धर्मस्थलों को प्रचार के लिए इस्तेमाल न करने की चुनाव आयोग की नसीहत का क्या अर्थ है?

चुनाव आयोग अपनी नई एडवाइज़री को लेकर वास्तव में गंभीर है तो उसका स्वागत किया जा सकता है. इसके बावजूद इस जवाब की दरकार रहेगी कि इस बार इसके अनुपालन के लिए उसने कौन-सी नई व्यवस्था बनाई है जिनसे आश्वस्त हुआ जा सके कि पिछली बार की तरह इस बार कोई पक्षपात नहीं किया जाएगा?

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(फोटो साभार: पीआईबी/ट्विटर)

चुनाव आयोग अपनी नई एडवाइज़री को लेकर वास्तव में गंभीर है तो उसका स्वागत किया जा सकता है. इसके बावजूद इस जवाब की दरकार रहेगी कि इस बार इसके अनुपालन के लिए उसने कौन-सी नई व्यवस्था बनाई है जिनसे आश्वस्त हुआ जा सके कि पिछली बार की तरह इस बार कोई पक्षपात नहीं किया जाएगा?

(फोटो साभार: पीआईबी/ट्विटर)

गत शुक्रवार को चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के लिए जारी अपनी नवीनतम एडवाइजरी में हिदायत दी कि आगामी लोकसभा चुनाव में वे जाति-धर्म व भाषा के आधार पर वोट मांगने और भक्त-भगवान-संबंधों का उपहास करने से परहेज करें, साथ ही पूजास्थलों (मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों व गिरजाघरों) का प्रचार के लिए इस्तेमाल न करें, तो कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. दुर्भाग्य से उनमें खट्टी व कड़वी ज्यादा थीं, मीठी कम. एक मित्र तो यह तक कह गए कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि इसको लेकर हंसें या रोएं-औपचारिक मानें या ‘नवीनतम’, ‘कड़ी’ व ‘अभूतपूर्व’, जैसा कि कई हलकों में दावा किया जा रहा है.

मित्र की ही प्रतिक्रिया को आगे बढ़ाएं तो कहना होगा कि यह एडवाइजरी औपचारिक है और आयोग ने इसे लकीर पीटने की अपनी पुरानी ‘परंपरा’ के तहत ही जारी किया है (इस परंपरा के तहत वह हर चुनाव से पहले दलों व प्रत्याशियों के लिए ऐसी एडवाइजरियां जारी करता, फिर उनका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेता या उसे पक्ष-विशेष, कहना चाहिए महज विपक्ष, पर डाल देता और ज्यादातर उसके नेताओं को ही उनके उल्लंघन वगैरह के नोटिस वगैरह भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है.) तो भी इस पर हंसने या रोने से ज्यादा सिर धुनने व पूछने की जरूरत है कि तब वह इतना स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कैसे सुनिश्चित करेगा, जिसके नतीजों में आम मतदाता का विश्वास कतई संदिग्ध न हो.

बहुत दूर न जाएं, पिछले लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो आयोग ने उसमें ऐसी कई नजीरें बनाई थीं, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सत्तापक्ष के ज्यादातर नेता प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष, दबा-ढका या खुल्लमखुल्ला कैसा भी उल्लंघन करके उसकी नसीहतों व आदर्श आचार संहिता की बंदिशों से ‘आजाद’ नजर आते थे-कहना चाहिए, उनका अंकुश मानते नहीं दिखते थे, जबकि दूसरे पक्ष के नेताओं को पग-पग पर उनके अंकुश झेलने पड़ रहे थे.

वह स्थिति, निस्संदेह, चुनावी मुकाबलों में समानता के उस मूल-भूत सिद्धांत की गंभीर अवज्ञा थी, जिसके तहत सारे प्रत्याशियों के लिए एक जैसी मैदानी स्थितियां उपलब्ध कराई जाती हैं.

इसी के चलते आज आयोग को अपनी एडवाइजरी में भी यह कड़वा सच स्वीकारना पड़ रहा है कि चुनावी अभियानों, विमर्शों व चर्चाओं का स्तर चिंतनीय रूप से गिर गया है. इस गिरावट के लिए और जो भी कारक जिम्मेदार हों, धर्मोें, उनके स्थलों व जातियों आदि का चुनावी दुरुपयोग रोकने में आयोग की नाकामी भी जिम्मेदार है. यह नाकामी जिस भी कारण उसके हिस्से आई हो, आम धारणा है कि वह धर्मों, धर्मस्थलों व जातियों का चुनावी दुरुपयोग रोकने को लेकर पहले से गंभीरता बरतता, तो हालात यों विकट होते ही नहीं. धनबल और बाहुबल के चुनावी दुरुपयोग को लेकर भी यही बात कही जाती है.

कोढ़ में खाज यह कि दस साल पहले देश की लोकतांत्रिक व संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण अचानक बहुत तेज तो गया, तो आयोग भी अपने को उससे नहीं बचा पाया. उसको बहुसदस्यीय बनाया जाना भी उसका क्षरण रोकने के काम नहीं आया. अपने मुख्य चुनाव आयुक्त रहते टीएन शेषन दर्पपूर्वक उसे भारत सरकार का नहीं, भारत का चुनाव आयोग बताया करते थे, लेकिन अब वह भारत सरकार का ही ज्यादा नजर आता है.

यह ‘सरकार’ आदर्श चुनाव आचार संहिता के औपचारिक रूप से लागू होने के पिछले पल तक अपनी शक्ति व सामर्थ्य के अमर्यादित इस्तेमाल से विपक्ष पर बढ़त बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक युद्ध चलाने यानी मुकाबले को असमान बनाने में लगी रहती है, तो आयोग को उसमें कुछ भी गलत नहीं लगता. वह अपनी सीमित शक्तियों (पढ़िए: असहायता) का रोना रोते हुए इस सबकी ओर से आंखें मूंदे रहता और उसे रोकने के उपाय करने में कतई दिलचस्पी नहीं लेता.

इसके उलट उसने इधर एक नई परंपरा डाल दी है कि चुनाव कार्यक्रम घोषित करने में ध्यान रखता है कि सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री सरकारी घोषणाओं की बिना पर अनौपचारिक चुनाव प्रचार का अपना मनोवांछित सिलसिला उससे पहले पूरा कर लें.

हां, नई एडवाइजरी को लेकर वह वास्तव में गंभीर है तो ‘जब से चेते, तभी से सही’ कहकर उसका स्वागत किया जा सकता है. इसके बावजूद इस सवाल को जवाब की दरकार रहेगी कि अपनी नई एडवाइजरी का अनुपालन कराने के लिए उसने कौन-सी नई व्यवस्था बनाई है और ऐसे कौन-से नए इंतजाम किए हैं जिनसे आश्वस्त हुआ जा सके कि इस काम में कोई पक्षपात नहीं किया जाएगा?

फिलहाल, उसने कहा है कि वह इसके प्रत्यक्ष ही नहीं, अप्रत्यक्ष उल्लंघनों पर भी कड़ी नजर रखेगा और कैसा भी उल्लंघन करने वालों पर-वे स्टार प्रचारक ही क्यों न हों-कड़ी कार्रवाई करेगा.

लेकिन इतने भर से उसकी ‘कड़ी कार्रवाई’ में पक्षपात के अंदेशे कम नहीं होंगे. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इस बार ऐसे अंदेशे पहले से कई गुने ज्यादा प्रबल हो गए हैं. इसे यों समझ सकते हैं कि 2019 में नए मतदाताओं से अपना पहला वोट पुलवामा के शहीदों को समर्पित करने की बात कहकर (यानी शहीदों के नाम पर वोट मांगकर) भी आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के दंड से बच निकले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार प्रधानमंत्री से ज्यादा धर्माचार्य के रूप में सामने हैं.

अपने अभूतपूर्व ‘चोलाबदल’ को अंजाम देते हुए वे अपनी पार्टी के कई मुख्यमंत्रियों के साथ आक्रामक हिंदुत्व के ‘खेल’ में कभी अपनी जाति बताते नजर आते हैं, कभी संविधान के धर्मनिरपेक्षता जैसे पवित्र मूल्य की दुर्गति करते.

पाठकों को याद होगा, गत लोकसभा चुनाव से ऐन पहले उन्होंने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो नए मंत्रियों की जाति का भी भरपूर प्रचार कराया था. पाठकों को यह भी मालूम है कि प्रधानमंत्री एक ऐसी पार्टी से हैं जो राम मंदिर के नाम पर वोट मांगने के लिए दशकों से इस सवाल को दरकिनार करती, कहना चाहिए, चिढ़ाती आई है कि क्या किसी धर्मनिरपेक्ष देश में मंदिर या मस्जिद के नाम पर-उसके निर्माण अथवा ध्वंस के लिए-जनादेश मांगा जा सकता है?

क्या चुनाव आयोग अपने अब तक के इतिहास में कभी उसे सख्ती से इस सवाल को चिढ़ाने और राम मंदिर के नाम पर वोट मांगने से रोक पाया?

जवाब है-नहीं, जब भी इसकी बात उठी, वह ‘पाॅलिटिकली करेक्ट’ होने की कोशिशें करता ही नजर आया. इस सिलसिले का नया सवाल यह है कि अब जब सत्तापक्ष राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के निस्तारण के बाद सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से अयोध्या में ‘वहीं’ बन रहे राम मंदिर का श्रेय अपनी झोली में डालकर मतदाताओं से ‘कृतज्ञतापूर्वक’ उसे ही फिर से चुनने को कह रहा है, तो आयोग मंदिर का निर्माण कराने को लेकर वोट मांगने को मंदिर को प्रचार के लिए इस्तेमाल करना मानेगा या नहीं?

अगर नहीं तो क्या इससे उसकी यह एडवाइजरी बेमतलब होकर नहीं रह जाती? और क्या इससे यह समझना जरा-सा भी कठिन रह जाता है कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मतदाताओं को राम मंदिर की बिना पर रिझाने में दिन-रात एक कर देंगे- किए तो खैर अभी भी हुए हैं- तो वह इस एडवाइजरी के अनुपालन में वस्तुनिष्ठ रवैया अपनाकर अपनी अंपायरिंग की छवि उजली करेगा या उन्हें अभय करने के लिए नए ‘तर्क’ गढ़ेगा?

कम से कम एक ‘तर्क’ तो उन्होंने अपनी ओर से उसे अभी से उपलब्ध करा दिया है. यह कि जिन भगवान राम का पांच सौ साल का तथाकथित इंतजार खत्म कराकर ‘सनातन’ के जयघोष के बीच वे उन्हें अयोध्या लाए हैं, वे किसी एक धर्म के थोडे़ ही हैं, ‘राष्ट्रपुरुष’ और ‘सनातन’ हैं यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटा मेरे बाप का.

यह सवाल आयोग से इसलिए भी तुरंत जवाब की मांग करता है कि पिछले कई चुनावों से उसके द्वारा उठाये जा रहे एक से एक ‘अभूतपूर्व’ व ‘अनूठे’ कदमों ने चुनाव में सत्तापक्ष व विपक्ष से समान बरताव की उसकी अंपायरिंग की कसौटी को हिला डाला है. अकारण नहीं कि कई बार विपक्षी दल शिकायत करते हैं कि उन्हें सत्तापक्ष के साथ चुनाव आयोग के पक्षपात से भी लड़ना पड़ रहा है. इतना ही नहीं, कई बार आयोग विधिसम्मत प्रक्रिया से चुनाव कराने के अपने अधिकार का अतिक्रमण कर ऐसे-ऐसे कदम उठाने लगता है, जिनसे लगता है कि वह उक्त प्रक्रिया को ही बदल देना चाहता है.

इसकी एक मिसाल यह है कि मतदाताओं के घरों व परिसरों वगैरह की दीवारों पर लिखकर, झंडे, बैनर व पोस्टर आदि लगाकर परंपरागत प्रचार करने की राह में अब ढेरों बंदिशें हैं लेकिन बड़े दल और प्रत्याशी प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल माध्यतों से मतदाताओं के ड्राइंग व डाइनिंग रूमों तक में घुसकर बेधड़क अपना प्रचार करते और उनका मन बनाते व बिगाड़ते रह सकते हैं.

क्या यह मुकाबले में सभी प्रतिद्वंद्वियों को समान अवसर देने व सबके साथ समान व्यवहार करने के निष्पक्ष अंपायरिंग के मूल सिद्धांत के अनुरुप है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)