बतौर रचनाकार मेरा समय ‘करगिल छद्म युद्ध’ से शुरू होता है. जब मैं नाल-बीकानेर में थी और एकाएक ख़बरों में करगिल उभरा. अपनी ही सीमाओं में गश्त करते हुए कैप्टन सौरभ कालिया के क्षत-विक्षत शरीर के लौटने की ख़बर के बाद जो सिलसिला शुरू हुआ वह स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के शहीद होने तक चला. हालात इतने विकट थे कि पश्चिमी सीमाओं पर रेड अलर्ट जारी हो गया था. यह वह समय था जब सैनिक परिवारों को वहां से निकलने के ऑर्डर आ गए थे. हमारे घरों के आगे छिपने के लिए खदानें खोद दी गईं, घर के कांचों पर काले पेंट होने लगे. मैं दोनों छोटी बच्चियों के साथ अपने मायके निकालने की तैयारी में थी. लेकिन मेरे मन में टीस थी, जब टीवी खोलती देश वर्ल्ड कप के पागलपन में डूबा नज़र आता, विज्ञापनों में कोला वॉर. हालांकि विक्रम बत्रा की आखिरी पुकार ‘कुछ कर दिखाना है जीत कर आना है’ थी.
लेकिन बाकी देश को कुछ नहीं पड़ी थी जलती सीमाओं की. सैनिकों के कॉन्वॉय कश्मीर और यहां-वहां डिप्लॉय हो रहे थे. बाकी सरकारी अमला तब भी देर से दफ़्तर पहुंच रहा था, लोग वैसे ही रिश्वत खाकर काम रहे थे. वो जज़्बा गायब था जब स्त्रियां सैनिकों को स्वेटर बना कर भेजा करती थीं, रेलवे-स्टेशनों पर लोग एकत्र हो कर सैनिकों का हौसला बढ़ाया करते थे.
तब मैंने ‘हंस’ बहुत बेचैन होकर एक पत्र लिखा था ‘किसकी रक्षा के लिए’. तब तक मैं अपनी कलम और लिखने को कोई प्राथमिकता नहीं देती थी, बस कविताएं लिखना और ढेर सारी साहित्यिक पत्रिकाएं मंगाना और पढ़ना. क्योंकि एयरफोर्स के अंग्रेजीदां माहौल में यही पत्रिकाएं मुझे हिंदी से जोड़े रखती थीं. उस पत्र ने इतनी खलबली मचा दी कि मुझे रोज़ दर्जनों पत्र आने लगे. खैर उसके बाद देश जागा, तत्कालीन प्रधानमंत्री ने सकारात्मक फैसले लिए और हम पर थोपा गया छद्म युद्ध, युद्ध में बदलने से टल गया.
यह वही समय था जब हिंदी, इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति के लिए भाषा वैज्ञानिकों और तकनीकी जानकारों को आपस में जोड़ने की कवायद में थी. हमारी तनख्वाह के हिसाब से दस गुना मंहगा कंप्यूटर घर आया था. मैंने कंप्यूटर तकनीक के गहरे जानकार अपने पति अंशु को पूछा, इसमें हिंदी कैसे टाइप होगी तो पता चला कि आगरा-अकबर-शुषा तरह-तरह के फॉन्ट थे. अंग्रेजी की तरह हमारे पास यूनिवर्सल फॉन्ट नहीं था.
सदी बदली. साल 2000 आ गया. अंशु ने कंप्यूटर और हिंदी में मेरी सहज रुचि जानकर मुझे हिंदी की पहली वेब-पत्रिका हिंदीनेस्ट के लिए प्रोत्साहित किया. फ्रंटपेज इस्तेमाल कर हमने पत्रिका आरंभ की. हिंदी और प्रौद्योगिकी को निकट लाने के लिए बहुत से जागरूक लोग हमारे इस अभियान में आ जुड़े.
तो मेरे उभरते लेखक ने बदलते समय को देखा. जब लग रहा था कि हिंदी किताबें और पत्रिकाएं मर जाएंगी तभी इंटरनेट एक वरदान की तरह उभरा और आज देखा जाए तो हिंदी निश्चित तौर पर वैश्विक बन चुकी है. किसी भी रचनाकार का समय केवल वही नहीं होता जिसमें वह रच रहा होता है, वह भी होता है जिसने उसे बनाया होता है.

जिस प्रौद्योगिकी युग ने नए मिलेनियम में भारत के विकास को रफ़्तार दी थी, मुझे याद है अपनी युवावस्था के राजीव गांधी के भाषण, जिसमें वे कहते थे, हमने इंडस्ट्रियल टैक्नोलॉजी की एक बस छोड़ दी है इसीलिए अब इलेक्ट्रॉनिक्स की बस मिस नहीं कर सकते, इसे दौड़ कर पकड़ना होगा. और यह देश सचमुच दौड़ा है और आज हम बाकी विश्व के साथ ही नहीं चल रहे, बल्कि वैश्विक रफ़्तार में भारतीय कंप्यूटर वैज्ञानिकों का अहम योगदान है.
बतौर रचनाकार मेरे लिए यह पर्यावरण के भीषण संकट का भी समय है. इस सदी में हमने सैकड़ों प्रजातियां, वनस्पतियां और जीव-जंतु सदा के लिए खो दिए हैं. मगर हिंदी जगत इस विषय पर अक्सर मौन रहता है. हाथियों और मनुष्यों के आपसी संघर्ष को मैंने हाल ही में अपने उपन्यास त्रिमाया में लिखा है. वह प्रौद्योगिकी मेरे लिए विध्वंसक है जो प्रकृति विनाशक हो, मगर इसी प्रौद्योगिकी ने पर्यावरण संरक्षण को भी कुछ तो सुरक्षा दी है.
पर्यावरण पर प्रौद्योगिकी के नकारात्मक प्रभाव के बावजूद, जलवायु परिवर्तन के लिए वैश्विक चिंता में हाल ही में वृद्धि ने नई पर्यावरण प्रौद्योगिकी के विकास को जन्म दिया है, जिसका उद्देश्य अधिक टिकाऊ, कम कार्बन- अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव के माध्यम से हमारे सामने आने वाली कुछ सबसे बड़ी पर्यावरणीय चिंताओं को हल करने में मदद करना है.
मैं क्योंकि वैज्ञानिक सोच की हिंदी लेखिका हूं, सो मेरी विचार-प्रक्रिया विश्लेषणात्मक है ना कि किसी एक वाद के पीछे भागते हुए इकहरी. मैं फेमिनिज़्म के भी इकोफेमिनिज़्म पक्ष के प्रति अधिक झुकती हूं. हम स्त्रियां हैं, हमारा संबंध धरती से कहीं गहरा है. हमारी पुरखिनों ने चावल भी वहां फटके हैं, जिस आंगन में गौरेया आती हैं.
आज का समय स्त्री के आत्मनिर्भर होने का है तो यही समय उस पर सोशल मीडिया के दबावों का भी है. यह समय और जटिल तब हो जाता है जब यह सोशल मीडिया उसकी निजता में घुसपैठ करता है, हमले करता है. तब मानसिक अवसाद, दबाव और उत्तेजना, आक्रामकता जन्म लेती है. ऊपर से मज़बूत दिखती स्त्री भीतर से कितनी किर्च-किर्च है, उसके मनोजगत की स्लाइस काटकर कथा में दिखाने और विश्लेषित करने का समय है. इस पल उसे नारों की ज़रूरत कम, समझे जाने की ज़रूरत अधिक है. मोटी तनख्वाह के पीछे भागने की जगह एक पढ़ी-लिखी स्त्री जब थोड़े कम लाभ के साथ फ्रीलांस काम या वर्क फ्रॉम होम करती है, टूटे और खराब दाम्पत्य से निकलती है, विवाह नहीं करना चाहती, विवाह कर मां नहीं बनना चाहती, तो अब समय है कि उसके फ़ैसलों का सम्मान किया जाए.
हमारी पीढ़ी ने बदलता समय देखा है. कलाओं के संसार को, सिनेमा को बदलते देखा है. थियेटर में ज़रूरी प्रयोगात्मक बदलाव हुए. लेकिन एक बात जो मैं शिद्दत से महसूस करती हूं वह यह कि-एक समय था जब लेखक के सरोकारों में दूसरी कलाएं और मित्र मंडल में अन्य कलाओं के कलाकार होते थे. मसलन मोहन राकेश और अलकाज़ी, निर्मल वर्मा और स्वामीनाथन, कृष्ण बलदेव वैद साहब और राम कुमार, अशोक वाजपेयी और रज़ा साहब, कृष्ण खन्ना, और ये सभी एक दूसरे को नियमित पत्र लिखते थे और अपने संस्मरणों में ज़िक्र किया करते थे. पर आज लेखक केवल अपनी विधा तक केंद्रित हो गए हैं.
कविता और कहानी के बीच भी फांक आ गई है. ऐसे में मैंने कथक नर्तकी और आचार्य प्रेरणा श्रीमाली जी, मालिनी अवस्थी और विश्व-प्रसिद्ध चित्रकार अखिलेश जी के साक्षात्कार लेकर इस दूरी को अपने लिए मिटाया था. मैंने और अखिलेश जी ने पत्र-व्यवहार आरंभ किया था- ये पत्र अपने समय को पकड़ते हैं, अपने समय पर विचार करते हैं. मुझे लगता है यह परंपरा फिर आरंभ होनी चाहिए. लेखक को अपने दायरे से निकलना चाहिए तभी वह ठीक तरह से अपने समय को पकड़ेगा.
हमें न केवल अपने समय के कलाकारों, फिल्मकारों से बौद्धिक तौर पर जुड़ना चाहिए बल्कि वैज्ञानिकों,अर्थशास्त्रियों, पुराविदों, इतिहासकारों, नृतत्त्वशास्त्रियों, कानूनविदों, मनोविश्लेषकों, पर्यावरण समर्थकों, पॉलिसी नियामकों से भी संवाद बनाना चाहिए और उस संवाद को सामने लाना चाहिए. मैं देखती हूं रज़ा फाउंडेशन का यह प्रयास अनवरत रहता है. अशोक वाजपेयी युवा रचनाकारों को प्रोत्साहित भी करते हैं इस संवाद के लिए.
बाकी हर समय की अपनी विडंबनाएं, अपने सकारात्मक पक्ष होते हैं. आज हम एक क्लिक पर अपनी रचनाएं किसी भी पत्रिका को भिजवा देते हैं, यह सुख पहले कहां था? आज हम फ़ोन में बीस किताबें साथ लिए चल सकते हैं. मैं इस संक्रमण काल में परिपक्व हुई लेखक हूं तो मुझे किताब के पन्नों की ख़ुशबू भी प्रिय है तो फोन या टैब में अपनी प्रिय किताबें लेकर चलना और कहीं भी पढ़ने की सहूलियत भी. मुझे पत्र पाना भी पसंद है तो ईमेल पर तुरंत मिली प्रतिक्रियाएं भी. मैं तेज़ी से बदले वक्त की प्रत्यक्षदर्शी कथाकार हूं. मुझे वर्तमान यथार्थ भी लिखना प्रिय है तो नॉस्टैल्जिक होकर बीते समय को भी रचना.
यह समय भी उतना ही अच्छा और उतना ही विकट भी है, जितने इस धरती पर आए-गए समय रहे होंगे. हम इसे रेशा-रेशा अपनी अभिव्यक्ति में जितना पकड़ पाएं, वही बतौर रचनाकार हमारा समय है.
(मनीषा कुलश्रेष्ठ वरिष्ठ लेखिका हैं.)
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