‘वर्तमान समय में कविता का संकट’ विषय पर बोलने के लिए मुझे एक बार आमंत्रित किया गया था. बाद में किन्हीं कारणों से वह कार्यक्रम रद्द हो गया. मैंने राहत महसूस की थी कि वहां बोलने नहीं जाना पड़ा. इस विषय ने मुझे ऐसे प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया था, जो मुझे लगातार परेशान करता है.
वर्तमान के संकट पर विचार करने के लिए ‘वर्तमान’ का होना भी ज़रूरी है. अतीत का व्यक्ति वर्तमान की समस्या पर कैसे विचार कर सकता है? मैं जिस आदिवासी इलाक़े से आता हूं, उसे पिछड़ा हुआ मानती है बाक़ी दुनिया. जीविका के लिए जहां रहने को मजबूर हूं, वहां हर पल मुझे ‘अतीत’ से होने का अहसास होता है. ऐसे में ‘पीछे छूटी हुई दुनिया’ से, मुझे ‘आगे बढ़ चुकी एक दुनिया में’ लोगों से मुख़ातिब होना होता है.
व्यक्तिगत अनुभव यह है कि जब भी इस ‘आगे’ बढ़ चुकी दुनिया को देखता हूं, यहां पेड़ कम दिखते हैं, नदियां या तो मर चुकी हैं या कराहती हुई दिखती हैं, औरतें पुरुषों पर निर्भर दिखती हैं. जातियों में विभाजित यहां का ‘समाज’, ‘ज्ञान’ के अहंकार से लदा हुआ दिखता है. श्रेष्ठता के अहंकार में डूबता-उतराता यह समाज हिंसा-कटुता के पक्ष में प्रत्यक्ष-परोक्ष ढंग से खड़ा दिखता है. ऐसे में सवाल यह है कि मैं जब अपने आदिवासी गांव से निकलकर इस दुनिया में आता हूं, तो क्या अतीत से निकलकर सीधे भविष्य में प्रवेश कर जाता हूं ? जिसे वर्तमान कहा जाता है, वह मुझे वर्तमान से ज़्यादा आशंकाओं-त्रासदियों से भरे भविष्य की तरह दिखता है. तब वर्तमान क्या आशंकाओं से भरे भविष्य का ही नाम है? अतीत और भविष्य के बीच वह वर्तमान कहां है, जिसे सुनहरा बनाने के लिए तमाम क़वायदें चल रही हैं.
‘नदियां नहीं लौटीं तो ख़ुशियां लौट कर कभी नहीं आएंगी’
पेड़ों का कम होना, नदियों में पानी नहीं होना, पहाड़ों का धीरे-धीरे स्मृति होते जाना, वह भविष्य ही तो है जिससे हम डरते हैं. तमाम इन्श्योरेंस के माध्यम से स्वयं और अपने परिवार को ‘इन्श्योर्ड’ करने वाली पीढ़ी के लिए, यह समझना इतना मुश्किल क्यों है कि नदियां नहीं लौटीं तो ख़ुशियां लौट कर कभी नहीं आएंगी. न हम सुरक्षित रह पायेंगे और न वर्तमान भी ख़ुद को आशंकाओं से भरे बदनसीब भविष्य में तब्दील होने से बचा पाएगा.
दूसरी तरफ़ वे लोग जो इस धरती से प्यार करते हैं, जिन्हें अपनी प्रकृति और परिवेश से सच्चा लगाव है, वे अपने ‘अतीत’ में रहकर ‘वर्तमान’ को सुंदर बनाना चाहते हैं. उन्हें ज़बरदस्ती एक और ‘वर्तमान’ में रहने को मजबूर किया जा रहा है. वह वर्तमान जो सिर्फ़ कुछ लोगों का है, जिसमें वर्तमान नहीं बल्कि वह भविष्य मौजूद है जो हमें लगातार डराता है. उनका यह डर सिर्फ़ अपना नहीं है, बल्कि यह डर उस धरती के लिए है, जिससे वे बेपनाह प्यार करते हैं. जिसके प्रति जीवन प्रदान करने और इसे जीने देने के लिए वे कृतज्ञ हैं.
सोमलाल हेम्ब्रम असम-मिज़ोरम से काम करके, कुछ वर्षों बाद गांव में रहने की क़सम खाता हुआ वापस लौटा, तो उसे अपना गांव ही अपनी जगह पर नहीं मिला. दिकू लोगों के अतिक्रमण और कोयला खदानों के अत्याचार से कराहती हुई ही सही पर गाडा (नदी) तो वहीं थी पर उसके किनारे पर बसा उसका गांव, खेत, मैदान, अखड़ा, सरना-स्थल, उसकी सहिया सांझों का घर कहीं नहीं दिखे. उन्हें अपनी जगह पर न पाकर, उन्हें खोजता हुआ वह कुछ दिनों तक बौराया हुआ फिरता रहा था. सोमलाल की छाती फटी जा रही थी, उसकी दुनिया हमेशा के लिए उजड़ चुकी थी और ‘वर्तमान’ को अपने लिए संवारने वाले सहृदय उसे पागल घोषित करते रहे, उसका मख़ौल उड़ाते रहे. यह कैसा वर्तमान है जिसमें हमें कभी अपना पेड़ नहीं मिलता, कभी गांव नहीं मिलता, कभी पूरा का पूरा जंगल नहीं मिलता? बरसात में नदी जब घाट का कोई पत्थर बहा कर किसी और गांव के पास लेकर चली जाती है, हम उस पत्थर को भी याद करते हैं. उसके साथ गुज़ारे हुए वक़्त को, उस पर बैठ कर नदी में पैर डुबोए नदी और संगियों से बातें करने को याद करते हैं और भावुक हो जाते हैं. यहां तो पूरी की पूरी नदी ही हमसे छीन ली जा रही है.
हमारा समय पुरखे पेड़ों, नदियों, और जंगलों में निवास करता है. उनके बीच पलता-बढ़ता है. उन्हीं के साथ-साथ चलता है. उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है, हमारे लोग बीत जाते हैं. वैसे समय का हम क्या करेंगे जिनमें ये नहीं होंगे. आप भी क्या करेंगे ऐसे समय का ? असल सवाल तो यह है कि आप क्या कर रहे हैं ऐसे समय में? इस दुनिया में कटते पेड़ों के साथ कटुता बढ़ती ही गई है. जंगलों-नदियों के नहीं होने से मनुष्य लगातार हिंसक होता गया है. यह समीकरण शायद आपको उल्टा लगे पर उस तरफ़ खड़े होकर देखिए जिधर नदियां धरती पर अपने मौत का विलाप कर रही हैं. फिर आपको शायद यह अहसास हो कि सीधा क्या है और उल्टा क्या है?
‘जैसे-जैसे धरती की क्षमता कम होती जाती है, मनुष्य और मनुष्य के बीच कटुता बढ़ती जाती है’
कभी ग़ौर से अपने इतिहास पर हम विचार करें, तब शायद यह समझ पाएं कि धरती के पास हमारी ज़रूरत को पूरा करने के लिए जब तक पर्याप्त होगा, मनुष्यता विकसित होती रहेगी. हमारे लालच से जैसे-जैसे धरती की क्षमता कम होती जाती है, मनुष्य और मनुष्य के बीच कटुता बढ़ती जाती है. यह कटुता दुनिया भर में जंगों के सिलसिले को जन्म देती रही है. हज़ारों साल पुराना एक नैटिव अमेरिकन मुहावरा है, ‘यह धरती हमें अपने पुरखों से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि इसे हमने अपने बच्चों से उधार लिया है’. अब सोचिए कि कृतघ्नता की किस हद को हम जी रहे हैं. जी ही नहीं रहे बल्कि उस कृतघ्नता का उत्सव मना रहे हैं और हमें इसका इलहाम तक नहीं. यह धरती और हमारी यह दुनिया पता नहीं इस कृतघ्नता को कब तक बर्दाश्त कर पाएगी?
विकास की दौड़ में शामिल हमारी दुनिया और इसके आकाओं का प्रिय शब्द ‘कॉलेट्रल डैमेज’ है. मनुष्यों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए विकास ज़रूरी है और विकास की क़ीमत किसी-न-किसी को तो चुकानी ही पड़ती है; इस बात से हम इतने मुतमइन हैं कि यह आस्था जैसी चीज़ बन गई है. विकास ज़रूरी है पर किस क़ीमत पर? जिन चीज़ों को वापस निर्मित नहीं किया जा सकता कम से कम उनका तो ख़याल करें. धरती से कुछ सुंदर मिटाया जा रहा हो और उसकी जगह कितना भी ‘सुंदर’ कुछ और क्यों न बनाया जा रहा हो, कामनीय नहीं हो सकता.
‘बांझ’ शब्द का हिंदी प्रदेश में ख़ूब प्रयोग होता है. औरत या पुरुष, किसी को भी बांझ कहना उचित नहीं है. किसी मनुष्य का मां या पिता बनना जितना स्वाभाविक है, उतना ही किसी का न बनना भी. यह भाषा और हमारे व्यवहार की हिंसा है कि हम किसी को बांझ कहते हैं या समझते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि अगर हम इस चीज़ को लेकर इतने भावुक हैं, तब हम जानबूझकर धरती के साथ वही सुलूक क्यों कर रहे हैं ? क्या हम वापस कोई नदी पैदा कर सकते हैं ? कोई पहाड़ या जंगल दोबारा बना सकते हैं? आदरणीय रामदयाल मुण्डा ने बहुत पहले इस सन्दर्भ में सचेत करते हुए कहा था, ‘बाग़ तो हम नया लगा लेंगे पर जंगल कहां से लाएंगे’.
क्या हमें अपनी धरती के प्रति कृतज्ञ नहीं होना चाहिए?
क्या हमें इस बात का थोड़ा भी इलहाम है कि मनुष्यों को पैदा करने से पहले इस धरती को हमारे रहने लायक बनाने में, धरती को कितने लाख वर्ष लगे हैं? नदी, पहाड़, जंगल को बसाने के लिए वह कितने वर्षों तक आग में जली, बर्फ़ की रातों को सहा और लगातार बरसात में भीगी है? क्या हमें यह महसूस नहीं होता कि हम उत्तरोत्तर क्रूर से क्रूरतम मनुष्य ही बनते रहे हैं? क्या हमें अपनी धरती के प्रति कृतज्ञ नहीं होना चाहिए? कम-से-कम आज जब अपनी ही कृत्यों की वजह से मनुष्य को लगातार नई विपदाओं का सामना करना पड़ रहा है, तब हमें थोड़ा ज़िम्मेदार नहीं होना चाहिए ?
सोचिए न जिन पेड़ों ने हज़ारों वर्षों तक हमें रहने के लिए आसरा दिया, ख़ुद को ख़ाली करके जगह दी बसने की और सामाग्री और वातावरण दिया घर बनाने-बसाने की, आज हम उन्हें ही घरेलू-पालतू बनाने की सोच से ओत-प्रोत नज़र आते हैं. पेड़ों को पालतू बनाने की सोच ने एक मनुष्य के तौर पर हमारा बहुत नुकसान किया है. धरती पर रहने के लिए जिस सहजीविता की भावना ज़रूरी है, उसे हम व्यर्थ के स्वार्थों की ख़ातिर गंवाते रहे हैं. बहुत बार मुझे आदिवासी और जंगलों के रोमान में डूबा हुआ मान लिया जाता है.
जंगल के साथ रहना, उनके हक़ में खड़ा होना यथास्थितिवादी होना नहीं है. तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद हमें आज भी सूरज के उगने और धरती के घूमने से ज़्यादा भरोसा किस बात पर है? क्या हम दुनिया भर का विज्ञान लगाकर भी पानी से शुद्ध पानी, हवा से शुद्ध हवा, मिट्टी से ज़्यादा उपजाऊ मिट्टी और आसमान से साफ़ आसमान बना सकते हैं? इसलिए इनके पक्ष में खड़ा होना यथास्थितवादी होना नहीं, बल्कि इस धरती के पक्ष में खड़ा होना है. कम-से-कम इस धरती पर न्याय और बराबरी के पक्ष में खड़े होने वालों को तो अब धरती के पक्ष में खड़ा होना ही चाहिए. मनुष्यविरोधी होकर तो फिर भी रहा जा सकता है पर धरतीविरोधी होकर कितने दिन तक बच पायेंगे हम ?
मनुष्यों की हमारी प्रजाति इस धरती पर लगभग दो से तीन लाख साल पुरानी है, जो पृथ्वी की उम्र कि तुलना में नगण्य है. ‘डाउन टू अर्थ’ ने इसे बड़े ही दिलचस्प ढंग से बताया है. उनके अनुसार ‘यदि पृथ्वी का निर्माण मध्यरात्रि में हुआ मानें और वर्तमान क्षण अगली मध्यरात्रि है, तो आधुनिक मानव को पृथ्वी पर आए हुए केवल एक सेकण्ड का ही वक़्त हुआ है’. कृषि क्रांति तो महज़ बारह हज़ार साल पहले घटित हुई. उद्योगों का विकास तो अभी हाल-फ़िलहाल की घटना है. मशीनों के आगमन के बाद इतनी हड़बड़ी क्यों सीख ली हमने? धरती ने तो इतने सालों में अपनी चाल नहीं बदली. अब भी वह उसी गति से अपने अक्ष पर घूमती है और सूर्य का चक्कर लगाती है. हमें किस बात की हड़बड़ी है? हम क्या पा लेना चाहते हैं? क्या हम यक़ीन से कह सकते हैं कि हम अपने पुरखों से ज़्यादा ख़ुश हैं?
‘एक भी व्यक्ति अगर पूरी पृथ्वी पर भूखा सोता है तो यह मनुष्यता की हार है’
ज़िंदगी का हासिल क्या होना चाहिए? ख़ूब ऐशो-आराम या ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की ख़ुशहाली? कुछ लोगों की तरक़्क़ी या ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की ख़ुशी? एक भी व्यक्ति अगर पूरी पृथ्वी पर भूखा सोता है तो यह मनुष्यता की हार है. एक देश के चंद लोग दूसरे देश के चंद लोगों की पीठ कब तक थपथपाते रहेंगे? कब तक उन चंद लोगों की ख़ुशियों की इबारत हथियारों से लिखी जाती रहेगी? दुनिया में मनुष्यों को मारने की जितनी मशीनों की खोज की गई, उसी अनुपात में पेड़ों के संहार के लिए भी मशीनों का ईजाद किया गया. हंसता-खेलता हंसदेव हो या अमेजन का जंगल, चंद दिनों में साफ़ किया जा सकता है. संहार की क्षमता से प्रभावित-चमत्कृत दुनिया संहार की किस हद तक जाएगी? जंगलों के उजड़ने के साथ-साथ जब जेसीबी और ऐसे ही संहारक मशीनों का इतिहास लिखा जाएगा, तब पता चलेगा कि असल में जंगल के पक्ष में खड़े लोग इस धरती पर कितने घरों को ग़मगीन होने से बचा रहे थे.
ग़ैरआदिवासी समाज अपनी कथित उपलब्धियों में इतना मगरूर है कि उसे अपने अलावा कोई दिखाई नहीं देता. उसके समय से बाहर सभी बेकार हैं. वे राक्षस हैं या भूत हैं. उनके साहित्य में राक्षस अट्टहास करते हैं, दरिद्र मानवता अंततः जीतती हुई नज़र आती है, जातिगत श्रेष्ठता साहित्य में विलाप करती है और जीवन में वही श्रेष्ठता जश्न मनाती है. साहित्यकार अगर स्वभाव से ही प्रगतिशील होता है तो यह प्रगतिशीलता किताबों की दुनिया लांघ क्यों नहीं पाती ? ‘वज्रसूचि’ से लेकर आज की कविता तक का समाज वहीं क्यों रुका हुआ है? समय जंगल में नहीं बल्कि वहां थमा हुआ है, जहां आज भी जाति को पहली और अंतिम पहचान की तरह बरता जाता है. जहां एक मनुष्य ख़ुद को दूसरे से मनुष्य से श्रेष्ठ समझता है. श्रेष्ठ समझे जाने की मुसलसल तिकड़में करता रहता है. जहां जीवन पहले से सुंदर हो, उसे बदलने की नहीं बचाने की ज़रूरत है. जहां मनुष्य होने की ही श्रेष्ठता का निषेध हो और पेड़, पक्षी, जानवर, नदी, चट्टान सभी बराबर माने जाते हों, वहां से सीखने की ज़रूरत है. जंगल और उसके पेड़ ही नहीं होंगे तो ऑक्सीजन के साथ साफ़ पानी मैदानों को कौन पहुँचायेगा ? पहाड़ नहीं बचे तो बारिश कौन लाएगा? कहां से होगी खेती और कैसे मनाए जाएंगे त्यौहार ?
‘आपका अतीत आपकी आंखों के सामने है और भविष्य आपकी पीठ के पीछे’
मुझे अपने मैदानी दोस्तों से बात करते हुए अक्सर लगा है कि वे बहुत दूर की सोचते हैं. उनका ध्यान बचपन से ही अपने भविष्य को ‘सुरक्षित’ करने पर रहता है. जो ऐसा नहीं करते, उन्हें ग़ैर-ज़िम्मेदार या बेवकूफ़ तक समझा जाता है. मुझे लगता है यह उनके भूगोल की ही देन है क्योंकि मैदानों में आप बहुत दूर तक देख सकते हैं जबकि पहाड़ी अंचलों में यह बिल्कुल संभव नहीं है. हर बार नज़र के सामने कोई पेड़, कोई पहाड़ आ जाता है, जो वर्तमान को जी लेने के लिए आमंत्रित करता है. अपने आस-पास के सौंदर्य और ज़िंदगी को जी लेने के लिए कहता रहता है. यह कितनी ख़ूबसूरत बात है कि जंगल-पहाड़ में रहने वालों ने दूर का नहीं सोचा, दूर की देखने की कोशिश नहीं की. अन्यथा हांफ रही हमारी धरती अब तक दम तोड़ चुकी होती.
हमारे यहां तो आप दूर देख कर चल तक नहीं सकते, गिर सकते हैं या चोट लग सकती है. इसलिए हम देखते हैं कि पहाड़ के लोग ख़ूब उत्सवधर्मी होते हैं जबकि मैदानों के लोग उत्सव मनाने के लिए कैलेण्डर देखते हैं और ख़ास समय का इंतज़ार करते हैं. इस समय के इंतज़ार करने की प्रथा में वह थोड़ा-थोड़ा बीतते रहते हैं. इसलिए शायद मैदानों में पहाड़ घूमने का रिवाज बना. इस सुंदर धरती पर पहाड़ जितने सुंदर हैं उतने मैदानी अंचल भी हैं. मनुष्य अपनी ज़रूरतों के अनुसार हर जगह बसेगा पर उसे यह याद दिलाते रहना भी ज़रूरी है कि सिर्फ़ उनका इलाक़ा ही पूरी धरती नहीं है और उनका तरीक़ा जीने का एकमात्र या शाश्वत तरीक़ा नहीं है. यह रिवाज इसलिए नहीं था कि किसी पहाड़ पर कोई पीर या देवता निवास करते हैं बल्कि उस सौंदर्य को नज़दीक से समझने और जीने के लिए यह रिवाज बना होगा. इससे भी ज़्यादा इसलिए कि लोग समझ सकें कि जैसे पहाड़ों में दूर देख कर नहीं चला जा सकता है, उसी तरह ज़िंदगी भी दूर तक देखने-सोचने वाली जगहों पर उत्सवधर्मी नहीं होती. यह सोचना कितना मुश्किल है कि नदियां बहेंगी तो पानी बचेगा, पानी को बड़ी-बड़ी टंकियां नहीं बचा सकतीं. पानी बिना जीवन कैसा होगा, यह तो हम भलीभांति समझते हैं.
दक्षिण अमेरिका के आयमारा आदिवासी समूह की एक प्रचलित कहावत है कि ‘आपका अतीत आपकी आंखों के सामने है और भविष्य आपकी पीठ के पीछे’. हम भविष्य को नहीं देख सकते, अपने अतीत को देख सकते हैं और और चाहे तो उससे सीख सकते हैं. चाहे तो जो सुंदर है और जिससे हमारी ज़िंदगी में प्यार का सिलसिला है, उसे संजो सकते हैं.
(राही डूमरचीर झारखंड के युवा कवि और साहित्यकार हैं. इन दिनों बिहार में रहते हैं.)
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