19 एवं 20 मार्च 1927 ई. को हुए महाड़ सत्याग्रह की गिनती शुरुआती दलित-आंदोलनों में होती है. इसे डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में वंचित समुदायों द्वारा मानवीय अधिकारों को हासिल करने के प्रयास के रूप में देखा जाता हैं. स्वयं आंबेडकर ने कहा था, ‘हम चावदार तालाब पर सिर्फ पानी पीने नहीं बल्कि यह जताने जा रहे हैं कि हम भी औरों की तरह इंसान ही हैं.’
सवाल उठता है कि आंबेडकर ने अपने सार्वजनिक जीवन का पहला आंदोलन पानी पर क्यों किया? क्या यह तत्कालीन परिस्थितियों का संयोग मात्र था या फिर इसके पीछे आंबेडकर का ऐतिहासिक चिंतन था? इन सवालों को जानने के लिए जरूरी है कि महाड़ सत्याग्रह की घटनाओं से पहले जल के ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आर्थिक मूल्यों को समझ लिया जाए.
जल, जीवन का आधार है. विश्व की सारी सभ्यताएं जल के किनारों पर विकसित हुई. जल का मूल्य आवश्यक पेय पदार्थ से अधिक सामाजिक,आर्थिक एवं धार्मिक होता गया. प्राचीन समय से व्यापार एवं यात्राओं के जल-मार्गों का प्रयोग होता रहा है. धार्मिक रूप से जल-स्रोत को पवित्र एवं देव निवास माना गया है. संभवतः, इन्हीं कारणों ने जल को कुछ वर्गों के लिए विशेषाधिकार की वस्तु बना दिया और अन्य वर्गों को इसकी सीधी पहुंच से वंचित कर दिया.
भारतीय वर्ण-व्यवस्था इसका प्रमाणिक उदाहरण हैं. शूद्रों को सार्वजनिक जल-स्रोत से वंचित करते हुए ‘पवित्रता’ के सिद्धांत आधारित अस्पृश्यता का जन्म हुआ. कार्ल पोलानी जमीन, श्रम और पूंजी के लिए जो शब्द गढ़ते हैं– Fictitious Commodities, वह वर्ण व्यवस्था के फ्रेम में जल पर उपयुक्त बैठता है. यह अस्पृश्यता कालांतर में गहराती रही. आज भी लोक-साहित्य में इसके उदाहरण विद्यमान है.
राजस्थानी लोक में कबीर की बेटी कमालिनी और एक ब्राह्मण का संवाद गाया जाता है, जहां कमालिनी के हाथ से पानी पीकर पछता रहे ब्राह्मण को वो ‘जल का भेद’ पूछती हैं और मछली और मक्खी के उदाहरण से अस्पृश्यता पर कटाक्ष करती है. रैदास की प्रचलित ‘कठौती में गंगा’ कथा भी इस जलीय-भेदभाव के पर कठोर प्रहार है.
लेकिन यह नैतिक विरोध कभी आर्थिक एवं कानूनी स्वरूप में तब्दील नहीं हो पाया, क्योंकि अस्पृश्यता एवं ऊंच-नीच के आधार पर हुए कर्म-विभाजन ने किसी प्रकार की आर्थिक गतिविधि में चारों वर्णों की एक साथ उपस्थिति को असंभव बना दिया था, वहीं, कानूनी स्वरूप में ‘राज्य’ का हस्तक्षेप मात्र कर-व्यवस्था तक सीमित रहा. जब अंग्रेजी राज्य ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था में रुचि लेना आरंभ किया. सार्वजनिक और निजी संपतियों पर अधिकारों के लेकर व्यापक कानून बने, जिसके फलस्वरूप कुछ अनुकूल परिस्थितियां विकसित होना शुरू हुई.
उसी समय ज्योतिबा फुले ने 1868 ई० में अपना निजी कुआं अछूतों के लिए खोल दिया. संभवतः,यह जल-अधिकार की दिशा में पहला प्रयास था. इन्हीं निजी प्रयासों और कानून निर्माण ने आंबेडकर के आंदोलन को निजी/कानूनी आंदोलन से वृहद् सामाजिक आंदोलन में परिवर्तित करने का अवसर उपलब्ध करवाया.
आंबेडकर का ‘महाड़ सत्याग्रह’ इस संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटना है. 1923 ई० में महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाज सुधारक एसके बोले ने बंबई विधानमंडल में एक कानून पारित करवाया, जिसमें सरकार द्वारा संचालित समस्त सार्वजनिक स्थानों एवं उपक्रमों में अछूतों को प्रवेश का अधिकार दे दिया गया. महाराष्ट्र के कोलाबा जिले की महाड़ नगरपालिका ने भी वहां के दलितों को चावदार तालाब में प्रवेश कि अधिकार दे दिया.
मगर सवर्णों के दबाव में यह अधिकार मात्र कागजी आदेश बनकर रह गया. इस स्थिति ने ‘अछूतों’ के समक्ष अस्मिता का प्रश्न उपस्थित कर दिया और सुधारकों के कार्यों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया.
कोलबा के कुछ सुधारकों ने इस समस्या से निबटने के लिए महाड़ जाकर अपने जल-अधिकार के प्रयोग का निश्चय किया. महाड़ और आसपास के क्षेत्र के अछूतों ने इसे व्यापक समर्थन दिया. इस बाहरी समर्थन के आधार पर इस आंदोलन की आलोचना भी होती हैं, जिसका जवाब बोज्जा ढरक्कन अपनी किताब ‘महाड़: द मार्च दैट लॉन्चड एवरीडे’ में देते हुए लिखते हैं कि
‘एक अछूत एक अछूत ही होता है, चाहे वो महाड़ से हो या अन्य किसी जगह से.वह जहां जाता हैं,अछूत ही बना रहता हैं. यह एक अदृश्य आईडी कार्ड जैसा हैं,जो उसके गले में टंगा रहता है.’
यह तर्क स्पष्ट करता है कि भले ही चावदार तालाब का भौगोलिक क्षेत्र महाड़ हो, लेकिन पानी का सवाल सारे अछूतों का साझा था. अपने इस नागरिक-अधिकार को हासिल करने के उद्देश्य से डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में महाड़ में 19 एवं 20 मार्च, 1927 को एक विशाल कॉन्फ्रेंस का निश्चय हुआ.
कॉन्फ्रेंस की व्यवस्थाओं का वर्णन करते हुए धनंजय कीर, आंबेडकर की जीवनी Dr. Ambedkar: Life and Mission में पानी के सवाल पर फिर उलझते दिखते हैं, जहां वो लिखते हैं- ‘कॉन्फ्रेंस की आवश्यकता-पूर्ति के लिए चालीस रुपये का पानी जातीय-हिंदूओं से खरीदा गया, क्योंकि अछूतों के लिए पानी उपलब्ध नहीं था.’
यह जल-उपलब्धता की आवश्यकता को न केवल रेखांकित कर रहा है बल्कि उससे उत्पन्न होते हुए आर्थिक-भार को दिखाता है. बहरहाल, कॉन्फ्रेंस 19 मार्च को शुरू हुई. छत्तीस वर्षीय युवा आंबेडकर ने जल के बहाने अपने अध्यक्षीय संबोधन में दलितों के ‘आचरण-सुधार’ पर बल दिया.
कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन आंबेडकर करीब ढाई हजार लोगों के साथ चावदार तालाब गए. वहां पानी पिया और प्रतीकात्मक रूप से अधिकार प्राप्ति की भाषा से अस्मिता की दावेदारी पेश कर दी. इसके बाद महाड़ में उच्च-जातीय उपद्रवियों ने जो दंगा-फसाद किया, उसका विवरण ‘द बंबई क्रॉनिकल’ की रिपोर्ट में मिलता है कि–
‘जुलूस बहुत शांतिपूर्ण था और सबकुछ शांतिपूर्वक हो गया.पर लगभग दो घंटे बाद क़स्बे के कुछ दुष्ट नेताओं ने यह अफवाह फैला दी कि दलित वर्ग वीरेश्वर मंदिर में प्रवेश करने की योजना बना रहा है,जिस पर बांस के डंडे लेकर उच्च वर्गों की एक बड़ी भीड़ वहां इकट्ठी हो गई. यह भीड़ शीघ्र ही आक्रामक हो गई और शीघ्र ही सारा कस्बा उपद्रवियों की उमड़ती हुई भीड़ में बदल गया,और ऐसा प्रतीत होता था कि वे दलित वर्गों के खून के लिए वहां आए हैं.’
कुछ गिरफ्तारियां हुईं. आंबेडकर 23 मार्च को बंबई वापस लौट गए. लेकिन, उच्च जातियों को पहली बार अधिकारों के संबंध में चुनौती मिली थी. जिसकी अप्रत्याशित प्रतिक्रिया हुई. इसी रिपोर्ट में दर्ज किया गया है कि– ‘महाड़ और कोलबा के उच्च वर्गीय हिंदुओं के व्यवहार का सर्वाधिक निंदनीय पक्ष यह था कि विभिन्न गांवों को तत्काल संदेश भेजकर वहां की उच्च वर्गीय लोगों से कहा गया कि जैसे ही सम्मेलन के प्रतिनिधि अपने-अपने गांव लौटे, वे उनको दंडित करे.’
उच्च जातीय लोगों ने तालाब को गाय के गोबर और गौमूत्र से पवित्र किया. यह शुद्धिकरण दलितों के आत्मसम्मान पर सीधी चोट थी. आंबेडकर ने इस प्रतिक्रिया को हाथों-हाथ लिया और ‘बहिष्कृत भारत’ में दोबारा सत्याग्रह की घोषणा के साथ दलितों से समर्थन की अपील की.
आंबेडकर जहां एक ओर बंबई में इस संदर्भ में लगातार बैठकें ले रहे थे, वहीं 04 अगस्त,1927 को महाड़ नगरपालिका ने दलितों के जल अधिकार का फैसला पलट दिया. आंबेडकर ने इसके विरोध में अपने समर्थको के साथ 25 और 26 दिसंबर की तिथियां सत्याग्रह के लिए आरक्षित कर दी. इस बीच जिला न्यायालय ने आंबेडकर समेत तीन व्यक्तियों के लिए महाड़ के चावदार तालाब पर जाने और पानी लेने के लिए निषेधाज्ञा जारी कर दी.
तमाम गतिरोधों के बीच 25 दिसंबर को महाड़ में सत्याग्रह सम्मेलन का आयोजन किया गया. आंबेडकर ने इस सत्याग्रह-सम्मेलन की तुलना ‘फ्रांस की राज्य-क्रांति’ से करते हुए कहा कि– ‘ यह सम्मेलन बराबरी का झंडा फहराने के लिए आयोजित किया गया है. हमारे सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक, धार्मिक, नागरिक और आर्थिक मामलों में समान उपलब्धि का है.’
जल का यह अधिकार और इसका संघर्ष 1937 ई० में बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ब्लूमफील्ड और वाडिया के अंतिम निर्णय तक गया, जब दलितों को अंततः जल पर समान अधिकार मिला. जल के बहाने आंबेडकर ने पहले चरण में आत्मविश्वास हार चुके दलितों को एक समान पृष्ठभूमि पर लाकर खड़ा कर दिया, और दूसरे चरण में ‘मनुस्मृति दहन’ के बहाने सदियों से चली आ रही अमानवीय व्यवस्था को अंतिम चुनौती पेश की.
आंबेडकर का यह आंदोलन महज उनके सार्वजनिक जीवन या किसी स्थान विशेष के दलित समुदाय का सफल प्रयास भर नहीं, बल्कि सदियों से वर्ण और जाति के ढर्रे पर जी रहे भारतीय समाज के दलितों की संघर्ष के लिए जगती इच्छाशक्ति और बंधनों को तोड़ने की छटपटाहट थी.
इस समय जब देश की दलित-राजनीति नए कलेवर का स्वाद चख रही हैं, तब उसके नेतृत्वकर्ताओं को आंबेडकर के महाड़ संघर्ष की आधारभूमि याद रखनी चाहिए, ताकि दलित-राजनीति किसी जाति या व्यक्ति की निजी उन्नति के स्थान पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारों को लोकतांत्रिक रूप से मजबूत करे.
(लेखक बेंगलुरु के अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में विद्यार्थी हैं.)
