भारत में कौन जनतंत्र को ज़िंदा रखना चाहता है

चुनाव के साफ़ सुथरा और निष्पक्ष होने में विपक्ष के अलावा जनता को दिलचस्पी होनी चाहिए. आशा की जाती है कि जब शासक दल निरंकुश होने लगे तो राज्य की बाक़ी संस्थाएं मिलकर जनतांत्रिक प्रक्रियाओं की हिफ़ाज़त करेंगी. लेकिन जान पड़ता है राज्य की सभी संस्थाओं ने भाजपा में अपना विलय कर दिया है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘भारत में जनतंत्र के पास कितना वक्त बचा है?’: किसी ने सवाल किया है. उन्हें मालूम है कि भारत में जनतंत्र दम तोड़ रहा है. सत्ता अपने बूट से उसका गला चांप रही है. सत्ता यानी उसके सारे अंग: प्रशासन, पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण आयोग, आयकर विभाग और एक बड़ी हद तक न्यायपालिका. जनतंत्र की हत्या के इस दृश्य पर ताली बजा-बजाकर अट्टाहास कर रहा है भारत का बड़ा मीडिया. जनता हैरान और भ्रमित है.

जनतंत्र जिंदा रहेगा या नहीं, इससे भी बड़ा सवाल यह है कि भारत में कौन जनतंत्र को जिंदा रखना चाहता है. राजकीय संस्थान? नौकरशाही? मीडिया? न्यायपालिका? कॉरपोरेट दुनिया? साधारण जनता? आख़िर किसकी दिलचस्पी जनतंत्र में है?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जेल में हैं. उनके उपमुख्यमंत्री और अन्य दो मंत्री पहले से जेल में हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री उनके पहले से जेल में हैं. बाक़ी विपक्षी नेताओं में किसी की भी गिरफ़्तारी किसी भी बहाने, किसी भी क्षण हो सकती है.

कांग्रेस पार्टी की एक प्रवक्ता पर उनके सोशल मीडिया खाते से की गई अभद्र टिप्पणी के बाद महिला आयोग, चुनाव आयोग, दिल्ली के उपराज्यपाल, सबकी तरफ़ से घेरा जा रहा है. यह सब उनकी सफ़ाई के बावजूद किया जा रहा है कि उनके खाते का दुरुपयोग करके किसी और वह टिप्पणी ने की थी और वे उस टिप्पणी के लिए माफ़ी मांगती हैं और बार-बार उस टिप्पणी से ख़ुद को अलग करने के बावजूद न जाने कितनी सरकारी संस्थाओं की तरफ़ से उन पर क़ानूनी कार्रवाई करने की धमकी सिर्फ़ धमकी रहेगी, नहीं कहा जा सकता.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 11 करोड़ रुपये के बकाया कर का नोटिस भेजा गई है. तृणमूल कांग्रेस को आयकर विभाग ने 1, 2 नहीं 15 नोटिस भेजे हैं. कांग्रेस पार्टी को 1,800 करोड़ रुपये के बकाया कर का नोटिस मिला है. उसके पहले उसके सारे बैंक खाते सील कर दिए गए हैं क्योंकि आयकर विभाग उससे अपना बकाया वसूलना चाहता है. इतना ही नहीं, उसने पार्टी को बिना बताए बैंकों को मजबूर किया कि वे कांग्रेस के खातों से आयकर विभाग के खाते में पैसा डाल दें.

यह प्राकृतिक न्याय के नियम के विरुद्ध है. मुझे बना बतलाए मेरे खाते से सरकार का कोई विभाग पैसा कैसे निकाल सकता है? लेकिन इसे लेकर मीडिया में कोई सवाल नहीं. बल्कि जो भी हो रहा है उसे उचित ठहराने की कोशिश है.

मीडिया में कहीं खबर नहीं कि भारतीय जनता पार्टी पर आयकर विभाग का कुछ भी बकाया है या नहीं.

मालूम होता है कि आयकर विभाग की नींद ठीक इसी वक़्त खुली जब चुनाव होने वाले हैं और सारे दलों को चुनाव प्रचार में लगना है जिसमें ख़ासे पैसे लगते हैं. ठीक इसी समय वह उनसे बकाए की वसूली कर रहा है. नोटिस का जवाब देने का वक्त देने का भी क़ायदा है लेकिन आयकर विभाग इसे मात्र औपचारिकता मानता है. या शिष्टाचार जिसका पालन करना आज की सरकार का कोई भी अंग अब ज़रूरी नहीं मानता. यह सब कुछ भी मीडिया के लिए विचारणीय नहीं है.

कांग्रेस पार्टी के पास अपने दफ़्तरों में काम करने वालों को तनख़्वाह देने को पैसे नहीं हैं. चुनाव प्रचार के लिए भी नहीं. न पर्चा, पोस्टर छपाने के लिए, न रेल, जहाज़ के टिकट के लिए.

विपक्षी दलों के नेताओं के पास ठीक इसी समय एक-एक क़रके सरकारी जांच एजेंसियों से बुलावा आ रहा है.वे उनके बुलावे पर उनके अफ़सरों के आगे हाज़िरी देते रहें तो फिर चुनाव प्रचार में कब जाएं?

क्या यह सब कुछ सामान्य है? क्या जनता को यह सब कुछ चुपचाप देखते रहना चाहिए? क्या मीडिया को इस पर चर्चा नहीं करनी चाहिए और क्या सरकार से सवाल नहीं करना चाहिए? क्या चुनाव आयोग को इन एजेंसियों को नियंत्रित नहीं करना चाहिए? क्या अदालतों को दख़ल नहीं देना चाहिए?

क्या इन सबका जवाब यह है कि आयकर विभाग हो या सीबीआई या ईडी, सबको अपना काम तो करते रहना है? या पूछा जाएगा कि क्या वे अपना काम यह सोचकर रोक दें कि अभी चुनाव है? क्या हम नहीं जानते कि इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ़ विपक्षी दलों और उनके नेताओं को क्यों घेरा जा रहा है, गिरफ़्तार किया जा रहा है?

हम नहीं जानते जो विपक्ष के उन नेताओं को किस तरह ब्लैकमेल किया गया है जो या तो अभी अपने दल छोड़ रहे हैं या चुनाव लड़ने से इनकार कर रहे हैं.

चुनाव के घोषणा के ठीक पहले राजनीतिक दलों को गुप्त चंदा देने के लिए चुनावी बॉन्ड के इस्तेमाल को सर्वोच्च न्यायालय ने ग़ैरक़ानूनी करार दिया. लेकिन तब तक भाजपा के पास अकूत धन इकट्ठा हो चुका था. विपक्षी दल पैसे में भाजपा से किसी तरह मुक़ाबला नहीं कर सकते. उनके पास जो भी पैसा है, वह एजेंसियों के ज़रिये हड़प किया जा रहा है.

इसके बाद भी चुनाव होगा. हर कोई चुनाव लड़ने को स्वतंत्र होगा. लेकिन इस दौड़ में विपक्ष के हाथ-पांव बांध दिए गए हैं. उसके बाद उस पर आरोप लगाया जाएगा कि वह दौड़ में पीछे रह जाता है, वह भाजपा की ऊर्जा का मुक़ाबला नहीं कर पा रहा.

साथ ही ईवीएम है, जिस पर कई विशेषज्ञ शक ज़ाहिर कर चुके हैं. लेकिन चुनाव आयोग ज़िद पर अड़ा है कि वह इसमें सुधार नहीं करेगा.

भारत के जनतंत्र की जान उसके चुनाव में है. अगर चुनाव की प्रक्रिया को ही दूषित कर दिया जाए तो जनतंत्र के बचने का सवाल कहां पैदा होता है? यह बात पिछले 10 साल से साफ़ दिख रही है कि मीडिया विपक्ष के ख़िलाफ़ है और भाजपा का उत्साही बल्कि आक्रामक प्रचारक है. तो उससे उम्मीद करना कि वह विपक्ष की बात जनता तक पहुंचाएगा, बेवक़ूफ़ी है.

आशा की जाती है कि जब शासक दल निरंकुश होने लगे तो राज्य की बाक़ी संस्थाएं मिलकर जनतांत्रिक प्रक्रियाओं की हिफ़ाज़त करेंगी. लेकिन जान पड़ता है राज्य की सभी संस्थाओं ने भाजपा में अपना विलय कर दिया है. पुराने फ़ौजी अधिकारी यह देखकर हैरान और चिंतित हैं कि सेना भी भाजपा की ज़बान में बात करने लगी है.

साफ़ सुथरे और निष्पक्ष चुनाव जनतंत्र के लिए अनिवार्य हैं. भारत की सरकारों पर अब तक यह आरोप नहीं लगा था कि वे लोकसभा के चुनाव को दूषित करती हैं. शासक दल को कुछ फ़ायदा ज़रूर रहता है लेकिन विपक्ष को ठप करने की साज़िश सत्ताधारी दलों ने आज तक नहीं की है.

इंदिरा गांधी को सबसे निरंकुश शासक कहा जाता है. उन्होंने भी ख़ुद आपातकाल ख़त्म करके सारे विपक्षी नेताओं को रिहा किया था. आज के शासक होते तो विपक्षी नेताओं को जेल में रखकर चुनाव करवाते. आज विपक्ष या तो जेल में है या एजेंसियों के दफ़्तर में हाज़िरी दे रहा है या अदालतों का चक्कर लगा रहा है. उसके सारे साधन छीन लिए गए हैं.

यह सब करके मीडिया के ज़रिये जनता को बतलाया जा रहा है कि विपक्ष भाजपा के मुक़ाबले में ही नहीं है. प्रधानमंत्री की अपार लोकप्रियता का शोर खड़ा किया जा रहा है. अब औपचारिक तौर पर सरकारी माध्यमों से सत्ताधारी दल प्रचार नहीं कर सकता लेकिन मीडिया के मंचों से उनका प्रचार बिना उनके खर्चे के किया जा रहा है. आचार संहिता लागू होने के बाद प्रधानमंत्री भूटान की यात्रा करके वहां से राजकीय पुरस्कार ग्रहण करते हैं. यह सब राजकीय खर्चे पर उनका और भाजपा का प्रचार है.

चुनाव के साफ़ सुथरा और निष्पक्ष होने में विपक्ष के अलावा जनता को दिलचस्पी होनी चाहिए. उसके अभिजात वर्ग की रुचि होनी चाहिए. लेकिन उसके एक बड़े हिस्से में या तो इसकी गंभीरता का एहसास नहीं है या उसे इसमें उज्र नहीं कि भाजपा चुनाव पर क़ब्ज़ा करने के लिए ये तिकड़में कर रहा है.

सिर्फ़ नरेंद्र मोदी नहीं, सिर्फ़ भाजपा नहीं, बल्कि भारत के अभिजन, भारत के सबसे संपन्न लोग हैं जनतंत्र के इस क़त्ल में भाजपा को हथियार मुहैया करा रहे हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)