‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ से पुरस्कृत लेखक दलपत सिंह राजपुरोहित का वक्तव्य.
तीसवां ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ मिलना मेरे लिए अत्यंत गौरव की बात है. मेरी पुस्तक सुंदर के स्वप्न को मिली यह मान्यता न केवल मध्यकालीन भारत और भक्ति साहित्य पर हो रहे शोध एवं आलोचना की दिशा को रेखांकित करती है, बल्कि इस क्षेत्र में नए विमर्शों को प्रेरित करने का आह्वान भी करती है. इस सम्मान के लिए मैं वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी, वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, उपन्यासकार मृदुला गर्ग, प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल और रेखा अवस्थी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूं. डॉ. देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में और ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ की संस्थापक-संचालक स्वर्गीय श्रीमती कमलेश अवस्थी की श्रद्धांजलि स्वरूप यह विचार गोष्ठी आयोजित की गई है, जिसका विषय ‘आस्था की विडंबनाएं’ है.
आस्था का प्रश्न निःसंदेह भक्ति आंदोलन की परिधि और उसकी समकालीन प्रासंगिकता से जुड़ा हुआ है, जो मेरी पुस्तक का भी प्रमुख विषय है. अतः इस गोष्ठी में मैं आस्था के प्रश्न को भक्ति की विरासत के संदर्भ में समझने और विश्लेषित करने का प्रयास करूंगा.
एक इंसान के रूप में हर व्यक्ति की अपनी सीमाएं होती हैं. हमारे पास अपने वर्तमान या भविष्य पर पूर्ण नियंत्रण नहीं होता, इसलिए हम अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए सहज रूप से विचारों, संस्थाओं, धर्मों और विभिन्न पहचानों में आस्था खोजते हैं. यानी, आस्था केवल भगवान तक सीमित नहीं होती; यह गुरु, संप्रदाय, पंथ, संस्थाओं, विचारधाराओं और यहां तक कि राजनीतिक दलों तक भी जाती है.
अपने मूल रूप में आस्था निर्दोष होती है और इसमें एक प्रकार की निरीहता निहित होती है, जिसके कारण इसे नियंत्रित किया जा सकता है. इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां आस्था का ‘एप्रोप्रियेशन’ करके व्यक्ति और समुदायों पर नियंत्रण स्थापित किया गया—और यह आज भी जारी है.
प्रश्न यह है कि आस्थावान होना क्या बुरा है?
भक्ति कविता इसका एक उत्तर देती है, जो यह है कि विवेकपूर्ण और तर्कसंगत आस्था अनुचित नहीं है, बल्कि सत्य की खोज के लिए आवश्यक है. भक्ति, परम सत्ता के साथ कवियों की जिरह की कविता है, क्योंकि उसमें आत्म के विस्तार की जिज्ञासा निहित है, और जिज्ञासु मन स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठाता है. यही कारण है कि भक्ति काव्य में प्रश्नोत्तर शैली, तर्कसंगत विवेक और संवादी भाव गहरे समाए हुए हैं. न केवल भक्ति काव्य, बल्कि हमारे अनेक धर्मग्रंथ, कथाएं और आख्यान भी ‘सॉक्रेटिक’ या प्रश्नोत्तर शैली में ही लिखे गए हैं.
सत्रहवीं सदी में राजस्थान के कवि सुंदरदास अपने समय की विभिन्न भक्ति परंपराओं—नाथ-योगी सिद्धांत, सूफ़ी प्रेम, षट्दर्शन और वेदांत—की सायास व्याख्या करते हैं और इसके लिए प्रश्नोत्तर शैली को अपनाते हैं. यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आस्था हमें सत्य की ओर ले जाती है, लेकिन सत्य की पहचान केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो संशय करता है, प्रश्न उठाता है और विवेक का सहारा लेता है. संशय और विवेक आस्था को दृढ़ बनाते हैं, उसे नकारते नहीं.
भक्ति कविता आस्था को शब्द देती है, उसका सौंदर्य रचती है, और उसे संगीत-सा बना देती है, जो सीधे हृदय में पैठता है. हमारे लोकवृत्त में इसकी निरंतर उपस्थिति के कारण इसे कभी भारतीय अंतर्मन की आवाज़ कहा गया, कभी जाति और संप्रदाय की सीमाओं या लैंगिक भूमिकाओं को तोड़ने वाला आंदोलन, और कभी राष्ट्र की सांस्कृतिक एवं संवेदनागत एकता को दर्शाने वाली शक्ति के रूप में भी प्रस्तुत किया गया.
भाषाई रूप से विविध, लेकिन प्रेम, जिज्ञासा और संशय का आधार ली हुई यह परंपरा दक्षिण की आण्डाल और अक्क महादेवी से लेकर पश्चिम के बसवन्ना, तुकाराम और नरसी मेहता, उत्तर भारत के कबीर, ललद्यद, रैदास, मीराबाई, सूरदास, गुरु नानक, दादूदयाल, सुंदरदास और पूर्व के चंडीदास, चैतन्य तथा लालन फकीर तक फैली हुई है. ये कवि जीवन, मृत्यु, अकेलेपन, भय, अनिश्चितता और मानवीय अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों को प्रेम की कसौटी पर कसते हैं. इनके समर्पण में संशय, विवेक और जिज्ञासा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.
भारत भर में भक्ति आंदोलन के विविध रूपों की उपस्थिति इसकी ऐतिहासिक व्याख्याओं के बंधे-बंधाए साँचों का अतिक्रमण कर जाती है. यदि अध्येता जॉन हॉली के शब्दों में कहें, तो इस कविता में एक प्रकार की ‘अन-डिटरमेंसी’ (अनिश्चितता) का भाव है; यह एक ‘अन-फ़िनिश्ड’ (अपूर्ण) प्रक्रिया है. इसी कारण, भक्ति के हर अध्येता को वर्तमान संदर्भ में इसके प्रस्तुतीकरण का अपना आख्यान रचना पड़ता है.
भक्ति आंदोलन क्या था, इस पर बात करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि यह आंदोलन क्या नहीं था. भक्ति कविता जिन पांडुलिपियों में पहले-पहल संग्रहित की गई—जैसे सिक्खों की गोइंदवाल पोथी या आदिग्रंथ, उसी समय संकलित फ़तेहपुर मेनुस्क्रिप्ट, दादू के शिष्यों द्वारा संकलित सरवंगी और पंचवाणी, या संतों के चरित पर आधारित भक्तमाल परंपरा—ये सभी किसी एक कवि पर केंद्रित संकलन नहीं हैं. इन ग्रंथों में अनेक धाराओं, संप्रदायों और संवेदनाओं से जुड़े कवियों को एक साथ रखा गया है.
यहां जितने तुलसीदास के राम अहम हैं, उतने ही कबीर के राम. जितने वल्लभ के कृष्ण ज़रूरी हैं, उतने ही मीरा के. जितनी जगह सूफ़ियों या नाथों के ‘अलख’ को मिली है, उतनी ही गुरु नानक के ‘एक-ओंकार’ या दादू के ‘सत्यराम’ को.
भक्ति कविता के ये संकलन हमें यह दर्शाते हैं कि सत्य पर किसी एक धर्म, एक ग्रंथ, या एक पंथ-संप्रदाय का एकमात्र अधिकार होने का दावा निरर्थक है. इसलिए, भक्ति के किसी एक कवि को आधार बनाकर किसी अन्य समुदाय की ‘अदरिंग’ (पराएपन का निर्माण) करना भक्ति आंदोलन की चेतना के मूल स्वरूप के विरुद्ध पड़ता है.
भक्ति या आस्था को कालातीत, यानी इतिहास से परे स्थित अवधारणा मानने से बचना चाहिए. भक्ति ऐतिहासिक समय में बंधी हुई अवधारणा है, इसलिए इसे ‘हिस्टॉरिसाइज़’ (इतिहासबद्ध) किए बिना, इसकी प्रकृति को पूरी तरह नहीं जाना जा सकता. भक्ति व्यक्तिगत और सामूहिक मुक्ति का आग्रह लेकर आती है, लेकिन इसके साथ-साथ यह आस्था के ऐसे तंत्र भी विकसित करती है, जो मनुष्य पर नियंत्रण की व्यवस्थाएं स्थापित करने में सहायक हो सकते हैं—और इतिहास में ऐसा होता भी रहा है.
इसलिए, भक्ति या आस्था को इतिहास से जोड़कर देखे बिना उसकी वास्तविक प्रकृति को सही ढंग से नहीं समझा जा सकता.
एके रामानुजन के शब्दों में कहें, तो भक्ति ‘भगवान से मातृभाषा में संवाद’ है. ईसा की दूसरी सहस्राब्दी, जिसे शैल्डन पोलक ने ‘देशभाषाओं की सहस्राब्दी’ कहा है, की शुरुआत से ही धर्मचर्चा, ज्ञान और दर्शन के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को भक्ति संवेदना मातृभाषा के माध्यम से विस्तार और संबल देती है. व्यापार के बढ़ाव के साथ सोलहवीं सदी से जिस सैद्धांतिक और आभासी अवकाश (वर्चुअल स्पेस) का निर्माण हुआ—जिसे पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ‘भक्ति का लोकवृत्त’ कहा है—वह केवल शाश्वत और पारलौकिक विषयों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें इहलौकिक और तात्कालिक समस्याओं पर भी गहन संवाद और तीव्र वाद-विवाद हुआ.
भक्ति के इस लोकवृत्त का संज्ञान तत्कालीन सत्ताधारी वर्ग भी ले रहा था, बल्कि वह इसमें एक प्रभावी भूमिका भी निभा रहा था. सुंदरदास ने कहा भी है, ‘प्रथम सुधर्म सुदेश कहूं ताके, भलो राज्य कछु दखल न जाके.’
सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य के अध्ययन का उद्देश्य उन द्वैतों की निर्मिति की प्रक्रिया को समझने का प्रयास होना चाहिए, जिनके माध्यम से अब तक हिंदी साहित्य के अतीत को परिभाषित किया गया है— मध्यकालीन बनाम आधुनिक, हिंदू बनाम मुस्लिम, सामंती संस्कृति बनाम जनसंस्कृति, भक्ति बनाम रीति, और शास्त्र-प्रधान बनाम लोककाव्य परंपरा. इन श्रेणियों के बीच कविता की आवाजाही को उद्घाटित करने का प्रयास भी आवश्यक है.
सुंदरदास जैसे संत अपने अनुभवजन्य विवेक के आलोक में शास्त्र को परखते हैं. उनकी कविता एक ओर मानवीय समानता के प्रति प्रतिबद्ध है और वर्णाश्रम व्यवस्था के नकार पर आधारित है, तो दूसरी ओर, यह शक्ति-काव्य की संरचना भी करती है, जिसमें उच्च सामाजिक पद की आकांक्षा रखने वाले समुदायों की आशाएं और स्वप्न प्रतिबिंबित होते हैं. किंतु समावेशी भक्ति के प्रति उनकी निष्ठा शक्ति-प्राप्ति की चेष्टाओं की निस्सारता को भी उजागर करती है. उनके काव्य में समानता और अद्वैत दर्शन से प्रेरित एक बहुभाषी संसार निर्मित होता है, जो उत्तर भारत के विविध भाषाई समुदायों को एक सूत्र में जोड़ता है.
सुंदरदास की कविता यह भी दर्शाती है कि कविता कैसे प्रार्थना और मंत्र का रूप धारण कर सकती है—एक प्रक्रिया जिसके माध्यम से दादूपंथ जैसे निर्गुण संप्रदाय संगठित हो रहे थे.
भक्ति अपनी समग्रता में कोई एकरूप, स्थिर या किसी विधि-विधान से बंधा उपदेश नहीं है. यह एक बहुआयामी, विरोधाभासों से युक्त और सहज मानवीय अनुभव से निकली कविता है—ठीक वैसे ही जैसे विभिन्न विचारों, निर्मितियों या संस्थाओं के प्रति हमारी सहज आस्था होती है. इन्हीं विडंबनाओं पर और इसके विविध आशयों पर आज का यह सत्र आयोजित किया गया है. एक अर्थपूर्ण चर्चा के लिए मेरी शुभकामनाएं!
