नई दिल्ली: केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोमवार (10 मार्च) को संसद को बताया कि उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में महाकुंभ के दौरान स्नान के लिए सभी जगहों के पानी की गुणवत्ता तय मापदंड की ‘सीमा के भीतर’ थी. इस दौरान भूपेंद्र यादव ने 28 फरवरी को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) को सौंपी गई केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की व्यापक रिपोर्ट का हवाला दिया.
मालूम हो कि इससे पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जल गुणवत्ता परीक्षणों का हवाला देते हुए कहा था कि इलाहाबाद सहित कई स्थानों पर गंगा का जल स्नान के लिए उपयुक्त नहीं है. एनजीटी को सौंपी गई इस रिपोर्ट में कहा गया था कि फीकल कोलीफॉर्म का स्तर बहुत अधिक है. यह रिपोर्ट महाकुंभ (13 जनवरी से 26 फरवरी) के बीच 3 फरवरी को आई थी.
हालांकि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीपीसीबी के 3 फरवरी के निष्कर्षों का खंडन करते हुए दावा किया था कि गंगा का जल स्नान करने और अनुष्ठान के लिए उपयुक्त है.
अपनी रिपोर्ट से पलटा सीपीसीबी
द वायर द्वारा देखी गई 28 फरवरी की सीपीसीबी की नवीनतम रिपोर्ट, जिसे एनजीटी को सौंपा गया है, में सीपीसीबी ने कहा है कि 12 जनवरी से 22 फरवरी तक गंगा और यमुना में कई स्थानों पर पानी स्नान के लिए उपयुक्त था.
सीपीसीबी ने पानी के पीएच, घुलित ऑक्सीजन, जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग और फीकल कोलीफॉर्म (पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए सभी महत्वपूर्ण पैरामीटर) के लिए औसत मूल्यों का हवाला दिया है. ये सभी मान तय सीमा के भीतर आते हैं.
सीपीसीबी के अनुसार, यह 12 जनवरी से 22 फरवरी तक सप्ताह में दो बार सात स्थानों – गंगा में पांच और यमुना में दो पर पानी की गुणवत्ता की निगरानी के साथ-साथ 21 फरवरी और 22 फरवरी को इलाहाबाद में गंगा में तीन और स्थानों पर पानी की गुणवत्ता की निगरानी पर आधारित था.
विशेष रूप से, रिपोर्ट में उद्धृत फीकल कोलीफॉर्म की औसत दर संगम पर प्रति 100 मिली लीटरलीटर 1,700 एमपीएन (सबसे संभावित संख्या), इन दिनों निगरानी किए गए सभी सामूहिक स्नान स्थानों पर 1,700 और सभी 10 निगरानी स्थानों के लिए 1,400 है (जिनमें से तीन स्थानों के लिए डेटा केवल दो दिनों के लिए एकत्र किया गया था).
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘उपर्युक्त सांख्यिकीय विश्लेषण के अनुसार, निगरानी वाले हिस्सों के लिए पीएच, डीओ, बीओडी और एफसी की औसत दर स्नान के पानी के लिए संबंधित मानदंड/स्वीकार्य सीमा के भीतर है.’
देखा जाए तो स्पष्ट रूप से सीपीसीबी अब अपने पिछले निष्कर्षों से पीछे हट गया है.
सीपीसीबी ने 3 फरवरी को एनजीटी को अपनी रिपोर्ट में फीकल कोलीफॉर्म के जो स्तर सूचीबद्ध किए थे, वे उनकी अपेक्षा से लगभग बीस गुना अधिक थे.
उदाहरण के लिए इलाहाबाद के संगम घाट पर कुल फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 12 जनवरी को 4,500 और 2,000 एमपीएन/100 मिली लीटर से बढ़कर 14 जनवरी को 49,000 और 11,000 एमपीएन/100 मिली लीटर हो गया. यह फिर से 19 जनवरी को कुल कोलीफॉर्म स्तर 7,00,000 एमपीएन/100 मिली लीटर और फीकल कोलीफॉर्म स्तर 49,000 एमपीएन/100 मिली लीटर तक बढ़ गया. ये औसत आंकड़े नहीं थे.
उस रिपोर्ट में सीपीसीबी ने कहा था कि नदी के पानी की गुणवत्ता विभिन्न अवसरों पर सभी निगरानी स्थानों पर फीकल कोलीफॉर्म के संबंध में स्नान के लिए प्राथमिक जल गुणवत्ता के अनुरूप नहीं थी. इस रिपोर्ट में कुंभ के दौरान इलाहाबाद में स्नान करने वाले लोगों की ‘बड़ी संख्या’ को फीकल कोलीफॉर्म के स्तर की वृद्धि के लिए जिम्मेदार बताया गया था.
हालांकि, 28 फरवरी को एनजीटी को दी गई सीपीसीबी की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, जल गुणवत्ता मापदंडों में अंतर का कारण ‘डेटा में बदलाव होते रहना’ है.
इसमे कहा गया है, ‘…विभिन्न मापदंडों के मूल्यों में महत्वपूर्ण परिवर्तनशीलता है, जैसे कि पीएच, घुलित ऑक्सीजन (DO), बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) और अलग-अलग तिथियों पर एक ही स्थान से लिए गए नमूनों के लिए फीकल कोलीफॉर्म काउंट. उपर्युक्त मापदंडों के मान एक ही दिन एकत्र किए गए नमूनों के लिए अलग-अलग स्थानों पर भिन्न होते हैं.’
रिपोर्ट के अनुसार, सीपीसीबी की एक ‘विशेषज्ञ समिति’ ने ‘डेटा में परिवर्तनशीलता के मुद्दे की जांच की’ और उनका मानना था कि डेटा केवल ‘किसी विशिष्ट स्थान और समय पर पानी की गुणवत्ता का एक स्नैपशॉट’ दर्शाता है और ‘नदी की समग्र विशेषताओं का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है’.
मालूम हो कि संसद में समाजवादी पार्टी के सांसद आनंद भदौरिया और कांग्रेस सांसद के. सुधाकरन के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सीपीसीबी की इस ‘व्यापक’ रिपोर्ट से कुछ विवरण साझा किए.
हालांकि, उनके सवालों में यह भी शामिल था कि क्या ‘सीपीसीबी ने हाल ही में कोई रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया हो कि सभी निगरानी स्थानों पर फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 2,500 यूनिट प्रति 100 मिली लीटर की तय सीमा से ऊपर था, जो महत्वपूर्ण सीवेज से पानी के दूषित होने को दर्शाता है, यदि ऐसा है, तो इसका विवरण और यदि नहीं, तो इसके कारण.’
भूपेंद्र यादव के जवाब में सीपीसीबी की 3 फरवरी की रिपोर्ट का कोई उल्लेख नहीं था, जिसमें फीकल कोलीफॉर्म के उच्च स्तर की जानकारी दी गई थी. उनके जवाब में केवल 28 फरवरी की सीपीसीबी रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जो अलग-अलग स्थानों के लिए अलग-अलग तारीख पर तय सीमा में सभी जल गुणवत्ता मापदंडों के लिए औसत देती है और दिखाती है कि सभी तय सीमाओं के भीतर थे.
अपने जवाब में पर्यावरण मंत्री ने संसद को यह भी बताया कि भारत सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 से 3 मार्च 2025 तक राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के लिए कुल 7,421.60 करोड़ रुपये जारी किए हैं, जिसके तहत जून 2014 से भाजपा के सत्ता में आने के बाद से नदी के ‘कायाकल्प’ के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया गया है. इसी अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश को गंगा की सफाई के लिए 2,500 करोड़ रुपये से अधिक मिले हैं.
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