जम्मू कश्मीर: अदालत के निर्देश के एक साल बाद एनएचआरसी मानवाधिकार उल्लंघन पर सुनवाई करेगा

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह पहली बार है कि मानवाधिकार का मुद्दा आधिकारिक स्तर पर उठाया जाएगा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक नोटिस में कहा गया है कि इसकी एक समिति 7 फरवरी से 9 फरवरी तक श्रीनगर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के संबंध में आम जनता की शिकायतों पर सुनवाई करेगी.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Flickr/Alisdare Hickson (CC BY-SA 2.0 DEED)

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह पहली बार है कि मानवाधिकार का मुद्दा आधिकारिक स्तर पर उठाया जाएगा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक नोटिस में कहा गया है कि इसकी एक समिति 7 फरवरी से 9 फरवरी तक श्रीनगर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के संबंध में आम जनता की शिकायतों पर सुनवाई करेगी.

कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के ख़िलाफ़ ब्रिटेन में प्रदर्शन की एक तस्वीर. (फोटो साभार: फ्लिकर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के लगभग एक साल बाद केंद्र सरकार अगले सप्ताह जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों पर अपनी तरह की पहली सार्वजनिक सुनवाई करने के लिए तैयार है.

एनएचआरसी के एक नोटिस में कहा गया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की एक समिति 7 फरवरी से 9 फरवरी तक श्रीनगर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन के संबंध में आम जनता की शिकायतों पर एक शिविर बैठक और खुली सार्वजनिक सुनवाई करेगी.

नोटिस में लोगों से जम्मू कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही या ऐसी किसी घटना में शामिल होने के लिए किसी भी लोक सेवक के खिलाफ 29 जनवरी तक अपनी शिकायत दर्ज कराने को कहा गया है.

अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह पहली बार है कि मानवाधिकार का मुद्दा आधिकारिक स्तर पर उठाया जाएगा.

हिरासत में नागरिकों की हत्या के बाद सुनवाई

एनएचआरसी की सुनवाई पुंछ जिले में हुई चौंकाने वाली घटना की पृष्ठभूमि में होगी, जिसमें पिछले साल दिसंबर में सेना की हिरासत में तीन नागरिकों को कथित तौर पर यातना देकर मार डाला गया था, जबकि कम से कम चार अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

मार्च 2020 में केंद्र ने जम्मू कश्मीर में मानवाधिकार संबंधी चिंताओं से निपटने के लिए एनएचआरसी को अधिकृत किया था. लेकिन अपने स्थानीय कार्यालयों की अनुपस्थिति में, इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि आयोग ने पिछले तीन वर्षों से अधिक समय में किसी मामले का संज्ञान लिया या नहीं.

राज्य मानवाधिकार आयोग (एसएचआरसी), एक अर्ध-न्यायिक निकाय, जो जम्मू कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन की जांच करता था, का अस्तित्व  31 अक्टूबर 2019 को समाप्त हो गया था, जब जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ और तत्कालीन राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया.

जम्मू कश्मीर मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम-1997, जो एसएचआरसी की स्थापना का आधार बना, समेत दर्जनों कानून 2019 में जम्मू कश्मीर में पुनर्गठन अधिनियम लागू होने के बाद निरस्त कर दिए गए थे.

2022 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर को राज्य से केंद्र शासित प्रदेश में बदले जाने के बाद यहां मानवाधिकार आयोग समेत वैधानिक निकायों की अनुपस्थिति को लेकर पुणे के वकील असीम सुहास सरोदे द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी.

पिछले साल फरवरी में केंद्र ने अदालत को बताया था कि जम्मू कश्मीर में निष्क्रिय मानवाधिकार आयोग का मुद्दा उसके विचाराधीन है. बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने सरकार को एक ऐसा तंत्र लाने का निर्देश दिया, जो जम्मू-कश्मीर के लोगों को जम्मू कश्मीर से ही एनएचआरसी में अपनी शिकायतें दर्ज कराने की अनुमति देगा.

उच्च आधिकारिक आंकड़े, उससे भी अधिक अनौपचारिक संख्या

एक आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जब एसएचआरसी को 2019 में बंद किया गया था, तब वह हत्या, जबरन गायब होने, बलात्कार और स्थानीय निवासियों पर सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर किए गए अन्य प्रकार के दुर्व्यवहार की कम से कम 630 शिकायतों की जांच कर रहा था.

प्रशासन ने कार्यकर्ता वेंकटेश नायक की आरटीआई के जवाब में कहा था, ‘आयोग के सभी रिकॉर्ड तत्कालीन मानवाधिकार आयोग (ओल्ड असेंबली कॉम्प्लेक्स, श्रीनगर) के कार्यालय परिसर में एक निर्दिष्ट कमरे में बंद कर दिए गए थे.’

हालांकि, अनौपचारिक आंकड़े बहुत अधिक हैं. वर्ष 2017-18 की एसएचआरसी की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए हफपोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के पास यातना, गायब होने, न्यायेतर हत्याओं, उत्पीड़न और अन्य समेत दुर्व्यवहार के 8,000 से अधिक मामले लंबित थे.

संयुक्त राष्ट्र की एक समिति ने सितंबर 2020 में एसएचआरसी को बंद करने पर केंद्र सरकार को फटकार भी लगाई थी. स्वतंत्र आकलनों के अनुसार, 1990 के दशक की शुरुआत में आतंकवाद भड़कने के बाद से जम्मू-कश्मीर में 8,000 से अधिक लोग जबरन गायब होने का शिकार बन चुके हैं.

जांच करने वालों को सज़ा

2021 में जम्मू कश्मीर में अधिकारों के हनन का दस्तावेजीकरण करने में शामिल माननाधिकार समूहों और व्यक्तियों के एक संगठन कोअलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी (सीसीएस) के संयोजक खुर्रम परवेज़ को ‘आतंकवाद की फंडिंग’ में संलिप्तता का आरोपी बनाया गया था और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था.

2000 में अपनी स्थापना के बाद से सीसीएस ने जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों और आतंकवादियों द्वारा मानवाधिकारों के हनन पर दर्जनों वार्षिक, द्विवार्षिक और विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की हैं. हालांकि, इसके संयोजक की गिरफ्तारी के बाद समूह निष्क्रिय हो गया है.

सीसीएस की आखिरी रिपोर्ट राजौरी के उन तीन युवाओं के बारे में थी, जो जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने के एक साल बाद 2020 में सेना द्वारा एक फर्जी मुठभेड़ में मारे गए थे.

पिछले साल अनुच्छेद 370 को हटाए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर में अधिकारों के हनन की जांच के लिए ‘सच और सुलह समिति’ (Truth and Reconciliation Committee) गठित की थी.

मामले की सुनवाई करने वाली संवैधानिक पीठ का हिस्सा जस्टिस एसके कौल ने कहा था, ‘समिति कम से कम 1980 के दशक से जम्मू कश्मीर में राज्य और गैर-राज्य कर्ताओं द्वारा किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच करेगी और रिपोर्ट करेगी और सुलह के उपायों की सिफारिश करेगी.’

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.