फ़ैज़ाबाद: अयोध्या नगर निगम का एक अनाम-सा हिस्सा

नवाबों का शहर फ़ैज़ाबाद, अब उस अयोध्या नगर निगम का अनाम-सा हिस्सा है, जिसके ज़्यादातर वॉर्डों के पुराने नाम भी नहीं रहने दिए गए हैं. नवाबों के काल की उसकी दूसरी कई निशानियां भी सरकारी नामबदल अभियान की शिकार हो गई हैं. हालांकि अब भी ग़ुलामी के वक़्त के तमाम नाम नज़र आते हैं, जो सरकार को नज़र नहीं आते.

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अयोध्या के ग़ुलाबबाड़ी स्थित नवाब शुजा उद दौला का मक़बरा. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: विकिपीडिया/Mukulfaiz/CC BY-SA 3.0)

नवाबों का शहर फ़ैज़ाबाद, अब उस अयोध्या नगर निगम का अनाम-सा हिस्सा है, जिसके ज़्यादातर वॉर्डों के पुराने नाम भी नहीं रहने दिए गए हैं. नवाबों के काल की उसकी दूसरी कई निशानियां भी सरकारी नामबदल अभियान की शिकार हो गई हैं. हालांकि अब भी ग़ुलामी के वक़्त के तमाम नाम नज़र आते हैं, जो सरकार को नज़र नहीं आते.

अयोध्या के ग़ुलाबबाड़ी स्थित नवाब शुजा उद दौला का मक़बरा. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: विकिपीडिया/Mukulfaiz/CC BY-SA 3.0)

समाचार और प्रचार माध्यमों का एक बड़ा हिस्सा इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी ‘डबल इंजन’ सरकारों को अयोध्या का चतुर्दिक विकास कर उसे ‘भव्य’ व ‘दिव्य’ बनाने का ही नहीं, दुनिया भर में उसके नाम का डंका बजवाने का श्रेय भी दे रहा है.

कोई पूछे कि क्या इससे पहले दुनिया अयोध्या को नहीं जानती थी, तो इन माध्यमों का यह हिस्सा बताने लगता है कि इस रूप में तो नहीं ही जानी जाती थी: फैजाबाद मंडल के फैजाबाद जिले में फैजाबाद शहर की छोटी-सी पड़ोसन थी वह और दोनों के जन्मकाल में काफी दूरी के बावजूद कई लोग अयोध्या और फैजाबाद को ‘जुड़वां शहर’ कहते थे.

लेकिन अब वह खुद अपना मंडल व जिला तो है ही, नगर भी है. साथ ही यह बताना भी नहीं भूलता कि यह सब फैजाबाद के अस्तित्व की कीमत पर संभव हुआ है. जैसे कि अयोध्या और फैजाबाद की सचमुच कोई पुरानी लाग-डांट रही हो!

प्रसंगवश, नवाबों का शहर फैजाबाद, जिसके बारे कहा जाता है कि बाप (नवाब शुजाउद्दौला) के उसे बसाने और अवध की राजधानी बनाने के कुछ ही वर्षों बाद बेटे (नवाब आसफउद्दौला) ने राजधानी लखनऊ स्थानांतरित करके उसे उजाड़ दिया था, अब उस अयोध्या नगर निगम का अनाम-सा हिस्सा है, जिसके ज्यादातर वॉर्डों के पुराने नाम भी नहीं रहने दिए गए हैं.

नवाबों के काल की उसकी दूसरी कई निशानियां भी सरकारी नामबदल अभियान की शिकार हो गई हैं. शुजा के सपनों के महल दिलकुशा तक को जीर्णोद्धार के बाद दिलकुशा नहीं रहने दिया गया है- साकेत सदन कर दिया गया है.

कई लोग कहते हैं कि अब शुजा व बहू-बेगम के मकबरे ही शहर में उनकी उल्लेखनीय ‘अमानत’ रह गए हैं, यकीनन इस मजबूरी के कारण कि मकबरों को उन्हीं का नाम दिया जा सकता है, जो उनमें दफन हों. वैसे, शुजा के मकबरे का एक नाम ‘गुलाबबाड़ी’ भी है.

पिछले दिनों अधबने राम मंदिर के दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं व पर्यटकों के हुजूम की सुविधाओं के नाम पर अयोध्या की सड़कें चौड़ी करने के लिए जो व्यापक तोड़फोड़ हुई और जिससे जुड़ीं दुर्घटनाओं में कई निर्दोषों की जानें भी गईं, कहा जाता है कि उसका एक प्रच्छन्न प्रयोजन उसको नवाबकालीन पहचान से, जो हिंदुत्ववादियों व उनकी सरकारों की निगाह में ‘गुलामी की निशानियां’ थीं, परे करना ही था.

लेकिन इस स्थिति का एक और पहलू है: हिंदुत्ववादियों और उनकी सरकारों को इस शहर के अंग्रेजों के वक्त के इस तरह के नामों व निशानों में ‘गुलामी की निशानियां’ नजर नहीं आतीं. न ही उनका नाम या रूप बदलने की उन्हें जरूरत महसूस होती है.

इसीलिए उन्होंने विपक्ष में रहते हुए कभी इसके लिए आवाज तो नहीं ही उठाई, सत्ता में हैं तो भी ऐसा करना उनके एजेंडे पर नहीं है. भले ही उनकी ‘भव्य’ व ‘दिव्य’ अयोध्या में अभी भी इमारतों, मुहल्लों/गांवों और ब्लाॅकों आदि के ऐसे अनेक नाम चले आ आ रहे हैं, जो अंग्रेजों के ऐसे सैनिक/असैनिक अधिकारियों के नामों पर रखे गए, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए हुईं लड़ाइयों व संघर्षों के दमन में ‘बड़ी’ भूमिका निभाई और जिसने भी उनके खिलाफ आवाज उठाई, उस पर भरपूर जोर-जुल्म किए.

इसकी एक बड़ी मिसाल फैजाबाद के ऐतिहासिक चौक से सटा रीडगंज मुहल्ला है, जो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के विफल हो जाने के बाद जिले के कलेक्टर रहे ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य अधिकारी चार्ल्स रीड के नाम पर है.

पाठक बीते 5 फरवरी को द वायर पर ‘अयोध्या: अब आचार्य नरेंद्रदेव की स्मृतियों का ध्वंस’ शीर्षक रिपोर्ट में पढ़ चुके हैं कि 1857 में बागी देसी सेनाओं ने तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में अंग्रेजों को खदेड़कर दिल्ली को ईस्ट इंडिया कंपनी से मुक्त करा लिया, तो रीड ने उस पर कंपनी के दोबारा कब्जे के सैन्य अभियान की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

बाद में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने भारत की सत्ता कंपनी से अपने हाथ में ली तो रीड को उसकी सेवाओं का पुरस्कार देने के लिए अवध में नियुक्त कर ‘1857 की अशांति के शमन’ के साथ उन वायदों को निभाने की जिम्मेदारी सौंपी, जो उन्होंने ‘करुणा की देवी’ के रूप में अपने घोषणा-पत्र में अपनी प्यारी ‘भारतीय प्रजा’ से किए थे.

जानकार बताते हैं कि फैजाबाद में कलेक्टरी के दौरान रीड ने महारानी की आंख में चढ़ने के लिए गोरी सत्ता और भारतीय प्रजा-खासकर उसके प्रभुवर्ग-के बीच की तल्खियां खत्म करने के कई कदम उठाए थे.

ज्ञातव्य है 1971 के पहले तक फैजाबाद में एक रीडगंज रेलवे स्टेशन भी था, जिसे कई मांगों व आंदोलनों के बाद आचार्य नरेंद्रदेव का नाम दिया गया था. अब रेलवे बोर्ड ने संभवत: ‘न रहे बांस, न बजे बांसुरी’ के उद्देश्य से इस स्टेशन को ही खत्म कर दिया है, लेकिन रीडगंज मुहल्ले का नाम जस का तस है और कई जगह उसके नए बोर्ड लगाए गए हैं.

यह तब है जब कई लोग दावा करते हैं कि 1971 में स्टेशन के नाम से रीड का नाम हटाया गया तो मुहल्ले के नाम से भी हटाया गया था. बहरहाल, न ही हिंदुत्ववादी सरकारों को रीडगंज लिखे बोर्ड बुरे लगते हैं, न ही उनके अफसरों व समर्थकों को.

शहर के पुराने लोगों की मानें तो इनसे भली तो वे कांग्रेस की सरकारें ही थीं, जिन्होंने अंग्रेज अफसरों के साथ महारानी विक्टोरिया के नाम व प्रतिमाओं को भी आजादी की भावना के खिलाफ माना और हटाया. अलबत्ता, उनकी इस शुरुआत पर भी देरी और धीमी गति के आरोप थे, लेकिन बाद की सरकारों ने तो उसे एकदम से ठप कर दिया.

इसे यों समझ सकते हैं कि 1963 तक अयोध्या में महारानी विक्टोरिया के नाम का एक पार्क था. उसमें उनकी प्रतिमा भी लगी हुई थी. गुलामी के वक्त जो लोग उधर से गुजरते इस प्रतिमा के प्रति सम्मान जताना उनका ‘कर्तव्य’ माना जाता और ऐसा न करना सजा या जुर्माने का कारण हुआ करता था.

फैजाबाद की पुलिस लाइन में भी महारानी की प्रतिमा थी, जबकि चौक स्थित वह घंटाघर भी उनकी याद दिलाता था (अभी भी दिलाता है), जिसे 1857 में बागियों पर अंग्रेजों की विजय की याद में एक अंग्रेज भक्त राजा ने बनवाया था. महारानी ने खुद इस घंटाघर के लिए विशाल घड़ी उपहार में भिजवाई थी.

आजादी के डेढ़ दशक बाद दिसंबर 1963 में एक महिला समाजसेवी की पहल पर विक्टोरिया पार्क का नाम ‘तुलसी उद्यान’ रख दिया गया और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल विश्वनाथ दास ने उसमें तुलसीदास की प्रतिमा का अनावरण करके नए नाम को अतिरिक्त वैधता प्रदान कर दी.

पुलिस लाइन वाली विक्टोरिया की प्रतिमा भी हटा दी गई, लेकिन घंटाघर की घड़ी की सुइयां कब की बंद हो जाने के बावजूद स्थिति ज्यों की त्यों है और बाबरी मस्जिद को गुलामी की निशानी बताकर तोड़ डालने वालों को उसमें गुलामी की कोई निशानी नहीं दिखती.

इसी तरह रीडगंज मुहल्ले में जिले के एक अन्य अंग्रेज कलेक्टर होबर्ट के नाम की लाइब्रेरी भी तब तक होबर्ट लाइब्रेरी ही बनी रही, जब तक उसके जर्जर भवन ने उसका अस्तित्व ही खत्म नहीं करा दिया.

इसी मुहल्ले में फार्ब्स (यह सज्जन भी कलेक्टर ही थे) के नाम पर एक इंटर कॉलेज भी है. एक समय 1857 के नायक मौलवी अहमद उल्ला शाह के नाम पर उसका नाम रखने की बात चली, तो उसे अंजाम तक नहीं पहुंचने दिया गया.

अंग्रेज कलेक्टरों के नामों पर नामकरणों का सिलसिला यहीं नहीं रुकता. डफरिन नामक एक अन्य अंग्रेज कलेक्टर अपने नाम पर अस्पताल का नामकरण करा गए थे, तो हैरिंग्टन नाम के कलेक्टर अपने नाम का ब्लाॅक. एडवर्ड के नाम का तो एक मेडिकल स्टोर भी हुआ करता है.

1902 में अयोध्या के ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए तीर्थ विवेचनी सभा गठित की गई तो उससे भी एडवर्ड का नाम जोड़ा गया था. इनमें डफरिन हास्पिटल बाद में जिला अस्पताल बन गया तो उसका डफरिन से पीछा छूट गया, लेकिन बाकियों का आज तक नहीं छूटा है. छूटे भी कैसे, जब सत्ताधीशों की निगाह में वे गुलामी की निशानियां ही नहीं हैं.

यहां जानना दिलचस्प है कि शेक्सपीयर ने भले ही कह रखा हो कि नाम में क्या रखा है, लेकिन उनके देश के गोरे शासकों ने भारत में रहते हुए अपने नाम अमर करने के लिए विभिन्न संस्थाओं, संस्थानों और मार्गों वगैरह के नामों से जोड़ने में कतई गुरेज नहीं किया. ऐसे में भारतीय शहरों में विक्टोरिया मेमोरियल/पार्क और जार्ज टाउन वगैरह क्यों नहीं होते?

जानकारों के अनुसार उस दौर में अपनी राजभक्ति व स्वामिभक्ति के प्रदर्शन के इच्छुक देसी राजाओं, तालुकदारों, जमीनदारों, राय बहादुरों व कंपनी बहादुरों में अंग्रेज अफसरों को खुश करने वाले नामकरणों के प्रस्ताव लाने की होड़ मची रहती थी.

ऐसी ही एक होड़ के तहत कुछ स्वामिभक्तों ने फैजाबाद में लॉयड की कलेक्टरी के वक्त उसकी चापलूसी में चौक के एक दरे का नाम लॉयड गेट रख दिया. हालांकि यह गेट नवाब शुजाउद्दौला के वक्त बना था. उस गेट का यह नाम भी अभी तक चला आता है और सत्ताधीशों को कतई नहीं अखरता. ऐसे में उनसे पूछा ही जाना चाहिए कि क्या अंग्रेजों की गुलामी, गुलामी नहीं थी?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है.)