22 जनवरी, 2024 एक तरह से राजनीति के सत की परीक्षा है

चार शंकराचार्यों ने राम मंदिर के आयोजन में शामिल होने से इनकार कर दिया है. उन्होंने ठीक ही कहा है कि यह धार्मिक आयोजन नहीं है, यह भाजपा का राजनीतिक आयोजन है. फिर यह सीधी-सी बात कांग्रेस या दूसरी पार्टियां क्यों नहीं कह सकतीं?

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दीपावली 2023 पर सजाया गए अयोध्या का निर्माणाधीन राम मंदिर. (फोटो साभार: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र)

चार शंकराचार्यों ने राम मंदिर के आयोजन में शामिल होने से इनकार कर दिया है. उन्होंने ठीक ही कहा है कि यह धार्मिक आयोजन नहीं है, यह भाजपा का राजनीतिक आयोजन है. फिर यह सीधी-सी बात कांग्रेस या दूसरी पार्टियां क्यों नहीं कह सकतीं?

दीपावली 2023 पर सजाया गए अयोध्या का निर्माणाधीन राम मंदिर. (फोटो साभार: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र)

‘उस मंदिर में कोई देवता नहीं है, साधु ने कहा.

राजा रोष से भर उठा:
‘देवता नहीं! अरे संन्यासी, नास्तिक की तरह बोलता है तू.
रत्नजड़ित सिंहासन पर दीपित है रतनविग्रह!
फिर भी कहता है तू कि ख़ाली है यह?’

राजदर्प से पूर्ण है, ख़ाली नहीं.
तुमने अपने को स्थापित किया है, देवता को नहीं.’

रवींद्रनाथ ठाकुर के द्वारे अगर विश्व हिंदू परिषद के लोग 22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण लेकर पहुंचते, तो वे उन्हें यही जवाब देते जो ‘दीनदान’ कविता में साधु राजा को देता है.

लेकिन कांग्रेस पार्टी दुविधा में है कि वह अयोध्या में उस राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाए या नहीं जो एक आपराधिक कृत्य में बाबरी मस्जिद को तोड़कर न्यायिक छल से उसकी ज़मीन हासिल कर उस पर बनाया जा रहा है. कई लोगों को कांग्रेस के इस असमंजस में मज़ा आ रहा है. कुछ भारतीय जनता पार्टी की चतुराई पर दांतों तले उंगली दबा रहे हैं कि देखो, कांग्रेस को कैसा फंसाया! ‘

लेकिन हम सबको प्रश्न करना चाहिए कि यह दुविधा क्यों होनी चाहिए आख़िर कांग्रेस को? और अगर वह दुविधा है तो बाक़ी लोगों को इसमें आनंद क्यों आ रहा है? और इस दुविधा से इस देश के बारे में क्या मालूम होता है? क्या यह सिर्फ़ कांग्रेस की समस्या है या यह पूरे देश की समस्या है?

जब हम देश कह रहे हैं तो फिर ईमानदारी से कहें कि यह हिंदुओं की समस्या है. अब मुसलमानों को इस मंदिर का बनने, उसकी तारीख़, उसमें कौन शामिल होता है, कौन नहीं, इससे कोई बहुत फ़र्क नहीं पड़ता. उन्होंने इस मंदिर के निर्माण की क़ीमत अदा की है. बिना बाबरी मस्जिद के ध्वंस के यह मंदिर संभव नहीं होता.

इसके अलावा राम मंदिर का अभियान मुसलमानों को अपमानित करने का अभियान था. अगर इस अभियान के नारों को याद करें, तो वे जितना राम के बारे में थे उससे ज़्यादा मुसलमानों के ख़िलाफ़ थे. इस अपमान के अलावा यह मंदिर मुसलमानों को उनके ख़िलाफ़ हिंसा और खूंरेजी की याद दिलाता रहेगा. और अंत में सर्वोच्च न्यायालय के आख़िरी अन्याय को भी मुसलमान नहीं भूल सकते.

यह बात मुसलमानों को मालूम है कि यह मंदिर राम की श्रद्धा से अधिक मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत और उन पर हिंदुओं की काल्पनिक विजय का स्मारक है. वे यह भी जानते हैं कि इस देश की लगभग सारी राजनीतिक पार्टियां एक हिसाब से हिंदू पार्टियां ही हैं. इसलिए वे इस राम मंदिर के उद्घाटन के निमंत्रण को लेकर अरदब में पड़ गई हैं.

अगर निमंत्रण स्वीकार न करें, तो हिंदुओं का वोट जाने का ख़तरा है लेकिन अगर स्वीकार कर लें तो उसका मतलब अपनी नैतिकता से समझौता कर लेना होगा. इसका मतलब यह है कि इस देश में राजनीतिक नैतिकता के मूल्य या मान का एहसास बचा हुआ है. वह नैतिकता सरल अर्थ में धर्मनिरपेक्षता नहीं है, हालांकि वह भी उसमें शामिल है. वह व्यापक अर्थ में न्याय की नैतिकता है.

सभी जानते हैं कि यह मंदिर एक विराट अन्याय का प्रतीक है. इस अन्याय का जश्न नहीं मनाया जा सकता. लेकिन इस सवाल पर विचार करने के पहले कुछ और सवाल हैं. वे सवाल उनके लिए हैं जो इस मंदिर को स्वीकार कर रहे हैं और वहां जाने में कुछ भी बुरा नहीं देखते.

हम जानते हैं कि यह मंदिर अभी अधूरा है, निर्माण कार्य चल रहा है. फिर बिना पूरा मंदिर बने, गर्भगृह के उद्घाटन की जल्दी क्यों?

हम सब जानते हैं कि कई बार अधूरे घर में ही गृह प्रवेश का अनुष्ठान करवा लिया जाता है. कुछ व्यावहारिक मजबूरियों के चलते. घर का कोई ख़ास आदमी विदेश जा रहा होता है, किसी के माता-पिता इतने वृद्ध हो गए होते हैं कि लगता है कि वे अपनी आंख के आगे अपने बच्चों का अपना घर तो देख लें! लेकिन यहां अब तक अधूरे मंदिर में शिशु राम को बिठा देने की व्यग्रता क्यों? हम जानते हैं कि मंदिर क्या इसलिए कि वे खुले में भीग रहे हैं? या उन्हें ठंड से बचाना है?

लेकिन हमें पता है कि मामला कुछ और है. जो निर्दोष भाव से रामभक्त हैं, यानी राजनीतिक रामभक्त नहीं, वे कहीं नहीं जा रहे. राम मंदिर पूरा बन जाने के बाद ही उसके उद्घाटन का कोई अर्थ है. फिर यह जल्दबाज़ी क्यों?

भारतीय जनता पार्टी को हड़बड़ी है कि वह अपूर्ण मंदिर में ही नाबालिग शिशु राम को बिठा दे. क्या यह इसलिए कि अगले 1 या 5 वर्ष तक फिर इसका शुभ मुहूर्त नहीं निकलेगा? हम सब, वे भी जो ख़ुद को सच्चे रामभक्त, धार्मिक हिंदू कहते हैं, जानते हैं कि इसकी वजह सिर्फ़ एक है: 3 महीने बाद होने वाला लोकसभा का चुनाव. इस चुनाव प्रचार में भाजपा ‘शिशु राम’ को उनका घर दिला देने की अपनी उपलब्धि का ढिंढोरा पीट सके, इसके लिए अभी ही यह उद्घाटन कर लिया जाना चाहिए.

यह इसलिए भी कि बाबरी मस्जिद की ज़मीन हड़पने के बाद उसका राम मंदिर की भूमि के रूप में पूजन करने की नरेंद्र मोदी की तस्वीरें पुरानी पड़ चुकी हैं, हालांकि उनका अभी भी इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन और तस्वीरें चाहिए. नरेंद्र मोदी को भारत के प्रथम हिंदू की पदवी पर स्थापित करने के लिए, जिसमें वही पुरोहित हों और वही यजमान, ऐसी तस्वीरों की रोज़ाना ज़रूरत है.

अयोध्या में ‘रामलला’ की प्राण-प्रतिष्ठा करते हुए प्रधानमंत्री की तस्वीर मोदी को ‘सभ्यता पुरुष’ के रूप में प्रचारित करेगी, वह ‘राजा’ जिसने राम को को वापस घर दिलवाया. इस तस्वीर का चुनावी महत्त्व है.

हिंदू मन में मोदी को चुने हुए सम्राट के तौर पर स्थापित करने के अभियान में ‘रामलला’ की ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ करते हुए मोदी की तस्वीर आवश्यक है. आपने राम मंदिर न्यास के कर्ता-धर्ता चंपत राय का बयान सुना ही होगा. उन्होंने कहा कि राजा विष्णु का अवतार होता है और मोदी राजा हैं. इसलिए वे विष्णु के अवतार हैं.

भाजपा को उम्मीद है कि किसी भी दूसरे नारे या वादे के मुक़ाबले अयोध्या के इस नए राम मंदिर में ‘रामलला’ की प्राण-प्रतिष्ठा की तस्वीरें हिंदू मनोविज्ञान को अधिक प्रभावित करेंगी. यह कहने के लिए आपको विश्लेषक होने की आवश्यकता नहीं कि इससे भाजपा सरकार की दूसरी नाकामियों को छिपाने में काफ़ी मदद मिलेगी. यह तस्वीर एक ‘हिंदू राष्ट्र’ के उदय का प्रमाण भी होगी.

यह सब हम जानते हैं और कांग्रेस या दूसरी पार्टियां भी. फिर भी वे भयभीत हैं कि अगर वे इस राम मंदिर के उत्सव में शामिल नहीं हुईं तो उन्हें हिंदू विरोधी घोषित कर दिया जाएगा.

इस देश में इस प्रकार के नैतिक संशय में पड़ने पर अभी भी गांधी के पास जाने का रिवाज बचा हुआ है. अपने ग़लत कृत्य को भी सही साबित करने के लिए बड़े लोग गांधी का नाम ले लेते हैं. जैसे अभी हाल में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने गुजरात में मंदिर भ्रमण के अपने सार्वजनिक प्रदर्शन को जायज़ ठहराने के लिए किया.

क्या गांधी अभी भी कांग्रेस के नैतिक पैमाना हैं? अगर हैं तो कांग्रेस को यह सवाल करना चाहिए कि ऐसी स्थिति में वे क्या करते. क्या जवाब देते विश्व हिंदू परिषद या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को?

अगर वे जीवित होते तो आप मान सकते हैं कि मंदिर न्यास गांधी को अवश्य निमंत्रित करता. यह उसके लिए विडंबनापूर्ण है क्योंकि इस न्यास से जुड़े लोगों के बड़े संगठन के एक सदस्य ने ही गांधी की हत्या की थी. उसे जाने दें. कुछ लोग कह सकते हैं कि इस शुभ अवसर पर हत्या का ज़िक्र क्यों करना? बहरहाल! अगर गांधी को यह न्योता मिलता तो उन्हें इसे अस्वीकार करने में क्षणभर भी विलंब न होता.

इसका कारण सिर्फ़ यह नहीं कि गांधी मंदिर शायद ही जाते थे. अपना हिंदूपन साबित करने की उन्हें ज़रूरत न थी.बल्कि वे अपने हिंदूपन का अतिक्रमण करने और उसे नए अनुभवों से समृद्ध करने का ही प्रयत्न उन्होंने जीवन भर किया. उन्हें किसी शंकराचार्य या किसी धार्मिक गुरु से भी कभी स्वीकृति की आवश्यकता नहीं पड़ी.

लेकिन इस निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए आम तौर पर अपने मंदिर न जाने को गांधी कारण नहीं बनाते. अव्वल तो वे उसके पहले शायद यह आंदोलन करते कि ध्वस्त की गई बाबरी मस्जिद को दोबारा बनाकर मुसलमानों को वापस किया जाए.

1947-48 में दिल्ली में कई मस्जिदों, मज़ारों और दरगाहों को नुक़सान पहुंचाया गया और उन पर हिंदुओं ने क़ब्ज़ा भी किया. कनॉट प्लेस की मस्जिद पर कब्जा करके उसमें मूर्तियां रख दी गईं. गांधी ने बार-बार कहा कि जिन मस्जिदों पर क़ब्ज़ा किया गया था, उन्हें ख़ाली किया जाए. इससे आगे जाकर उन्होंने कहा कि जिन इस्लामी इमारतों को शरणार्थियों ने दख़ल कर लिया था, वे भी ख़ाली की जाएं.

ज़ाहिर है, गांधी अपने इस स्टैंड के कारण हिंदुओं में अलोकप्रिय हुए. लेकिन इसके कारण उन्होंने न तो अपना स्टैंड बदला, न ही चुप रहना तय किया.

बाबरी मस्जिद को मंदिर बनाने के लिए दो अपराध किए गए, यह सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है. क्या उस अपराध में संलिप्त लोगों को सजा हुई? सजा तो दूर, जिन्होंने उस अपराध की योजना बनाई, उन्हें ही मंदिर बनाने के लिए ज़मीन दे दी गई.

इसे कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति कैसे स्वीकार कर सकता है?

अलावा इसके हर कोई जानता है कि यह पूरा आयोजन भारतीय जनता पार्टी का आयोजन है. पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता घर-घर राम अक्षत, या पीले चावल की पुड़िया के साथ मंदिर के उद्घाटन का निमंत्रण लेकर घूम रहे हैं. क्यों कहा जा रहा है कि 22 जनवरी को हर मोहल्ले, गली में मंदिरों में इसे लेकर आयोजन किया जाए? क्यों नरेंद्र मोदी हिंदुओं को कह रहे हैं कि हर घर में दीवाली मनाई जानी चाहिए? क्यों विश्व हिंदू परिषद दुनिया के 55 देशों में 22 जनवरी को इस मंदिर के उद्घाटन का उत्सव मना रही है? क्यों राजकीय ख़र्चे से इस आयोजन का प्रचार किया जा रहा है?

क्या यह सच नहीं है कि अभी संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के कार्यकर्ता राम मंदिर का निमंत्रण लेकर घर-घर गए और उनसे भाजपा को वोट करने की शपथ दिलवाई? क्या किसी एक मंदिर के निर्माण के इस आडंबर के पीछे छिपे छल को नहीं पहचान पा रहे हैं?

चार शंकराचार्यों ने इस आयोजन में शामिल होने से इनकार कर दिया है. उन्होंने ठीक ही कहा है कि यह धार्मिक आयोजन नहीं है, यह भाजपा का राजनीतिक आयोजन है. फिर यह सीधी-सी बात कांग्रेस या दूसरी पार्टियां क्यों नहीं कह सकतीं? इसके बदले वे ख़ुद भाजपा के इस प्रचार अभियान में शामिल होंगी? सुना कि कर्नाटक में सरकार राज्यभर में इसका उत्सव करने जा रही है? क्या यह राजनीतिक मूर्खता नहीं है?

जनता इसे देख रही है लेकिन इसे बतलाने की भी ज़रूरत है कि इस राम मंदिर के निर्माण का हर कदम प्रदूषित है और इसलिए इसमें शामिल होना भी दूषण है.

कांग्रेस पार्टी को गांधी का नैतिक साहस वापस हासिल करना होगा अगर उसे भाजपा के घृणापूर्ण अभियान का सामना करना है. भाजपा हिंदुओं को मानसिक और नैतिक रूप से पतित बना रही है. कांग्रेस को इससे लड़ना है. उसे वापस मतदाता को इंसान भी बनाना है. यह काम वह डरते हुए नहीं कर सकती.

हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि आज टैगोर होते तो अयोध्या के इस भाजपावाले राम मंदिर पर और सख़्त कविता लिखते. कांग्रेस पार्टी न तो महात्मा है, न ही कवि है, लेकिन क्या नैतिक साहस सिर्फ़ इन दो के पास होता है और क्या राजनीति आख़िरकार धोखे और कायरता से ही बनती है?

यह कहा जा सकता है कि 22 जनवरी, 2024 एक तरह से राजनीति के सत की परीक्षा है. देखना है, इसमें कौन पास होता है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)