अरुण देव की ‘मृत्यु कविताएं’ पढ़ते हुए बरबस ही उस ख़्याल का अहसास होने लगता है, जिसे हम स्वीकार तो करते हैं, मगर उस पर खुलकर बात नहीं कर पाते. हम सब जानते हैं कि एक दिन मरना है. लेकिन अगर मरना ही है तो फिर जीवन क्यों?
यह वह सवाल है, जिसके बारे में सोच-सोच कर हम लोग अक्सर परेशान होते हैं. इस सवाल की खोज में बहुत से ज्ञानी पुरुषों ने अपना दिमाग़ खपाया है, दुनिया के कई धर्म इसी सवाल का जवाब देने में अपनी सार्थकता समझते हैं. कवियों और शायरों ने भी इस सवाल से होने वाली परेशान को अपनी रचनाओं में रेखांकित है.
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जीवन और जीवन के बाद होने वाला यह ‘क्या’ हमारे लिए इतना वहशतनाक है कि कई बार हम वास्तविक मृत्यु से पहले ही मर जाते हैं. अपनी इच्छाओं, ख़ाहिशात और कामनाओं को दबा देते हैं, यह सोचकर कि जब मरना है तो फिर जीकर क्या करना?
मगर सवाल यह भी है कि मृत्यु के डर से मृत्यु आने से पहले ही मृत हो जाने की इस प्रक्रिया से क्या हम अपनी मृत्यु का ही अपमान नहीं कर रहे होते हैं? बेशक, यह मृत्यु का अपमान है और अरुण देव अपनी ‘मृत्यु कविताएं’ के क्रम में दसवीं कविता में कहते भी हैं-
मृत्यु से पहले
मृत्यु के डर से
मर जाते हैं लोग
मर हुए लोगों के पास नहीं जाती वह.
जो मुर्दा है, जो मर गया है, जिसने खुद को मृत घोषित कर लिया है, उसके पास मृत्य जाकर करेगी क्या?
मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि जिसने खुद को मृत घोषित कर लिया है, क्या उसे मृत्यु नहीं आएगी?
यहां मुझे कुरआन की एक छोटी-सी आयात याद आती है. यह आयत इतनी छोटी और सारगर्भित है कि यह कुरआन की कोई आयत न रहकर एक कहावत हो गई है. लोग इसे इस संदर्भ में भी इस्तेमाल करते हैं. कुरआन की इस आयत में अल्लाह अपने बंदों से (उन्हीं बंदों से जो जीवित हैं) मुखातिब होकर कहते हैं-
कुल्लु नफ़्सिन ज़ाइक़त-उल-मौत
अर्थात्, हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है. यह आयत उन सभी के लिए हैं, जो वास्तविक रूप से जीवित हैं, और वे भी जो अवास्तविक रूप से मृत हो गए हैं. यानी जिन्होंने जीवन की खुशी, रंगों और ताज़गी से मुंह फेरकर अपनी इच्छाओं और कामनाओं का गला घोंट लिया है और खुद को मृत घोषित कर लिया है.
कुरआन और इंसान का जीवन
कुरआन इंसान के जीवन के तीनों हिस्सों के बारे में बात करता है. पहला, जीवन, दूसरा मृत्यु और तीसरा मृत्यु के बाद जीवन.
इन तीन हिस्सों में से पहले हिस्से से हम अपने जन्म के साथ ही परिचित हो जाते हैं. दूसरा, मृत्यु है, जो हमें सबसे ज्यादा परेशान करता है और इसी परेशानी के आलाम में मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी कहा है,
मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद रात भर क्यों नहीं आती?
तीसरे हिस्से को हम मज़हबी वर्णन और कल्पनाएं समझकर रद्द कर सकते हैं. मगर दूसरे वालों को नहीं. पहले हिस्से को तो ख़ैर हम जीते ही हैं.
अरुण देव की ‘मृत्यु कविताएं’ हमारे जीवन चक्र के इसी मध्य भाग की बात करती है. यानी ये कविताएं हमें बताती हैं कि मृत्यु है क्या? अगर ईश्वर ने जीवन दिया है तो फिर उसके साथ मृत्यु क्यों लगाई है? अगर मृत्यु लगा दी है तो मृत्यु के बाद क्या है?
इसका सबसे आसान जवाब कवि ने अपनी एक कविता में यूं दिया है,
अनंत के अबूझ पथ पर
यात्रा के लिए निकल पड़ा है यात्री
खाली हाथ
सहयात्री उसका कोई नहीं.
हर किसी को तन्हा सफ़र करना है. कोई किसी के साथ नहीं जाता. हम सब जानते हैं. इसलिए कोई भी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाता कि मृत्यु के बाद क्या?
हो सकता है कि मृत्यु के बाद कुछ भी न हो. हमारा यकीन, विश्वास और मज़हबी वर्णन केवल कल्पना मात्र ही हो! कौन क्या कह सकता है? मगर कवि को तो कम से कम इतना कहने की छूट है. और वह अपनी इस छूट का इस्तेमाल भी करता है. वह कहता है-
अग्नि खा जाएगी
पी जाएगी नदी
हवा ले जाएगी अपने साथ
मिट्टी मिला देगी मिट्टी में उसे
यही जीवन है, और उसकी सार्थकता भी. एक शानदार और आरामदायक मृत्यु है. हर किसी की चाहत. अपने घर में मरने की. बिस्तर पर मृत्यु ख़ाहिश. अपने कमरे में लेटे हुए प्राण त्यागने की इच्छा. कोई भी सड़क हादसे, किसी दुर्घटना या किसी बीमार से ग्रस्त होकर मरना नहीं चाहता. अम्मी हर नमाज़ के बाद जब दुआ मांगती है तो उन दुआओं में एक दुआ यह भी होती,
‘या अल्लाह तू हमें आसान मौत फरमा. कलमे वाली मौत अता फरमा है. आराम वाली मौत फरमा. बिस्तर वाली मौत फरमा. अस्पताल के चक्करों, बीमारियों से और कुत्ते-बिल्ली की मौत से बचा.’
मौत के बाद का जीवन
अगर हमारी मौत आसान होगी तो शायद बाद का जीवन, जिसके बारे में हम सोचते रहते हैं, वह भी आसान हो जाए. मगर क्या यह वाकई सच भी है! उस बाद की यात्रा को कौन जानता है? कोई नहीं. इस सफ़र पर जाने के लिए मृत्यु एक पड़ाव है, जिसके सार्थक होने की अम्मी दुआ करती है. अम्मी की तरह कवि भी कहता है-
दुर्गम
दीर्घ
और जोख़िम भरी यात्राओं में
कहां चले जाते हैं लोग?
इस यात्रा को कौन जातना है?
बेशक, इस यात्रा को कोई नहीं जानता है. मगर इस यात्रा के पहले पड़ाव को कवि ने बहुत खूबसूरती और चाहते के साथ बयान किया है-
आकाश भरा था तारों से
लहरों पर फिसल रहा था चांद
बह रही थी धीरे-धीरे हवा
अंत के छोर पर
नदी किनारे अग्नि धधक रही थी.
यह धकती अग्नि ही इस जीवन की परिणिति है. यही है वह, जो बताती है कि जीवन का अंत कहां है. यही अग्नि, उस स्तर के पास जाती है, जो जीवन और मृत्यु के दर्मियान है. यह स्तर इतना क़रीबी और अदृश्य है कि कोई बार नज़र भी नहीं आता.
कई बार सोचता हूं कि क्या ही बेहतर हो अगर मृत्यु न हो? हम हमेशा जीवित ही रहे? मगर फिर क्या है? यह देह इतना लंबा जीवन बर्दाश्त कर पाएगी? क्या हम इतनी लंबी उम्र जीकर इसकी सार्थकता पूरा कर पाएंगे? शायद नहीं. क्योंकि हर चीज़ की एक सीमा है. फूलों, फलों, नदी-नालों और इस पृथ्वी पर हर चीज़ की अपनी सीमा है. फूल खिलता है और एक सीमा के बाद मुरझाकर झर जाता है. फल लगते हैं, पकते है और फिर सड़कर वापस वहीं चले जाते हैं, जहां वे उगे थे. यही नियम इस जीवन पर भी लागू होता है.
अगर किन्हीं कारणवश या सुविधाओं के तहत हम जीवन को लंबी कर भी ले तो फिर देह का क्या? वह ढलेगे नहीं? सड़ेगी नहीं? अपनी अंतिम परिणिति के लिए तड़पेगी नहीं?
कवि देह की तड़प के बारे में कहता है,
देह बिलखती है, मृत्यु के लिए.
वाह! क्या खूब कहा है. देह मृत्यु के लिए बिलखती है. वह जानती है कि एक सीमा के बाद इस जीवन को कोई बर्दाश्त नहीं कर सकता. खुद जीवन भी नहीं. जीवन की सार्थकता मृत्यु में है. उसी मृत्यु में, जिसके लिए ‘बिलखती’ है देह.
इस जीवन के लिए मृत्यु उतनी ही आवश्यक है, जितना कि यह खुद जीवन. एक सीमा के बाद जीवित रहना या अमर हो जाना अमरता नहीं, अभिशाप बन जाता है. जीवन एक क्षण के लिए हैं, एक लम्हा, एक पल. इसके विपरीत मृत्यु शाश्वत और चिरंतन है. मृत्यु से जुड़ी है जीवन की डोर. तो भी मृत्यु एक भिन्न शाश्वत सत्य है, जो जीवन से एकदम जुदा है. इसीलिए मृत्यु की मृत्यु नहीं होती. संग्रह की सोलहवीं कविता में कवि कहता हैं-
जब मृत्यु की भी मृत्यु हो जाएगी
जीवन क्या करेगा?
मृत्यु के बिना जीवन एक अभिशाप होगा. मृत्यु है, तो ही जीवन वरदान है. मृत्यु का अभिशाप जुड़ने से ही जीवन वरदान बनता है. यह मृत्यु ही है, जो अभिशाप को वरदान में बदलती है. अगर यह न हो तो वरदान भी अभिशाप बन सकता है. अगर मृत्यु न हो, जीवन ही चलता रहे तो एक समय यह यातना बन जाएगा, एक कारागार और उसमें फंसी देह. अपनी मुक्ति की भीख मांगती हुई. इस बंधन से छुटकारा पाने के लिए तड़पती हुई.
संग्रह की सत्ताईसवीं कविता में कवि अरुण देव जीवन की इसी यातना की बात करता है-
अंत की ओर मुख किए
अशक्त देह
मुक्त हुई यातना से.
ये कविताएं न केवल मृत्यु की सार्थकता और हमारे जीवन में उसकी महत्ता का वर्णन करती है. साथ ही ये कविताएं उन धार्मिक आंडबरों पर प्रहार भी करती चलती हैं, जिनके लिए मनुष्य बिना मौत के ही मरने की ख्वाहिश पालने लगता है. किसलिए?
सिर्फ़ उस स्थान-विशेष के लिए, जिनके बारे में धार्मिक ग्रंथों ने कह दिया है कि फलां जगह मरने से सीधा स्वर्ग मिलेगा. बिना किसी रोक-टोक के. बिना किसी हिसाब-किताब के. आप जैसा चाहो, जीवन जियो. बस फलां स्थान पर जाकर मर जाओ, तो आप सीधे स्वर्ग में चले जाओगे. जिसके होने, या न होने के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनकी चाहत होती है कि उनकी मृत्यु मक्का या मदीना में हो. वह शहर, जहां पैगंबर मौहम्मद पैदा हुए और फिर अपने जीवन को अलविदा कहा.
उसी तरह जैसे बहुत से लोग हिंदू काशी में मरना चाहता हैं ताकि सीधे स्वर्ग जा सके. काशी में प्राण त्यागने से जीवन इस मायावी चक्र से मुक्त हो जाता है. हालांकि, कबीर सरीखे से लोग भी हुए हैं, जो इस मोह को धता बताते हैं. अंधविश्वास कहकर इसकी खिल्ली उड़ाते हैं. वह अपने जीवन की अंतिम बेला में उस स्थान का चुनाव करते हैं, जो बताता है कि महत्वपूर्ण यह है नहीं कि आप किस शहर, कस्बे, मोहल्ले या जगह पर मृत्यु का वरण करते हैं, महत्वपूर्ण यह है कि आपने जीवन कैसे जिया है?
कवि कहता है-
बनारस में शव आते हैं
मगहर में रह जाती है
मृत्यु!
मृत्यु वहीं है, जहां जीवन है. और जीवन बनारस, या मक्का-मदीना में नहीं, मगहर में है. उस जगह, जहां आपने जीवन जिया.
इन कविताओं में कोई बनाव-श्रृंगार नहीं है. एक अहसास है. साफ़बयानी है. उस अहसास की, जिसे हम मृत्यु कहते हैं. इन कविताओं में कवि किसी को दोष नहीं देता. उसके पास किसी के लिए कोई शिकायत नहीं है. वह किसी भगवान, अल्लाह, ईश्वर या ख़ुदा को इल्जाम नहीं देता कि उसने जीवन दिया है तो उसके साथ मृत्यु को क्यों बनाया? बल्कि इन सबकी जगह वह खुद विराजकर इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है कि जीवन के साथ मृत्यु है, तो क्यों है?
‘मृत्यु भी इसी जीवन, इसी संसार की परिघटना है, शाश्वत और सर्वग्रासी. लेकिन जीवन कहीं उच्चतर है’
किताब के ब्लर्ब पर प्रख्यात कवि अरुण कमल कहते भी हैं, ‘मृत्य की कविताएं अंतत: जीवन की कविताएं होती हैं, जो जीवन था, जो है और जो होगा. कभी-कभी कविता इतनी कम जगह घेरती है मानो कोई अंतिम सांस हो. कबीर से लेकर कामू तक के प्रसंग एक बिम्ब को महाकाव्यात्मक विस्तार दे देते हैं, लेकिन कहीं भी न तो ईश्वर का स्मरण है, न किसी अन्य लोक या उत्तर-जीवन की अभिलाषा. जो है यहीं है. मृत्यु भी इसी जीवन, इसी संसार की परिघटना है, शाश्वत और सर्वग्रासी. लेकिन जीवन सबसे बड़ा है.’
कवि खुद अपने इन कविताओं के बारे में कहा है, इस संग्रह को ‘मृत्यु को उदात्त बना देने के नए प्रस्थान’ की तरह देखा गया है.
साहित्यकार अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ कवियित्री गगन गिल इन कविताओं के बारे में कुछ यूं कहती हैं, ‘बेशक, इन कविताओं में मृत्यु छाया है, जीवन से विदा लेने के क्षण हैं, स्थितियां हैं, मगर ये गहरे जुड़ाव और जिजीविषा की कविताएं हैं. यह कवि-कथन के बावजूद मृत्यु-आसन्न नहीं है, मृत्यु की चेतना से प्रभासित विज़डम हैं.’
मैं कहानियां लिखता हूं और कहानियां ही पढ़ता हूं. कभी-कभी उपन्यास भी. मैंने अभी तक छिटपुट कविताएं ही पढ़ी हैं. विशेष तौर पर वे, जिनके बारे में कह दिया जाता है, उल्लेख कर दिया जाता है, या कोई वरिष्ठ अपने व्याख्यान में उसका ज़िक्र कर देते हैं. यह कविता की ऐसी पहली किताब है, जिसे न मैंने खरीदा है, बल्कि पूरा पढ़ा भी है. इस संग्रह की कविताएं मुझे इतना पसंद आई है कि अगर ज़रा-सी आर्थिक स्वतंत्रता मिले तो मैं इसकी प्रतियां लोगों को तोहफे में दूं.
शायद इसलिए, क्योंकि संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ आलोचक और लेखक राधावल्लभ त्रिपाठी कहते हैं, ‘कविता अमरता का गान न भी हो सके तो मृत्यु की चुनौती से जूझने का संबल तो हो ही सकती है, जो कि अरुण देव के इस संकलन की कविताएं हैं.
(शहादत युवा कथाकार और अनुवादक हैं.)
