अयोध्या: राम, तुम्हारे नाम पर..!

तुलसीदास रामचरितमानस में कहते हैं कि राम के बारे में अब तक जो कुछ भी लिखा-पढ़ा या सुनाया गया है, वह लिखने-पढ़ने-सुनाने वालों की ‘स्वमति अनुसार’ ही है- आधिकारिक या प्रामाणिक नहीं. ऐसी कोई ‘स्वमति’ कुमति में बदल जाए तो उससे किसी भी सभ्य तर्क की कसौटी पर खरी उतरने की अपेक्षा नहीं की जा सकती. 

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अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर. (फोटो साभार: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र)

तुलसीदास रामचरितमानस में कहते हैं कि राम के बारे में अब तक जो कुछ भी लिखा-पढ़ा या सुनाया गया है, वह लिखने-पढ़ने-सुनाने वालों की ‘स्वमति अनुसार’ ही है- आधिकारिक या प्रामाणिक नहीं. ऐसी कोई ‘स्वमति’ कुमति में बदल जाए तो उससे किसी भी सभ्य तर्क की कसौटी पर खरी उतरने की अपेक्षा नहीं की जा सकती.

अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर. (फोटो साभार: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र)

अवध में एक पुरानी लोककथा है. राम का राज खत्म होने के बाद लोगों को नाना प्रकार के दैहिक-दैविक-भौतिक ताप सताने लगे तो एक संत अपनी सिद्धियों के सहारे उनके तारणहार बनकर सामने आए. जिस किसी को भी कोई ताप या संताप सताता, निजात का कोई और उपाय काम न आने पर वह त्राहिमाम करता हुआ उन संत के पास जाता और संत जहां तक संभव होता, उसकी पीड़ा हरते.

देखते ही देखते, उनकी ख्याति ऐसी फैली कि जहां भी दो-चार दुखियारे जुटते, उनकी बतकही घूम-फिरकर उन्हीं पर आ जाती. एक दिन ऐसी ही किसी बतकही में किसी ने उस किसान को भी उनके बारे में बताया, जिसके बैलों के पक आए खुरों में कीड़े पड़ गए थे और किसी भी तरह के इलाज से जाने का नाम नहीं ले रहे थे. इससे बैल अपाहिज होकर रह गए थे और खेतों की जुताई नहीं हो पा रही थी, जबकि फसलों की बुआई का मौसम बीत चला था.

जिसने उसे संत की बाबत बताया, यह भी सुझाया कि वह देर किए बिना उनके दरबार में जाकर उनसे अरदास करे. वे उसे ऐसी कोई जुगत जरूर बता देंगे, जिससे उसके बैल जल्दी ही चंगे हो जाएंगे. लेकिन उसका दुर्भाग्य कि वह संत के दरबार में पहुंचा तो पाया कि वे तीर्थाटन पर गए हुए हैं और महीनों बाद लौटेंगे. फिर भी आखिरी पल तक हिम्मत न हारने और हर उम्मीद का पीछा करने की अपनी किसानसुलभ आदत के वशीभूत होकर उसने एकदम से खाली हाथ लौटने के बजाय संत के शिष्य को जोहारने का फैसला किया.

उसके पास जाकर प्रणाम निवेदित कर प्रार्थना की कि संत के लौटने की प्रतीक्षा उस पर बहुत भारी पड़ जाएगी, इसलिए उसके बैलों के खुरों में पड़े कीड़ों से निजात का वही कोई उपाय बता दे.

शिष्य ने पहले तो उसे टालने की कोशिश की, लेकिन उसने रोते हुए कसकर उसके पांव पकड़ लिए और किसी भी तरह छोड़ने को तैयार नहीं हुआ तो दो भोजपत्रों पर पांच-पांच बार राम का नाम लिखा और उसे थमाते हुए कहा, ‘ये लो, जाओ, दोनों भोजपत्रों को अलग-अलग साफ कपड़े में गठियाकर दोनों बैलों के गले में बांध दो. भगवान राम ने चाहा तो जल्दी ही खुर के कीड़े तुम्हारे बैलों का पीछा छोड़ देंगे.’

कथा के अनुसार, घर लौटकर किसान ने वैसा कर मनोवांछित फल पाया तो जुताई-बुआई खत्म करने के बाद कृतज्ञता ज्ञापित करने दोबारा संत के पास गया. वे तीर्थाटन से लौट आए थे और उससे यह जानकर बहुत प्रसन्न हुए कि अब उनका शिष्य भी लोगों के ताप-संताप हरने लगा है.

उन्होंने उसके सामने ही शिष्य को बुलाया और पूछा, ‘तुमने इस किसान का संताप कैसे हरा?’ शिष्य ने खुशी-खुशी बताया, ‘दो भोजपत्रों पर पांच-पांच बार राम का नाम लिखकर दे दिया था. यह कहकर कि अलग-अलग साफ कपड़ों में लपेटकर बैलों के गले में बांध दे.’

बात बताकर वह इस उम्मीद में वहीं खड़ा रहा कि संत उसे भरपूर शाबाशी देंगे. लेकिन यह क्या, संत ने मुखमुद्रा ही बदल ली. कठोर होकर पहले तो यह कहा कि ऐसा करके उसने शिष्यत्व की पात्रता खो दी है, फिर कड़ा प्रायश्चित करने की आज्ञा दे डाली. इससे विचलित होने के बावजूद शिष्य ने उनकी आज्ञा सहर्ष शिरोधार्य कर ली. लेकिन यह निवेदन किए बिना नहीं रह सका कि वे कम से कम उसे उसका अपराध बता दें.

संत ने कहा, ‘तुमने राम के नाम का घोर दुरुपयोग किया है. सोचो जरा, जिस राम नाम की ऐसी महिमा है कि कहते हैं, तुलसी रा के कहत ही निकसत पाप पहाड़, फिरि आवन पावत नहीं, देत मकार किवाड़, इस किसान को एक साधारण-सी समस्या से निजात दिलाने में उसका उपयोग करने चले तो तुम्हें उसकी महिमा में ऐसा संदेह हुआ कि भोजपत्र पर उसे एक बार लिखना पर्याप्त नहीं लगा! फिर तुमने उसे पांच-पांच बार लिखा- इस कदर विवेक खो दिया कि उसका ऐसा दुरुपयोग तुम्हें तनिक भी अनुचित नहीं लगा!’

अयोध्या में आगामी 22 जनवरी को अधबने ‘भव्य’ मंदिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर जो कुछ चल रहा है, न सिर्फ उसे बल्कि राजनीतिक दुर्दिन झेल रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार ने 1984 में अचानक ‘तालों में बंद भगवान राम की मुक्ति’ की जरूरत याद आने के बाद से अब तक राम के नाम का दुरुपयोग कर जो कुछ भी किया है, इस लोककथा के आईने में देखें, तो उस सबका सिर्फ एक तर्क से बचाव मुमकिन है.

यह कि गोस्वामी तुलसीदास अपने रामचरितमानस में राम को बुद्धि, मन और वाणी से ‘अतर्क्य’ करार दे गए हैं. साथ ही उन्होंने लिखा है कि अब तक उनके बारे में जो कुछ भी लिखा-पढ़ा या सुनाया गया है, वह लिखने-पढ़ने व सुनाने वालों की ‘स्वमति अनुसार’ ही है- आधिकारिक या प्रामाणिक नहीं.

यहां जो बात बिना कहे समझने की है, वह यह कि ऐसी कोई ‘स्वमति’ कुमति में बदल जाए तो उससे किसी भी सहृदय, सदय व सभ्य तर्क की कसौटी पर खरी उतरने की अपेक्षा नहीं की जा सकती. क्योंकि उसकी अतार्किकताओं, झूठों, अर्धसत्यों व अनुकूलित तथ्यों के निकट कोई भी बुद्धिमत्ता ऐसी चालाकी का पर्याय होती है, जो हर पल दिन को रात, रात को दिन, शेर को बिल्ली या बिल्ली को शेर सिद्ध करने में लगी रहती हैं.

जानें क्यों, इसके बावजूद कई भाइयों का यह विश्वास अभी भी अटूट है कि वे किसी के ताप या संताप हरने के लिए नहीं, बल्कि हमारे देश, लोकतंत्र व संविधान और उसके साझा मूल्यों व संस्कृति को नए-नए संताप देने के लिए भगवान राम के नाम के हर संभव दुरुपयोग पर आमादा संघ परिवार को सदय व सभ्य तर्कों से अपनी राह बदलने को राजी कर सकते हैं.

निस्संदेह, वे ऐसा कर सकते थे- बशर्ते इस परिवार ने देश के लोकतंत्र की सवाल व संवाद की परंपरा को पुष्ट करने वाली गुंजाइशों में अपना विश्वास तनिक भी बचने दिया होता, क्योंकि तब वह अपने हजार-हजार मुंहों से एक साथ हजार-हजार बातें कहकर ‘अपना माहौल’ नहीं बना पाता. इस ‘सुविधा’ का लाभ भी नहीं ही उठा पाता कि सच जरा-सा भी घट या बढ़ जाए तो सच नहीं रह जाता और झूठ की कोई इंतिहा नहीं होती? खुद को ‘स्वतः धर्मनिरपेक्ष’, उसके ही अनुसार जिसे किसी से भी धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ने की जरूरत नहीं है, घोषित करते रहकर धर्मनिरपेक्षता का मजाक भी तब वह नहीं उड़ा पाता- न ही धर्म को नागरिकता का आधार बनाने वाला कानून बनाता.

तब वह राम मंदिर को लेकर कभी इस तो कभी उस करवट वाली ‘सुविधा की राजनीति’ करते ज्यादा नहीं तो थोड़ा-बहुत जरूर लजाता. खासकर जब उसे ठंडे बस्ते में डालता, ‘स्टेट अफेयर’ बनाने पर आमादा होता या उसके बहाने नरेंद्र मोदी को विष्णु का अवतार बताता, पोस्टरों में राम को उनसे छोटा कर देता, अदालती आदेश पर बन रहे मंदिर के निर्माण का श्रेय उन्हें देता और जताता कि उन्होंने जैसे चार करोड़ गरीबों के वैसे ही रामलला का घर बनाकर उन पर ‘अनुकंपा’ की है. तब भी, जब एक मुंह से ‘सबके राम, सबमें राम’ का जाप करता और दूसरे से राम की ‘सर्वव्यापकता’ से खेलता हुआ किसी को भीे ‘रामविरोधी’ ठहराकर उसके हृदय में उनके वास पर संदेह करता.

ऐसा नहीं है, इसलिए वह कभी यह कहता है कि ‘वे राम को लाए हैं’ और कभी यह कि ‘उनके द्वारा रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का दिन 15 अगस्त, 1947 जितना महत्वपूर्ण है.’ इसके चलते शंकराचार्य तक अपनी मर्यादा को लेकर चिंतित हो जाते हैं तो उसकी बला से.

उसका एक मुंह कहता है कि प्राण-प्रतिष्ठा में कोई राजनीति नहीं की जा रही और दूसरा दावा करता है कि उससे ऐसी आंधी चलेगी कि उसके सारे राजनीतिक विरोधी उड़ जाएंगे! उसका एक मुंह सीता द्वारा शापित और राम द्वारा स्वर्ग व ‘स्वर्णमयी लंका’ से बढ़कर बताई गई अयोध्या को सरकारी संसाधनों के बूते अयोध्या को ‘नई’ कर देने का दावा करता है तो दूसरा ‘त्रेता की वापसी’ कराने का! एक मुंह सीता को राम से अलगकर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाता है और दूसरा इस सवाल का सामना तक नहीं कर पाता कि अयोध्या महज राम की होकर क्यों रह गई है, सीता की क्यों नहीं हो पाई है?

एक कहावत के शब्दों में कहें, तो उसके मुंहों ने कुपदी के सौ पद कर डाले हैं और पदी का एक भी पद नहीं रहने दिया है. इसके चलते यह पूछना भी अपराध हो चला है कि धर्मों व धर्मराज्यों के पास हमारे सारे सवालों के जवाब या सारी समस्याओं के समाधान होते तो हमें लोकतंत्र की जरूरत ही क्योंकर होती?

इतना ही नहीं, भक्ति और लोकतंत्र के बैरकों पहचानकर ‘ननु-नच किए बिना राजाज्ञाओं का पालन करने वाली प्रजा’ बने रहने से इनकार करके ‘राज्य का एजेंडा तय करने वाले नागरिक बनने’ की सारी कोशिशें असहनीय करार दी गई हैं?

अंत में एक और लोककथा. एक बार इतनी भीषण बाढ़ आई कि नदी-नाले सब एक हो गए तो मछलियों का एक जोड़ा प्रसन्नमन सैर करने निकला. गंगा से गोमती, गोमती से सरयू, फिर कई छोटी बरसाती नदियों से होते हुए उसे कुछ पता ही नहीं चला कि कब एक गांव के तालाब में जा पहुंचा. फिर तो वहां के दिलफरेब आकर्षण में ऐसा खोया कि लौटने की सुधि ही नहीं रही. वर्षा ऋतु जाने को हुई तो नर मछली ने मादा से कहा- इससे पहले कि जिस जलमार्ग से हम आए थे, वह सूखकर अवरुद्ध हो जाए और हम यहीं बंदी होकर रह जाएं, हमें अपनी नदी में लौट चलना चाहिए.

लेकिन मादा अभी भी खुमारी में खोई हुई थी. उसने कहा, ‘तुमको बहुत उतावली है तो लौट जाओ. मैं तो यहां की रमणीकता का भरपूर लुत्फ लेकर ही लौटूंगी.’ शरद और हेमंत ऋतुएं बीत जाने पर भी उसकी खुमारी नहीं टूटी. अलबत्ता, ग्रीष्म का ताप तालाब को इतना सुखा दिया कि उसके उथले पानी में पीठ छिपाना मुश्किल हो चला, चील-कौए उस पर चोंच मारने लगे, प्राण संकट में आ पड़े और लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा तो उसे नर का आगाह करना याद आया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अंततः मछेरे के जाल में जा फंसने और बोटी-बोटी कट जाने से पहले जब तक चेत रहा, अफसोस करती रही कि काश, वह समय रहते चेत गई होती.

सवाल है कि उसी जैसी मृगमरीचिका में फंसा अपने विवेक पर निरंतर हमले झेल रहा यह देश समय रहते सचेत होकर हमलावरों को कडे़ पश्चाताप के लिए विवशकर अपना बचाव कर पाएगा या नहीं? अगर नहीं, तो उसके दैहिक-दैविक-भौतिक ताप उसे कितना संतापित करेंगे?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)