रचनाकार का समय: ‘क्या आपके किरदार बड़े सवालों से जूझते हैं?’

एक लेखक को बार-बार नए सिरे से ख़ुद को खोजना पड़ता है. बहुत थोड़े लेखक ऐसे होते हैं जिन्हें जीवन भर अपनी मर्ज़ी से लिखने की सुविधा प्राप्त होती है. पढ़िए 'रचनाकार का समय' में चंद्रभूषण का आत्म-कथ्य.

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(बाएं) चंद्रभूषण. (फोटो साभार: फेसबुक/पेंटिंग: The Dance of Transformation By Vandana Rakesh)

दो-तीन साल के होते-होते बच्चे कुछ-कुछ ऐसा करने लगते हैं जो उनके दैनिक जीवन से जुड़े काम-काज, खाने-पीने, उठने-बैठने, चलने-फिरने, हंसने-बोलने से बहुत अलग होते हैं. कोई दीवारों पर लकीरें खींचता है, कोई ढब-ढब डिब्बा पीटता है, तो कोई फंसती ज़बान में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता है. इन हरकतों का मकसद बड़ों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचना होता है, लेकिन जब-तब इनमें रचना की पुकार भी शामिल होती है. कलाकार और हुनरमंद परिवारों के बच्चे जीवन के इसी मोड़ पर समझ जाते हैं कि हाथ या गले को किस तरह चलाना अच्छा रहेगा, लेकिन ज़्यादातर बच्चों की यह पुकार अकारथ चली जाती है.

कई प्रतिभाओं वाले जर्मन लेखक ग्युंटर ग्रास के जगत्प्रसिद्ध उपन्यास ‘द टिन ड्रम’(1959) में ऐसी ही ढब-ढब से एक प्रतीक खड़ा किया गया है, जिसमें कला का दिखावा तक नहीं है.

आप पेंसिल से या रंग-कूंची से कुछ उल्टा-सीधा खींच रहे हैं. मार नहीं पड़ी तो उसी से कोई आम, अमरूद, गुलाब या हिरन बनने लगता है. दस में नौ लोगों से यह भी नहीं हो पाता लेकिन जिस एक हाथ से जानी-पहचानी आकृतियां बनने लगती हैं, उसे माहौल मिल गया तो वह शुरुआती स्तर का चित्रकार बन जाता है. शब्दों का मामला भी इससे बहुत अलग नहीं है. उल्टे-सीधे वाक्य बनाते-बनाते आप कुछ लिखने लगते हैं. कभी-कभी इसमें कुछ पढ़ने लायक भी निकल आता है.

सोशल मीडिया के आ जाने से सबको अपना सब कुछ लिखा भाने लगा है, क्योंकि दूसरे छोर पर ऐसे ही सौ अन्य लोगों की तर्जनी ‘लाइक’ और ‘लव’ जताने के लिए खुजलाती रहती है. रचनात्मकता का अलग दौर!

एक समय था जब क़िस्सा-कहानी और गीत अक्षरों से नहीं बंधे होते थे. वे सिर्फ कहने-सुनने की चीज़ समझे जाते थे. सबसे महान किताबें वे मानी गईं जो किसी पर उतरी हुई बताई जाती थीं. उनका लेखक होने का दावा भी किसी ने नहीं किया. बाद में किताबों का नाम लेखकों से जुड़ने लगा, तब भी लिखने वाले क़िस्सागोई की ऐसी तकनीक अपनाते थे, जिसमें कई वक्ता-श्रोता युगल मौजूद होते थे. शिव ने पार्वती से कही, बीच में पार्वती सो गईं तो छिपकर सुन रहा एक तोता हुंकारी भरने लगा. बाद में तोता मनुष्य योनि में आकर शुकदेव बना तो उसके ज़रिये कथा फैलती गई और पता नहीं किससे-किससे होती हुई जैसे-तैसे कवि तक पहुंच गई. क़िस्सा किसने बनाया और श्रोता तक वह कैसे पहुंचा, इस स्पेस में इतनी धुंध भर दी जाती थी कि प्रामाणिकता का प्रश्न ही सदा के लिए खत्म हो जाए.

ज़ाहिर है, ऐसे में रचना के समय और स्थान जैसा तो कोई मामला ही नहीं बचता था. कई बार इस प्रश्नातीत स्थिति का विस्तार लेखक तक भी हो जाता था. वाल्मीकि और व्यास की बात ही छोड़ें, बहुत बाद में हुए कालिदास और बाणभट्ट भी कहां के रहने वाले थे, यह सवाल इनका विपुल लेखन उपलब्ध होने के बाद भी हल नहीं हो पाया है.

इसके बरक्स इन दिनों लेखकों के नाम, परिचय और चेहरे पर ज़ोर काफी ज्यादा है. रचना का क्या है, देख लेंगे. पहले रचनाकार को ठीक से देख लें. उसकी पर्याप्त चर्चा हो पाएगी, तभी तो वह दुनिया से अपना देय वसूल कर सकेगा!

पता करें तो पता चलेगा कि सम्मानों, पुरस्कारों और प्रचार के ढेरों हथकंडों के बावजूद अभी की ज़्यादातर चर्चित किताबें प्रकाशन के थोड़े समय बाद ही रद्दी के काम की मान ली जाती हैं. पढ़ी जाती हैं सिर्फ वही, जिनका कोई तार लोगों के मन से जुड़ता है. फिर लेखक तो क्या, किताब के देश-काल से भी पढ़ने वाले का कोई परिचय हो या न हो. कहां-कहां से आई, किन-किन ज़मानों की कथावस्तु वाली किताबें हमारे दिलों पर राज करती हैं, सोचकर देखें.

यह टिप्पणी लिखते हुए मेरा मन उन सवालों की तरफ भाग रहा है, जो मुझ जैसे लेखकीय आकांक्षा वाले पत्रकारों को अक्सर परेशान करते हैं. सबसे पहले यह कि जो वे लिख रहे हैं, उसमें अपने समय का सही प्रतिनिधित्व हो पा रहा है या नहीं. शेक्सपीयर ने समय का सिर पीछे से गंजा बताया है. चोटी पकड़ने की कोशिश करो तो हवा ही हाथ आती है. इतनी तेजी से दुनिया भाग रही है कि आपके कैमरे की शटर स्पीड कितनी भी ज़्यादा क्यों न हो, कुछ-न-कुछ छूट ही जाएगा. कितने साल हुए जब लोग पैंट की बेल्ट में ‘पेजर’ लटकाए नज़र आते थे? यह चीज़ मेरी मेमोरी से डिलीट हो गई थी. लौटी तब, जब इसी साल लेबनान में पेजर फटने से हिज़बुल्ला लड़ाकों की मौत की ख़बर पढ़ी!

ग़ौर से देखने पर लगता है, तकनीकी ब्यौरों से क्या डरना? बैंगन का चित्र बनाते हुए उसकी डंठल पर लगे रोयों जैसे डिटेल, जिनके न रहने पर भी कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा. आप एक कविता या कहानी लिखते हैं तो उसमें ब्यौरे हमेशा ज़रूरी होते हैं.

लेकिन जैसे ‘गॉड लिव्स इन द डिटेल्स’ पश्चिमी कलाकारों का एक प्रिय मुहावरा है, उसी तरह एक चलता-पुर्जा मुहावरा ‘द डेविल इज़ इन द डिटेल्स’ का भी है. जो समय हमें दिख रहा है, अपनी कला में उसको हम ब्यौरों के जरिये ही पकड़ सकते हैं, लेकिन ब्यौरों की यह मांग अक्सर कला को मार भी देती है. दुनिया रोज़-की-रोज़ नई होती जा रही है. उसे आप भला कितना दबोच कर रखेंगे कि दस साल बाद भी वह सबको अपनी-सी लगे?

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इलाहाबाद में कथाकार शैलेश मटियानी मुझे मुंबई में अपने संघर्ष के दिनों के किस्से रस लेकर सुनाते थे. इनमें एक किस्सा मन में उठे आत्महत्या के विचार का भी था. टहलते-टहलते समुद्र के किनारे एक ऊंची चट्टान पर चले गए. वहां वाल्मीकि रामायण का एक प्रकरण याद आया, जहां सीता की खोज में निकले हनुमान इसी तरह सागर किनारे एक पहाड़ के छोर पर पहुंचते हैं और उनके भी मन में ऐसा ही विचार उठता है. नाकाम लौटकर अपमान सहें या यहीं एक छलांग में क़िस्सा खत्म कर दें. उनकी उधेड़बुन एक आखिरी कोशिश और कर लेने के नतीजे के साथ खत्म होती है. क़िस्सा सुनाते हुए मटियानी जी बोले- ‘उस दिन लगा, यह प्रसंग वाल्मीकि ने मेरे लिए ही लिखा था.’

इंसान का मन एक क़िस्से या गीत से ख़ुद को इसलिए नहीं जोड़ता कि ऊपरी तौर पर वह कितना प्रामाणिक लग रहा है. दूसरे शब्दों में कहें तो उसमें दिख रहा समय वास्तविकता के कितने क़रीब है. जुड़ने के लिए वह सिर्फ एक कसौटी आजमाता है. वह यह, कि कृति में वह किस हद तक ख़ुद को खड़ा देख पा रहा है. इस कसौटी पर बहुत पुरानी और बहुत दूर की चीज़ें कई बार अपने बिल्कुल क़रीब की और समकालीन चीज़ों से ज़्यादा खरी उतरती हैं.

चंद्रभूषण की पुस्तकें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

इधर-उधर घूमकर अपनी तरफ लौटूं तो कहना जरूरी लगता है कि एक लेखक को बार-बार नए सिरे से ख़ुद को खोजना पड़ता है. बहुत थोड़े लेखक ऐसे होते हैं जिन्हें जीवन भर अपनी मर्ज़ी से लिखने की सुविधा प्राप्त होती है. ज़्यादातर को समय निरंतर अलग-अलग स्थितियों में डालता है और उन्हें तय करना होता है कि लिखना छोड़ दें या अपनी विधा बदलकर या किसी और तरह से इस काम को जारी रखें.

इसी तरह कोई-कोई समय ऐसा भी आता है, जब लेखक के पास किसी विस्फोट की तरह काफी कुछ कर गुज़रने का मौका होता है. मेरे लिए यह मौका 1990 से 1993 के बीच आया था, जब कार्यकर्ता, पत्रकार और कवि, तीनों ही रूपों में मैंने मन भर काम किया. कमाल यह कि इस अवधि में मेरे घर-परिवार के लोग इस हक़ीक़त से भी अनजान थे कि कितनी बार मैं मरते-मरते बचा.

अपनी ज़िंदगी में पढ़ी गई पच्चीस सबसे दिलचस्प किताबों की सूची मुझे बनानी हो तो उनमें एक चौथाई को मैं अपने इन्हीं तीन तूफानी सालों से जोड़ सकता हूं. याद दिला दूं कि इन सालों में सुबह से शाम तक जिंदगी इतनी पैक्ड थी कि कहीं बैठकर किताब पढ़ना पापबोध पैदा करता था. लेकिन संयोग ऐसा कि इनमें आधी किताबें रेल में पढ़ी गईं, आधी जेल में. एक कमाल यह भी कि इन किताबों का आपस में कोई दूर-दूर का रिश्ता भी नहीं खोजा जा सकता.

इनमें दो उपन्यास उन्नीसवीं सदी के थे और दोनों की लिखाई का समय भी आसपास का ही था. 1870 के दो-चार साल आगे या पीछे. लेकिन माहौल और मिज़ाज एक-दूसरे से इतना अलग कि एक साथ इनके बारे में सोचना भी अजीब लगता है. ब्रिटिश लेखक टॉमस हार्डी की ‘फार फ्रॉम द मैडिंग क्राउड’ क्लासिक अर्थों में एक रोमांटिक नॉवेल है. सामंती मूल्यों और नफ़े-नुकसान की जकड़ से दूर, थोड़े में खुश रहने वाले प्राकृतिक जीवन के क़रीब. जबकि रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोएव्स्की का ‘द इडियट’ संबंधों में मिल्कियत की धारणा का दार्शनिक खंडन करने वाली एक असाधारण प्रेमकथा है, जो शुरू से अंत तक जैसे रतजगे और बेचैनी भरे सपनों के बीच चलती जाती है.

ये दोनों किताबें रेल में पढ़ी गईं और इनके रचना-समय का, यानी किस वक्त की कहानी ये कह रही हैं, इसका कोई मायने नहीं है. बीच-बीच में शेयर बाजार या अख़बार जैसी चीज़ों का ज़िक्र आ जाने से आपको लगता है कि इनका कथा समय भी इनके लेखकों के समय के आसपास का ही है, लेकिन कहानी में इनकी कोई बड़ी भूमिका नहीं है.

तीसरी किताब के साथ भी रेल में ही न्याय करना पड़ा, लेकिन उसका नंबर सबसे बाद में आया. यह थी कोलंबिया (दक्षिणी अमेरिका) के लेखक गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज की ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ जिस पर बनी वेब सीरीज बीते साल धूमधाम से नेटफ्लिक्स पर नुमायां हुई. इस किताब की लिखाई ऊपर की दोनों किताबों के सौ साल बाद की है, लेकिन इसके भीतर का समय अलबेला है. हमारी सुपरिचित दुनिया का दखल यहां तीन चौथाई नॉवेल निकल जाने पर दिखता है. लोकतंत्र और खुले बाज़ार के दावे करती निरंकुशता, जहां सत्य पहली कैजुअल्टी है.

आरा सेंट्रल जेल की लाइब्रेरी से मिली तीन यादगार किताबें थीं- ड्रैकुला, गॉडफादर और चौरंगी. आइरिश लेखक ब्रैम स्टोकर की किताब ड्रैकुला पूर्वी यूरोप की एक भुतही दंतकथा को उपन्यास का कलेवर देती है. लेकिन हक़ीक़त में यह रोमांटिसिज्म का ही एक ऐसा अलग आयाम खोलती है, जिसका रुग्ण आकर्षण पश्चिमी लेखकों को बार-बार इस गली की तरफ़ ले आता है. आगे, गॉडफादर का जादू ऐसा कि अमेरिका में यह एक अपराध कथा से बढ़कर किसी शाश्वत कथा-सूत्र जैसी हैसियत पा गया. 1969 में आया मारियो पूजो का यह नॉवेल इस सच्चाई को बेपर्द करता है कि लोकतंत्र में राजनीति और पूंजी के गठजोड़ के लिए कानून के राज का कुछ खास मायने नहीं है.

बांग्ला उपन्यासकार शंकर की 1962 में आई किताब ‘चौरंगी’ असाधारण कवि-कथाकार राजकमल चौधरी के हाथों जल्द ही हिंदी में आ गई थी. सामान्य जीवन अनुभवों से शुरू हुआ उपन्यास आपको चमक-दमक भरी ज़िंदगी की ऐसी भूलभुलैयों से गुज़ारता है कि एक अर्से तक दिमाग से इसका असर ही नहीं जाता.

आज़ादी के आसपास वाले दौर में कोलकाता का एक नौजवान जो एक अंग्रेज वकील का मोहर्रिर है, ठीक-ठाक तनख्वाह और अंग्रेजी बोलने के हुनर के चलते अपने दायरे में जिसकी थोड़ी इज़्ज़त भी है, वकील की मृत्यु हो जाने से अचानक सड़क पर आ जाता है और चौरंगी इलाके में डस्टबिन बेचने लगता है. किसी पुराने परिचित की कृपा से एक होटल में उसकी छोटी-सी नौकरी लग जाती है, जहां आधुनिक सभ्यता के अंधेरे पहलू उसके आगे उजागर होने लगते हैं. इसके कथासूत्र एक शहर, एक देश से निकलकर ग्लोबल पैमाने तक पहुंचते हैं, लेकिन दुख का रंग हर जगह एक ही दिखता है.

ध्यान रहे, कोलकाता आज़ादी के एक दशक इधर और उधर तक विश्वयुद्ध, देश-विभाजन, स्वतंत्रता और पूंजी संकट का गढ़ बना रहा, लेकिन यह उपन्यास कहीं सूत भर भी इनके प्रलोभन में नहीं पड़ता.

क्या इन छिटपुट बातों से ऐसा सूत्र निकल रहा है कि लेखक को अपने समय के ब्यौरों की तलाश से बरी हो जाना चाहिए? उसके ज्वलंत प्रश्नों से कतरा कर निकल जाना चाहिए? लेकिन अगर वह ऐसा करता है तो उसके लिए लिखने की ज़रूरत क्या बचेगी? असल बात दूसरी है. यह कि समय का बड़े से बड़ा सवाल भी रचना में आने से पहले उसके किसी पात्र के जीवन में झलकता है.

महाभारत का युद्ध कितना भी भीषण रहा हो, उसका दुख एक महाकाव्य की धुरी तभी बना, जब एक लेखक ने किसी द्रौपदी, किसी अभिमन्यु, किसी कर्ण या किसी अश्वत्थामा के जीवन में उसकी किरचें चुभती देख लीं. मौजूदा महाभारत का अक्स भी किसी की जिंदगी में कोई देख रहा हो, काश!

(चंद्रभूषण वरिष्ठ पत्रकार, कवि और अनुवादक हैं.)

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