बचाने वाला बड़ा होता है तो बापू को बचाने वाले बतख मियां की हेठी अंतहीन क्यों हो गई है?

चंपारण में महात्मा को जहर देकर रास्ते से हटाने की गोरे नील बागान मालिकों की साज़िश को असफल करने वाले बतख मियां विस्मृति के गर्त में ही खोए रहे. विडंबना यह कि महात्मा ने अपनी आत्मकथा लिखी तो जाने क्यों उसमें भी इरविन की उक्त साज़िश और उसे विफल करने में बतख मियां के योगदान का ज़िक्र नहीं किया. 

महात्मा गांधी और बतख मियां. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

अपने देश में गौतम बुद्ध के छुटपन की एक कथा के हवाले से प्रायः कहा जाता है कि बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है.

दरअसल, गौतम बुद्ध (जिनका एक नाम सिद्धार्थ भी है) और उनके भाई  देवदत्त में एक हंस (जिसका शिकार करते हुए देवदत्त ने उसे तीर से घायल कर दिया और सिद्धार्थ ने बचाया था) पर अधिकार जताने को लेकर हुआ विवाद उनके पिता राजा शुद्धोधन तक जा पहुंचा तो उन्होंने दोनों के पक्ष सुनने के बाद फैसला सुनाते हुए कहा था कि बचाने वाले का हक मारने वाले से बड़ा होता है.

लेकिन क्या आज देश में बचाने वालों के हक की वाकई ऐसी मान्यता है? 1917 में गोरे नील बागान मालिकों के हाथों उत्पीड़ित नील किसानों की मुक्ति के लिए ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह के दौरान अपनी जान व जीविका को संकटग्रस्त करके महात्मा गांधी के प्राण बचाने वाले बिहार के मोतिहारी जिले के बंजरिया थाना क्षेत्र के सिसवा अजगरी गांव में जन्मे (मरहूम) बतख मियां अंसारी की तब से अब तक चली आ रही हेठी तो इसकी कतई ताईद नहीं करती. उल्टे जताती है कि उन्हें 30 जनवरी, 1948 को बापू को गोलियां मारकर मौत की नींद सुला देने वाले नाथूराम गोडसे से भी कमतर कर दिया गया है.

और यह तब है, जब इस बात की कल्पना भी त्रासद है कि उस वक्त चंपारण में महात्मा को जहर देकर रास्ते से हटाने की गोरे नील बागान मालिकों की साज़िश सफल हो जाती तो क्या होता! दरअसल, दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह की सफलता से उत्साहित महात्मा उस वक्त चंपारण में सत्याग्रह का देश का पहला ही प्रयोग कर रहे थे और उनके महात्मा बनने में भी अभी देर थी.

गौर कीजिए, उस नाज़ुक वक्त में उनकी जान ले ली जाती तो उनके उक्त प्रयोग की भ्रूणहत्या तो हो ही जाती, उसकी सारी संभावनाओं का भी अंत हो जाता. फिर क्या पता कि बाद में सत्य व अहिंसा के उनके प्रयोगों के ही इर्द-गिर्द घूमती रही हमारी आज़ादी की लड़ाई का क्या स्वरूप होता? और उससे  हासिल हुए सत्य व अहिंसा के अनूठे अस्त्र हमें कैसे मिलते? मिलते भी या नहीं.

तीन कठिया 

बहरहाल, इतिहास गवाह है कि उन दिनों ‘तीन कठिया’ समेत कई हथकंडों से चंपारण के नील किसानों को सताते आ रहे गोरे मालिक इसको लेकर बहुत कुपित थे कि महात्मा ने वहां आकर नील किसानों में अपने हकों की चेतना जगाकर उनको इतना अभय कर दिया कि वे न सिर्फ अपने शोषण व उत्पीड़न के विरुद्ध मुंह खोलने बल्कि सबूत जुटाकर उनके प्रतिकार के प्रयासों के लिए एकजुट भी होने लगे हैं.

यहां जानना जरूरी है कि तीन कठिया चंपारण के किसानों से जबरिया नील की खेती कराने के गोरे नील बागान मालिकों के तीन तरीकों में से एक था, जिसका कोई कानूनी आधार न होने के बावजूद किसानों से उनकी भूमि के पंद्रह प्रतिशत क्षेत्रफल पर नील की खेती कराई जाती थी. ऐसी ही जबरदस्ती के दो अन्य तरीके थे कुरतौली व खुश्की. महात्मा के सत्याग्रह के बाद चंपारण कृषि अधिनियम बनाकर इन्हें समाप्त कर दिया गया.

लेकिन इससे पहले गोरों को उनके इस सत्याग्रह में नील के अपने साम्राज्य के लिए खतरे की घंटी बजती सुनाई पड़ने लगी और वे अपने शुभचिंतक अंग्रेज अफसरों, अदालतों और पुलिस बलों के भरपूर दुरुपयोग से भी उसे बजने से नहीं रोक पाए तो वे महात्मा की हत्या की साजिश रचने पर उतर आए. इस साजिश का सूत्रधार इरविन ( गवर्नरजनरल व वायसराय लार्ड इरविन नहीं) नामक एक नील बागान प्रबंधक था, जो किसानों के लिहाज से शोषक नील बागान मालिकों का सबसे दुष्ट और सबसे शातिर पैरोकार था.

बतख मियां अंसारी वल्द मुहम्मद अली अंसारी इसी इरविन के यहां रसोइये का काम करते थे. एक दिन जब उसने उन्हें बुलाकर महात्मा को मार डालने की अपनी साजिश में शामिल करना चाहा और इसके बदले वेतन बढ़ाने, साथ ही भरपूर ईनाम और जमीन वगैरह देकर मालामाल कर देने का प्रलोभन दिया तो उन्हें अपने पांवों के नीचे की धरती सरकती-सी महसूस होने लगी.

लेकिन साज़िश में शामिल न होने पर कठोरतम दंड, बदले की कार्रवाई और अंजाम भुगतने की उसकी क्रूर धमकी के कारण वे उसे साफ-साफ या  दो टूक जवाब देखकर नाराज करने का जोखिम नहीं उठा पाए.

लेकिन जब उसने उन दिनों तक अविभाजित चंपारण के मोतिहारी स्थित जिला मुख्यालय के अपने घर पर महात्मा को उनके सहयोगी डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ दावत पर बुलाया और बतख मियां को महात्मा का ‘सारा किस्सा’ खत्म कर देने के लिए जहर भरा दूध पिलाने भेजा तो उन्होंने अपने भीतर का सारा संकल्प जगाया और जब तक महात्मा उक्त दूध का गिलास हाथ में लेकर होंठों से लगाते, रुद्ध कंठ से बता दिया कि उसमें जहर मिला हुआ है और वे उसे न पीएं. कहते हैं कि इसके बाद बतख मियां भावुक होकर हिचक-हिचक व फफक-फफक कर रोने भी लगे.

इरविन की साज़िश विफल हो गई तो कुछ देर को वह निष्प्रभ जरूर हुआ, लेकिन बाद में उसके क्रोध व कोप का कोई पारावार नहीं रह गया. उसने न सिर्फ बतख मियां को रसोइया नहीं रहने दिया, बल्कि बहुत मारा-पीटा भी. फिर उल्टे उन्हें ही जेल भिजवाकर उनकी सारी संपत्ति जब्त और घर नीलाम कराकर उनके गांव से उनका निर्वासन करा दिया.

फिर तो बेघर-बेदर बतख मियां की आंखों के आगे अंधेरा छा गया और उनको अपने परिवार के साथ जानें कहां-कहां भटकना पड़ा. फिर भी उन्होंने आज़ादी के विषम युद्ध में उलझे महात्मा, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, कांग्रेस या किसी और नेता से किसी भी तरह के अनुग्रह या मदद की मांग नहीं की.  देश को आज़ादी मिल गई और महात्मा गांधी हत्यारे नाथूराम गोडसे के शिकार हो गए तो भी बतख मियां विस्मृति के गर्त में ही खोए रहे.

विडंबना यह कि महात्मा ने अपनी आत्मकथा लिखी तो जाने क्यों उसमें भी इरविन की उक्त साज़िश और उसे विफल करने में बतख मियां के योगदान का ज़िक्र नहीं किया.

आज़ादी के बाद

बीबीसी हिंदी पर एक लेख में मधुकर उपाध्याय ने लिखा है कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने चंपारण का सबसे प्रामाणिक इतिहास मानी जाने वाली अपनी किताब में भी इस प्रकरण को जगह नहीं दी है, लेकिन  बताते हैं कि आज़ादी के कुछ साल बाद वे एक कार्यक्रम में सभा को संबोधित करने मोतिहारी आए तो पाया कि सभा के एक कोने से एक व्यक्ति बार-बार उनके पास आने की कोशिश कर रहा है और पुलिस के सिपाही उसे रोक रहे हैं.

उन्होंने उस व्यक्ति को पहचानने में कोई ग़लती नहीं की, मंच पर बुलाकर उसे गले से लगाया, आसन देकर अपने पास बैठाया और सभा में उपस्थित लोगों को बताया कि ये सज्जन बतख मियां हैं, जिन्होंने 1917 में महात्मा गांधी को जहर देकर मार देने की गोरे नील बागान मालिकों की साज़िश से उनके प्राण बचाये थे.

बतख मियां की आपबीती सुनने के बाद उन्होंने वहां उपस्थित  जिलाधीश को उनके परिवार की गुजर-बसर के लिए उसे पचास (कुछ  स्रोतों के अनुसार पैंतीस) एकड़ खेती लायक भूमि प्रदान करने का आदेश दिया. लेकिन यह आदेश भी बतख मियां के किसी काम नहीं आया और उनके परिवार की दुर्दशा बदस्तूर जारी रही.  उन्होंने अपना आगे का जीवन उक्त आदेश के क्रियान्वयन के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटते और अफसरों व बाबुओं के तरह-तरह के संदेहभरे व अड़ंगेबाजी करने वाले सवालों के जवाब देते हुए बिताया, लेकिन चार दिसंबर, 1957 को अंतिम सांस लेने तक उन्हें संतुष्ट करके भूमि पाने सफल नहीं हो पाए.

सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता की हद यह कि उनके निधन के अगले साल,1958 में उनके परिवार को छ: एकड़ भूमि आवंटित भी की गई तो उनके गांव से कोई सौ मील दूर अकवा परसावनी गांव में. बेचारगी में यह परिवार 1960 में उक्त भूमि पर खेती करने वहां चला गया तो पाया कि वन विभाग ने उसे उक्त भूमि के आवंटन के विरुद्ध आपत्ति दर्ज करा रखी है.

इस आपत्ति का यथासमय निस्तारण न हो पाने के कारण परिवार को अगले छः साल तक उक्त भूमि पर कब्जा नहीं मिल पाया. मिला भी तो नदी के किनारे होने के कारण उस भूमि का बड़ा हिस्सा कटकर नदी में समा गया और परिवार की हालत कमोबेश फिर पहले जैसी हो गई.

इसे लेकर पहले बता मियां के बेटे, फिर पोते बार-बार आवाज उठाते और अपने परिवार की दुर्दशा की दुहाई देते रहे, लेकिन उनका इंतजार लंबा ही होता गया. राष्ट्रपति के उन्हें भूमि देने के आदेश का ठीक ठीक अनुपालन नहीं  हुआ तो नहीं ही हुआ और किसी ने भी इसकी शर्म नहीं महसूस की.

ढाक के तीन पात 

इस बीच देश की नदियों में बहुत पानी बह चुका है और बतख मियां के पोते भी साठ पार के हो चुके हैं. उन्हें शिकायत है कि उनके दादा की देशसेवा को भुला दिया गया है और वे अभी भी बेहद गरीबी में गुजर-बसर करने को मजबूर हैं. उनके परिजनों द्वारा कुछ दिन पहले पत्रकारों को दी गई जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा उनके परिवार को भूमि देने के आदेश के सम्यक अनुपालन की सारी फरियादें अभी भी नक्कारखाने में तूती की आवाज बनी हुई है. 2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल और 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय द्वारा किए गए प्रयासों के बावजूद.

दूसरी ओर मोतिहारी में मोतीझील के पास जो बतख मियां स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय बनाये गये हैं, उनका लाभ भी लोगों को इसलिए नहीं मिल पा रहा है कि उनमें स्वतंत्रता संग्राम या बतख मियां से संबंधित किताबें या सामग्री ही नहीं है.

अंत में एक और बात. गौरतलब है कि कहना बहुत कठिन है कि बतख मियां की कई दशक लंबी हो चुकी इस बेकदरी के गुनाह में किसका हिस्सा बड़ा और किसका छोटा है. कारण यह कि तब से अब तक देश और बिहार में प्रायः सारी राजनीतिक विचारधाराओं वाली सरकारें सत्ता संचालन  कर चुकी हैं और अपनी-अपनी बारी पर उन सबने बतख मियां की स्मृतियों के संरक्षण और राष्ट्रपति के उन्हें भूमि देने के आदेश के अनुपालन में एक जैसी उदासीनता व लापरवाही बरती है.

फिर हम किस मुंह से बचाने वाले को मारने वाले से बड़ा बता सकते हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)