संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता के लिए फिलिस्तीन के प्रस्ताव पर अमेरिका का वीटो

गुरूवार (18 अप्रैल) को सुरक्षा परिषद में संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए फ़लस्तीन का प्रस्ताव अमेरिका द्वारा अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल किए जाने के कारण ख़ारिज कर दिया गया.

अमेरिका के राजदूत रॉबर्ट ए. वुड ने सुरक्षा परिषद में फिलिस्तीन पर मसौदा प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करते हुए. फोटो साभार: यूएन

नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की सदस्यता के लिए फिलिस्तीन के प्रस्ताव पर सुरक्षा परिषद में मतदान किया गया. इसमें 12 सदस्य देशों ने इसका समर्थन किया.जबकि दो सदस्य देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. वहीं अमेरिका ने इसके विरोध में वोट दिया, जिसके बाद ये मसौदा पारित होने में विफल रहा, क्योंकि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य अमेरिका ने अपनी वीटो अधिकार का प्रयोग किया.

सुरक्षा परिषद के इतिहास में इस प्रस्ताव का मसौदा सबसे संक्षिप्त मसौदों में से एक के रूप में देखा गया. इसके अनुसार, संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने के लिए फिलिस्तीन के आवेदन (S/2011/592) को जांचने के बाद, सुरक्षा परिषद की यूएन महासभा के लिए अनुशंसा थी कि फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता दी जाए. इस प्रस्ताव को अमेरिका ने वीटो कर दिया.

मालूम हो कि 15-सदस्यीय सुरक्षा परिषद में एक मसौदा प्रस्ताव को पारित करने के लिए, पक्ष में कम से कम नौ सदस्य होने चाहिए और किसी स्थाई सदस्य देश- चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका- द्वारा अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

गाजा में जारी लड़ाई के बीच फिलिस्तीन ने 2 अप्रैल को संयुक्त राष्ट्र महासचिव के पास एक पत्र भेजा, जिसमें जिसमें कहा गया था कि संगठन की सदस्यता के लिए फिलिस्तीनी के 2011 के आवेदन पर नए सिरे से विचार किया जाए.

ज्ञात हो कि इस संबंध में फिलिस्तीन ने पहली बार साल 2011 में आवेदन दाख़िल किया था. तब सुरक्षा परिषद ने इस अनुरोध पर विचार किया था, मगर एक राय न होने की वजह से यूएन महासभा के लिए सिफ़ारिश नहीं भेजी गई थी. यूएन चार्टर के अनुसार, महासभा के 193 सदस्य देशों द्वारा इस विषय में मतदान किया जाना ज़रूरी है.

इस महीने की शुरुआत में सुरक्षा परिषद ने सदस्य राज्यों की प्रवेश समिति को फिलिस्तीन का ये नवीनतम अनुरोध भेजा था, जिसके बाद इस मामले पर चर्चा करने के लिए 8 और 11 अप्रैल को बैठक हुई थी.

फिलिस्तीन 2012 के बाद से ही संयुक्त राष्ट्र का स्थाई पर्यवेक्षक राष्ट्र रहा है, जबकि उससे पहले फिलिस्तीन को यूएन महासभा में पर्यवेक्षक का दर्जा हासिल था.

अमेरिका पूरी तरह अलग-थलग: रूस

रूसी राजदूत वासिली नेबेंज़िया ने कहा कि गाजा में मौजूदा तनाव शुरू होने के बाद से यह पांचवीं बार है जब अमेरिका ने परिषद के प्रस्ताव पर वीटो किया है.

उन्होंने कहा, ‘अमेरिका ने एक बार फिर दिखाया कि वे वास्तव में फिलिस्तीनियों के बारे में क्या सोचता है. अमेरिका के लिए फिलिस्तीन अपना खुद का राज्य रखने के योग्य नहीं हैं. वे इज़रायल के हितों को साकार करने की राह में केवल एक बाधा हैं.’

उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान में वैश्विक समुदाय का पूर्ण बहुमत संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य बनने के लिए फिलिस्तीन के आवेदन का समर्थन करता है.

उनके मुताबिक, ‘अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल द्वारा वीटो का प्रयोग इतिहास के अपरिहार्य घटनाक्रम को रोकने का एक निराशाजनक प्रयास है. वोट के नतीजे इस बारे में खुद बताते हैं, जहां अमेरिका व्यावहारिक तौर पर पूरी तरह से अलग-थलग था.

सुधारों की जरूरत: अमेरिका

अमेरिकी उप स्थायी प्रतिनिधि रॉबर्ट वुड ने कहा कि परिषद के सदस्यों को यह सुनिश्चित करने की विशेष जिम्मेदारी है कि उनके कार्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा दें और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की आवश्यकताओं के अनुरूप हों.

उन्होंने कहा कि नए सदस्यों के प्रवेश पर समिति की रिपोर्ट दर्शाती है कि सदस्यों के बीच इस बात पर सहमति नहीं है कि फिलिस्तीन संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद IV के अनुरूप सदस्यता के मानदंडों को पूरा करता है या नहीं.

उन्होंने आगे कहा कि उदाहरण के लिए ऐसे अनसुलझे प्रश्न हैं कि क्या आवेदक राज्य माने जाने वाले मानदंडों को पूरा करता है.

रॉबर्ट वुड के अनुसार, ‘हमने लंबे समय से फिलिस्तीनी प्राधिकरण से राज्य के लिए तत्परता की विशेषताओं को स्थापित करने में मदद करने के लिए आवश्यक सुधार करने का आह्वान किया है, और ध्यान दें कि हमास, एक आतंकवादी संगठन है, जो वर्तमान में गाजा में शक्ति और प्रभाव बढ़ा रहा है, जो इस संकल्प में परिकल्पित राज्य का एक अभिन्न अंग है.

उन्होंने बताया कि इन्हीं कारणों से अमेरिका ने पक्ष में वोट ‘नहीं’ दिया. वुड ने कहा कि अमेरिका दो-राज्य समाधान का पुरजोर समर्थन करता रहा है.

उन्होंने आगे कहा, ‘यह वोट फिलिस्तीनी राज्य के विरोध को प्रतिबिंबित नहीं करता है, बल्कि यह स्वीकारोक्ति है कि यह केवल दोनों पार्टियों के बीच सीधी बातचीत से आएगा.’

चीन: संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता पहले से कहीं अधिक जरूरी

चीनी राजदूत फू कांग ने कहा कि फिलिस्तीनी लोगों का दशकों पुराना सपना ऐसे समय में खारिज कर दिया गया है जब संयुक्त राष्ट्र के पूर्ण सदस्य के रूप में फिलिस्तीन का प्रवेश पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है.

उन्होंने बताया कि पिछले 13 वर्षों में, फिलिस्तीन में स्थिति बदल गई है, इसलिए फिलिस्तीन की शासन करने की क्षमता पर सवाल उठाना स्वीकार्य नहीं है.

फू कांग ने कहा, ‘एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना एक अनिवार्य अधिकार है जिस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है. संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण सदस्य के रूप में फिलिस्तीन के प्रवेश से वास्तव में दो-राज्य समाधान पर इज़रायल के साथ बातचीत में मदद मिलेगी.’

फू ने उस दिन को दोखने के लिए चीन के समर्थन का वादा किया,  जब फिलिस्तीन और इज़रायल एक दिन साथ-साथ शांति से रहेंगे. उन्होंने कहा कि इतिहास के पहिए आगे बढ़ रहे हैं.

फिलिस्तीन स्वतंत्रता के अधिकार का समर्थन करता है

फिलिस्तीन राज्य के स्थायी पर्यवेक्षक रियाद मंसूर ने कहा कि उनके लोगों का स्वतंत्रता का अधिकार कभी भी सौदेबाजी या बातचीत के अधीन नहीं रहा है.

उन्होंने कहा, ‘हमारी मातृभूमि फिलिस्तीन का एक स्वतंत्र राज्य के रूप में रहना, जो स्वतंत्र और संप्रभु है, एक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और कानूनी अधिकार है. आज हम आज सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण के रूप में आए हैं, ताकि हम जो बचाया जा सकता है उसे बचा सकें. हम आपको हमारे क्षेत्र में न्यायसंगत और व्यापक शांति की नींव स्थापित करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी सौंपते हैं.’

रियाद मंसूर के अनुसार, ‘परिषद के सदस्यों को हमारे लोगों के बीच खोई हुई आशा को पुनर्जीवित करने और दो-राज्य समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दृढ़ कार्रवाई में बदलने का अवसर दिया गया था ‘जिसे न तो बदला जा सकता है और न ही वापस लिया जा सकता है.’ और परिषद के अधिकांश सदस्य इस ऐतिहासिक क्षण के स्तर तक पहुंच गए हैं, और वे नैतिक और मानवीय और कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप, न्याय और स्वतंत्रता और आशा के पक्ष में खड़े हुए हैं.

मंसूर ने संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए फिलिस्तीन के अनुरोध का समर्थन करने वाले और मसौदा प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने वाले देशों की सराहना की.

उन्होंने कहा, ‘तथ्य यह है कि यह प्रस्ताव पारित नहीं हुआ,लेकिन इससे हमारी इच्छाशक्ति नहीं टूटेगी और यह हमारे दृढ़ संकल्प को नहीं हरा सकता.’

मंसूर के मुताबिक, ‘हम अपने प्रयास में नहीं रुकेंगे. फिलिस्तीन राज्य अनिवार्य है, ये सच है. शायद वे इसे दूर से देखते हैं, लेकिन हम इसे पास से देखते हैं, और हम वफादार हैं.

इज़रायल: ‘आपका वोट शांति को लगभग असंभव बना देगा’

इज़रायली राजदूत गिलाद एर्दान ने कहा कि फिलिस्तीन प्राधिकरण एक आतंक-समर्थक इकाई है, जो ‘हमें मारने के लिए आतंकवादियों को भुगतान कर रही है,’ और फिलिस्तीनी इज़रायल को एक यहूदी राज्य के रूप में भी मान्यता नहीं देते हैं.

उन्होंने कहा कि आज यहां हमास का उल्लेख नहीं किया गया क्योंकि यहां फिलिस्तीनी प्रतिनिधि कम से कम आधी फिलिस्तीनी आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.

उन्होंने कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए आवश्यक मानदंडों को पूरा करने में फिलिस्तीनियों की विफलता के बावजूद, ये दुख की बात है कि आप में से अधिकांश ने फिलिस्तीनी आतंक को फिलिस्तीनी राज्य से पुरस्कृत करने का फैसला किया है. यह बहुत दुखद है क्योंकि आपका वोट फिलिस्तीनी अस्वीकृतिवाद को और भी अधिक बढ़ावा देगा और शांति को लगभग असंभव बना देगा.’

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