़ी और जनता से चंदा लेने में अपने एक्शनों के गुप्त न रह जाने का अंदेशा दिखा तो नौ अगस्त, 1925 को उन्होंने लखनऊ में काकोरी रेलवे स्टेशन के पास आठ डाउन पैसेंजर ट्रेन से जे जाया जा रहा साम्राज्यवादी सरकार का वह खजाना लूट लिया, जिसे उसने देश की जनता को लूट-लूटकर इकट्ठा किया था.

‘मियां की जूती मिया के सिर’ करने यानी साम्राज्यवादियों का खजाना लूटकर उससे ही उनसे लड़ने के इरादे से नौ अगस्त, 1925 को की गई इस कार्रवाई को उन्होंने ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ का नाम दिया था.

इस एक्शन से साम्राज्यवादी निजाम अंदर तक हिल गया तो इसके दो बड़े कारण थे. पहला यह कि वह इसे क्रांतिकारियों के उसे खुली चुनौती देने के इरादे के ऐलान के तौर पर देख रहा था और दूसरा यह कि इससे देशवासियों को स्पष्ट संदेश गया था कि क्रांतिकारियों ने उससे दो-दो हाथ करने की अदम्य क्षमता हासिल कर ली है.

हालांकि बाद के घटनाक्रम से यही प्रमाणित हुआ कि क्रांतिकारियों ने ऐसा कुछ भी हासिल नहीं किया था, लेकिन उससे पहले निजाम को यही लगा था कि उसने जल्दी ही क्रांतिकारियों का दमन नहीं कर दिया तो देशवासियों का उनके प्रति बढ़ता हुआ सहयोग व समर्थन उसके अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा संकट बन जाएगा. इसलिए वह जानबूझकर इस एक्शन को ‘काकोरी षड्यंत्र’ ही कहता रहा और उसके ज्यादातर ‘षड्यंत्रकारियों’ को गिरफ्तार करने में सफल हो जाने के बाद उन पर दो चरणों में जो मुकदमा चलाया, उसे भी ‘काकोरी षड्यंत्र और उसका पूरक केस’ ही कहा.

फिलहाल, काकोरी ट्रेन एक्शन के बारे में मोटे तौर पर हम इतना ही जानते हैं. हां, यह भी कि इस एक्शन के 17 वर्ष बाद 1942 में 9 अगस्त को ही ‘अंग्रेजो! भारत छोड़ो’ आंदोलन आरंभ हुआ तो इस तारीख को दोहरा ऐतिहासिक महत्व प्राप्त हो गया.

थोडे़ और विस्तार में जाएं, तो अवध चीफ कोर्ट में ‘काकोरी षड्यंत्र’ की सुनवाई के नाटक के बाद छह अप्रैल, 1927 को स्पेशल मजिस्ट्रेट ए. हैमिल्टन ने 115 पृष्ठों का फैसला सुनाया तो क्रांतिकारियों द्वारा ‘बदले की कार्रवाई’ की आशंका से इतने डरे हुए थे कि अदालत से अपने घर जाने की हिम्मत भी नहीं कर पाए. सीधे रेलवे स्टेशन जाकर ट्रेन पर बैठे, बंबई गए और वहां से ब्रिटेन रवाना हो गए. उन्होंने फैसला सुनाने से पहले ही इस यात्रा का पक्का इंतजाम कर लिया था.

गौरतलब है कि इतने डर के बावजूद उन्होंने क्रांतिकारियों को सजा देने में भरपूर सख्ती बरती थी. वे जरा भी नरमी बरत देते तो बिस्मिल, अशफाक, रोशन व लाहिड़ी को फांसी नहीं होती क्योंकि उन्होंने किसी का खून नहीं बहाया था. लेकिन उन्होंने नरमी नहीं बरती और शचींद्रनाथ बख्शी, मुकुंदीलाल, शचींद्रनाथ सान्याल, जोगेशचंद्र चटर्जी व गोविंदचरण कर को उम्रकैद की तो मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष की कैद की सजा भी सुना दी थी. इसी तरह रामकृष्ण खत्री, राजकुमार सिन्हा, सुरेशचंद्र भट्टाचार्य व विष्णुशरण दुबलिश को दस वर्ष की, तो प्रेमकिशन खन्ना, भूपेंद्रनाथ सान्याल व रामदुलारे त्रिवेदी को पांच वर्ष की, प्रणवेश चटर्जी को चार वर्ष की, रामनाथ पांडे को तीन वर्ष की और अपना जुर्म इकबाल कर लेने वाले बनवारीलाल को दो साल की सजा सुनाई थी.

उनसे सजा पाने वालों कई ऐसे क्रांतिकारी भी थे, जो इस तो क्या किसी भी क्रांतिकारी एक्शन में कभी शामिल नहीं हुए थे. गंभीर रूप से बीमार दामोदरस्वरूप सेठ को मुकदमे के बीच ही रिहा कर दिया गया था जबकि ‘फरार’ चंद्रशेखर आजाद 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए थे. दो अन्य क्रांतिकारी हरगोविंद और शचींद्रनाथ विश्वास बरी कर दिए गए थे, जबकि केशवचंद्र चक्रवर्ती, मुरारीलाल शर्मा, महावीर सिंह पहलवान, कुंदनलाल गुप्ता और रामशंकर उर्फ बच्चा पकडे़ ही नहीं जा सके थे.

विडंबना यह कि इतनी कठोर सजाएं भुगतने के बावजूद देश के गैर-क्रांतिकारी हलकों या स्वतंत्रता के लिए अहिंसक संघर्ष चलाने वाली पांतों को इन क्रांतिकारियों की हौसलाअफजाई गवारा नहीं थी. क्यों? इसे समझने के लिए कांग्रेस के नेता, स्वतंत्रता सेनानी व पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी द्वारा संपादित दैनिक ‘प्रताप’ में ‘वे दीवाने’ शीर्षक से छपा यह संपादकीय पढ़ना चाहिए, जो उन्होंने ए. हैमिल्टन के फैसला सुनाने के बाद लिखा था:

अनुत्तरदायी? जल्दबाज? अधीर आदर्शवादी? डाकू? हत्यारे? अरे, ओ दुनियादार, तू उन्हें किस नाम से, किस गाली से विभूषित करना चाहता है? वे मस्त हैं, वे दीवाने हैं, वे इस दुनिया के नहीं हैं. वे स्वप्नलोक की बीथियों में विचरण करते हैं. उनकी दुनिया में, शासन की कटुता से, मां धरित्री का दूध अपेय नहीं बनता. उनके कल्पनालोक में ऊंच-नीच का, धनी-निर्धन का, हिंदू-मुसलमान का भेद नहीं है. इसी संभावना का प्रचार करने के लिए वे जीते हैं. इसी दुनिया में उसी आदर्श को स्थापित करने के लिए वे मरते हैं. दुनिया में पठित मूर्खों की मंडली उनको गालियां देती है.

लेकिन सत्य के प्रचारक गालियों की परवाह करते तो शायद दुनिया में आज सत्य, न्याय, स्वातंत्र्य और आदर्श के उपासकों के वंश में कोई नामलेवा और पानीदेवा भी न रह जाता. संसार को जिन्होंने ठोकर मारकर आगे बढ़ाया वे सभी अपने-अपने समय में लांछित हो चुके हैं.

दुनिया खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने तथा उपभोग करने की वस्तुओं का व्यापार करती है. पर कुछ दीवाने चिल्लाते फिरते हैं: सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. ऐसे कुशल किंतु अवघट व्यापारी पहले भी कभी देखे हैं? अगर एक बार आप हम उन्हें देख लें तो कृतकृत्य हो जाएं.

इस संपादकीय से साफ है कि इन क्रांतिकारियों को दो पाटों के बीच रहकर दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही थी. उनके एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद था, जो उनके निर्मम दमन पर आमादा था तो दूसरी ओर वे देशी महानुभाव, जिन्हें वे ‘अनुत्तरदायी, जल्दबाज, अधीर आदर्शवादी, डाकू और हत्यारे’ वगैरह नजर आ रहे थे.

इसके बावजूद कि 28 जनवरी, 1925 को क्रांतिकारियों ने देश-विदेश में ‘द रिवोल्यूशनरी’ नामक पर्चा बांटकर घोषणा कर दी थी कि न वे आतंकवादी हैं, न ही अराजकतावादी. लेकिन अंग्रेजों और उनके किराये के गुर्गों को देश में निर्बाध रूप से, जो कुछ वे चाहें, नहीं करने देंगे.

अलबत्ता, गणेशशंकर विद्यार्थी और उनके द्वारा संपादित ‘प्रताप’ दोनों आजादी के क्रांतिकारी संघर्षों के भी वैसे ही पुरस्कर्ता थे, जैसे अहिंसक संघर्षों के. उनकी मान्यता थी कि संघर्ष के साधन परिस्थितियों के अनुसार चुने जाते हैं, इसलिए स्वतंत्रता संघर्षों में हिंसा-अहिंसा का सवाल तब तक बेमानी है, जब तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद उनके विरुद्ध मनमानी हिंसा का सहारा ले रहा है.

इसी मान्यता के तहत विद्यार्थी ने काकोरी के क्रांतिवीरों द्वारा जेल में की जा रही भूख हड़ताल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और बिस्मिल, अशफाक, रोशन व लाहिड़ी की शहादत के बाद उनके परिजनों व स्मृतियों के संरक्षण में भी योगदान दिया था- बिस्मिल की बेसहारा मां को सहारा दिया था तो अशफाक की कब्र बनवाई और रोशन की बेटी का कन्यादान किया था.

दूसरे पहलू पर जाएं, तो अयोध्या में अशफाक उल्ला खां मेमोरियल शहीद शोध संस्थान के कर्ता-धर्ता सूर्यकांत पांडे एक विडंबना की ओर ध्यान दिलाते हैं: गुलामी के दौर में ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने बिस्मिल, अशफाक, रोशन व लाहिड़ी की देहों को फांसी पर लटकाया था, तो स्वतंत्र भारत में उनकी स्मृतियों के साथ क्रांतिकारी विचारों व चेतनाओं को बेमौत मारा जा रहा हैं. अशफाक के ‘जिंदान-ए-फैजाबाद’ व रोशन के इलाहाबाद, साथ ही ‘मलाका जेल’ की पहचान बदल दी गई है, तो आजादी की शक्ल व सूरत भी. इसके चलते वह आजादी कहीं नजर ही नहीं आती, जो उन्हें अभीष्ट थी.

प्रसंगवश, अशफाक लिख गए हैं: मुझे विदेशी तो क्या, ऐसी जम्हूरी सल्तनत भी कुबूल नहीं, जिसमें कमजोरों का हक, हक ही न समझा जाए और मजदूरों व किसानों का बराबर का हिस्सा न हो… ऐ खुदा! मुझे ऐसी आजादी तब तक न देना, जब तक तेरी मखलूक में मसावात (बराबरी) कायम न हो जाए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)