उत्तराखंड: चुनाव प्रचार में अग्निवीर, बेरोज़गारी व अंकिता भंडारी के हत्यारों पर क्यों मौन रही भाजपा

23 बरस पहले उत्तराखंड जिस मकसद के लिए बनाया गया, उसे लेकर आज लगता है कि लोगों की आकांक्षाओं को अनदेखा किया गया और बुनियादी मुद्दों से भटकाने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर धकेल दिया गया.

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ऋषिकेश में हुई एक चुनावी जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी. (फोटो साभार: फेसबुक/@pushkarsinghdhami.uk)

उत्तराखंड चुनाव में महंगाई, बेरोज़गारी, अग्निवीर योजना और अंकिता भंडारी हत्याकांड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पूरी तरह कठघरे में है. इन्हीं वजहों से इस पर्वतीय प्रदेश की पांचों सीटों पर भाजपा को जनाक्रोश और विरोध का सामना करना पड़ रहा है. विगत दो आम चुनावों में भाजपा ने लगातार सभी पांचों सीटों पर कब्ज़ा किया लेकिन इस बार क्या समीकरण बदलेंगे या कोई बड़ा उलटफेर होगा, इस पर सारी निगाहें लगी हैं.

प्रधानमंत्री मोदी चुनावी रैली मे नौजवानों को ढाबा खोलने का मंत्र दे गए हैं. असली मुद्दों और आम जनता की दैनिक चिंताओं से ध्यान भटकाने के बजाय वेजिटेरियन खाना और लोगों को वोट देने के पहले अपने गांव के मंदिर में माथा टेकने की नसीहत देकर लौट आए हैं.

उत्तराखंड के हर दौरे में प्रधानमंत्री यह बताना नहीं भूलते कि उत्तराखंड से उनका बहुत पुराना नाता है. लेकिन 10 साल में उत्तराखंड में बेरोज़गारी दूर करने और स्थायी रोज़गार पैदा करने के लिए एक बैठक करने का भी वक्त नहीं निकाला. अंकिता भंडारी की भाजपा नेता के  पुत्र द्वारा कथित बलात्कार और हत्या के सबूत सरकारी सरंक्षण में मिटाए जा चुके हैं. हत्यारों को जल्दी सज़ा के लिए फास्टट्रैक का वायदा पूरा नहीं किया गया. अंकिता के मुद्दे पर आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि भाजपा के जिस वीआईपी नेता के लिए वेश्यावृत्ति कराने के दबाव में अंकिता की हत्या हुई वह नेता और हत्या के सबूत मिटाने की दोषी भाजपा महिला विधायक पीएम मोदी की रैली में मंच पर थे.

हर बार यहां की चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहाड़ों के पानी और यहां की जवानी को यहां के काम में लाने का संकल्प लिया करते हैं. 2014 के दौर में राज्य में कांग्रेस सरकार थी तो मोदी ने लोगों से कहा था कि उत्तराखंड में भी भाजपा की सरकार बननी ज़रूरी है क्योंकि सरकार जब डबल इंजन से दौड़ेगी तो पहाड़ों का विकास कई गुना तेज़ी से होगा. इसी मुगालते में लोगों ने 2017 से उत्तराखंड में डबल इंजल सरकार की भाजपा सरकार बनवा दी. तीन चौथाई बहुमत वाला डबल इंजन का कमाल देखिए कि भ्रष्टाचार और घोटालों में साढ़े चार साल 2017 -2021 में भाजपा को 3 मुख्यमंत्री बदलने पड़े.

उत्तराखंड में यहां के मूल वासियों जिनके लिए यह राज्य बनाया गया, वहां के लोग हिमालय के इतिहास के सबसे बुरे संकट में हैं. अति संवेदनशील परिस्थितिकीय व पर्यावरणीय चुनौतियां आए दिन की प्रलयकारी आपदाएं लेकर आ रही हैं. पहाड़ों से पलायन का सबसे बड़ा कारण नौकरियां और रोज़गार का न होना है. शिक्षा मंत्री को स्कूलों को बंद करने के फायदे गिनाने से फुर्सत नहीं है.

उत्तराखंड सरकार में हर साल कई हज़ार नौजवान यहां से सेनाओं में भर्ती परेड का इंतज़ार करते थे. मोदी सरकार ने अग्निपथ योजना लाकर हज़ारों नौजवानों के सपनों को तोड़ दिया. चार साल के लिए अग्निवीर बनने वालों को भविष्य अंधकारमय लग रहा है. बिना सोचे समझे अचानक सेना स्थायी भर्ती को बंद कर ऐसे नौजवानों और उनके परिवारों के भविष्य के बारे में सरकार ने ज़रा भी चिंता नहीं की.

उत्तराखंड के साथ ही हिमाचल, राजस्थान व हरियाणा समेत उन प्रदेशों के नौजवानों के लिए इस चुनाव में यह बड़ा मुद्दा बना हुआ है.

देहरादून में रिटायर्ड ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त डंगवाल कहते हैं, ‘पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की पुस्तक आंख खोलने वाली है, जिसमें उन्होंने साफ़ लिखा है कि ‘हमें यह कतई स्वीकार नहीं कि एक जवान से यह उम्मीद की जाती है कि वह देश के लिए अपना बलिदान दे और उसी जवान से दिहाड़ी मज़दूर जैसा व्यवहार किया जाए.’

उत्तराखंड देश का ऐसा अकेला राज्य है जहां आबादी के औसत के हिसाब से 13 प्रतिशत वोट पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों का है. ऐसी सूरत में पूर्व सैनिकों की एक रैंक एक पेंशन की विसंगतियों को दूर न करने से नाराज़गी व अग्निपथ योजना के साझा असंतोष का खामियाज़ा भाजपा को उत्तराखंड व देशभर में भुगतना पड़ सकता है.

पूर्व सेना प्रमुख व केंद्र में राज्यमंत्री रहे जनरल वीके सिंह पर टिहरी लोकसभा की चुनावी सभा में पहाड़ के पूर्व सैनिकों का गुस्सा इसलिए भी भड़का क्योंकि उनके अनुसार वीके सिंह ने मोदी सरकार में पूरे 10 साल मंत्री रहते हुए नए और पुराने सैनिकों के रैंक व पेंशन की खामियों को दूर करने के मुद्दे पर कुछ नहीं किया. हालांकि, रानीखेत के अपने गांव में बस चुके रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल मोहन भंडारी मोदी सरकार का बचाव करते हुए कहते हैं, ‘वन रैंक वन पेंशन के मामले में कांग्रेस या अन्य सरकारों की अपेक्षा मोदी सरकार ने बेहतर ही किया है.’

वस्तुतः यह पर्वतीय अंचल कई तरह की भीषण समस्याओं व गहरी दुश्वारियों से घिरा है. उत्तराखंड के 13 ज़िलों में से करीब 9 ज़िले उद्योग शून्य हैं. इस राज्य की नियति बन चुकी है कि साल दर साल पढ़े लिखे नौजवान नौकरी की तलाश में पहाड़ों को हमेशा के लिए छोड़ने को विवश हैं.

23 बरस पहले यह पहाड़ी राज्य उत्तर प्रदेश से जिस मकसद के लिए बनाया गया, पीछे मुड़कर हर किसी को लगता यही है कि लोगों की आशाओं व आकांक्षाओं के साथ नई पीढ़ी का भविष्य संवारने के व्यावहारिक पक्षों की पूरी तरह अनदेखी की गई. लोगों को सिर्फ वोट देने की मशीन में तब्दील कर दिया गया. उनका ध्यान बुनियादी समस्याओं व मुद्दों से भटकाने के लिए धार्मिक नफरत, तनाव व वोटों के ध्रुवीकरण की ओर फोकस कर दिया गया.

भाजपा ने उत्तरखंड को एक तरह की प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया. चूंकि यहां चार धाम के अलावा हरिद्वार-ऋषिकेश जैसे धार्मिक स्थल मौजूद हैं. यहां देशभर से लाखों लोग हर साल यात्रा और सैर सपाटे पर आते हैं इसलिए भी भाजपा को लगता है कि इन स्थलों की हिंदू मान्यताओं की महत्ता के अलावा साधु संतों, अखाड़ों व मठों पर प्रभाव जमाकर, तात्कालिक व दूरगामी लक्ष्य की खातिर धर्म और राजनीति के दांव-पेंच उसके काम आते रहेंगें.

उत्तराखंड में चल रही निर्माण परियोजनाओं में भारी भ्रष्टाचार का आलम यह है कि उत्तरकाशी में सिलक्यारा-बड़कोट की जिस टनल में 42 मजदूर 17 दिनों तक मौत और ज़िंदगी से जूझते रहे, उस नवयुग इंजिनियरिंग कंपनी से भाजपा ने 55 करोड़ रुपये का चंदा वसूला. इस एवज में उसने टनल में सुरक्षा शर्तों की घोर उपेक्षा की. मोटा चंदा दिया सो इतने बड़े हादसे के बादजूद उस कंपनी का बाल बांका तक नहीं हुआ!

पूरे राज्य में अवैध खनन से लेकर सैकड़ों करोड़ के सरकारी ठेकों में बेहिसाब भयावह लूट और भ्रष्टाचार का बोलबाला है. सरकारी नौकरियां बेचने और नकल कराने वाले गिरोहों को सरकारी संरक्षण अरसे से चल रहा है. पेयजल विभाग के अधीन ऋषिकेश और हरिद्वार में सीवर लाइनों का 350 करोड़ का टेंडर पिछले साल राज्य सरकार ने बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के जारी कर दिया. जनता के टैक्स के पैसे की बदंरबांट के इस तरह के दर्जनों घोटाले हैं जो दबा दिए गए हैं.

इस सबके बावजूद भ्रष्टाचार के मामलों पर इस चुनाव में चर्चा नदारद है. मोदी लहर में भाजपा ने 2014 और 2019 में सभी 5 लोकसभा सीटों पर लगातार दो बार जीत दर्ज कर ली. बावजूद इसके 2019 के लोकसभा चुनावों के मुकाबले 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के वोट प्रतिशत में भारी गिरावट आई है. इसलिए पिछले विधानसभा चुनावों में खटीमा में मुख्यमंत्री धामी की बुरी हार जैसे झटकों को रोकने के लिए कई तरह की कार्य योजनाओं पर काम तेज हुआ.

लोकसभा चुनावों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को विधानसभा में पारित करवाने की इतनी हड़बड़ी दिखाई कि विपक्षी दल ही नहीं अपने विधायकों को भी इस विवादास्पद विधेयक प्रावधानों के बारे में भनक तक नहीं लगने दी गई. धार्मिक उन्माद और मंदिर-मस्जिद भाजपा और उसके पालतू मीडिया के सबसे प्रिय विषय हैं. हल्द्वानी के सांप्रदायिक दंगे में प्रशासनिक मशीनरी के उकसावे की हरकतों से पूरे राज्य में सियासी हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)