इस भयावह समय में फ़िलिस्तीनी कविता सारी मनुष्यता का शायद सबसे मार्मिक और प्रश्नवाचक रूपक है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ़िलिस्तीनी कविता में गवाही, हिस्सेदारी और ज़िम्मेदारी एक साथ है. यह कविता मातृभूमि को भूगोल भर में नहीं, कविता में बचाने की कोशिश और संघर्ष है. दुखद अर्थ में यह कविता मानो फ़िलिस्तीनियों की मातृभूमि ही होती जा रही है- वह ज़मीन जिस पर कब्ज़ा नहीं किया जा सकेगा.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ़िलिस्तीनी कविता में गवाही, हिस्सेदारी और ज़िम्मेदारी एक साथ है. यह कविता मातृभूमि को भूगोल भर में नहीं, कविता में बचाने की कोशिश और संघर्ष है. दुखद अर्थ में यह कविता मानो फ़िलिस्तीनियों की मातृभूमि ही होती जा रही है- वह ज़मीन जिस पर कब्ज़ा नहीं किया जा सकेगा.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

क्या ऐसी कोई जगह, अनुष्ठान या विधा हो सकती है जिसमें ‘सबका दुख इकट्ठा हो’? शायद और भी हों, पर जो फ़ौरन सूझती है वह है पिछली लगभग अधसदी की फ़िलिस्तीनी कविता. इस समय जब फ़िलिस्तीनी अपने गाज़ा अंचल में इज़रायल द्वारा नरसंहार सह-झेल रहे हैं और जिसमें सैकड़ों लोग, ज़्यादातर बिल्कुल निरपराध, हज़ारों की संख्या में बच्चे और स्त्रियां जिनमें शामिल हैं, तब हम कुछ लेखकों ने इस कविता का एक संचयन हिंदी अनुवाद में अनूदित-संकलित किया है.

वह ‘कविता का काम आंसू पोंछना नहीं’ शीर्षक से जिल्द बुक्स द्वारा प्रकाशित हुआ. 21 फ़िलिस्तीनी कवियों की 86 कविताएं हिंदी अनुवाद में शामिल की गयी हैं.

इस समय दुनियाभर में नरसंहार-हिंसा-हत्या-बलात्कार करने वाली शक्तियां बढ़-फैल रही हैं. इस अनाचार और अनैतिक उपक्रम में सत्ताएं, राजयन, धर्म, बाज़ार, मीडिया सभी शामिल और सक्रिय हैं. गाज़ा में चल रहा नरसंहार इस भयावहता का एक बेहद क्रूर संस्करण है. इस सबके बरक़्स विश्व कविता में गहरा प्रतिरोध भी है. सतही भूमंडलीकरण और ग़ैर-बराबरी, घटती मानवीयता, हिंसा और क्रूरता के अटूट सिलसिले के चलते कविता मानवीयता, करुणा और सहानुभूति, समझ और सहकार का इज़हार-इसरार करती नज़र आती है.

कविता के इस मानवीय-नैतिक प्रतिरोध में फ़िलिस्तीनी कविता की अग्रणी भूमिका है. अपनी ही मातृभूमि में निष्कासित और शरणार्थी बने फिलिस्तीनी कवि खुली आंखों से रोज़मर्रा का अपमान, हिंसा, बाधाएं, बंधन-बंदिशें देखता-दर्ज़ करता है पर मानवीय गरमाहट, बिरादरी भाव, दूसरों के भी मनुष्य होने की पहचान और एहतराम गहराई से करता-बरतता है.

फ़िलिस्तीनी कविता में गवाही, हिस्सेदारी और ज़िम्मेदारी एक साथ है. वह कविता की सर्वमान्य शर्तों पर भी खरी उतरती है और अपने लिए किसी छूट या रियायत की मांग नहीं करती. यह कविता मातृभूमि को भूगोल भर में नहीं, कविता में बचाने की कोशिश और संघर्ष है. एक दुखद अर्थ में यह कविता मानो फ़िलिस्तीनियों की मातृभूमि ही होती जा रही है- वह ज़मीन जिस पर कब्ज़ा नहीं किया जा सकेगा.

एक कवि ने कहा ही है: ‘हमारे पास एक देश है शब्दों का’. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि ऐन इस भयानक समय में फ़िलिस्तीनी कविता सारी मनुष्यता का शायद सबसे मार्मिक, सबसे नैतिक, सबसे प्रश्नवाचक रूपक है. उसमें अटूट स्थानीयता और गहरी सार्वभौमिकता एक साथ है. ऐसा कविता और मनुष्यता के इतिहास में पहले कम ही हुआ है.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए कुछ कविताओं के अंश देखिए:

§

ओह, भद्रजनो, पैग़ंबरो,
वृक्षों से उनका नाम मत पूछो
घाटियों से मत पूछो कौन है उनकी मां!
मेरे माथे से फूटती है रोशनी की तलवार
और मेरे हाथ से फूट पड़ता है नदी का सोता.
लोगों का दिल मेरी राष्ट्रीयता है.

– महमूद दरवेश

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… आंसूओं की इस कसैली ज़िद के ख़ातिर,
आइए, आंखों का अभिषेक करें
इस धरती के सबसे पवित्र संत के रूप में.
कविता काम नहीं है आंसू पोंछना
कविता को खाई खोदनी चाहिए
जिसका बांध वे तोड़ दें और इस ब्रह्मांड को डुबो दें.

– ज़करिया मोहम्मद

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भटका हुआ नौजवान, जो दिल और आत्मा निचोड़ देता है,
वह था ही ऐसा
तब भी तुम शहीद हुए उसके पैदा होने से
आठ साल पहले और वह, तुम्हारे जाने के आठ साल बाद.

– माया अबू अल हयात

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काफ़ी है मेरे लिए रहना
अपने मुल्क़ के आग़ोश में उसमें रहना करीब मुट्ठीभर मिट्टी की तरह
घास के एक गुच्छे की तरह
एक फूल की तरह.

– फ़दवा तूक़ान

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पूरा मुल्क ढूंढ रहा है
वह तस्वीर
जिसमें सबका दुख इकट्ठा हो.

– हुसाम मारूफ़

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और क्योंकि शब्द हमारे बीच अब अंत की
तरफ़ जा चुके हैं बिना ज़ोर से कुछ कहे
साथ-साथ हम ललक रहे हैं उससे मिलने को
जबकि पहाड़ी पर पड़े सफ़ेद दस्ताने
धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं
बदलते हुए ज़हरीले फूलों में

– दालिया ताहा

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मैं चाहती हूं होना फिर से ख़ाली दिमाग़
उस शिशु की तरह जो खिड़की से झांकती रौशनी
की तरफ़ ताकती रहे यह सोचते हुए
कि वह मेरी है.

-नाओमी शिहाब न्ये

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बेमतलब मैंने उनके घरों तक पानी पहुंचाया
उनके खच्चरों के लिए घास, उनकी मेज़ों तक शराब,
उन्हें बुलाया उनके घटिया घरेलू नामों से
और उनके बेवकूफ़ पेड़ों की डालों तले प्रार्थना की
बेमतलब मैंने ढलान के पास एक लालटेन छोड़ी
और दरवाज़े पर
दूध का ढंका हुआ कटोरा
और उसके ऊपर कुछ चर्बी

– ग़स्सान ज़क़तान

♦♦♦

सियासी न हो, ऐसी कविता लिख सकूं
उसके लिए मुझे पंछियों को सुनना चाहिए
और पंछियों को सुन सकूं
इसके लिए जंगी जहाज़ों को ख़ामोश होना ही चाहिए.

– मरवान मखूल

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और उन्होंने उससे पूछा:
तुम गाते क्यों हो?
और उन्होंने कहा
मैं गाता हूं क्योंकि मैं गाता हूं

और उन्होंने उसके सीने में तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ उसका हृदय मिल पाया
और उन्होंने उसके हृदय की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ उसके लोग मिल पाए

और उन्होंने उसकी आवाज़ की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ दर्द मिल पाया
और उन्होंने उसके दर्द की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ क़ैदखाना मिल पाया

और उन्होंने उसके कै़दखाने की तलाशी ली
लेकिन उन्हें सिर्फ़ वे खुद जंज़ीरों में बंधे दिखायी दिए

– महमूद दरवेश

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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