नई दिल्ली: कैलिफोर्निया के फ्रेमोंट जिले में एक स्कूल बोर्ड ने हिंदुत्व समर्थकों और यहूदी समूहों के विरोध के बावजूद पिछले हफ्ते अपने जातीय अध्ययन/बहुसांस्कृतिक शिक्षा (Ethnic Study) के पाठ्यक्रम को मतदान के माध्यम से जारी रखने का फैसला किया है.
फ्रेमोंट यूनिफाइड स्कूल डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने यह फैसला ‘सवेरा: यूनाइटेड अगेंस्ट सुप्रीमेसी कोलिशन’ नाम के एक गठबंधन की मज़बूत वकालत के बाद लिया.
इस गठबंधन में आंबेडकर किंग स्टडी सर्किल (एकेएससी), हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (एचएफएचआर) और इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी) शामिल हैं, जिन्होंने पाठ्यक्रम का समर्थन करने के लिए समुदाय के सदस्यों को संगठित किया.
दो हफ्ते पहले कट्टर दक्षिणपंथी समूहों द्वारा इस पाठ्यक्रम के विरोध में दुष्प्रचार अभियान चलाने के कारण मतदान में देरी हुई थी. इन समूहों ने दावा किया था कि पाठ्यक्रम ‘हिंदू और यहूदी विरोधी’ है.
गठबंधन ने एक बयान में कहा कि समर्थकों ने व्यक्तिगत रूप से और ऑनलाइन दोनों तरह से बोर्ड की इस बैठक में भाग लिया, और पाठ्यक्रम के पक्ष में 19 में से 16 टिप्पणियां पेश कीं. छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और समुदाय के अन्य सदस्यों ने कार्यक्रम का समर्थन किया.
हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की सदस्य लिसा अधिकारी ने कहा, ‘एक हिंदू अमेरिकी अभिभावक और शिक्षक के रूप में मैं अपने बच्चों के लिए जातीय अध्ययन के महत्व को समझती हूं. हम दक्षिणपंथी हिंदू वर्चस्ववादियों को अपने बच्चों से उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करने से रोकने नहीं दे सकते. ऐसी शिक्षा जो समावेशी और सशक्त हो. आज के राजनीतिक माहौल में हमें इसकी पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है.’
फ्रेमोंट के एक अभिभावक और एकेएससी के सदस्य सेल्वा ने भी कार्यक्रम के लिए समर्थन व्यक्त किया. उन्होंने कहा, ‘बहुत लंबे समय से, फ्रेमोंट में कुछ हिंदू जातिवाद वर्चस्ववादियों ने समुदाय को डराने की कोशिश की है, उन्हें अपने बहिष्कार के एजेंडे का पालन करने के लिए डराया धमकाया है. इस सप्ताह, फ्रेमोंट ने दिखा दिया है कि जब हम एक साथ खड़े होते हैं और लड़ते हैं, तब हम जीतते हैं.’
एक दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संगठन- हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की कैलिफोर्निया की क्षेत्रीय निदेशक संगीता शंकर ने पाठ्यक्रम के खिलाफ बात की. यह संगठन बीते कुछ समय से खुद को ट्रंप प्रशासन और एमएजीए आंदोलन के साथ कदम मिलाता नजर आ रहा है.
शंकर ने ‘बंगाली-अमेरिकी, सिख-अमेरिकी और पंजाबी-अमेरिकी’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई. उनका तर्क था कि वे एक ही पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्होंने हेट क्राइम के संदर्भ में ‘हिंदू-अमेरिकी’ शब्द के बजाय ‘दक्षिण एशियाई’ शब्द के इस्तेमाल की भी आलोचना की. बाद में एक छात्र ने उनके बयान को सही करते हुए निशाना बनाकर की जाने वाली हिंसा के बारे में ऐतिहासिक संदर्भ दिया.
