नागपुर का सीमावर्ती छिंदवाड़ा: क्या भाजपा मध्य प्रदेश में कांग्रेस का अंतिम किला जीत पाएगी?

मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के ‘मिशन 29’ की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बनी वरिष्ठ कांग्रेसी कमल नाथ के प्रभाव वाली छिंदवाड़ा लोकसभा सीट को जीतने के लिए पार्टी ने ‘दल बदल की राजनीति’ को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है.

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छिंदवाड़ा में 16 अप्रैल को हुए रोड शो के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ मध्य प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा (बाएं), मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव (माइक थामे हुए) और पार्टी के छिंदवाड़ा प्रत्याशी बंटी साहू (दाएं). (फोटो: दीपक गोस्वामी/द वायर)

छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश): यह गौरतलब  है कि कांग्रेसी नेता कमल नाथ के प्रभुत्व वाला ज़िला छिंदवाड़ा नागपुर की सीमा पर ठहरा हुआ है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का गठन ठीक एक सदी पहले नागपुर में हुआ था, और उसके बाद से नागपुर इस संगठन का मुख्यालय बना हुआ है, वरिष्ठ प्रचारकों और सरसंघचालकों की कर्मभूमि रहा है. नागपुर से ही सटे मध्य प्रदेश के बैतूल को ‘संघ की प्रयोगशाला’ कहा जाता है. बैतूल समेत आस-पास के सभी जिलों में भाजपा लगातार जीतती आ रही है, लेकिन छिंदवाड़ा की नागपुर और संघ मुख्यालय से इतनी करीबी के बाद भी भाजपा यहां सफलता नहीं चख पायी है और करीब पांच दशकों से कमल नाथ से मात खाती आ रही है.

क्या यह सिर्फ़ कमल नाथ का प्रभाव है या छिंदवाड़ा की विशिष्ट राजनीतिक और सामाजिक सरंचना का सूचक है?

मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ‘मिशन 29’ की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बनी छिंदवाड़ा लोकसभा सीट को जीतने के लिए अब पार्टी ने ‘दल बदल की राजनीति’ को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है.

छिंदवाड़ा लोकसभा के तहत सात विधानसभा क्षेत्र – चौरई, छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा, पांढुर्ना, परासिया, जुन्नारदेव और सौंसर – आते हैं, और इनमें से अधिकांश क्षेत्रों में बड़ी तादाद में कांग्रेसियों ने भाजपा का दामन थामा है.

चौरई से पूर्व कांग्रेसी विधायक चौधरी गंभीर सिंह, छिंदवाड़ा से कमल नाथ के सबसे खास दीपक सक्सेना; अमरवाड़ा से तीन बार के विधायक कमलेश शाह और छिंदवाड़ा महापौर विक्रम अहाके; पांढुर्ना से प्रदेश कांग्रेस महासचिव अज्जू चौहान; जुन्नारदेव से प्रदेश महामंत्री, मीडिया उपाध्यक्ष और प्रदेश प्रवक्ता रहे सैयद जफर; और परासिया में कई ब्लॉक अध्यक्ष समेत हजारों छोटे-बड़े कांग्रेसी नेता/कार्यकर्ता भाजपा में पहुंचे हैं.

भाजपा ने कांग्रेस को सबसे बड़े आघात उन तीन विधानसभा क्षेत्रों में दिए हैं, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी पिछड़ गई थी. उस वक्त सात विधानसभाओं में से कांग्रेस 3, जबकि भाजपा 4 पर आगे रही थी. छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा और जुन्नारदेव विधानसभाओं में कांग्रेस को मिली बड़ी बढ़त ने उसे छिंदवाड़ा लोकसभा सीट जिताने में निर्णायक भूमिका निभाई थी.

छिंदवाड़ा में कांग्रेस 15,071; अमरवाड़ा में 22,296; और जुन्नारदेव में 12,068 मतों से आगे रही थी. जबकि, चौरई में 1,453; परासिया में 4,743; पांढुर्ना में 848; और सौंसर में 4,645 मतों से पिछड़ गई थी. इस तरह कांग्रेस को कुल 37,536 मतों से जीत मिली थी.

पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में भी इन सातों विधानसभा क्षेत्रों में से छिंदवाड़ा (36,594) और अमरवाड़ा (25,086) में ही कांग्रेस को दो सबसे बड़ी जीत मिली थीं. बाकी 5 जगह उसकी जीत का अंतर 2 हजार से 12 हजार के बीच रहा था.

सौंसर में कांग्रेस में टूट का कोई खास उदाहरण नहीं मिलता है, जबकि परासिया में भी कोई बड़ा कांग्रेसी भाजपा में शामिल नहीं हुआ है. इसका कारण भाजपा का यहां ठीक-ठाक स्थिति में होना बताया जा रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में इन दोनों क्षेत्रों में भाजपा को सबसे बड़ी बढ़त मिली थी. वहीं, पिछले वर्ष के विधानसभा चुनाव में भाजपा को परासिया में महज 2,168 मतों से हार मिली थी.

बग़ावत बनाम सहानुभूति

कमल नाथ हर मंच से अपने विकास कार्य गिनाते हैं और जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने अपना जीवन छिंदवाड़ा की सेवा में खपा दिया. स्थानीय पत्रकार अवनीत गंगवाल कहते हैं, ‘जिस ढंग से इन नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी है, उससे जनता में कमल नाथ के प्रति सहानुभूति पैदा हुई है. उनके भावुक भाषण लोगों पर खासा असर डाल रहे हैं.’

इस सहानुभूति का प्रत्यक्ष उदाहरण अब्दुल रहीम के ये शब्द हैं, ‘छिंदवाड़ा को उन्होंने 45 साल दिए हैं, अपना जीवन खपा दिया, आज ठीक से चल भी नहीं सकते. उन्हें देखकर आंखें भर आती हैं.’

स्थानीय पत्रकार नितिन रघुवंशी बताते हैं, ‘अमरवाड़ा से तय होगा कि छिंदवाड़ा पर राज किसका होगा! यह आदिवासी बहुल इलाका है. भाजपा ने यहां के दो सबसे बड़े आदिवासी नेताओं, कमलेश शाह जो यहां के राजघराने से आते हैं और विक्रम अहाके, को कांग्रेस से तोड़ लिया है. आदिवासी ही कमल नाथ और कांग्रेस की ताकत हैं.’

हालांकि, अमरवाड़ा के आदिवासी नागरिक मोहन बरकड़े कहते हैं, ‘वो तो बस कहना है कि राजा (कमलेश शाह) ने पार्टी बदल ली, सब ऊपरी दिखावा है, वोट कमल नाथ के लिए ही जाएगा.’

ऑटो चालक शानू कहते हैं, ‘जो विकास छिंदवाड़ा में हुआ है, शायद ही कहीं हुआ हो. शहर का मुख्य इलाका सत्कार चौक चार दशक पहले जंगल था, दिन ढलने के बाद लोग यहां से निकलते नहीं थे. छिंदवाड़ा में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल सभी कमल नाथ लाए हैं.’

बस डिपो संचालक समीर (परिवर्तित नाम) बताते हैं, ‘यह चुनाव 1997 के पैटर्न पर है. तब भाजपा के सुंदर लाल पटवा ने धन-बल के सहारे कांग्रेसियों को अपने पाले में किया था, लेकिन कमल नाथ ने अपनी पत्नी को हटाकर खुद सांसद बनने के लिए क्षेत्र को चुनाव में धकेल दिया. जनता इससे खफा थी. नतीजतन, उन्हें पहली बार हार झेलनी पड़ी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है.’

भाजपा का दल बदल पर जोर, लेकिन पार्टी के भीतर असंतोष

भाजपा ने छिंदवाड़ा से 45 वर्षीय बंटी साहू को उम्मीदवार बनाया है. साहू ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी, बाद में वह भाजपा में आ गए. भाजपा ने 2019 में छिंदवाड़ा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव और 2023 में इसी सीट से विधानसभा चुनाव में उन्हें कमल नाथ के सामने उतारा था, लेकिन दोनों ही बार वह बड़े अंतर से हारे.

बंटी साहू (बीच में). (फोटो: दीपक गोस्वामी/द वायर)

इस बार जब लोकसभा के लिए उनके नाम की घोषणा हुई तो पूर्व कैबिनेट मंत्री चौधरी चंद्रभान सिंह ने ‘प्रत्यक्ष विरोध’ भी व्यक्त किया था. चंद्रभान सिंह के इस कदम को तो पार्टी ने शांत करा दिया, लेकिन अंदरूनी तौर पर पार्टी में ‘अप्रत्यक्ष विरोध’ भी बसा हुआ है. अलग-अलग क्षेत्र के पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से द वायर की बातचीत में यह विरोध निकलकर सामने आया.

एक पार्टी पदाधिकारी ने कहा, ‘पिछली बार हम छिंदवाड़ा लोकसभा की 4 विधानसभाओं में आगे थे, इस बार केवल 2 में रहेंगे. 5 विधानसभाएं कांग्रेस जीत रही है.’

दूसरे पदाधिकारी ने कहा कि साहू की जगह अगर किसी भी अन्य स्थानीय नेता को टिकट दे दिया जाता या फिर बाहर से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे किसी बड़े नेता को यहां चुनाव लड़ने भेज दिया जाता, तो पूरी संभावना थी कि हम छिंदवाड़ा जीत जाते. उन्होंने कहा, ‘हम यहां हारते रहे क्योंकि 1997 के अलावा पार्टी ने यहां कभी गंभीरता से चुनाव लड़ा ही नहीं. हमेशा टिकट वितरण में गलती की. इस बार हम गंभीरता से लड़ रहे हैं, लेकिन अब भी टिकट गलत आदमी को दिया है.’

उन्होंने 2-3 ऐसे स्थानीय नेताओं के भी नाम गिनाए, जिन्हें टिकट दिए जाने पर पार्टी की संभावना बन सकती थी.

जब इन भाजपा कार्यकर्ताओं से पूछा गया कि आखिर पार्टी के छिंदवाड़ा में गंभीरता से चुनाव न लड़ने का क्या कारण हैं, अमूमन सभी ने कहा, ‘कमल नाथ सबसे बनाकर चलते हैं और स्थानीय भाजपा नेताओं को अपने पक्ष में काम करने के लिए मना लेते हैं.’

एक अन्य पूर्व भाजपाई पार्षद ने कहा, ‘पार्टी बाहरी प्रत्याशी को लाकर चुनाव जीतना चाहती है. जो लोग भी मोर्चा संभाले हुए हैं, सभी तो कांग्रेस से आए हैं. बंटी भी तो कांग्रेसी थे.’

एक अन्य भाजपा कार्यकर्ता कहते हैं, ‘साहू की जगह किसी को भी टिकट मिलता तो पूरी भाजपा काम करती. आज लोग घर बैठे हैं. जितने भी लोग कांग्रेस छोड़कर आए हैं, कमल नाथ के पक्ष में ही वोट करेंगे.’

ऐसे में अवनीत के शब्द महत्वपूर्ण हैं, ‘यहां भाजपा के मंच पर अग्रिम पंक्ति में कांग्रेस से आए लोग बैठे नज़र आते हैं. भाजपा के नेता पीछे चले गए हैं. क्या उन्हें यह चुभता नहीं होगा कि कांग्रेसियों ने आकर उनकी जगह पर कब्जा कर लिया?’

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