नई दिल्ली: संभल में शाही जामा मस्जिद की प्रबंध समिति के सदर (अध्यक्ष) ज़फर अली को पिछले साल नवंबर में मस्जिद के विवादास्पद सर्वेक्षण के दौरान भड़की हिंसा के पीछे कथित आपराधिक साजिश से संबंधित एक मामले में रविवार (23 मार्च) को गिरफ्तार किया गया.
अली के करीबी एक सूत्र- जो खुद एक वकील हैं – ने आरोप लगाया कि अली को 24 नवंबर, 2024 की हिंसक घटना के ठीक चार महीने बाद 23 मार्च को गिरफ्तार किया गया – ताकि उन्हें लखनऊ में न्यायिक आयोग के समक्ष पेश होने और गवाही देने से रोका जा सके. गिरफ्तारी से पहले अली को पुलिस ने लगातार दो दिनों तक पूछताछ के लिए बुलाया था.
अली के भाई ताहिर अली ने संवाददाताओं को बताया कि पुलिस ने उन्हें न्यायिक आयोग के समक्ष अपना बयान देने से रोकने के लिए गिरफ्तार किया, जिसने उन्हें समन जारी किया था.
‘पुलिस नहीं चाहती कि वह न्यायिक आयोग के समक्ष अपना बयान दें’
ताहिर अली ने कहा, ‘पुलिस नहीं चाहती कि वह आयोग के समक्ष अपना बयान दें. उन्हें न्यायिक आयोग के समक्ष अपील करने से रोकने के लिए पुलिस ने यह असंवैधानिक काम किया.’
जफर अली की गिरफ्तारी की घोषणा करते हुए संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण बिश्नोई ने कहा कि अली को ‘आपराधिक साजिश’ के लिए दर्ज एफआईआर के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है.
समाजवादी पार्टी के संभल सांसद जिया-उर-रहमान बर्क पर उसी एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने घटना से कुछ दिन पहले दिए गए भाषण के माध्यम से भीड़ को उकसाया था, जिसके तुरंत बाद अदालत द्वारा नियुक्त अधिवक्ता आयुक्त के नेतृत्व में प्रशासन ने स्थानीय सिविल जज के निर्देश पर मस्जिद का जल्दबाजी में सर्वेक्षण किया था.
सपा विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल पर भी भीड़ को उकसाने का आरोप लगाया गया था.
ज्ञात हो कि अदालत ने 19 नवंबर, 2024 को कुछ हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा दायर एक आवेदन का संज्ञान लेते हुए मस्जिद का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था, जिसमें दावा किया गया था कि सम्राट बाबर के समय में निर्मित इस्लामी धार्मिक स्थल मूल रूप से एक प्रमुख हिंदू मंदिर था जो भगवान विष्णु के भविष्यवाणी किए गए अवतार, कल्कि को समर्पित था.
अली का नाम एफआईआर में नहीं था और अब तक उन्हें संदिग्ध या आरोपी के तौर पर नामजद नहीं किया गया है, हालांकि नवंबर की घटना के एक दिन बाद उन्हें पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया था, क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर आरोप लगाया था कि उन्होंने पुलिसकर्मियों को भीड़ पर गोली चलाते देखा था. हिंसा में पांच मुस्लिमों की मौत हो गई थी.
उनके परिवारों ने आरोप लगाया कि उन पर पुलिस ने गोली चलाई, प्रशासन ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि पुलिस ने कोई घातक हथियार नहीं चलाया और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए केवल आंसू गैस, लाठीचार्ज और रबर पेलेट गन का इस्तेमाल किया.
रविवार को जब पुलिस उन्हें ले जा रही थी, तब अली ने अपना विद्रोही रुख बरकरार रखा. उन्होंने कहा कि उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है क्योंकि उन्होंने ‘पुलिस की पोल खोल दी थी.’
पुलिस वाहन में ले जाए जाते समय अली ने मीडियाकर्मियों से कहा, ‘वे ही थे जिन्होंने उन लड़कों को मारा. उन्होंने लड़कों की हत्या कर दी.’
पुलिस ने हिंसा मामले में सांसद बर्क के खिलाफ साजिश के लिए दर्ज मूल एफआईआर में दंगा, घातक हथियार से लैस होकर दंगा करना, लोक सेवक को सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन में स्वेच्छा से बाधा डालना, लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करना, विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना, शरारत, कानूनी आदेश की अवहेलना और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की अन्य धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे.
एफआईआर में सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम की संबंधित धाराएं भी शामिल की गई हैं. इन सभी आरोपों में सात साल से कम की जेल अवधि है, जिससे आरोपी को जमानत मिल सकती है.
एमपी बर्क को जनवरी में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मामले में गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान किया गया था, हालांकि, न्यायालय ने उनके खिलाफ एफआईआर रद्द करने की उनकी याचिका को खारिज कर दिया.
अली की गिरफ्तारी की घोषणा करते हुए, संभल जिले के पुलिस प्रमुख बिश्नोई ने उनके खिलाफ बीएनएस की दो अतिरिक्त धाराओं (230 और 231) का हवाला दिया. ये दो धाराएं किसी को मृत्युदंड या आजीवन कारावास के साथ दोषी ठहराने के इरादे से झूठे सबूत देने या गढ़ने से संबंधित हैं. दूसरे शब्दों में, इन दोनों धाराओं में सात साल से अधिक की सजा का प्रावधान है.
अली की गिरफ़्तारी सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त आरोप लगाए गए
अली से जुड़े एक वकील ने कहा कि चूंकि एमपी बर्क को मूल एफआईआर में लगाए गए आरोपों के लिए गिरफ़्तारी से पहले ही स्थगन मिल चुका था, इसलिए अली की गिरफ़्तारी सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त आरोप लगाए गए. इसका मतलब है कि उन्हें सत्र न्यायाधीश से ज़मानत लेनी होगी.
वकील ने कहा, ‘बर्क को हाईकोर्ट से राहत मिल गई. इससे मामले में कार्रवाई का वही कारण बनता. इसलिए उन्होंने दो और धाराएं जोड़ दीं.’
पुलिस ने अभी तक यह नहीं बताया है कि साजिश में जफर अली की कथित भूमिका क्या थी.
अली के सहयोगी उनकी गिरफ़्तारी से हैरान हैं. वकील आमिर हुसैन ने कहा कि अली ने हिंसा के एक दिन बाद ही प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, उससे पहले नहीं, जिसमें उन्होंने पुलिस पर भीड़ पर गोली चलाने का आरोप लगाया था.
हुसैन ने कहा, ‘यह (प्रेस कॉन्फ्रेंस) प्रशासन के पूर्ण संज्ञान में था, जिसने उन्हें एक हेलमेट भी उपलब्ध कराया.’
अली के करीबी एक अन्य वकील ने आश्चर्य व्यक्त किया कि चूंकि 25 नवंबर के बाद कोई अतिरिक्त हिंसा नहीं हुई थी, तो पुलिस ने अली पर किस आधार पर आरोप लगाया.
25 नवंबर को अली ने मीडिया को संबोधित करते हुए आरोप लगाया था कि उन्होंने पुलिस को गोली चलाते देखा. अली ने कहा था, ‘मैंने देखा कि पुलिस गोलियां चला रही थी. यह मेरे सामने हुआ. मेरी मौजूदगी में लोगों की ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई.’
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों के पास देसी हथियार थे और उन्होंने मस्जिद के पास खड़ी अपनी गाड़ियों में भी तोड़फोड़ की और आग लगा दी. संभल पुलिस और प्रशासन ने उनके आरोपों का खंडन करते हुए उन्हें ‘राजनीति से प्रेरित’ और ‘भ्रामक’ बताया.
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