सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश का मक़सद यह था कि नोटिस देने के बाद, सुनवाई करके और विधि सम्मत प्रक्रिया अपनाकर ही किसी तरह की ध्वस्तीकरण कार्रवाई या तोड़-फोड़ की जाए, न कि न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन कर के. फिर भी भाजपा शासित राज्य सरकारों ने- और कुछ कम मामलों में ही सही लेकिन पंजाब तथा कर्नाटक की विपक्षी सरकारों ने भी- बार-बार इस आदेश का उल्लंघन किया है, जिसे सीमित रूप से लागू किया गया है और पीड़ितों, यानी ज़्यादातर मुस्लिमों को कभी-कभार ही मुआवज़ा दिया गया है.
छह लेखों की श्रृंखला का यह पांचवा लेख यह बताता है कि जैसे-जैसे बुलडोज़र राजनीतिक शक्ति का प्रतीक बन गए हैं, अब सज़ा के तौर पर तोड़-फोड़ को वैध बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. इस श्रृंखला का पहला, दूसरा , तीसरा और चौथा लेख यहां पढ़ सकते हैं.
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नई दिल्ली: सालों से चुनिंदा तरीके से संपत्ति को ढहाकर सज़ा देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आख़िरकार 9 नवंबर 2024 को सरकारों को आदेश दिया कि वे बिना क़ानूनी प्रक्रिया- जिसमें पहले से नोटिस देना और सुनवाई करना शामिल है – के संपत्ति को न गिराएं. मगर अब यह एक ऐसा आदेश बनकर रह गया है जिसका बार-बार उल्लंघन किया जा रहा है – ख़ासकर इसलिए क्योंकि पिछले पांच सालों में कार्यपालिका द्वारा ऐसे मामले को सुलझाने की अनिच्छा और तोड़-फोड़ को वैचारिक आधार मिल गया है.
न्यायालय का निर्णय बिल्कुल स्पष्ट था, जिसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया कि मकान-दुकान आदि को गिराने से पहले क़ानून की उचित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए. अदालत द्वारा कार्यपालक अधिकारियों द्वारा ‘बुलडोज़र न्याय’ के नाम पर चलाई जा रही अतिरिक्त न्यायिक प्रक्रिया की आलोचना की गई.
न्यायालय ने कहा कि बिना अनुमति के किए गए निर्माण, नियमों के उल्लंघन आदि के आधार पर किसी भवन को गिराए जाने से पहले 15 दिन का नोटिस दिए बिना गिराने की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा जाना चाहिए और संपत्ति पर चिपकाया जाना चाहिए, और गिराने की वीडियोग्राफ़ी होनी चाहिए. इस प्रक्रिया का उल्लंघन किए जाने पर न्यायालय की अवमानना के तहत कार्रवाई की जा सकती है.
तत्कालीन मुख्य न्यायधीश बीआर गवई ने इस बात को रेखांकित किया था कि एक घर ‘एक परिवार की स्थिरता, सुरक्षा और भविष्य की मिली-जुली उम्मीदों को आसरा होता है’ और अधिकारियों को ख़ुद को यह यक़ीन दिलाना होगा कि घर गिराना ही एकमात्र विकल्प है. न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कार्यपालिका किसी को दोषी ठहराकर और उनके मकान गिराकर न्यायिक शक्ति को अपने हाथ में नहीं ले सकती, जो क़ानून के राज और संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन होगा.
न्यायालय ने शक्ति के बंटवारे के सिद्धांत को भी दोहराते हुए यह भी कहा था कि सरकार ख़ुद को जज नहीं बना सकती जो बिना ट्रायल के किसी आरोपी को दोषी ठहराए और बुलडोज़र से घरों को तोड़कर ‘सामूहिक दंड’ दे. ‘हमारे हिसाब से बेगुनाह लोगों के सिर से छत छीनकर उनके जीने के अधिकार से उन्हें वंचित करना पूरी तरह से ग़ैर-संवैधानिक होगा.’
लक्ष्य से भटकना
न्यायालय के ज़रूरी निर्देशों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय शामिल थे: 15 दिन पहले नोटिस देना, जिसमें बिना इजाज़त के निर्माण और ख़ास उल्लंघनों की जानकारी हो; राज्य की कार्रवाई को चुनौती देने के लिए सुनवाई का मौक़ा; आदेश में तार्किक निष्कर्ष, और तोड़-फोड़ की वीडियोग्राफ़ी.
ये दिशानिर्देश, असल में जिसमें किसी तरह की छूट नहीं दी गई थी, काफ़ी हद तक लंबे समय से चले आ रहे न्यायिक आदेशों से मिलती-जुलती थीं, राज्य सरकारें और नगर निगम जिनका लगातार उल्लंघन करती हैं और इसके नतीजे की उन्हें कोई चिंता नहीं होती है.

जैसा कि इस शृंखला के पिछले लेखों में बताया गया है कि भाजपा शासित राज्य सरकारों को मुसलमानों की संपत्ति को बिना किसी क़ानूनी कार्रवाई के निशाना बनाने से रोकने में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश पहले ही नाकाफ़ी साबित हुए हैं. भाजपा और आम आदमी पार्टी की सरकारों द्वारा बार-बार नाफ़रमानी करने पर न्यायालय द्वारा सज़ा देने से इनकार, और वैचारिक आधार पर तोड़-फोड़ किए जाने पर चुप्पी, एक बड़ी कमी बनी हुई है.
न्यायालय के निर्देशों के साथ मुख्य समस्या यह है कि वे इस बात को चिह्नित नहीं करते हैं कि हालिया तोड़-फोड़ की घटनाओं के पीछे एक वैचारिक आधार है. इन अभियानों में जो पक्षपात साफ़ दिखता है, वह सिर्फ़ ग़रीब विरोधी नहीं, बल्कि सांप्रदायिक रहा है. हालांकि न्यायालय ने संक्षेप में कहा था कि कुछ संरचनाओं को चुनकर गिराना और वैसी ही जगहों पर बने अन्य इमारतों को छोड़ देना, जानबूझकर गलत इरादे से की गई कार्रवाई का संकेत हो सकता है, लेकिन उसने सांप्रदायिक रूप से निशाना बनाने को मान्यता नहीं दी.
इरादों के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ यही ज़िक्र किया था: ‘जब किसी ख़ास संरचना को अचानक गिराने के लिए चुना जाता है, और उसी के आस-पास के बाक़ी वैसे ही इमारतों को छुआ तक नहीं जाता, तब लगता है कि इसके पीछे कोई ग़लत नीयत हो सकती है.’
हालांकि, न्यायालय का आदेश बुलडोज़र के गैर-क़ानूनी ग़लत इस्तेमाल की बात तो करता है, लेकिन यह उस राजनीतिक कार्यपालिका को सज़ा नहीं देता या उस पर रोक भी नहीं लगाता जिसने बार-बार अपने संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन किया है.
इसमें ग़ैर-क़ानूनी तरीके से तोड़-फोड़ की पहली की घटनाओं के लिए कोई राहत, मुआवज़ा या सज़ा नहीं नज़र आती है. इन दिशानिर्देशों में भविष्य में तोड़-फोड़ की कार्रवाई के लिए अधिकारियों से लागत वसूलने की बात कही गई है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया है.
फिर भी, न्यायालय ने तोड़-फोड़ के पीछे की वैचारिक सोच को रेखांकित नहीं किया, जो मुसलमान और ईसाई अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने की कोशिश करती है, इसके लिए हेट क्राइम, रोज़ी-रोटी पर हमले और बुलडोज़र से तोड़-फोड़ के ग़ैर-न्यायिक सज़ा का इस्तेमाल करती हैं. बुलडोज़र, जिन्हें सार्वजिक रूप से सबक़ सिखाने और स्टेट की सोच का ज़रिया माना जाता है, असली या मनगढ़ंत अपराधों, जैसे कि कथित गोहत्या, लव जिहाद, या धर्म परिवर्तन की सज़ा देते हैं.

न्यायिक रिकॉर्ड
मोदी सरकार के कार्यकाल में कुछ ही न्यायालयों के दख़ल ने सीधे तौर पर तोड़-फोड़ के सांप्रदायिक प्रकृति के बार में खुलकर कहा है.
इस संबंध में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सवाल किया कि क्या 2023 में हरियाणा के नूंह में हुई तोड़-फोड़ असल में ‘एथनिक क्लींजिंग’ थी, यह देखते हुए कि गृह मंत्री ने जांच पूरी होने से पहले ही तोड़-फोड़ को ‘इलाज’ कहा था. हरियाणा सरकार ने किसी भी प्रकार के एथनिक या धार्मिक वजह से इनकार किया और दावा किया कि सभी प्रक्रिया का पालन किया गया था. केस की सुनवाई करने वाली बेंच को अगली सुनवाई से पहले बदल दिया गया.
द हिंदू और हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकीय में भी इन चिंताओं को दोहराया गया, जिसमें तय प्रक्रियाओं के उल्लंघन और सांप्रदायिक आधार पर निशाना बनाए जाने की ओर इशारा किया गया.
मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट के जज उज्जल भुइयां ने बुलडोज़र से मकानों-दुकानों आदि को ढाहने को ‘संविधान पर बुलडोज़र चलाना’ बताया, था जो क़ानून के राज के लिए ख़तरा है. नवंबर 2024 के आदेश में पहले ही कहा गया था, ‘क़ानून के राज में बुलडोज़र से न्याय बिल्कुल मंज़ूर नहीं है… बुलडोज़र से न्याय किसी भी सभ्य न्याय व्यवस्था में नहीं है.’
भुइयां ने एक सार्वजनिक आयोजन में कहा था, ‘मेरे हिसाब से किसी प्रॉपर्टी को गिराने के लिए बुलडोज़र का इस्तेमाल करना संविधान पर बुलडोज़र चलाने जैसा है. यह क़ानून के राज की अवधारणा को ही नकारना है और अगर इसे रोका नहीं गया, तो यह हमारी न्याय व्यवस्था की नींव को ही ख़त्म कर देगा.’
फिर भी, जैसा कि मैंने पहले लिखा है, ‘भाजपा शासित राज्यों की सरकारें इन आदेशों का उल्लंघन करती रही हैं इन्हें किसी बात की चिंता भी नहीं होती है. जब स्टे दिए जाते हैं, तब तक बहुत नुक़सान हो चुका होता है. जैसा कि अशोका यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंटिस्ट अली ख़ान महमूदाबाद ने टाइम मैगज़ीन को बताया था कि ‘जब तक तोड़-फोड़ पर रोक लगाने का ऑर्डर आता है, तब तक बहुत कुछ तबाह हो चुका होता है; पहले ही बहुत नुक़सान हो चुका होता है.’
आदेश लागू करने की अपील
कई वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से अपने ही आदेशों को लागू करने की अपील की है.
दिल्ली के एक वकील सारिम नावेद ने मार्च 2025 में स्क्रॉल को बताया था, ‘ये लगातार तोड़-फोड़ न्यायालय को यह बताने की कोशिश है कि वे मायने नहीं रखते- कि क़ानून का राज मायने नहीं रखता.’
नावेद ने एक याचिका पर बहस की थी, जिसकी वजह से 13 नवंबर का सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया. उन्होंने सुझाव दिया कि न्यायालय अवमानना के लिए जुर्माना, पीड़ित को मुआवज़ा और फिर से भवन बनाने का आदेश दे.
दिल्ली के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड पारसनाथ सिंह, जिन्होंने अहमदाबाद के उन मुसलमानों की ओर से न्यायालय में याचिका दायर की थी जिनकी संपत्तियां गिराई गईं, ने मार्च 2025 में मिंट को बताया था, ‘ये तोड़-फोड़ दिखाता है कि राज्य सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उचित सम्मान नहीं कर रहा है. क़ानून के राज वाले लोकतंत्र में इस बात की छूट की इजाज़त नहीं दी जा सकती.’
यह पूछे जाने पर कि कार्यपालिका सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन क्यों कर रहा है, सिंह ने कहा; ‘सुप्रीम कोर्ट को आदेश लागू करना चाहिए. अगर न्यायालय गंभीर नहीं हो सकती है, तो आप सरकार से गंभीर होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?’

सीमित सुरक्षा
कभी-कभी, न्यायालय ने तोड़-फोड़ पर रोक लगाई है:
– उत्तराखंड: मई 2025 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सांप्रदायिक हिंसा के बाद तोड़-फोड़ पर रोक लगा दी थी क्योंकि कोई भी क़ानून कथित अपराधों के लिए संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने की इजाज़त नहीं देता है.
– नागपुर: मार्च 2025 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के मक़बरे के पास हुई घटना की वजह से फैले सांप्रदायिक तनाव के बाद आगे की तोड़-फोड़ पर रोक लगा दी थी.
ऐसा बहुत कम होता है, मगर अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर अतीक़ अहमद से जुड़ी संपत्तियों को ग़ैर-क़ानूनी तरीके से गिराने की आलोचना की और हर पीड़ित को सरकारी ख़जाने से 10 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, मगर इसके लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों से किसी तरह का कोई हर्जाना नहीं वसूला गया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अहमद की संपत्तियों को गिराने से ‘चौंकाने वाला और ग़लत संदेश’ गया. सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति पर सिर्फ़ एक नोटिस चिपकाने की प्रक्रिया की भी आलोचना की. न्यायालय के अनुसार, ‘ऐसा नहीं हो सकता कि जिस व्यक्ति को नोटिस देने का काम सौंपा गया है, वह उस पते पर जाए और जब उसे पता चले कि उस दिन संबंधित व्यक्ति मौजूद नहीं है और वह नोटिस चिपका दे.’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘ऐसे मामले हमारी अंतरात्मा को झकझोर देते हैं.’
फिर भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दख़ल देने से इनकार कर दिया और मामले को उच्च न्यायालय के पास भेज दिया, जिससे न्याय में देरी हुई है और राज्यों को तोड़-फोड़ की कार्रवाई जारी रखने का मौक़ा मिल गया. कुछ उदाहरण: उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र.
सितंबर 2025 में बरेली में हुई हिंसा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर 2025 को दो घरों को गिराने पर रोक लगाने से मना कर दिया, और इस दावे को ख़ारिज कर दिया कि राज्य सरकार ‘निशाना बनाकर’ तोड़-फोड़ अभियान चला रही है.
न्यायालय ने कहा, ‘न्यायालय पहले ही एक विस्तृत फ़ैसला दे चुका है. उच्च न्यायालय जाएं और उस फ़ैसले का लाभ उठाएं.’
इसी तरह, 20 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया जिसमें आरोप लगाया गया था कि महाराष्ट्र के अधिकारियों ने सिर्फ़ एक दिन का नोटिस देकर उसके पहले के निर्देशों का उल्लंघन किया था.
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा, ‘आप उच्च न्यायालय क्यों नहीं जाते? हम यहां हर चीज़ को मॉनिटर नहीं कर सकते. हमारे नवंबर 2024 के आदेश में कहा गया है कि यह फ़ैसला सरकारी सड़कों पर बने स्ट्रक्चर पर लागू नहीं होता. अगर आपने हमें सैंक्शन प्लान दिखाया होता, तो हम इस पर विचार करते…’
3 मार्च 2025 को उसी बेंच ने गुजरात में कथित सज़ा के तौर पर की गई तोड़-फोड़ पर संबंधित अवमानना याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया, और याचिकाकर्ता को गुजरात उच्च न्यायालय जाने को कहा.
जजों ने कहा, ‘हम इस न्यायालय में मौजूदा याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार नहीं हैं. हम उच्च न्यायालय से अपील करते हैं कि अगर शिकायतकर्ता उच्च न्यायालय जाता है तो उसकी शिकायत पर जल्द से जल्द ध्यान दिया जाए.’
सज़ा के तौर पर तोड़-फोड़ को क़ानूनी बनाना
अब सज़ा के तौर पर तोड़-फोड़ के औपचारिक क़ानून बनाने की कोशिशें हुई हैं.
राजस्थान ग़ैरक़ानूनी धर्मांतरण निषेध बिल, 2025, जिसे सितंबर 2025 में उस राज्य की विधानसभा ने पास किया था और 8 अक्टूबर 2025 को गवर्नर की मंज़ूरी के बाद विधिवत रूप से क़ानून बना, ‘ग़ैर-क़ानूनी’ धर्मांतरण कराने वालों की संपत्तियों को तोड़ने की इजाज़त देता है.
अक्टूबर 2025 में आर्टिकल 14 द्वारा किए गए विश्लेषण में कहा गया है कि नया क़ानून, ‘किसी भी व्यक्ति’ के आरोपों के आधार पर आपराधिक केस, उम्रक़ैद, और बिना सज़ा के संपत्ति ज़ब्त करने और गिराने की इजाज़त देता है, जो क़ानून से परे और ग़ैर-क़ानूनी कामों के लिए क़ानूनी संरक्षण प्रदान करता है.
सामूहिक दंड के ये राजनीतिक संकेत जारी हैं: 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घोषणा की कि पहचाने गए ‘माफ़ियाओं’ के लिए ‘बुलडोज़र तैयार है’.
चौधरी सबसे ताज़ा उदाहरण हैं जिन्होंने संकेत दिया कि उनकी पार्टी और सरकार बुलडोज़र को मज़बूत, निर्णायक प्रशासन का सबसे बड़ा प्रतीक मानने में ख़ुद को संविधान, क़ानून और न्यायालय से बँधा हुआ नहीं मानती.
‘बुलडोज़र ने ख़ुद को बदला’
किसी भी सरकारी अधिकारी को क़ानून का उल्लंघन करते हुए संपत्ति गिराने के लिए निजी रूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया है, न ही गिराई गई संपत्ति का ख़र्च उनसे वसूला गया. मुआवज़ा सरकारी ख़जाने से दिया जाता है. द पोलिस प्रोजेक्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के असर पर ध्यान दिया: ‘सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा के तौर पर तोड़-फोड़ की कार्रवाई पर रोक नहीं लगाई- अधिक से अधिक उसने बस नियम बनाए जिसके तहत अब यह सब हो रहा है. बुलडोज़र पीछे नहीं हटा, उसने ख़ुद को बदल लिया है.’
एक्टिविस्ट कविता कृष्णन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश वाले दिन भी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने चुनावी रैलियों में बुलडोज़र को शासन के निशान के तौर पर दिखाया, जो प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विपक्षी नेताओं को ‘बुलडोज़र चलाना’ सिखाने वाली बात की याद दिलाता है. आदित्यनाथ ने कहा था, ‘सिर्फ़ वही बुलडोज़र चला सकता है जिसका ‘दिल और दिमाग़’ बुलडोज़र जितना मज़बूत हो. जो लोग दंगाइयों के सामने झुक जाते हैं, वे बुलडोज़र नहीं चला सकते.’
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है. लेख के लिए उमैर ख़ान ने शोध सहायता की है. इस लेख के लिए डायसपोरा इन एक्शन फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स से सहयोग मिला है.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
