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तानाशाही जनतंत्र के भीतर, उसी के सहारे पैदा होती है

जैसे सभ्यता का दूसरा पहलू बर्बरता का है, वैसे ही जनतंत्र का दूसरा पहलू तानाशाही है. जनतंत्र की तानाशाही इसलिए भी ख़तरनाक है कि उसे खुद जनता लाती है. वह लोकप्रिय मत के सहारे सत्ता हासिल करती है. कविता में जनतंत्र स्तंभ की 32वीं क़िस्त.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)
(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

एक आवाज़: तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते. हमारे पास क़ानून हैं. हमारे पास अदालतें हैं. हमारे पास संगठन हैं.
एक आवाज़: तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते. आख़िर मैं कार्ल मार्क्स में यक़ीन करता हूं.
एक आवाज़: तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते. संविधान इसकी मनाही करता है.
एक आवाज़: मैंने हमेशा ख़ुशी ख़ुशी सहयोग किया.
एक आवाज़: मुझे यह अच्छा धंधा लगा.
एक आवाज़: मुझे यह वर्ग संघर्ष मालूम दिया.
एक आवाज़: मुझे यह अपने वक़्त में अमन की तरह जान पड़ा.
तानाशाह आवाज़:
आपको धन्यवाद, देवियो और सज्जनो. जनतंत्र का ख़ात्मा हो चुका है. आपका ख़ात्मा हो चुका है. अब बस हम हैं.

तुमने मुझे ग़लत समझा.
दूसरों ने अक्सर यही गलती की है.
अक्सर और बार-बार कई मुल्कों में
मैं कभी लोगों की ताक़त का सहारा नहीं लेता.
मैं उनकी कमज़ोरियों और भय के सहारे बढ़ता हूं.
मैं उनके संदेहों को अपने सहयोगी और जासूस बना लेता हूं.
मेरे पास सबसे विश्वास करने योग्य अमन का मुखौटा है.
विशेषज्ञों के द्वारा रंगा हुआ, एक तरह के मूर्खों के लिए,
और दूसरे के लिए मैं एक अच्छा व्यवसायी हूं,
बिना लाग लपेट, व्यवसाय और बाज़ार की बात करनेवाला
जिसे बहुत ग़लत समझा गया.

मैं इस आदमी को उसकी पॉकेटबुक के सहारे छूता हूं.
उस आदमी को उसके बॉस के प्रति नफ़रत के सहारे,
और उस आदमी को उसके भय के ज़रिये.
मैं हर चीज़ का वादा करता हूं क्योंकि वादा करना सबसे सस्ता है.
मैं कोई दावा नहीं करता जब तक कि दावा न करूं.
मैं हमेशा संतुष्ट रहता हूं जब तक कि न रहूं
जो उन लोगों के साथ कुछ तेज़ी से होता है
जो सोचते हैं मैं एक तबाहो बर्बाद और पूरी तरह हज़म कर ली गई दुनिया से
कुछ कम पर संतुष्ट हो जाऊंगा
मेरा ख़ुफ़िया हथियार कोई ख़ुफ़िया हथियार नहीं है.
यह है हर सबको हरेक के ख़िलाफ़ कर देना
मेरे अपने मक़सद के लिए
अच्छे लोग जाने बिना मेरा काम करते हैं
सिर्फ़ ख़ुफ़िया ग़द्दार और जासूस ही नहीं.
असल है सवाल और संदेह पैदा कर देना
जहां भी विश्वास हो.

असल है लोगों के दिमाग़ों को क़ब्ज़ा कर लेना इसके पहले कि उनके शरीरों को लोहे का एहसास हो.
असल है सारी ईर्ष्या, सारी निराशा, सारे पूर्वाग्रहों का इस्तेमाल
मेरे अपने मक़सद के लिए.
अगर तुम्हारे कोई ईर्ष्या है या कोई पूर्वाग्रह
अच्छी तरह विकसित, संपूर्ण घृणा,
मैं उससे खेलूंगा और उसे तुम्हारी तबाही के लिए इस्तेमाल करूंगा.

मेरे जनरल हैं जनरल अविश्वास, जनरल भय, जनरल बेदिल,
जनरल बहुत-देर-हो-चुकी-है
जनरल लोभ और मेजर जनरल नफ़रत
और वे सब सिविलियन कपड़ों में घूमते हैं
तुम्हारी ही अपनी गलियों में और तुम्हारे कानों में फुसफुसाते हैं
मुझे बैठे रहकर नहीं हराया जा सकता.

उन्होंने फ़्रांस में यह करके देख लिया. मुझे हराया नहीं जा सकता
अंधेरे में छिपकर और मुंह बनाते हुए
और निश्चय ही मुझे कभी हराया नहीं जा सकता
उनके द्वारा जो मेरी जैसी दुनिया को पसंद करते हैं
और अगर पसंद न भी करें तो यह मानते हैं कि यह आकर रहेगा
वे जिनके पंख हैं और ज़मीन में मांद.
क्योंकि मैं सिर्फ़ टैंकों, बंदूकों, जहाजों और बमबारों पर नहीं
बल्कि तुम्हारे अपने विभेदों और बंटवारे पर दांव लगाता हूं.
तुम्हारे अपने दिमाग़ों और दिलों पर मुझे भीतर आने देने को,
क्योंकि अगर वह हो जाए, तो वह सब होगा जो मैं चाहता हूं.
तो फिर तुम्हें क्या कहना है?
मेरे दांव के मुक़ाबले तुम्हारा दांव क्या है?
तुम्हारी एकजुट आवाज़ कहां है?

स्टीफ़न विंसेंट बेनेट की लंबी कविता ‘लोगों को सुनो’ का यह एक अंश है. कविता 1941 में लिखी गई थी. मेरी पत्नी पूर्वा ने पढ़कर कहा, लगता है हमारे भारत की कहानी है. लेकिन बेनेट के देश अमेरिका के लोग कह सकते हैं, यह कविता उनपर फिट बैठती है. अमेरिका में नवंबर, 2024 को क्या नवंबर, 2016 दोहराया जाएगा?

कवि को यों ही भविष्यवक्ता नहीं कहा जाता. हालांकि वह सिर्फ़ अपने वक्त को देख और लिख रहा होता है. अगर वह हमारे वक्त के लिए भी सटीक हो तो इसका मतलब यही है कि हर चीज़ दोहराई जा सकती है, दोहराई जाती है. वह क्यों दोहराई जाती है, इसका कारण बेनेट के हमवतन एक दूसरे अमेरिकी कवि हॉवार्ड नेमेरोव ने ही बताया है:

हम इतिहास से नहीं सीखते इसकी वजह यह है कि
हम वे लोग नहीं जिन्होंने पिछली बार सीखा था

…..

हम जानते हैं कि हम उनसे बेहतर जानते हैं
और इतिहास हमें दोष नहीं देगा अगर एक बार फिर
सुरंग के अंत में जो रोशनी हो वह ट्रेन है

या उसकी वजह वह भी हो सकती है जो पोलिश कवि तादेवुष रुज़ेविच अपनी कविता ‘जो होता है’ में बतलाते हैं:

यह हुआ है
और यह होते ही जाता है
और यह फिर होगा
अगर कुछ न हो इसे रोकने के लिए
भोले कुछ नहीं जानते
क्योंकि वे कुछ ज़्यादा ही भोले हैं
और दोषी कुछ नहीं जानते
क्योंकि वे बहुत दोषी हैं
गरीब कुछ नहीं देखते
क्योंकि वे कुछ ज़्यादा ही गरीब हैं
और अमीर कुछ नहीं देखते
क्योंकि वे कुछ ज़्यादा अमीर हैं
अहमक अपने कंधे उचकाते हैं
क्योंकि वे कुछ ज़्यादा अहमक हैं
और चतुर कंधे उचकाते हैं
क्योंकि वे कुछ ज़्यादा चतुर हैं
नौजवान कोई परवाह नहीं करते
क्योंकि वे कुछ ज़्यादा नौजवान हैं
और बूढ़े परवाह नहीं करते
क्योंकि वे कुछ ज़्यादा बूढ़े हैं
यही वजह है कि कुछ नहीं होता
इसी रोकने के लिए
और यही वजह है कि यह हुआ है
और होता ही जाता है और फिर होगा.

यह जो होता है उससे हम आंख चुराते रहते है, फिर भी वह होता है. क्योंकि उसके होने की शर्तें मौजूद हैं:

ओह! मैंने कहा, यह होने जा रहा है.
और यह हुआ.
ओह, मैंने कहा, यह कभी नहीं होगा.
लेकिन यह हुआ.
और एक बैंगनी कुहासा धरती पर उतर आया.
पेड़ों की जड़ें ऐंठ गईं.
दुनिया दो देशों में बंट गई.
हर तस्वीर जो पहले में ली गई थी, लोगों की थी.
हर तस्वीर जो दूसरी में ली गई थी किसी को नहीं दिखाती थी.
सारी की सारी लड़कियों को नाम दिया गया :और.
सारे के सारे लड़कों को नाम दिया गया: फिर.

अमेरिकी कवयित्री मेरी रुफ़ेल की ‘जेनेसिस’ शीर्षक यह कविता प्रायः वही कहती है जो बेनेट की कविता कह रही है या शेष कविताएं जिसकी चेतावनी दे रही हैं.

तानाशाही जनतंत्र के भीतर ही, उसी के सहारे पैदा होती है. जैसे सभ्यता का दूसरा पहलू बर्बरता का है, वैसे ही जनतंत्र का दूसरा पहलू तानाशाही है. जनतंत्र की तानाशाही इसलिए भी ख़तरनाक है कि उसे खुद जनता लाती है. वह लोकप्रिय मत के सहारे सत्ता हासिल करती है.

लेकिन मसला सिर्फ़ तानाशाही का नहीं. बेनेट की कविता अंग्रेज़ी में डिक्टेटर शब्द इस्तेमाल नहीं करती. जिसका अनुवाद यहां तानाशाह आवाज़ किया गया है, वह है ‘टोटलिटेरियन वॉइस’ (Totalitarian voice). टोटलिटेरियन डिक्टेटर है, लेकिन सिर्फ़ उतना ही नहीं.

इसे समझना हो तो भारत में 19 महीनों के आपातकाल और 2014 से अब तक के काल की तुलना करनी होगी. आपातकाल में एक तरह की तानाशाही थी लेकिन वह भारत के हर तबके के लिए एक जैसी थी. 2014 के बाद जब हम तानाशाही की बात करते हैं तो उसका असर भारत के मुसलमानों पर जिस क़िस्म का है, वैसा हिंदुओं पर नहीं.

1975 से 77 के भारत में भले ही तानाशाही थी, लेकिन वह टोटलिटेरियन नहीं था जबकि 2014 के बाद का राज्य टोटलिटेरियन है. इस अंतर को समझना आवश्यक है. अपनी किताब ‘India’s Undeclared Emergency: Constitutionalism and the Politics of Resistance’ में अरविंद नारायण इस फ़र्क को समझाते हैं.

टोटलिटेरियन महत्त्वाकांक्षा ‘सत्ता सत्ता के लिए’ की इच्छा से कहीं आगे लोगों के जीवन के हरेक पहलू को नियंत्रित करने की इच्छा तक जाती है. वह यह परिभाषित करना चाहती है कि लोगों को किस भगवान की पूजा करना चाहिए, और वह पूजा कैसे की जाएगी; वे किससे प्यार कर सकते हैं और वे क्या खाना खाएं. अगर हम भाजपा शासित राज्यों में धर्मांतरण, ‘लव जिहाद’, मवेशी वध के इर्द-गिर्द पेश किए गए नए कानूनों को देखें, तो आपको टोटलिटेरियन महत्त्वाकांक्षाओं का अंदाजा हो जाएगा. देश या राष्ट्र का सम्मान तो अनिवार्य है ही, वह किसी तरह किया जाएगा, यह भी सत्ता तय करेगी.

अरविंद नारायण राजनीति शास्त्री जुआन जे. लिंज़ के हवाले से बतलाते हैं कि टोटलिटेरियन सत्ता ‘राजनीतिक जीवन और समाज को पूरी तरह से संगठित करने के लिए शासन का रूप’ है. लिंज़ के विश्लेषण में टोटलिटेरियन सरकार की महत्त्वाकांक्षाएं एक अधिनायकवादी सरकार के मुक़ाबले कहीं अधिक व्यापक और कहीं अधिक गहरी हैं.

एक टोटलिटेरियन शासन राज्य पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने भर से संतुष्ट नहीं होता. वह ‘जनता का राजनीतीकरण’ करने की कोशिश करता है और अपनी विचारधारा के सांचे में लोगों को ढालने की कोशिश करता है. इसे अपनी ताकत न केवल राज्य के लीवर पर नियंत्रण के चलते ताक़त मिलती है, लेकिन उसके आगे जाकर वह उन संगठनों मोर्चों से भी ताक़त हासिल करता है जो सामाजिक स्तर पर काम करते हैं. इन सबका उद्देश्य समाज को अपनी विचारधारा के अनुसार बदलना है.

अरविंद जो कह रहे हैं, वह इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी के शासन के बीच के अंतर से समझा जा सकता है. इंदिरा गांधी की इच्छा राज्य पर नियंत्रण की थी, लेकिन मोदी और भारतीय जनता पार्टी लोगों की, और उनमें मुसलमानों के साथ हिंदू भी शामिल हैं, जीवन पद्धति को बदल देना चाहती हैं. वह भारत की ही परिभाषा बदलना चाहती है. सिर्फ़ प्रगति मैदान नहीं, सेंट्रल विस्ता नहीं, बल्कि बनारस, अयोध्या को ही संपूर्ण रूप से परिवर्तित कर दिया जाएगा या साबरमती आश्रम का नवीकरण कर दिया जाएगा या जैसा बतलाया जा रहा है, कामरूप कामख्या मंदिर को भी नया रूप दे दिया जाएगा.

अरविंद के मुताबिक़, हिंदुत्व के उदय के साथ आज के भारत में लिंज़ के वर्णन के अनुरूप टोटलिटेरियन सत्ता काबिज हुई दिखलाई पड़ती है. मोदी के शासन को सिर्फ़ पुलिस या प्रशासन नहीं चला रहा, बल्कि हिंदुत्व की विचारधारा को माननेवाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बजरंग दल या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे सैकड़ों संगठनों की हिंसा भी चला रही है.

यह हिंसक भीड़ भारतीय राजनीतिक मंच पर एक महत्त्वपूर्ण सत्ता है. लोगों की सामान्य समझ को हिंदुत्व की सोच के अनुरूप बदलने की कोशिश की जा रही है. टोटलिटेरियन शासन का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम इसकी ‘लोकप्रियता’ है जिसमें ‘लोगों’ को देश के सामूहिक तानाशाह के रूप में स्थापित किया जाता है.

टोटलिटेरियन शासन में लोग लापता हो जाते हैं. उनका अस्तित्व नहीं रहता जैसा रुफ़ेल की कविता कहती है:

दुनिया दो देशों में बंट गई.
हर तस्वीर जो पहले में ली गई थी, लोगों की थी.
हर तस्वीर जो दूसरी में ली गई थी किसी को नहीं दिखाती थी.

लोगों का ग़ायब हो जाना एक बात है और लोगों का एक दूसरे के विरोधी दो लोगों में बंट जाना एकदम अलग बात. एक तरह की टोटलिटेरियन सत्ता, जो अभी भारत में है, ख़ुद को एक तह के लोगों का नुमाइंदा बतलाती है और उन्हें दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करती है.

टोटलिटेरियन सत्ता अपने लोगों का निर्माण करती है. उन्हें यक़ीन दिलाती है कि वह उनकी तरफ़ से शासन कर रही है. वह उनमें दूसरों के प्रति, दूसरों से संदेह और भय पैदा करती है:

मैं कभी लोगों की ताक़त का सहारा नहीं लेता.
मैं उनकी कमज़ोरियों और भय के सहारे बढ़ता हूं.
मैं उनके संदेहों को अपने सहयोगी और जासूस बना लेता हूं.

लोगों के भीतर की अच्छाई की ताक़त को यह सत्ता अपना सहारा नहीं बनाती. वह उनके डर, शक-शुबहे को गहरा करती रहती है:

असल है सारी ईर्ष्या, सारी निराशा, सारे पूर्वाग्रहों का इस्तेमाल
मेरे अपने मक़सद के लिए.
अगर तुम्हारे कोई ईर्ष्या है या कोई पूर्वाग्रह
अच्छी तरह विकसित, संपूर्ण घृणा,
मैं उससे खेलूंगा और उसे तुम्हारी तबाही के लिए इस्तेमाल करूंगा.

एक टोटलिटेरियन शासक का आधार क्या है?

मेरे जनरल हैं जनरल अविश्वास, जनरल भय, जनरल बेदिल,
जनरल बहुत-देर-हो-चुकी-है
जनरल लोभ और मेजर जनरल नफ़रत
और वे सब सिविलियन कपड़ों में घूमते हैं
तुम्हारी ही अपनी गलियों में और तुम्हारे कानों में फुसफुसाते हैं

इसे देखते हुए, बिसूरते हुए, मुंह बनाते हुए बैठे रह कर हराया नहीं जा सकता. असल सवाल है:

तो फिर तुम्हें क्या कहना है?
मेरे दांव के मुक़ाबले तुम्हारा दांव क्या है?
तुम्हारी एकजुट आवाज़ कहां है?

यह एकजुट आवाज़ ही इस टोटलिटेरियन सत्ता का मुक़ाबला कर सकती है. हर मुल्क में, हर वक्त यह जद्दोजहद चलती रहती है. उन मुल्कों में भी जो ख़ुद को इससे कतई महफ़ूज़ समझते रहे हैं. इसलिए अपने संदेहों, पूर्वाग्रहों, अपनी कमज़ोरियों को पहचानना हरेक का फर्ज है. वरना जनतंत्र के टोटलिटेरियन तंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)

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